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March 27, 2012 By: archana dubey Category: Poetry

खुद से ही भागती फिरती रही

 सब से यूँ घुलती मिलती रही 
उन बवंडर और भवरों मे फंसी 
 सांसो मे एक राज दबाती रही 
 गहराई से डर कही जोर से हंसी 
तो कही बस मुस्कुराती रही 
खुद को ना देख लूँ कही
डर के आइने से झिझकती रही 
 स्याह काली ही निखर के आती है
और रंग कहा उतने उभर पाते है
दे दिया तुम्हे बस यही रंग,पाती
सब रंग बाकि लिए मै जीती रही
बद से कभी किसी को प्यार हुआ भला 
बेरंग कहा किसी को भाते है 
 ये कला सीख ली अब तो 
 अब हम भी दिल बहलाते है 
 खुद से ही भागती फिरती 
सब से यु घुलती मिलती रही 

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