ek aur sham
आज सुबह आई
और मुज़े एक मुस्कुराहट ने नींद से जगाया,
बहुत थी खुशी
शायद खुद ही को रास ना आया,
कुछ पल में छूटा हर एक साया,
और खुशी को मैने दर्द में बदलता पाया
जैसे रंग के बाद रात आती है
मैने सुबह-सुबह मन का सूरज ढलता पाया|
क्या है जो मुझे कचोट गया,
क्या था जो मुझे तोड़ गया|
आया ख्याल बीता हुआ पल
नही लौट कर आता है|
जो घर बिखर गये
वो न फिर बनते है
बेहतर है एक नया सूरज
सुंदर होगा नया सवेरा
ये लिखा तो नही
लेकिन एक आस तो है
और अगर आस बाकी है
तो हो भी तो सकता है||
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शायद खोया ही इसलिए जाता है
ताकि नया हाथ में पकड़ा जा सके||
कहाँ सबकी कलाई इतनी तगड़ी होती है
किसी में इतनी ताक़त होती है
की वो सबकुछ उठा सकता है
लेकिन कई लोग वो भी तो हैं
जिनसे सबकुछ नही उठ सकता
क्या मुज़े जीना छोड़ देना चाहिए.
बिल्कुल नहीं||
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जीने के हैं कारण हज़ार,
एक इसमे तू मेरा भी नाम लिख ले
इश्क़ नही, हिम्मत नही, मुकाम नही, सफ़र नही
तू इसमे मेरा भी नाम लिख ले||
हम दोनो खुद रास्ता बनाएँगे||