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वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने आखिरकार बजट पेश कर दिया। देश का बजट हर वित्त मंत्री को पेश करना होता है सो, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने भी कर दिया। कम से कम मुझे तो एक क्षण के लिए भी नहीं लगा कि वित्त मंत्री एक ऐसे महान क्षण के लिए संसद में खड़े हैं जिसका इंतजार पूरा देश साल भर से करता रहता है और अगले साल भर तक का लेखा-जोखा जिसके आधार पर ही होता है। फिर वो, मामला चाहे देश के साल भर के बजट का हो या फिर हमारे-आपके घर के बजट का।

वित्त मंत्री ने जब बजट भाषण पढ़ना शुरू किया और उसके बाद जैसे-जैसे उनकी एक-एक लाइनें आती गईं। लगा जैसे उनकी साल भर की मीडिया से मुखातिब होने वाली हर प्रेस कांफ्रेंस को वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने सहेज कर रहा था और उसका एक संग्रह करके बजट भाषण तैयार करवा दिया। जिस एक एलान की वजह से वित्त मंत्री उम्मीद कर रहे हैं कि इस बजट को आम आदमी का बजट करार दिया जाए। उसकी ही चर्चा कर लेते हैं। वो, है टैक्स की सीधी छूट में बीस हजार रुपए की और छूट। एक अप्रैल 2012 से डायरेक्ट टैक्स कोड लागू होना है जिसमें 2 लाख रुपए तक की कमाई टैक्स फ्री है। और, उस लिहाज से एक लाख साठ हजार से एक लाख अस्सी हजार रुपए तक की कमाई को टैक्स से मुक्त करना सीधे-सीधे मुखर्जी का वही बयान लगता है जिसमें वो, ये कह चुके थे कि डायरेक्ट टैक्स कोड की तरफ सरकार धीरे-धीरे कदम बढ़ाएगी।

खेती के उत्पादन और महंगाई पर वित्त मंत्री के बजट भाषण को याद कीजिए। एक भी लाइन ऐसी नहीं दिखी जो, नई हो। पिछले करीब 3 सालों से 6 महीने में एकाध महीने के चक्र को छोड़कर जनता लगातार महंगाई से त्रस्त थी तो, बार-बार सरकारी बयान यही आ रहा था कि दरअसल ये सारी समस्या सप्लाई साइड को लेकर है। और, वो भी तब जब लगातार पिछले 4 सालों से देश में अनाज और दूसरी जरूरी चीजों का उत्पादन दे दनादन हो रहा था। इतना कि हम लाखों टन अनाज मजे से सड़ा दे रहे थे। शायद ये आजाद भारत के इतिहास का पहला बजट होगा जिसमें कोई वित्त मंत्री अलग-अलग एक-एक फसलों के उत्पादन बढ़ाने पर इतनी छोटी-छोटी रकमों के एलान से खुश हो रहा हो। यहां तक कि वित्त मंत्री जी शहर के पास मंडी जैसी योजनाओं के लागू करने का कोई ठोस तरीका नहीं बता पाए। आखिर हर शहर के नजदीक में एक बड़ी मंडी तो, पहले से ही है। अब नोएडा, गुड़गांव, मुंबई, ठाणे, कोलकाता या दूसरे बड़े शहर में सब्जी या दूसरी चीजों का उत्पादन तो होने से रहा।

कच्चे तेल के भाव में लगी आग पर सरकार कैसे पानी डालेगी ये भी वित्त मंत्री के बजट भाषण में कहीं नहीं था। पूरे बजट में इसका खास जिक्र ही नहीं आया। ऑयल प्रोडक्ट पर ड्यूटी घटाने की मांग तेल मार्केटिंग कंपनियों से लेकर राज्य सरकारों और आम आदमी तक सबकी थी। लेकिन, पता नहीं क्यों वित्त मंत्री इस मुद्दे पर चुप्पी साध गए। इसकी महंगाई आएगी तो, कैसे घटाएंगे पता नहीं। महंगाई दर सात प्रतिशत पर लाने का वादा या दावा कई बार ध्वस्त होने के बाद अब मार्च का इंतजार कर रहा है। और, पुराने बयानों में से निकालकर वित्त मंत्री जी ने रिकॉर्ड चला दिया कि रिजर्व बैंक के कदम शानदार रहे हैं उसका असर भी शानदार है और अब महंगाई दर काबू में आ जाएगी।

