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समस्या है खुद न्यायपालिका — CJI को पत्र

भारत के मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय और अन्य लोगों को भेजने के लिए इस पत्र पर हस्ताक्षर करें


प्रिय मित्रों, 


निन्यानवे प्रतिशत से अधिक भारतीयों के लिए, न्यायिक उपचार की मांग असंभव है. अदालत में जाना बाधाओं से भरा हुआ है , जैसे –

  

  • बहुत महंगे वकील 

  • “तारीख पे तारीख”  – लगातार तहकूबी की वजह से विलंब 

  • मामूली कारणों पर स्थगन आदेश  (स्टे ऑर्डर)

  • कठिन और समय लेने वाली  अदालती प्रक्रियायें

  • ब्रिटिश युग से चली आ रही गुलामी परक शब्दों से भरी अदालती भाषा 

  • बार बार होने वाले न्यायालयीन अवकाश (कोर्ट वेकेशंस) से न्याय का प्रवाह टूटता है जो फैसलों में देरी के लिए जिम्मेदार है


हम सभी देखते हैं कि न्यायपालिका कई प्रशासनिक और अर्ध-न्यायिक प्रक्रियाओं (क्वॉसी जुडीशियल प्रोसीडिंग्स) के आदेश को बेमानी बना देती है. उदाहरण के लिए, हमारे नागरिक निकाय, अवैध संरचनाओं को  ध्वस्त करने और कब्जा करने वालों को  बेदख़ल करने में असहाय हैं क्योंकि अदालतें,  नियमित रूप से  दीर्घकालिक परिणामों के बारे में सोचे बिना विध्वंस और बेदखली नोटिस पर स्थगन आदेश देती रही है. हर महीने यह देखा गया है कि इन स्थगन आदेशों की वजह से, सूचना आयुक्तों के  कई अच्छे आदेश निश्प्रभावी हुए है.


लेकिन न्यायाधीशों  के सामने कोई भी प्रतिक्रिया रखने की हमारी हिम्मत नहीं होती, क्योंकि हम अदालत की अवमानना के लिए जेल में जाने से डरते हैं. हम जजों के निर्विवाद अधिकार और उनकी शक्ति से भयभीत होते हैं क्योंकि  वे परोक्ष या अपरोक्ष रुप से हमें बहुत नुकसान पहुँचा सकते हैं.


विडंबना देखें,  हम प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की कडे शब्दों में आलोचना करने से नहीं डरते लेकिन न्यायाधीशों को निर्विवाद सच बात बताने की सोच से भी कांप उठते है. 


मित्रों, चलिये, अब हम यह डरना बंद करें. हमें न्यायपालिका से जुड़े इस कड़वे सच को स्पष्ट रूप से व्यक्त करना होगा. हम न्यायपालिका से  स्वयं सुधार के लिये कहें. कृपया याद रखें, अदालतें केवल आम आदमी की सेवा के लिए मौजूद है, इसके अलावा उनके अस्तित्व का और कोई अन्य कारण नहीं. आम आदमी की सेवा करने में वे लगातार विफल रहे हैं, इसलिए यह हमारा कर्तव्य है कि हम इस असफलता को उल्लेखित करें और तत्काल परिवर्तन की मांग करें.


हम आठ लोगों ने (जिनमें से पांच सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली और बंबई उच्च न्यायालयों में  कार्यरत  अधिवक्ता हैं) सच बात कहने का निर्णय लिया है. 


25 दिसंबर 2011 को हम, भारत के मुख्य न्यायाधीश, सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और बार एसोसिएशन (वकील संघटना) के अध्यक्ष, केंद्रीय कानून मंत्री और भारतीय विधि आयोग को इस पत्र की प्रतियां भेजेंगे.


सुप्रीम कोर्ट के वकील श्री अब्दुल रशीद कुरैशी और बॉम्बे हाई कोर्ट के वकील श्री अमित मेहता से प्राप्त महत्वपूर्ण जानकारियों के आधार पर कई संशोधनों के बाद हमने नीचे दिये पत्र का मसौदा बनाया है.


