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माँ क़ी ब्यथा !!

अपनी जननी को तुम पल में 
विसरा क्यों देतो हो ?
जिसकी पावन छाँव में पलकर
 तुम जीवन सुख लेते हो 
  
जिसकी कोमल अँगुलियों को 
पकड़ -पकड़ चलाना सिखा 
जिसने तेरी किस्मत 
अपने हांथों से है खुद लिखा

उस माँ के आँखों में इतना
 आंसू  क्यों दे जाते हो ?
फूलों सी उस ममतामयी पर
 शब्दों के बाण चलते हो 

वह  जिसके आँचल ने तुझको 
इतना सारा प्यार दिया 
जिसने स्वयं बिन खाए रहकर 
तुझे खिलाकर बड़ा किया 

करुणामयी उस माँ के हिय पे 
आघात क्यों पहुंचाते हो ?
अपनी ही माँ को रुला-रुला के 
सच बोलो क्या पाते हो ?

जिस प्रसू क़ी गोंद ने
तुझको है आकर दिया 
कोटि- कोटि मन्नतों से जिसने 
स्वप्न तेरा साकार किया 

देवी सी उस धात्री के चरणों में 
शीश नहीं नवाते हो 
मंदिर – मंदिर भटक रहे हो 
पर माँ को कहा पाते हो ??

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प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ???

प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ???

हांथो में तेरे हाँथ को लेकर
देखे थे जो हमने सपने
उनको अब कैसे बिसराउ
प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ?

तन में ,मन में रोम – रोम में
हो दिल के हर एक धड़कन म
बिन तेरे कैसे रह पाऊं
प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ?

घन तिमिर में खो गए कहाँ हो
कुछ तो बोलो प्रिये कहाँ हो
रोते दिल को क्या समझाऊं
प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ?

आँखों से बहती अश्रु धाराए
पूछती हैं ये तुम क्यों न आये
बोलो तुम ही क्या बतलाऊं
प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ?

मन के मीत तू लौट के आ जा
इन नयनो की प्यास बुझा जा
तनहा दिल अब जी ना पाऊं
प्रिये तुम्हे कैसे भूल जाऊं ?

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सम्भल जा रे पाक !

सम्भल जा रे पाक !
अपने नापाक इरादो  
भला इसी में है तेरा 
सबक लो तुम खताओं से 

बम -बारूद ही क्या 
तुने अंगार बरसाए 
सिवा स्वयम के अपमान का 
हिंद का कुछ कर भी पाए ?

बार- बार ही तुमने 
इधर आँखें उठाई 
चुप रहे हम तो 
इसकी हंसी उड़ायी 

हस्र इसका तुम्हे पता है 
हरदम मात खानी पड़ी 
भाग गए तेरे सभी मेमने 

क्या यही तुमने जंग लड़ी ?

कान खोल सुन रे दुष्ट !
हिंद खून जब खौल जाता 
तू क्या महाकाल भी 
पथ अपना छोड़ भाग जाता 

  आशुतोष अम्बर 

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आई हेट लव स्टोरी

ये फैशन मुझको नहीं भाता 
प्यार जताने हमें न आता
मत कर मुझसे जोरा-जोरी 
काज आई हेट लव स्टोरी 

लड़का ये एडवांस नहीं है 
दिल पर इसके चांस नहीं है 
कर मत लेना दिल की चोरी 
काज आई हेट लव स्टोरी

मैं ठहरा गावन का छोरा 
मन भाउंगा कैसे तोरा 
हट जा दूर शहर की छोरी 
काज आई हेट लव स्टोरी

तुझे सदा देखता रहता हूँ 
मन ही मन कुढ़ता रहता हूँ 
आ जाना मत छत पर मोरी 
काज आई हेट लव स्टोरी

चक्कर में मैं तेरे रहता 
पर दोस्तों से न कुछ कहता 
मत बांधो बंधन की डोरी 
काज आई हेट लव स्टोरी