एक और मुद्दा काला धन। जिस पर उम्मीद थी कि वित्त मंत्री कुछ आगे बढ़ेंगे। लेकिन, जब बजट पेश करते हुए संसद में वित्त मंत्री बोल रहे थे तो, मुझे लग रहा था कि मैं काले धन पर वित्त मंत्री की शास्त्री भवन के पीआईबी कांफ्रेंस हॉल में हुई प्रेस कांफ्रेंस में बैठा हूं। सारी लाइनें वही थीं। वही कि हमने कई देशों के साथ गलत तरीके से बाहर गए धन की जानकारी का समझौता किया है। वही कि हमने 5 सूत्रीय एजेंडे पर काम शुरू किया है जिससे काला धन वापस आ जाएगा। अब उससे काला धन वापस आता तो, सुप्रीमकोर्ट को बार-बार सरकार को फटकार क्यों लगानी पड़ती। लोगों को उम्मीद थी कि एमनेस्टी या फिर काले धन के कुछ गुनहगारों को वित्त मंत्री बजट में बेनकाब करेंगे। लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ।

सरकार जो, यूपीए 1 के समय से कहती आ रही है कि विनिवेश और आर्थिक सुधार हमारे एजेंडे में ऊपर है। वही सब फिर से कह डाला। इस वित्तीय वर्ष में विनिवेश से मिली कमाई और अगले वित्तीय वर्ष में 40 हजार करोड़ का विनिवेश लक्ष्य फिर से बता डाला। कुल मिलाकर करीब 4 दशक से कुछ-कुछ अंतराल पर बजट पेश करते वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी कुछ ऊबे से लग रहे थे। जैसे कोई एक ऐसे काम से ऊब जाता है जिसमें अब उसके पास करने के लिए कुछ नया न हो। लेकिन, करना तो है क्योंकि, वो उसकी ड्यूटी में शामिल है। पॉपुलिस्ट के बहाने रिफॉर्मिस्ट सा लगने वाला बजट वित्त मंत्री पेश करने की कोशिश में लगे रहे। रिफॉर्मिस्ट दिखने से बाजार ने उम्मीदों की हवा भी भरी। लेकिन, बाजार बंद होते-होते वो हवा भी निकल गई। अब ये किसका बजट है किसके लिए बजट है ये कैसे समझा जाए। अबूझ पहेली हो गई है। बस बजट पेश करना था सो, पेश हो गया।

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Posted By: harshvardhan tripathi
Last Edit: 05 Mar 2011 @ 04 58 PM

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रविवार की छुट्टी और जबरदस्त गर्मी की वजह से पूरा दिन घर में बिताया। और लगे हाथ टीवी पर फिल्म देख डाली। फिल्म को बीच से देख पाया। काबुल में कहीं नेताजी भटक रहे थे। भारत से भागने के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस किस तरह से अफगानिस्तान के रास्ते जर्मनी पहुंचते हैं। और, कैसे भारतीय कम्युनिस्ट नेताओं के पत्र और आश्वासन के बाद भी नेताजी को सोवियत संघ अपने यहां आने की इजाजत नहीं देता।


फिल्म में तथ्य कितने सही थे-कितने गलत पता नहीं। लेकिन, जितना भी खोज पाए होंगे bose the forgotten hero फिल्म बनाने वालों ने सही ही दिखाया होगा। मैंने बहुत पहले एक कितना भी पढ़ी थी नेताजी पर। उसके और फिल्म के तथ्य काफी मिल रहे थे। मैं यही सोच रहा था कि आखिर उस समय कैसे एक नेता ने बिना जरूरी संचार माध्यमों, लोगों तक पहुंच और गांधी के प्रभाव के खिलाफ जाकर देश के लिए लोगों का जनमानस अपने लिहाज से तैयार किया होगा।


अपने देश में अपने देश के लोगों को देश के लिए तैयार करने की क्षमता नेताओं में नहीं दिख रही है। ऐसे हालात में नेताजी ने दुनिया के अलग-अलग देशों के भारतीय युद्धबंदियों और दूसरे देश में गए हिंदुस्तानियों को इकट्ठा करना सचमुच बहुत मुश्किल काम रहा होगा।


मेरी बहुत इतिहास की जानकारी नहीं है। अपनी सामान्य समझ है। उसके आधार पर मैं जब नेताजी को समझने की कोशिश करता हूं तो, मुझे लगता है कि काश एक ऐसा नेता आज भारत को मिल पाता। एक कांग्रेसी राजनीतिज्ञ (आजाद भारत के पहले का), कांतिकारी कम्युनिस्ट विचार वाला और जबरदस्त नेशनलिस्ट (राष्ट्रवादी)- कुछ ऐसा था नेताजी का व्यक्तित्व। लेकिन, शायद यही वजह रही कि इस महान नेता की विरासत आगे बढ़ाने का काम न तो कांग्रेस करना चाहती है और न ही इस देश की वामपंथी और राष्ट्रवादी पार्टियां।