हम चाहते हैं आप सभी इस पत्र पर हस्ताक्षर करके हमारे साथ शामील हों.  हस्ताक्षरित पत्र में शामिल होने के लिये कृपया अपना ईमेल पता, व्यवसाय, शहर और संपर्क नंबर इस ईमेल पर भेजें: grvora1@gmail.com


धन्यवाद. 

कृष्णराज राव  thebravepedestrian@gmail.com

98215 88114 

(हिंदी अनुवादक सुमेर बैस)


अनुवादित पत्र का मसौदा


25 दिसम्बर 2011 


प्रति, 

माननीय  न्यायमूर्ति श्री एस एच कपाड़िया 

भारत के मुख्य न्यायाधीश 

द्वारा/ रजिस्ट्रार 

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय,

तिलक मार्ग, नई दिल्ली – 110 001 

 

प्रतिलिपि: 

सभी उच्च न्यायालयों के माननीय मुख्य न्यायाधीश

द्वारा/   रजिस्ट्रार जनरल 

 

अध्यक्ष, बार एसोसिएशन (वकील संघटना)

 

श्री सलमान खुर्शीद 

केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री 

साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली 

 

माननीय न्यायमूर्ति श्री पीवी रेड्डी 

अध्यक्ष, 19  वाँ  विधि आयोग 

दुसरी  मंजिल, विधि संस्थान भवन 

सुप्रीम कोर्ट के सामने

नई दिल्ली 110 001. 


आपने न्यायपालिका को आम आदमी की पहुंच से परे रखा है, 

विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिक. 

कृपया इस स्थिति में सुधार करें 

 

प्रिय महोदय, 


हम भारत के लोग आपको अपने न्यायिक क्षमता में नहीं बल्कि भारत की न्यायपालिका के प्रशासनिक प्रमुख के रूप में संबोधित कर रहे हैं. महोदय, इससे पहले कि आप कुछ महीनों में निवृत्त हो, हम आशा करते हैं कि आप एक प्रबुद्ध प्रशासनिक सुधारक के रूप में अपने ज्ञान का उपयोग समाज हित में करें, और हमारे राष्ट्र को नुकसान पहुँचा रही कुछ पुरातन न्यायिक परंपराओं को खत्म करें. 


महोदय, उच्च न्यायपालिका के निरंकुश तरीकों से पीडित प्रतिवादी और याचिकाकर्ता बोल नहीं सकते. उन्हें डर रहता है कि आपके भ्राता न्यायाधीश कुछ मनमाने ढंग से आदेश जारी करके उनके मामलों को  नुकसान पहुँचायेंगे. हम उनकी ओर से बोल रहे हैं. 


भारत की न्यायिक मशीनरी वरिष्ठ नागरिकों के लिए उपलब्ध नहीं रह गई है. कोई भी वरिष्ठ नागरिक मामला दर्ज नही कर सकता, क्योंकि 15-20 साल तक निर्णय पर पहुंचने की संभावना नहीं. तब तक वह या तो बूढ़ा हो गया होगा, या फिर उसका देहांत हो गया होगा. 


आम जनता और बहुत सारे धनी लोग भी  अदालत में नहीं  जा सकते क्योंकि यह लाखों रुपयों का ऐसा बेक़ाबू खर्च है, जो उनके जीवन भर की पूंजी को खत्म कर देता है. 


दशकों से, न्यायिक मशीनरी का प्रशासन सकल रुप से  विफल हुआ है. कई न्यायाधीशों ने विभिन्न मंचों पर अपने भाषणों में इसकी ओर इशारा किया है. ये भाषण सिर्फ सुनने में अच्छे लगते हैं,  बाद में इस बारे में कुछ भी नहीं  किया जाता. 


“ न्यायपालिका की स्वतंत्रता” के सिद्धांत ने न्यायपालिका में सुधार करने में सरकार और संसद को अक्षम कर रखा है. केवल न्यायपालिका ही स्वंय सुधार कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट सम्पूर्ण अधीक्षण की समग्र अदालत है. न्यायपालिका की प्रशासनिक शक्तियाँ सिर्फ आप के हाथों में ही निहित हैं और आप इनका पुरजोर उपयोग करें. यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो कोई भी आपको यह करने के लिए मजबूर नही कर सकता. कोई भी अपनी आवाज नही उठा सकता, आपकी प्रशासनिक विफलता के लिये आलोचना नहीं कर सकता और आपकी जगह एक सक्षम प्रशासक प्रतिस्थापित करने की धमकी नहीं दे सकता, क्योंकि ऐसा करना अवमानना को आमंत्रित करना होगा.


