



मैं कुछ जगी सी कुछ सोयी सी…
अधखुली आँखों में ख्वाब नए पनप ने को बेताब…
मैं कभी हस्ती नए रंगों को निहारती…
कभी उदास नम आँखों से ख्वाबों को जुठलाती…
कशमकश भीतर उठी है कैसी यही न समज पाती…
मैं एक आह्ट से खिल सी जाती…
शायद बहार हो….!!!
सूखे पत्तो की सरसराहट जान भीतर सहम जाती…
मैं बस यूँही….
~ख्याति






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Good one again!!!
nice one…!..i am reading ur blog after a long time…i want to read all ur blogs…finding time…
happy valentine’s day