काश वो स्वप्न ही होते
काश वो स्वप्न ही होते…….
काश वो स्वप्न ही होते…….
लगता था उनकी नज़रो से नज़रे मिली हो जैसे
चाँद जब छत से नज़र आता था
ढूढ़ते थे चाँद को जब उन्हें देखने का मन करता था
और वो अक्सर तड़पाता था, गायब हो जाता था
वो काले सफ़ेद बदलो मे छुपता और निकलता था
बेबसी मे दिन गुजरते थे रात का इंतजार होता था
उनसे तो दूरी है चाँद मे आस नज़र आती थी
पर वह भी बेपरवाह था उनकी तरह
अपनी ही धून गाता था,खुदी मे रहता था
जब दिल ने हताश हो, दूरियों से हार कर
फासले रखने की सोची, चाँद से भी वास्ता न रहा
पर ,अब चाँद नज़र आता है जब मै काले बदलो को ढूढती हू
सुबह सूरज को देखना चाहा तो चाँद पीछे था
ज्यो कहता हो मै अब भी हूँ दिल में तेरे
और कितना भरम कितना झूठ कहोगी खुद से
मै साया हू कभी डूबता नहीं
तेज़ रौशनी से कब तक छुपाओगी मुझे
घूमता हू तेरे अंदर बाहर, चाहे दिखू ना दिखू
सांस हूँ कोई खुशबू नहीं कि कभी हूँ कभी नहीं
ये तो गुनाह ही हुआ जो उन्हें चाँद से जोड़ दिया
वो तो गए हमे यादो के संग छोड़ दिया
ये जो तन्हाई है वो चाँद कि रोशनी में
कई बार नहाई है मेरे अश्को संग
नज़र चुराते है जो आँख भर आई है
चाँद मे अब उनकी गहराई जो नहीं
पर चाँद उन्हें भी तडपाना कभी मेरी तरह
जुदाई कि चुभन उन्हें भी मिले कभी मेरी तरह