केवल आप, भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश, हमारी न्यायपालिका के सुधारों का आरंभ कर सकते हैं. पहला कदम होगा आप न्यायपालिका की खामियां खुलकर स्वीकार करें और इसे बदलने के लिए समय सारिणी के साथ एक रूपरेखा निर्धारित करें.


चाहे हम किसी भी अदालत के समक्ष वादी हों या न हों, न्यायपालिका की अनुपलब्धता और संरक्षण के अभाव की वजह से हम सभी हमारे दैनिक जीवन में गंभीर विकलांगता और कुंठाओं से ग्रासित हैं. कृपया हमारी  आवाज़ सुनें क्योंकि हम इन परिस्थितियों से  पीड़ित है.

  

कुछ समस्याएं और प्रस्तावित समाधान: 

  

समस्या 1: बहुत ही आसानी से अनिश्चित काल के लिए स्थगन आदेश मिलना. महोदय,  कई निचली अदालतें, अधिकरण, अर्ध-न्यायिक मंच (जैसे सूचना आयोग) के अच्छे तर्कपूर्ण निर्णयों को उच्च न्यायालयों से स्थगन आदेश (स्टे ऑर्डर) दिए गये हैं. विभिन्न प्रशासकीय आदेश और डिमॉलिशन नोटिस, जो कि महानगर पालिकाओं द्वारा ग़ैरक़ानूनी बांधकाम (कन्स्ट्रक्शन) के खिलाफ जारी किए जाते हैं उन्हें, अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया जाता है. स्थगन आदेश को हटाने के लिए बेहद मशक्कत करनी पड़ती है. ऐसा करना विभिन्न क़ानूनों के लिए, क़ानून प्रवर्तन एजेन्सियों के लिए और क़ानून का पालन करने वाले सामान्य नागरिकों के लिए एक बंद गली साबित होता है और उसके मन में वैधानिक तरीकों के बारे में उदासीनता पैदा करता है.

प्रस्तावित समाधान: सबसे पहले यह निर्देश जारी करें कि अगर किसी भी अदालत ने स्थगन आदेश जारी किया है तो वह मामला अपने आप “फास्ट ट्रेक” मामला हो जाए. अधिकतम एक सप्ताह के अंतराल की तिथियाँ दी जाए ताकि जिस पार्टी ने स्थगन आदेश लिया है वह न्यायिक देरी का अनुचित लाभ ना ले सके. इस मामले का निपटारा तीन महीने में हो जाना चाहिए और असाधारण मामलों में  छह महिने तक. दूसरे, यह अनिवार्य करें कि छह महिने के बाद यह स्थगन आदेश अपने आप समाप्त हो जाए ताकि उसका लाभार्थी  देरी करने की रणनीति में शरण न ले.


समस्या 2: बहुत ही आसानी से मामला तहकूब होना (ऐद्जोर्न्मेंट). उच्च न्यायालय और सभी निचली अदालतों की कार्यवाही एक हिन्दी फिल्म के प्रचलित वाक्यांश से अभिव्यक्त हो सकती है — “तारीख पे तारीख”. सत्र और मैजिस्ट्रेट अदालतों की कार्यवाहियों को तो समझा भी नहीं जा सकता. अंडरट्रायल्स और आरोपी पार्टियों को हर 2-3 महिनों में तलब किया जाता है और नई तारिखों के साथ वापस भेज दिया जाता है. उन्हें यह भी जानकारी नहीं होती कि उनकी सुनवाई क्यों नहीं हुई. उनकी प्रस्तुतियों को ध्यानपूर्वक नहीं सुना जाता. कभी कभार अगर ज़ोर लगाया जाए तो अदालत के कर्मचारी कमजोर स्पष्टीकरण देते हैं.  अदालत, पुलिस और आम जनता के हज़ारो कामकाजी घंटे बरबाद हो जाते हैं. और जैसे जैसे वर्ष बीतते जाते हैं, स्मृतियाँ धूमील होती जाती हैं, गवाह पलट जाते हैं और न्याय अर्थहीन हो जाता है. इस देरी का लाभ सिर्फ़ वकिलों को ही होता है.