मान लो कि कांग्रेसी तो इसलिए याद नहीं करते कि गांधी का विरोध करके कांग्रेस अध्यक्ष बनने वाले नेताजी को याद किया तो, आजावीन कांग्रेस के नेता तो नहीं ही बन पाएंगे। वामपंथी  और राष्ट्रवादी पार्टी के लोगों को पता नहीं क्या तकलीफ है। याद भी करते हैं बस ऐसे ही याद भर करने के लिए। वामपंथियों में एक फॉरवर्ड ब्लॉक थोड़ा बहुत याद भी करता है तो, उसकी CPM, CPI  तो सुनते ही नहीं दूसरों को वो क्या सुना पाएगा।


मुझे लगता है कि नेताजी होते तो, आज पाकिस्तान न होता। बर्मा शायद भारत का हिस्सा होता। भारत इतना ताकतवर होता कि चीन उसकी जमीन पर कब्जा न कर लेता। देश में राष्ट्रवादी भावना इतनी प्रबल होती कि उसके चलते दूसरी राष्ट्रविरोधी भावनाओं को जगह न मिल पाती। हमारे जैसे भारतीयों को इस भ्रम में न जीना पड़ता कि हम कैसा देश बनें। भारत NAM ummit (गुटनिरपेक्ष देशों के सम्मेलन) की जगह G8 में शामिल होता।



दरअसल हुआ यही था कि अंग्रेजों के साथ गांधी जी के अहिंसा आंदोलन और शांति के रास्ते से आजादी के चक्कर में जवाहर लाल नेहरू तो अंग्रेज ही हो गए थे। उन्हें अंग्रेजों के राज से तो मुक्ति जरूरी लगती थी लेकिन, अंग्रेजों के राज करने का तरीका अच्छा लगने लगा था। यही वजह थी कि 15 अगस्त 1947 को देश तो आजाद हुआ लेकिन, वो आजादी अंग्रेजों के राज से आजादी थी। अंग्रेजी राज से नहीं।


वरना सोचिए कि क्या वजह है कि आज भी जॉर्ज पंचम की शान में गाए गए जन गण मन पर पूरा भारत और भारतीय सेनाएं अपनी छाती चौड़ी किए रहती हैं। क्या वजह है कि अंग्रेज भारत की आजादी के बासठ साल बाद भी भारत आते हैं और विजय दिवस मनाकर शान से चले जाते हैं। विजय दिवस भी ऐसा वैसा नहीं 1857 के शहीदों के विद्रोह (अंग्रेज तो यही करते हैं) को दबाने वाले अफसर की शान में। छाती पर मूंग दलके चले जाते हैं जैसे कि हम अभी भी गुलाम हैं। क्या वजह है कि देश की आजादी के लिए अपना सबकुछ मिटा देने वाले और भारत की आजादी तक न देख पाने वाले जांबाज शहीदों के नाम गलती से दिख जाएं तो, बात अलग है वरना आजाद भारत की हर उपलब्धि पर एक परिवार का ही नाम खुदा दिखता है।


 
मैं भी कहां अचानक इस सब चिंता में दुबला होना लगा। दुनिया की मंदी के दौर में देश को तरक्की की ओर ले जाने अर्थशास्त्र के डॉक्टरों के हाथ में देश है। ग्लोबल विलेज जैसे विचार खोपड़ी फाड़कर बाहर आए जा रहे हैं। और, मैं भी कहां ऐसा विलक्षण नेता खोजने लगा। इतनी ही इस देश को चिंता होती नेताजी की तो, आजादी के इतने साल बाद कम से कम उनकी मौत का तो सही-सही पता लगा पाती। भारत की आजादी के लिए निर्वासन में जीने वाले नेताजी मौत के बाद भी उसी अवस्था में है। देश का क्या देश तो आजाद हो ही चुका है।

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Posted By: harshvardhan tripathi
Last Edit: 08 Mar 2011 @ 02 38 PM

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जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है ये मैंने पिछले साल 15 दिसंबर को लिखा था। और, आज 7 महीने के बाद ये बात साबित भी हो रही है कि जरदारी को साथ लेकर भारत वो कर सकता है जो,
62 सालों में सारी मेहनत-मशक्कत के बाद भारतीय सरकारें नहीं कर सकीं।