दिल में दर्द बहुत हूँ सहता 
बिन देखे तुमको नहीं रहता 
दया करो अब मुझ पर गोरी 
काज आई हेट लव स्टोरी 


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वो हमें जान न पाए

लाख दिल अपना खोल के दिखाते रहे 
हरदम उनको ही अपना बताते रहे 
मगर दो लब्ज भी हमसे वो कह न पाए 
वे हमें जान न पाए 

हर ख्वाब में उन्हें ही सजाते रहे 
रात – रात भर खुद को जगाते रहे 
कभी वे अपनी आँखे नम कर न पाए 
वे हमें जान न पाए  

उनकी चाहत में आँखे बरसती रहीं 
दिल ये रोता रहा सांस अटकती रही 
पर फिर भी सहारा हमें दे न पाए 
वे हमें जान न पाए  

खुद को जलाकर, रोशन उन्हें हम करते रहे 
कभी भीगते रहे कभी तपते रहे 
जालीम जमाने से वो लड़ न पाए 
वे हमें जान न पाए  

आवाज दे – दे कर उनको बुलाते रहे 
हम रोते रहे वे मुस्कुराते रहे 
चाहत का उनको एहसास करा न पाए 
वे हमें जान न पाए  



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ये तो modenr boys हैं (कविता )

चल रहा ऐसा समय 
लड़कों का बना जमाना है 
फीरे निकम्मे घुमते ये 
नीत नया लुक अथराइज है 
            ये तो modenr boys हैं  

सिगरेटों के धुएं 
कितने गुटके भी चूस जातें हैं 
लाज शर्म सब भूलकर 
चहु ओर मचाते नवाइज हैं  
             ये तो modenr boys हैं  

धुत्त नसे में हरदम रहते 
तन तक का होस खो जातें है 
मुंगेरी के रंगीन सपनों सा 
हवा में करते फ्लाइज हैं 
               ये तो modenr boys हैं  


मम्मी – पापा भूल गए 
मलिका -मेघना इन्हे याद रहीं 
गर्ल फ्रेंड दो – चार जरुरी 
ऐसी देते अड़वइज हैं 
             ये तो modenr boys हैं  

दो पैसे पा जाएँ कही से 
मौज मस्ती में डूब जातें है 
घर के लोग मरे खाने को 
सेलफोन इनकी च्वाइस 
             ये तो modenr boys हैं  

फिल्म इल्म के चक्कर में 
सब अपना समय गवातें है 
कैसे पार लगेगी नैया 
नहीं करते रियलाइज हैं 
             ये तो modenr boys हैं  






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मेरे पापा भाग्य विधाता

हे !विघ्नों के तारनहार 
जीवन पथ के हे मार्ग द्वार 
हे ! परमपूज्य कमल चरणों में 
शत -शत नमन कोटि- कोटि प्रणाम  

हे ! परम ब्रह्म हे पूज्य पिता 
वंदन अभीनन्दन करता हूँ 
बताये हुए आपके ही पथ पर 
ख़ुशी -ख़ुशी मैं चलता हूँ 

बचपन में जो शैतानी की 
पश्चाताप मैं करता हूँ
आपके कथनों को भूल न जाऊं 
सोच – सोच के डरता हूँ 

पकड़ – पकड़ के आपके अँगुलियों को 
चलना जब याद आता है 
आँखों से मेरे दो प्यार के 
आंसू टपक ही जाता है 

सोचता हूँ जब आपकी बातें 
सब दुःख दूर हो जाता है 
मिलता है फिर अजीव सकूँन 
और मन कहीं खो जाता है 

पापा मेरे भाग्य विधाता  
अब दरिन प्रतीञ मैं करता हूँ 
नही कभी दिग्भ्रमित होऊंगा 
फिर वादा मैं आपसे करता हूँ 


 





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पागल मन

मन मेरे पागल सा होकर 
तू बैठा क्या कर रहा 
औरों की प्रगति देख 
हीन भाव क्यों भर रहा 

अरे मन ! सोचो ज़रा
तू है कौन ?
सब जानकर भी बैठे हो 
क्यों मौन ?