प्रस्तावित समाधान: कृपया निर्देश जारी करके यह अनिवार्य करें कि वकिलों और पार्टियों पर उत्तरोत्तर ऐद्जोर्न्मेंट के लिए बढ़ता हुआ जुर्माना लागू किया जाए, जैसे प्रथम ऐद्जोर्न्मेंट पर 2000 रुपयों का जुर्माना, दूसरे ऐद्जोर्न्मेंट पर 5000 रुपयों का जुर्माना और तीसरे और अंतिम ऐद्जोर्न्मेंट पर 15000 रुपयों का जुर्माना.


समस्या 3: तारिखों के बीच का व्यापक अंतराल. कभी कभी तिथियों के बीच का अंतराल छह महिने तक का होता है, मुक़दमे सालों और दशकों तक खींचते चले जाते हैं. इस वजह से कभी कभी  न्यायालयीन हिरासत में रखे गये आरोपी को जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों से वंचीत होना पड़ता है.

प्रस्तावित समाधान: सबसे पहले निर्देश जारी करके अनिवार्य करें कि तिथियों  का अंतराल 15-30 दिनों के भीतर हो और कुल 10 तिथियों से ज़्यादा न हो. कई अधिवक्ताओं ने उनके अध्ययन से यह राय जाहिर की है कि ट्रायल कोर्टस्, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालयों में चल रहे मामले 7 से 10 तारिखों के बीच अपने अंतिम निर्णय पर पहुँच सकते हैं. दूसरे, यह अनिवार्य करें कि विरोधियों/ उत्तरदाताओं को अग्रीम सूचना (नोटीस) दी जाए ताकि पहली दो तारिखों की व्यर्थता समाप्त हो सके.


समस्या 4: आश्चर्यों की अदालते, क़ानून की नहीं . अपने बदव्यवहार के पीछे छिपकर, अपने अवमानना के अधिकार के कवच में न्यायाधीश बिल्कुल सनकी अंतरीम आदेश, राहतें और निर्णय देते हैं जो किसी भी क़ानूनी तर्कों पर खरे नहीं उतर सकते. निचली अदालतों के कई तर्कशुद्ध निर्णयों को खारीज़ किया जाता है या उच्चतर न्यायालय उन्हें  कमजोर आधारों पर फिर खोलती हैं. ऐसे निर्णय अक्सर प्रभावशाली या धनी व्यक्तियों के पक्ष में होते हैं.

प्रस्तावित समाधान: कृपया न्यायिक लेखा परीक्षण तंत्र की स्थापना करें जो संदिग्ध निर्णय और उनके तर्कों की जाँच करें. जिन न्यायाधीशों ने तर्कसंगत निर्णय नहीं लिए हैं उनकी पुछताछ हो और उनके ही साथियों द्वारा वे आलोचित हों.  


