Skip to content

Categories:

वो हमें जान न पाए

लाख दिल अपना खोल के दिखाते रहे 
हरदम उनको ही अपना बताते रहे 
मगर दो लब्ज भी हमसे वो कह न पाए 
वे हमें जान न पाए 

हर ख्वाब में उन्हें ही सजाते रहे 
रात - रात भर खुद को जगाते रहे 
कभी वे अपनी आँखे नम कर न पाए 
वे हमें जान न पाए  

उनकी चाहत में आँखे बरसती रहीं 
दिल ये रोता रहा सांस अटकती रही 
पर फिर भी सहारा हमें दे न पाए 
वे हमें जान न पाए  

खुद को जलाकर, रोशन उन्हें हम करते रहे 
कभी भीगते रहे कभी तपते रहे 
जालीम जमाने से वो लड़ न पाए 
वे हमें जान न पाए  

आवाज दे - दे कर उनको बुलाते रहे 
हम रोते रहे वे मुस्कुराते रहे 
चाहत का उनको एहसास करा न पाए 
वे हमें जान न पाए  



Posted in Uncategorized.



0 Responses

Stay in touch with the conversation, subscribe to the RSS feed for comments on this post.