Friends' Update
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Broadcasting my thoughts
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– July 24, 2012
प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ???
हांथो में तेरे हाँथ को लेकर
देखे थे जो हमने सपने
उनको अब कैसे बिसराउ
प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ?
तन में ,मन में रोम - रोम में
हो दिल के हर एक धड़कन म
बिन तेरे कैसे रह पाऊं
प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ?
घन तिमिर में खो गए कहाँ हो
कुछ तो बोलो प्रिये कहाँ हो
रोते दिल को क्या समझाऊं
प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ?
आँखों से बहती अश्रु धाराए
पूछती हैं ये तुम क्यों न आये
बोलो तुम ही क्या बतलाऊं
प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ?
मन के मीत तू लौट के आ जा
इन नयनो की प्यास बुझा जा
तनहा दिल अब जी ना पाऊं
प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ?
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– June 28, 2011
सम्भल जा रे पाक !
अपने नापाक इरादो
भला इसी में है तेरा
सबक लो तुम खताओं से
बम -बारूद ही क्या
तुने अंगार बरसाए
सिवा स्वयम के अपमान का
हिंद का कुछ कर भी पाए ?
बार- बार ही तुमने
इधर आँखें उठाई
चुप रहे हम तो
इसकी हंसी उड़ायी
हस्र इसका तुम्हे पता है
हरदम मात खानी पड़ी
भाग गए तेरे सभी मेमने
क्या यही तुमने जंग लड़ी ?
कान खोल सुन रे दुष्ट !
हिंद खून जब खौल जाता
तू क्या महाकाल भी
पथ अपना छोड़ भाग जाता
आशुतोष अम्बर
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– August 21, 2010
ये फैशन मुझको नहीं भाता
प्यार जताने हमें न आता
मत कर मुझसे जोरा-जोरी
काज आई हेट लव स्टोरी
लड़का ये एडवांस नहीं है
दिल पर इसके चांस नहीं है
कर मत लेना दिल की चोरी
काज आई हेट लव स्टोरी
मैं ठहरा गावन का छोरा
मन भाउंगा कैसे तोरा
हट जा दूर शहर की छोरी
काज आई हेट लव स्टोरी
तुझे सदा देखता रहता हूँ
मन ही मन कुढ़ता रहता हूँ
आ जाना मत छत पर मोरी
काज आई हेट लव स्टोरी
चक्कर में मैं तेरे रहता
पर दोस्तों से न कुछ कहता
मत बांधो बंधन की डोरी
काज आई हेट लव स्टोरी
दिल में दर्द बहुत हूँ सहता
बिन देखे तुमको नहीं रहता
दया करो अब मुझ पर गोरी
काज आई हेट लव स्टोरी
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– July 5, 2010
लाख दिल अपना खोल के दिखाते रहे
हरदम उनको ही अपना बताते रहे
मगर दो लब्ज भी हमसे वो कह न पाए
वे हमें जान न पाए
हर ख्वाब में उन्हें ही सजाते रहे
रात - रात भर खुद को जगाते रहे
कभी वे अपनी आँखे नम कर न पाए
वे हमें जान न पाए
उनकी चाहत में आँखे बरसती रहीं
दिल ये रोता रहा सांस अटकती रही
पर फिर भी सहारा हमें दे न पाए
वे हमें जान न पाए
खुद को जलाकर, रोशन उन्हें हम करते रहे
कभी भीगते रहे कभी तपते रहे
जालीम जमाने से वो लड़ न पाए
वे हमें जान न पाए
आवाज दे - दे कर उनको बुलाते रहे
हम रोते रहे वे मुस्कुराते रहे
चाहत का उनको एहसास करा न पाए
वे हमें जान न पाए
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– June 29, 2010
चल रहा ऐसा समय
लड़कों का बना जमाना है
फीरे निकम्मे घुमते ये
नीत नया लुक अथराइज है
ये तो modenr boys हैं
सिगरेटों के धुएं
कितने गुटके भी चूस जातें हैं
लाज शर्म सब भूलकर
चहु ओर मचाते नवाइज हैं
ये तो modenr boys हैं
धुत्त नसे में हरदम रहते
तन तक का होस खो जातें है
मुंगेरी के रंगीन सपनों सा
हवा में करते फ्लाइज हैं
ये तो modenr boys हैं
मम्मी - पापा भूल गए
मलिका -मेघना इन्हे याद रहीं
गर्ल फ्रेंड दो - चार जरुरी
ऐसी देते अड़वइज हैं
ये तो modenr boys हैं
दो पैसे पा जाएँ कही से
मौज मस्ती में डूब जातें है
घर के लोग मरे खाने को
सेलफोन इनकी च्वाइस
ये तो modenr boys हैं
फिल्म इल्म के चक्कर में
सब अपना समय गवातें है
कैसे पार लगेगी नैया
नहीं करते रियलाइज हैं
ये तो modenr boys हैं
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– June 23, 2010
हे !विघ्नों के तारनहार
जीवन पथ के हे मार्ग द्वार
हे ! परमपूज्य कमल चरणों में
शत -शत नमन कोटि- कोटि प्रणाम
हे ! परम ब्रह्म हे पूज्य पिता
वंदन अभीनन्दन करता हूँ
बताये हुए आपके ही पथ पर
ख़ुशी -ख़ुशी मैं चलता हूँ
बचपन में जो शैतानी की
पश्चाताप मैं करता हूँ
आपके कथनों को भूल न जाऊं
सोच - सोच के डरता हूँ
पकड़ - पकड़ के आपके अँगुलियों को
चलना जब याद आता है
आँखों से मेरे दो प्यार के
आंसू टपक ही जाता है
सोचता हूँ जब आपकी बातें
सब दुःख दूर हो जाता है
मिलता है फिर अजीव सकूँन
और मन कहीं खो जाता है
पापा मेरे भाग्य विधाता
अब दरिन प्रतीञ मैं करता हूँ
नही कभी दिग्भ्रमित होऊंगा
फिर वादा मैं आपसे करता हूँ
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– June 22, 2010
मन मेरे पागल सा होकर
तू बैठा क्या कर रहा
औरों की प्रगति देख
हीन भाव क्यों भर रहा
अरे मन ! सोचो ज़रा
तू है कौन ?