समस्या 5: वरिष्ठ वकीलों की भारी फीस और दलाली का नेटवर्क. वरिष्ठ वकील अंधाधुंद फीस चार्ज कर रहे हैं, जैसे प्रत्येक उपस्थिती के लिए 5 से 20 लाख रुपये. भले ही उन्हें एक स्थगन आदेश का अनुरोध करने के लिए कुछ  क्षण ही कोर्ट मे खड़ा होना हो, वे पूरी  फीस चार्ज करते हैं. कुछ मिनिटों के परामर्श के लिए भी वे लाखों  रुपये लेते हैं. अगर उन्हें अन्य कोर्ट में खड़ा होना हो तो प्रत्येक उपस्थिति के लिए यह आंकड़ा करोड़ों तक जाता है. कम जाने माने अधिवक्ता, दलाली  के बदले ऐसे बड़े अधिवक्ताओं की नियुक्ति के लिए अपने ग्राहकों  को मनाते हैं. ऐसे अमीर क़ानूनी दिग्गज वकिलों के क्लर्क और जूनियर्स अदालतों को “मैनेज” करते हैं ताकि आरामदायक तारिख़ें मिलें और बेंच की रीअसाइनमेंट हो जिसमें मित्रतापूर्ण न्यायाधीश हो. ऐसे  वकीलों का चेहरा और धनशक्ति यह सुनिश्चीत करता है कि भले ही मामले में कोई दम न हो, न्यायाधीश उनके व्याख्यान बड़े ध्यान से सुनते हैं. ऐसे वरिष्ठ वकीलों से प्रेरणा पाकर, कम जाने-माने वकिल भी अपनी फीस अंधाधुंध बढ़ा देते हैं. इस तरह से न्याय आम आदमी की पहुँच से दूर हो जाता है और अमीरों को अनुचित लाभ मिलता है. आजकल कंपनियाँ ही ऐसे वकीलों को वहन कर सकती हैं.  

प्रस्तावित समाधान: न्याय प्रक्रिया आम आदमी को उपलब्ध हो इसके लिए कृपया न्यायपालिका के सभी स्तरों पर सभी वकीलों के लिए एक उचित शुल्क संरचना लागू करें, विशेषकर उच्च न्यायपालिका में. जो अनिवार्य शुल्क संरचना का उल्लंघन करें, तो उनकी सनद रद्द कर दी जाए.


समस्या 6: अहंभाव और चापलूसी की संस्कृति. वकील लगातार ब्रिटिश काल की अभिव्यक्तियाँ, जैसे “युवर लॉर्डशिप”, “मिलार्ड”, “प्रेयर्स”, “वी क्रेव युवर लीव”, “वी हंम्बली प्रे”, “फॉर धीस फेवर वी विल एवर बी  इन युवर डेट” आदि, का प्रयोग करके न्यायाधिशों के अहंभाव को बढ़ाते हैं. अदालती लेखन सामग्री में भी ऐसी गुलामी परक भाषा पाई जाती है, जबकि नागरिक संविधान द्वारा उसे दिए गए अधिकारों के आधार पर ही न्याय माँग रहा है, किसी एहसान की भीख नहीं माँग रहा. न्यायाधीश उन वकिलों और नागरिकों को न्याय से वंचित करते हैं जो इस संस्कृति का विरोध करते हैं. जो नागरिक स्वयं “पार्टी इन परसन” के रूप में स्वयं का मामला लड़ने के लिए अदालत के सामने हाज़िर होते हैं, उन्हें परेशान किया जाता है. न्यायपालिका के परिसर में इस तरह गुलामी को बढ़ावा देना, समानता, जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.

प्रस्तावित समाधान: कृपया ऐसी अनावश्यक भाषा पर प्रतिबंध लगाएं और सुनिश्चित करें कि अब भाषण और लेखन में सभी न्यायाधिशों के लिए केवल “महोदय” शब्द का ही प्रयोग हो.


समस्या 7: अदालतों में झूठे सबूत और झूठी गवाहियाँ देना नज़रअंदाज़ किया जाता है. हालाकि, अदालतों के औचित्य के उल्लंघन पर सज़ा देने में शीघ्रता दिखाई जाती है, न्यायाधीश तब नाराज़ नहीं होते जब उनके आदेशों का सरासर उल्लंघन किया जाता है. इसके अलावा वे झूठे  दस्तावेज, झूठी गवाहियाँ और एकमुश्त झूठ को नज़रअंदाज कर देते हैं. इससे अपराधिओं का पलड़ा भारी हो जाता है, और निरपराध नागरिकों के साथ अन्याय होता है. 

प्रस्तावित समाधान: कृपया हर अदालत में आदेशों के उल्लंघन और झूठी गवाहियों के मुद्दों के लिए एक समय निर्धारित करें.


