जितना हूँ बाकी
January 4th, 2011
किस कश्ती का हूँ मैं माझी,
खबर है सिर्फ तुझको
बेखबर मैं, बेखबर सभी,
ढूँढते हैं कारण|
कि कोई नक्शा मिल जाए,
इस तैरते हुए पत्थर का|
सोचते हैं सभी,
किस मिट्टी का ये अरमान हैं,
पत्थर है लेकिन डूबता नहीं
क्या खबर उन्हे,
कि जो देखते हैं वो नज़रों से,
बची हुई एक कहानी हैं
कश्ती नहीं,
डूबे हुए काफ़िले का अरमान है|
अरमान है, ये भी खूब,
ना बचे हुए काफ़िले को बचाता है
ना डूबता है, पत्थर की तरह|
किस कश्ती का हूँ मैं माझी,
खबर है सिर्फ तुझको
बेखबर मैं, बेखबर सभी,
ढूँढते हैं कारण|
मौन ही शायद मेरी कहानी हैं
खबर है लेकिन फिर भी हूँ बेसबर,
मैं एक बचीं हुईं कहानी हूँ,
कश्ती नहीं
सिर्फ डूबे हुए काफ़िले का अरमान हूँ ||
अपूर्व
जितना हूँ बाकी