Untitled
खुद से ही भागती फिरती रही
सब से यूँ घुलती मिलती रही
उन बवंडर और भवरों मे फंसी
सांसो मे एक राज दबाती रही
गहराई से डर कही जोर से हंसी
तो कही बस मुस्कुराती रही
खुद को ना देख लूँ कही
डर के आइने से झिझकती रही
स्याह काली ही निखर के आती है
और रंग कहा उतने उभर पाते है
दे दिया तुम्हे बस यही रंग,पाती
सब रंग बाकि लिए मै जीती रही
बद से कभी किसी को प्यार हुआ भला
बेरंग कहा किसी को भाते है
ये कला सीख ली अब तो
अब हम भी दिल बहलाते है
खुद से ही भागती फिरती
सब से यु घुलती मिलती रही
