November 28, 2011
By: archana dubey
Category: Poetry
व्यस्त पन्नो की कहानी,उनकी अपनी और सबकी
दौड़ती है जिंदगी ये, हर दिशा मे तेजी से ये
भीड़ मे मै भीड़ थी औ, भीड़ मे संकीर्ड थी मै
वो अकेला है लगा पर, साथ किसको चाहिए अब
व्यस्त पन्नो की कहानी,उनकी अपनी और सबकी
जिंदगी जीती रही मै, सांसो मे मरती रही मै
गहरे कुओ और बावड़ी मे, डूबती उतरती रही मै
भावना के भाव देखू, इतना भी अब कब समय है
व्यस्त पन्नो की कहानी,उनकी अपनी और सबकी
नज़र को अंदाज़ दे दू, जुल्फ को बयार दे दू
उंगलियों से तितलियों को,पकडू छोडू, छोडू पकडू
मन का व्यवहार बदला,अब नहीं वो बोलता है
छोटी छोटी स्मिता से,काम अब चलता नहीं जो
व्यस्त पन्नो की कहानी,उनकी अपनी और सबकी
पत्र को एक माह लगते, तब तलक हम थे तरसते
आवाज सुनाने को तड़पते, नोट तब होते नहीं थे
आज सिक्को मे हो बांते, पर नहीं वो और नहीं हम
व्यस्त पन्नो की कहानी,उनकी अपनी और सबकी