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काश वो स्वप्न ही होते

January 17, 2012 By: archana dubey Category: Poetry

काश वो स्वप्न ही होते
कम से कम आशाये ना होती
एक समय से शुरु और ख़त्म होते
उम्मीदे  ना होती की कुछ मेरी सुने
और कुछ अपनी  कहे 
कुछ जवाब दे और कुछ प्रश्न करे
कुछ बांटे और कुछ बाते करे 
कभी गुस्सा हो और कभी मनाए
काश वो स्वप्न ही होते 
अपनी तरह ही उन्हें मानती
हर बात कहती और समझती
मुझे यु गलत ना समझते 
क्योकि मेरा दिलो दिमाग 
उनका ही होता पूरी रात 
बहुत कुछ बोलना ना पड़ता
वो जानते की मै क्या हू
और क्या चाहती हू 
काश वो स्वप्न ही होते
मेरे अहसास से शुरु और खत्म होते
कभी शक शुबह ना होते
बस दिल की गहराई से जीते
साथ साथ दिन रात 
यु मेरे पीछे  पड़ परेशां ना करते 
ना दिल तोड़ते ना मन मारते मेरा 
काश वो स्वप्न ही होते 
जानना चाहते मेरी आरजू भी 
मेरे जुनू मे हमनशी होते
ना छिपाते कोई बात कभी 
ना कभी दुनियादारी दिखाते 
क्योकि दुनिया के लिए तो हम साथ नहीं  
जब छिपाते कुछ यु भीतर 
उनकी परतो मे घुस मन जान जाती 

काश वो स्वप्न ही होते…….

2 Comments to “काश वो स्वप्न ही होते”


  1. archana dubey says:

    Thanks Nakul

    1
  2. nakul sharma says:

    very nice dear

    2


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