



Baban Pandey ji ki mul rachana : “नदी तट पर बैठी एक औरत” par aadharit
“नदी तट पर बैठी एक औरत”
नदी तट पर बैठी थी
वह औरत …..
रोज देखती थी …
उसमे गिरते गंदे नालों को
उसे लगता
मैं भी इसी गन्दी नदी की तरह हू ॥
मानव व्यापार करने वालों ने
धकेल दिया मुझे …..
अँधेरी गलियो में ॥
मैं भी नदी की तरह
कितनों से समागम कर
ढ़ोती हू …उनकी गंदगी ॥
फिर कुछ दिन बाद
एक बाढ़ आयी ….
नदी साफ़ हो गयी ॥
तट पर बैठी औरत सोच रही थी
क्या मेरी जिन्दगी में भी कभी
इसी तरह कोई बाढ़ आएगी ?
पूजनीय नारी
इक गहरी सोच में डूबी औरत…
उम्मीद कहाँ से रख्खे वो…
उन् हवस खोर नर भेडियों से ?
सफ़ेदपोश समाज के ठेकेदारों से
जो पडदे के पीछे के खिलाडी है ?
की इस आम जनता से
जो हर बात पे खुद को लाचार कमज़ोर जता
सब देखा अनदेखा कर जाती है ?
उम्मीद कहाँ से रख्खे वो…
इक गहरी सोच में डूबी औरत…
नदी को बड़े गौर से देखती है…
सोचती है…
क्या कुछ गंदे नालों की गंदगी
गंगा को अपवित्र कर सकती है ?
औरत उठ खडी होती है…
हाँ, देहविक्रय उस का पेशा है… कर्म है…
अंतर मन से आज भी वो साफ़ है…
गंगोत्री की तरह ही पूजनीय |
-ख्याति © 2010




![]()
एक क्षण
एक क्षण
पूछा मैने उस से
तुम कैसी क्षण हो ?
सुख की या दु:ख की ?
वो मुस्कुराके बोली…
अपने भीतर झांक के देखो
अपने हर क्षण को महसूस कर के देखो
क्या पाते हो तुम एक क्षण में ?
मैने कुतूहलवश अपने भीतर झाँका
हर कण कण को महसूस कर देखा
एक ही क्षण में अनगिनत कोषो को विलीन होते पाया
एक ही क्षण में अनगिनत कोषो का नवसर्जन देखा
वो एक ही क्षण था… विलीन-नवसर्जन दोनों साथ..!!
मैं हैरान हूँ… बड़ा ही आश्चर्य…!!
श्रूष्टि का नियम हर जगह एक सा ही तो है…!
अपनी अपनी नज़र का फरक है
कोई देखता है सिर्फ विलीनीकरण… दु:ख…
कोई देखता है सिर्फ नवसर्जन… सुख…
डाल से एक पत्ता गिरता है
उसी पल एक नयी कुपल खिलती है
डाल रोए या मुस्कुराए…?
वो इंसान से ज्यादा समजदार है
श्रूष्टि के नियम का उसे स्वीकार है
वो दोनों को बड़े साहजिकता से लेना जानती है
क्या कभी हम इंसान ये सीख पाएंगे…???
_________________________khyati…




मुखौटा पहन राहमें हरकोई मिलता है
चहरे पे हंसी चिपकाए हम भी मिल लेते है
हर एक का अपना ही इक ग़म है
दिल में अपने माज़ी को छुपये हुए है
अपनें - अंजाने अंजाने - कुछ अपनें लगते है
अपनों के भरम से हम अक्सर धोखा खाते है
ए ज़िंदगी ! ये कैसी दौड़ लगी है ?
हम रोज़ खुद को वहीं का वहीं पते है !
खुद ही की वाह वाही में हम ऐसे खो जाते है
जिसने दुनियाँ बनाई उस खुदा को भूल जाते है !
……………………………………………ख्याति..




Kohraa ghanaa hai
Raah bhatki si hai
Dagar badi kathin hai
Manzil bahut dur hai
Naa kabhi tum vichaleet hona
Aash ka akhand deep jalaaye rakhanaa
Jisse khud pe hai yakeen
Kar sakte hai voh
Har naa-mumkin ko mumkin
Yeh honsalaa sadaa banaaye rakhanaa
Har darr ke aage hi kahi jeet hai
Yeh tum sadaa yaad rakhanaa
Kuchh paane ki tum zidd karo
Aage badhane ki tum zidd karo
Haar se yun kadmo ko roko nahi
Har haar ko apni jeet ka aagaaz banaao
Andhere se naa gabharaao mere dost
Apne dil mey nayaa suraj ugaao




Sukhii thi bejaan si thi
Andar ik aag si thi
Dur dur tak tasati nigaahein
Aash ne ashroo bhi sukhaa diye
Ik aahat si hui
Ghan-ghor ghataa thi chhaayi
Thandi hawaa yun laharaayi
Aash hole sey muskaayi
Chaand-Suraj chhup key sharmaaye
Pyaar ki barasaa mey main bhinjaayi
Aanchal mey har boond yun sanjoyi
Hariyaali ban har rang ne li angadaayi
Bhige badan pe barasti boondoin ka shrungaar
Uss pe chadhaa yun teri nazaroin ka khumaar
Udaa aanchal jo tuney thaama
Meghdhanush ban woh nabh pe chhaya
_______________________Khyati




Ashqoin mey dhundhaley Aksharoin mey Pyaar ka taraanaa Dhoondhati rahi _____________khyati




गुम हुए सारे अर्थ शब्दों के….
मौन की हलचल मची है….
उम्मीदों के ढेर तले…
संबंधों की सांस दबी है….
क्या पाया क्या खोया…?
गिन्ती में ही ज़िंदगी बीती चली है…
khyati…




जो दिखता है
वो है नही
जो है
वो दिखता नही
चहेरे पे मोहरा
मोहरे पे चेहरा
क्या सच क्या जुठ?
कौन जाने?
रख दिल साफ
सब दिखेगा साफ
khyati




उन्हें फ़ुर्सद कहाँ की पलभर हमें याद करे…
चाँद नें कभी ली है आह चकोर के लिए…?
khyati…




Gazal ki aarzoo thi, sher bhi na hua…
Khwaab ki tamanna mei nind hi kaha aayi…!!!
khyati


More Options ...
Categories
Tag Cloud
Blog RSS
Comments RSS

Void « Default
Life
Earth
Wind
Water
Fire
Light 