भारतीय विदेश नीति के जानकार पता नहीं क्यों जरदारी के साथ संवाद बेहतर बनाने का काम नहीं कर पा रहे हैं। जबकि, जरदारी ने वो बात मान ली है जिसे मनवाने के लिए भारत संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका से लेकर दुनिया के हर थोड़ा भी दादा टाइप देश के पास पाकिस्तानी आतंकवाद के सबूतों का पुलिंदा लिए घूम रहा था। अमेरिकी अखबार the Washington post में जरदारी ने माना है कि पाकिस्तान ने छोटे-छोटे हित पूरे करने के लिए सरकारी नीति के तहत आतंकवादियों को पाला-पोसा-बढ़ाया। और, ये आतंकवादी पाकिस्तानी अवाम के साथ इस तरह से जुड़े हुए थे कि अमेरिका के ट्विन टावर पर हुए 9/11 हमले के पहले तक इन्हें हीरो की तरह देखा जाता था।


जरदारी ने एक और बात कही है कि दुनिया की दादागिरी में पाकिस्तान-अफगानिस्तान बर्बाद हो गए। ये भी एक ऐसी बाच है जिसे दुनिया अच्छे से जानती-मानती है लेकिन, तालिबान-अलकायदा-आतंकवादियों के अलावा कुछ रक्षा विश्लेषकों की ही जुबान से ये सुनाई देता था। अब खुद पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने ये कह दिया कि सोवियत संघ और अमेरिका के शीत युद्ध का शिकार पाकिस्तान और अफगानिस्तान हुए हैं।



जरदारी का ये बयान और कुछ दिन पहले दिया गया हिलेरी क्लिंटन का बयान एक दूसरे को और सच बनाता है। अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि पिछले 2-3 दशकों से अमेरिकी मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान में आतंकवादियों के सफाए के बजाए उन्हें बढ़ाने में हो रहा था। अब इन तीनों बयानों को साथ रखिए-


पाकिस्तान सरकार छोटे हितों को पूरा करने के लिए आतंकवादियों को पाल पोसकर बड़ा कर रही थी।

अमेरिका-सोवियत संघ के शीत युद्ध में अफगानिस्तान-पाकिस्तान, आतंकवादियों का गढ़ बन गए।

और, खुद हिलेरी का कहना कि आतंकवादियों को सफाए के लिए दी जा रही अमेरिकी मदद पाकिस्तान में आतंकवादियों को बढ़ाने में की जा रही थी।



साफ है दुनिया के दादा देश एशिया में अपना अड्डा मजबूत करने के लिए भारत-पाकिस्तान को लुरियाने में जुटे थे। भारत-पाकिस्तान का धर्म के आधार पर हुआ अलगाव सोवियत संघ-अमेरिका को ये आधार अपने आप ही दे दे रहा था कि भारत-पाकिस्तान एक दूसरे से लड़ने में उनकी मदद मांगते रहें। अब सोवियत संघ भले खत्म हो गया। लेकिन, अमेरिका ने खुद ही ये नीति बना ली कि दोनों की पटका-पटकी को बढ़ावा देते रहो। बचा-खुचा काम पाकिस्तान को बढ़ावा देकर चीन करता रहता ही है। वैसे अब चीन में हो रहे दंगों पर चीन सरकार ने पाकिस्तान से सफाई मांगी है।


कश्मीर जैसा नासूर दोनों देशों के पास राष्ट्रवादी होने का सबसे बड़ा आधार बनाता ही था। अच्छा हुआ कि हिंदुस्तानी संस्कृति, संस्कार नफरत की आग में इतना नहीं जले कि वो, आतंकवादी तैयार करने की ओर बढ़ते। लेकिन, सिर्फ मजहबी आधार पर बना पाकिस्तान इससे बच नहीं पाया। अफगानिस्तान-पाकिस्तान की अस्थिर सत्ता, लोकतंत्र का अभाव आतंकवाद की आग के लिए विशुद्ध देसी घी साबित होता रहा। और, इस आग में पाकिस्तान-अफगानिस्तान के जलने के साथ तेज लपटों से आज भी भी भारत झुलस रहा है।


कश्मीर में बेवजह आग लगी हुई है। उमर अब्दुल्ला जैसा नौजवान-आगे की सोच रखने वाला मुख्यमंत्री भी असहाय है। उसे टीवी पर आकर सफाई देनी पड़ रही है कि CRPF और पैरामिलिट्री की 75 कंपनियां तैनात हैं उन्हें हटाकर राज्य पुलिस की सिर्फ 25 कंपनियों से कैसे काम चल पाएगा। लेकिन, अलगाववादियों के लिए ये सबसे अच्छा समय होता है। वो, दबाव बढ़ाते जा रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों को काबू करने के लिए चली गोलियों से हमारा कश्मीरी नौजवान हलाल होता है और अलगाववादियों की बात के समर्थन में और सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों की मजबूती बढ़ती ही जाती है।


