वो कौन थी ??
रीमझीम फुहारों में
सावन की बहारों में
वह थी कड़ी छत पर
चाँद सी सीतारों में
पास ही में मैं भी था
देख रहा प्रकृती का अनुपम नजारा
झूमते तरू ,मलय पवन
तटिनी का उन्मुक्ता कीनारा
दृष्टी मेरी रूक गयी अचानक
उस नीलीमा पर आकर
हलके नीले अम्बर उसके
खुश थे उसे सजाकर
काली जुल्फे मृगा नयन
अती सुन्दर रजत दन्त पक्तियां
लगता जैसे हो उसके अन्दर
अगनीत दीव्य शक्तीयां
स्वक्छंद होकर ले रही आनद
थी वह जल कनो का
उस समय वह ही थी सायद
सर्व सुख सम्पन्न प्राणी इस धरा का
कभी देखती ऊपर और कभी अंजली
भर जल लेकर स्वयं को नीहारती
पता नहीं अपने कीस पीय को
वह थी पुकारती
बहुत ही खुस थी आँखें मेरी उसे देखकर
पर उस खुसी का अंत भी होना ही था
धीरे-धीरे तम ने समेत लीया उसे अपने अन्दर
ऑंखें फीर न देख सकी उसे इन्हे तो रोना ही था
अब जब भी सावन आता है
मई जा बैठता उस छत पर
इस आशा के साथ की सायद वह कहीं से आ जाय
उस दिन की ही तरह इन नयनो में चा जाय
पर वह कहाँ अब आने वाली
होगी कोई परी या फीर राजकुमारी जन्नत की
या प्रकृती की छोटी तनूजा
अती आनंदीत वीचरण करती होगी नीले अम्बर में
फीर भी उस दिन जो उस खुसी मे
चंचल वाणी मेरी मौन थी
बार - बार दिल यही पूछता
मुझे बता वह कौन थी ? वह कौन थी ?
आशुतोष कुमार
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