अरे पगले ! उठो !
निज पथ का निर्माण कर 
तुम्हे है क्या करना 
अपने लक्ष्य की पहिचान कर 

जीवन भरी है उथल – पुथल से 
कंटकों का ताज है 
जो तुम्हे था कल करना 
वह उचित समय आज है 

समय बहुत बहुमूल्य है 
बेकार की गवाओ नहीं 
समझ – बुझ के चलना है 
राह में भटक जाओ नहीं  

कुछ अपने को भी सोचो 
तेरे पर ही नाज है 
मै तो कहता हूँ की 
तू ही जगत का ताज है 

ये मेरे प्यारे मन !
तू मेरा कहना मान ले 
उचित – अनुचित क्या है 
अच्छी तरह पहचान ले 

तुम ऐसा कर्म करो की 
जग तेरा भी गुण गाये 
तेरे पदचिन्हों पर चलकर 
सारे लोग सकूँन पाए  




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बेखबर तुम !!!

खो दिया तो तुमने
सब कुछ उसके लिए
अब बताओ तुमको
बदले में उसने क्या दिए

ज्ञान वाली दिव्य ज्योति
क्यों तुम्हारी बुझ गयी
पत्ती चहुँ विकास की
क्यों नहीं नीकली नयी

भद्र जन तुमको तो
बारम्बार समझाते रहे
लेकिन तुम और भी
उसके करीब जाते गए

तुम तो कहते थे
हर साँस तुम्हारी है वही
गर्त में तुम गीर रहे थे
ख्याल तुमको था नहीं

तन्द्रा तेरी तब टूटी
नैया तुम्हारी डूब गयी
जली -जलाई तेरी
दीपक की बाती बुझ गयी

सावधान ! रे पगले
कलजुग की गाडी चल रही
परख सही से स्वर्ण कलस में
मदीरा तो नहीं है भरी


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वो कौन थी ???

  वो कौन थी ??

रीमझीम फुहारों में 
सावन की बहारों में 
वह थी कड़ी छत पर 
चाँद सी सीतारों में 

पास ही में मैं भी था 
देख रहा प्रकृती का अनुपम नजारा 
झूमते तरू ,मलय पवन 
तटिनी का उन्मुक्ता कीनारा

दृष्टी मेरी रूक गयी अचानक 
उस नीलीमा पर आकर 
हलके नीले अम्बर उसके
खुश थे उसे सजाकर 

काली जुल्फे मृगा नयन 
अती सुन्दर रजत दन्त पक्तियां 
लगता जैसे हो उसके अन्दर 
अगनीत दीव्य शक्तीयां  

स्वक्छंद होकर ले रही आनद 
थी वह जल कनो का 
उस समय वह ही थी सायद 
सर्व सुख सम्पन्न प्राणी इस धरा का 

कभी देखती ऊपर और कभी अंजली
भर जल लेकर स्वयं को नीहारती 
पता नहीं अपने कीस पीय को 
वह थी पुकारती

बहुत ही खुस थी आँखें मेरी उसे देखकर 
पर उस खुसी का अंत भी होना ही था 
धीरे-धीरे तम ने समेत लीया उसे अपने अन्दर 
ऑंखें फीर न देख सकी उसे इन्हे तो रोना ही था 

अब जब भी सावन आता है 
मई जा बैठता उस छत पर 
इस आशा के साथ की सायद वह कहीं से आ जाय 
उस दिन की ही तरह इन नयनो में चा जाय 

पर वह कहाँ अब आने वाली 
होगी कोई परी या फीर राजकुमारी जन्नत की 
या प्रकृती की छोटी तनूजा 
अती आनंदीत वीचरण करती होगी नीले अम्बर में  

फीर भी उस दिन जो उस खुसी मे
चंचल वाणी मेरी मौन थी 
बार – बार दिल यही पूछता 
मुझे बता वह कौन थी ? वह कौन थी ?

                                   आशुतोष कुमार 







 

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