



तेरी हर निशानी मिटादी मैंने
पर खुद को कहाँ मिटा पाई
ज़बान तो खामोश हो गई
भीतर लिखा तेरा नाम कहाँ मिटा पाई
मुह मोड़ना अच्छे से सिख लिया मैंने
पलकों तले से तेरा चहेरा कहाँ मिटा पाई
यादें नश्तर बन चुभती रही है
मेरी साँसों में घुली तेरी साँसें कहाँ मिटा पाई
खुद की तलाश में भटकती रही
मुझमे बसा तेरा अक्स कहाँ मिटा पाई
हाँ अब मुझमे तेरा इंतज़ार नहीं
राह पर बिछी नज़रें कहाँ मिटा पाई
~ख्याति






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Beautiful lines..i feel like writing poems again.