Chand ka asar
लगता था उनकी नज़रो से नज़रे मिली हो जैसे
चाँद जब छत से नज़र आता था
ढूढ़ते थे चाँद को जब उन्हें देखने का मन करता था
और वो अक्सर तड़पाता था, गायब हो जाता था
वो काले सफ़ेद बदलो मे छुपता और निकलता था
बेबसी मे दिन गुजरते थे रात का इंतजार होता था
उनसे तो दूरी है चाँद मे आस नज़र आती थी
पर वह भी बेपरवाह था उनकी तरह
अपनी ही धून गाता था,खुदी मे रहता था
जब दिल ने हताश हो, दूरियों से हार कर
फासले रखने की सोची, चाँद से भी वास्ता न रहा
पर ,अब चाँद नज़र आता है जब मै काले बदलो को ढूढती हू
सुबह सूरज को देखना चाहा तो चाँद पीछे था
ज्यो कहता हो मै अब भी हूँ दिल में तेरे
और कितना भरम कितना झूठ कहोगी खुद से
मै साया हू कभी डूबता नहीं
तेज़ रौशनी से कब तक छुपाओगी मुझे
घूमता हू तेरे अंदर बाहर, चाहे दिखू ना दिखू
सांस हूँ कोई खुशबू नहीं कि कभी हूँ कभी नहीं
ये तो गुनाह ही हुआ जो उन्हें चाँद से जोड़ दिया
वो तो गए हमे यादो के संग छोड़ दिया
ये जो तन्हाई है वो चाँद कि रोशनी में
कई बार नहाई है मेरे अश्को संग
नज़र चुराते है जो आँख भर आई है
चाँद मे अब उनकी गहराई जो नहीं
पर चाँद उन्हें भी तडपाना कभी मेरी तरह
जुदाई कि चुभन उन्हें भी मिले कभी मेरी तरह

soft,sad.sweet and tender.l
1Nice to see your comment Mahen.I really miss the old blogs and instant comments.Where are you being.
2CHAND HI CHAND KA ASHAR HAI YA ARCHANA’S POETRY ? ……….
nICE ONE
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