” प्रेम” प्रेम जिसे हम प्यार के नाम से भी जानते हैं | प्यार एक ऐसे शब्द का नाम हैं जिसमें दो दिलों का मेल होता है|
प्रेम कहने के लिए तो बहुत ही आसान शब्द है लेकिन इसके अर्थ और भावनाओं को समझता है वही महान
आदमी होता है, क्योकिं प्यार सबके दिल में नहीं होता | प्यार का मतलब हर तरह के प्यार से है, चाहे वह
माता-पिता का प्यार हो चाहे वह भाई-बहन का प्यार हो या पति-पत्नी का प्यार हो | सब एक दम सच्चा होना
चाहिए| अगर प्यार में सचाई नहीं है तो वह प्यार किसी कम का नहीं है| क्योकिं जब वह एक बार टूटता जाता
है तो आसानी से नहीं जुड़ता है और अगर जुड़ता है तो वह फिर कभी नहीं टूटता |
इसी के संबंध में किसी ने ठीक ही लिखा हैकि:—————
” रहिमन धागा प्रेम का , माता तोड़ो चटकाय………….
टूटे पर फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पर जाय|
अर्थात, यह एक ऐसा प्रेम जो की एक धागा के रूप में इसका उल्लेख कवि ने किया हैकि प्रेम धागा के जैसा ही कोमल
होता है| इस प्यार रूपी धागा को हमेशा संभाल कार रखना चाहिए | प्यार कोई बच्चों का खेल नहीं होता | आपने पहले
रोमिओ-जुलिएट और हीर-रांझा की प्रेम कहानी पढ़ी होगी उन्होने प्यार के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कार दिया |
प्यार एक ऐसा शब्द है जिसे बड़े से बड़े लोग इसको पहचान नहीं पते , उनको इस बात का अनुभव तब होता है जब
उनके प्यार का बलिदान हो गया होता है| जो प्रेम का अर्थ समझता है वह महान पुरुष कहलाता है|
इस लिए तो कहा गया है:…………….
” पोत्ती पढ़ी-पढ़ी जग मुआ पंडित हुआ ना कोय,
ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय !
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Aapne prastut kiya hai Prem ka Aadarshvad, aapne Prem ka arth vyakt kiya hai Bhartiya Sankriti ke anusar…. Aur do sawaal per bhi aap sochiyega 1) Prem ka yatharth swaroop kya hai…. kyon ki Bhay aur Swarth bin priti nahi… 2) Prem ka American sanskriti anusar kya arth hai us per bhi sochiyega…