सब जानकर भी बैठे हो
क्यों मौन ?
अरे पगले ! उठो !
निज पथ का निर्माण कर
तुम्हे है क्या करना
अपने लक्ष्य की पहिचान कर
जीवन भरी है उथल - पुथल से
कंटकों का ताज है
जो तुम्हे था कल करना
वह उचित समय आज है
समय बहुत बहुमूल्य है
बेकार की गवाओ नहीं
समझ - बुझ के चलना है
राह में भटक जाओ नहीं
कुछ अपने को भी सोचो
तेरे पर ही नाज है
मै तो कहता हूँ की
तू ही जगत का ताज है
ये मेरे प्यारे मन !
तू मेरा कहना मान ले
उचित - अनुचित क्या है
अच्छी तरह पहचान ले
तुम ऐसा कर्म करो की
जग तेरा भी गुण गाये
तेरे पदचिन्हों पर चलकर
सारे लोग सकूँन पाए
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– June 19, 2010
खो दिया तो तुमने
सब कुछ उसके लिए
अब बताओ तुमको
बदले में उसने क्या दिए
ज्ञान वाली दिव्य ज्योति
क्यों तुम्हारी बुझ गयी
पत्ती चहुँ विकास की
क्यों नहीं नीकली नयी
भद्र जन तुमको तो
बारम्बार समझाते रहे
लेकिन तुम और भी
उसके करीब जाते गए
तुम तो कहते थे
हर साँस तुम्हारी है वही
गर्त में तुम गीर रहे थे
ख्याल तुमको था नहीं
तन्द्रा तेरी तब टूटी
नैया तुम्हारी डूब गयी
जली -जलाई तेरी
दीपक की बाती बुझ गयी
सावधान ! रे पगले
कलजुग की गाडी चल रही
परख सही से स्वर्ण कलस में
मदीरा तो नहीं है भरी
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– June 18, 2010
वो कौन थी ??
रीमझीम फुहारों में
सावन की बहारों में
वह थी कड़ी छत पर
चाँद सी सीतारों में
पास ही में मैं भी था
देख रहा प्रकृती का अनुपम नजारा
झूमते तरू ,मलय पवन
तटिनी का उन्मुक्ता कीनारा
दृष्टी मेरी रूक गयी अचानक
उस नीलीमा पर आकर
हलके नीले अम्बर उसके
खुश थे उसे सजाकर
काली जुल्फे मृगा नयन
अती सुन्दर रजत दन्त पक्तियां
लगता जैसे हो उसके अन्दर
अगनीत दीव्य शक्तीयां
स्वक्छंद होकर ले रही आनद
थी वह जल कनो का
उस समय वह ही थी सायद
सर्व सुख सम्पन्न प्राणी इस धरा का
कभी देखती ऊपर और कभी अंजली
भर जल लेकर स्वयं को नीहारती
पता नहीं अपने कीस पीय को
वह थी पुकारती
बहुत ही खुस थी आँखें मेरी उसे देखकर
पर उस खुसी का अंत भी होना ही था
धीरे-धीरे तम ने समेत लीया उसे अपने अन्दर
ऑंखें फीर न देख सकी उसे इन्हे तो रोना ही था
अब जब भी सावन आता है
मई जा बैठता उस छत पर
इस आशा के साथ की सायद वह कहीं से आ जाय
उस दिन की ही तरह इन नयनो में चा जाय
पर वह कहाँ अब आने वाली
होगी कोई परी या फीर राजकुमारी जन्नत की
या प्रकृती की छोटी तनूजा
अती आनंदीत वीचरण करती होगी नीले अम्बर में
फीर भी उस दिन जो उस खुसी मे
चंचल वाणी मेरी मौन थी
बार - बार दिल यही पूछता
मुझे बता वह कौन थी ? वह कौन थी ?
आशुतोष कुमार
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– June 15, 2010