भारतीय मुक्केबाजों के घूंसे………..
अस्सी के दशक के बाद से, आज शायद पहली बार ऎसा हुआ है कि क्रिकेट में भारत की जीत फीकी पड़ गई और मुक्केबाजी में भारत की विजय तो छोड़िए, हार ने भी भारतीयों का दिल जीत लिया।
बीजिंग ओलम्पिक में सुशील कुमार ने आज पहले भारत के लिए कांस्य पदक जीता, उनके बाद जितेन्दर कुमार मुक्केबाजी के मुकाबलों में हार गए। लगभग उसी समय दाम्बुला में भारतीय क्रिकेट टीम ने श्रीलंका को दूसरे एकदिवसीय मैच में हराया।
लेकिन आज भारतीयों को क्रिकेट की जीत से ज्यादा गर्व महसूस हो रहा था अपने हारे हुए लाडले मुक्केबाज जितेन्द्र कुमार पर, जो मीडिया की सुर्खियों से दूर, करोड़ों रुपयों के सरकारी इनामात से वंचित, विज्ञापनों की मोटी रकम से अनजान, हरियाणा के भिवानी शहर में अपने दम पर मुक्केबाजी का ऎसा कौशल साध चुका था कि बीजिंग ओलम्पिक में मुक्केबाजी स्पर्धा के क्वार्टरफाइनल तक जा पहुंचा था।
उसके कुछ घंटे बाद ही विजेन्द्र कुमार ने अपने प्रतिद्वंदी को घूंसे मार- मार कर 9-4 से हरा दिया और सेमीफाइनल में पहुंच गए।
ओलम्पिक के लिए गए थे, तब इन मुक्केबाजों का नाम भी नहीं जानती थी आम जनता - क्योंकि न इन्हें मीडिया सिर चढ़ाता था, न नेता इनाम बांटते फिरते थे।
आज आम जनता खुश है कि उसके जैसे गुमनाम खिलाड़ी ही विश्व मंच पर देश के नाम की धूम मचा रहे हैं, और वे खिलाड़ी कहीं नहीं हैं जो "ग्लैमर" के कारण मीडिया की सुर्खियां बने रहते हैं।
बात सिर्फ विजय की नहीं है, बात यह सच कर दिखाने की है, कि भारत की मिट्टी में वह ताकत है कि सुविधा और आडंबर के बिना भी वह दुनिया फतह कर सकती है।
यह विजय हौसला देगी उन तमाम भारतीयों को जो छोटी जगहों में रहते हैं और अपने- अपने क्षेत्र में विश्व विजय के सपने पालते हैं।
उस हौसले को सलाम, उन सपनों को नमन और शुभकामनाएं आम भारतीय को, दुनिया फतह करने के लिए।
Posted in Sports.
– September 13, 2008
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