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Archive for the ‘The dungon grounds’ Category

नामंज़ूर

June 21st, 2010
सिमट-सिमट एक परछाई
खो गई धूप के गलियारे में,
सूरज ढला कुछ देर बाद,
लौटी नही वो ज़िंदगी के किनारों पे|
कहते-कहते नासूर हो गया,
यार जिंदगी थी या एक ख्वाब
कहाँ जीने का मतलब जिंदगी है,
भटकते आए है जब मुर्द् सारे, 
कहाँ महसूस का मतलब यहाँ बंदगी है|
जो जानते हैं सिर्फ़ कब्रिस्तान की ज़िंदगी,
उन महरूमो को कहाँ, 
महसूस होती हँसी है
जिन्हे दिखती लाशें हैं तरन्णू में
कहाँ उनके दर पर खुशी है मंज़ूर|
बेहोश शायर 
आज भी नही अकल का ठिकाना है|
ज़िंदगी नही तो भी अब गम नहीं
तमन्ना कब्रिस्तान बहाना है ||