समस्या 8: लंबी छुट्टियाँ और कम काम के घंटो की ब्रिटिश काल की प्रथा. निचली न्यायालय वर्ष में 240 दिन, और उच्च न्यायालयें 210 दिन काम करते हैं. सर्वोच्च न्यायालय सिर्फ 180 दिन, यानी कि आधे साल, काम करता है. गर्मियों में सम्पूर्ण न्यायपालिका (सभी न्यायाधीश, वकील, बाबू , आदि) लगातार छुट्टियों की वजह से 5 से 7 हफ्ते बंद रहती है. सर्वोच्च न्यायालय 10 मई से 30 जून तक छुट्टी पर चला जाता है. प्रशासन के अन्य किसी भी अंग के पास ऐसी उदार सुविधा नहीं है. कई अदालतों में तो प्रतिदिन 3 से 4 घंटे ही काम होता है. बढ़ते हुए लंबित मामलों के परिप्रेक्ष में इस तरह की कामकाजी आदतें सिर्फ़ अनुचित ही नहीं बल्कि दुर्लभ राष्ट्रीय संसाधन (न्यायालय के संसाधन) का दुरुपयोग भी है, और हमारी जनता की आपराधिक उपेक्षा भी है.

प्रस्तावित समाधान: सबसे पहले कृपया छुट्टियों की संख्या सीमित करके 60 दिन कर दें (यह भी अन्य क्षेत्रों से ज़्यादा ही होगा). दूसरे, सामुहिक छुट्टियों पर पाबंदी लगा दें. छुट्टियों को इस तरह से नियोजित किया जाए ताकि पूरा कोर्ट बंद न हो. अंत मे कृपया यह अनिवार्य करें कि हर न्यायाधीश  प्रतिदिन कमसे कम 6 घंटे मामलों की सुनवाई करे. 



महोदय, कई नागरिक मंचो ने बड़े धीरज से इन विचारों को संकलित किया है और कई वर्षों तक अपनी बात रखते रहे हैं, लेकिन न्यायपालिका ने उन्हें सदा अनदेखा किया. अब सभी का धीरज एक सीमा तक पहुँच गया है. हमें उम्मीद है कि आप निवृत्त होने से पहले अपने ऊँचे पद का उपयोग करेंगे और तत्काल इन अत्यावश्यक सुधारों को लागू करेंगे. हमें यह भी उम्मीद है कि आप स्पष्ट रूप से अपना अभिप्राय देश के सामने रखेंगे और सुविचारी नागरिकों को आपके हाथ मजबूत करने की सक्षमता प्रदान करेंगे.


भवदीय, 

  

1. ए. राशीद कुरैशी, 7838408078 rasheed1357@yahoo.co.in , अधिवक्ता, दिल्ली 

 

2. जी. आर. वोरा, 9869195785 grvora1@gmail.com , रोगविज्ञानी, मुंबई 

 

3. कृष्णराज राव, 9821588114 thebravepedestrian@gmail.com , पत्रकार, मुंबई 

 

4. ए. आयर्स रॉड्रिक्स, 9822684372 airesrodrigues1@gmail.com , अधिवक्ता, गोवा 

 

5. ए. अमित मेहता, 9821283232 ameetvmehta@gmail.com , अधिवक्ता, मुम्बई 

 

6. ए. आर्यन यादव, 9717468613 aryanscadvocate@gmail.com , अधिवक्ता, दिल्ली 

 

7. रमिज़ तौहिद, 09891664368 tauheedrameez@gmail.com , अभियंता, दिल्ली 

  

8. ए. विनोद संपत, 9324038095 vinodsampat@gmail.com , अधिवक्ता, मुम्बई


IMPORTANT NOTE: 

The original draft of this letter was in English. It was signed by 115 persons as of 22 December 9.30 p.m. See http://tinyurl.com/Chief-Justice-Letter-E3 

The above-named eight persons were the first signatories of this letter in English, before it was circulated in the public domain.

This letter has been translated into Hindi by Sumer Bais, an activist, and has been adequately proof-checked by Meenal Rege. 

The aim of this translation is to reach a wider audience and raise awareness of this important issue, and to gather wider support.

The above mentioned eight original signatories, or any of the later signatories, are not to be held responsible for inaccuracies in translation. Their signature is to the original English letter only.

Posted in Activism, Governance & Administration, Our Future, Right to Information, RTI Act 2005.

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