बस अच्छी बात ये है कि कश्मीरी अवाम का लोकतंत्र में भरोसा टूटा नहीं है। लेकिन, सरकार, सेना के खिलाफ ढेरों हवाई किस्से उनके जनमानस में घर कर गए हैं। मैं करीब ढाई साल पहले शादी के बाद श्रीनगर गया था तो, डल लेक पर जिस बोट में रुका था। उसके मालिक ने जो किस्सा सुनाया वो, चौंकाने वाला था। बेहद अच्छे स्वभाव के सुपर डीलक्स बोट के मालिक ने कहाकि- कश्मीर में आतंकवाद है ही नहीं। ये तो हिमाचल प्रदेश के सेब कारोबारियों और सेना की मिलीभगत हैं। क्योंकि, हिमाचल के सेब कारोबारियों को डर है कि कश्मीर में माहौल अच्छा रहा तो, कश्मीरी सेबों के आगे उनके सेब कौन खाएगा। ये सिर्फ बानगी है- ऐसे हजारों मनगढ़ंत नफरत भरने वाले किस्से कश्मीरियों के मानस का हिस्सा बन चुके हैं।


अब 62-63 सालों की नफरत के बाद जब आग लगाते-लगाते पाकिस्तानी सरकार का हाथ खुद जलने लगा तो, जरदारी कह रहे हैं कि बातचीत, शांति उनका सबसे बड़ा हथियार है। अच्छा है भारत सरकार को भी 5 साल के लिए जनादेश मिला है। स्थिर सरकार है जरदारी को साथ लीजिए, संवाद बेहतर कीजिए। ISI और कठमुल्लाओं के खिलाफ जूझ रह जरदारी का साथ दीजिए। अंतरराष्ट्रीय मंचों के लिए हिलेरी क्लिंटन जैसों को आगे रखिए। कश्मीर में जलती आग ऐसे ही बुझ पाएगी। वरना तो, CRPF, सेना हटाने और लगाने में अगले कई सौ साल बीत जाएंगे। और, कुछ निकलकर आने वाला नहीं है।

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Last Edit: 01 Jan 1970 @ 05 30 AM

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पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का खुदा जाना … बड़ी भूल हुई। फिल्म में ये गाना दो लोगों के निजी प्रेम संबंधों के उम्मीदों पर खरा न उतरने को बखूबी बयां करता है। लेकिन, गीत लिखने वाले को शायद ये अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि ये लाइनें किसी ऐसी शख्सियत पर बखूबी फिट बैठेगा जो, करोड़ो की उम्मीदों को तोड़ रही है। धूल-धूसरित कर रही है।


मनुवाद, ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद की विरोधी मायावती की मूर्तियां लखनऊ में हर थोड़ी दूर पर नजर आने लगी हैं। मायावती शायद देश की पहली नेता होंगी जो, जीते जी ही खुद अपनी मूर्तियां लगाने पर जुटी हैं। गांव-समाज में एक देसी कहावत अकसर सुनने को मिल जाती है फलनवा बड़ा आदमी रहा। अपने जीते जी मरे के बादौ क इंतजाम कई गवा। काहे से कि केहु ओकरे करै वाला नहीं रहा। मायावती भी कुछ गांव-समाज के उसी बड़े आदमी जैसा बर्ताव कर रही हैं। लेकिन, मामला सिर्फ ये नहीं है कि मायावती ने किसी से प्रेम नहीं किया-शादी नहीं की तो, उनकी फिकर करने वाला भी कैसे होगा। दरअसल, ये मायावती तो, उन करोड़ों लोगों की उम्मीद थी जिन्हें लगता था कि ये हमारे लिए बहुत कुछ करने के लिए शादी-ब्याह नहीं कर रही। अपना जीवन-करियर सब त्याग दिया।


ये वो मायावती थी जिसकी मूर्ति कहीं नहीं थी लेकिन, यूपी का करोड़ो दबा-कुचला अधिकारविहीन पीछे डंडा-झंडा लिए गर्मी-पानी-जाड़ा में मायावती के नाम का झंडा बुलंद करता घूम रहा था। फिर मायावती को ये करने की क्यों सूझी। इन करोड़ो लोगों पर मायावती को भरोसा क्यों नहीं रहा कि ये उनके मरने के बाद भी उनका नाम उसी बुलंदी पर रखेंगे जहां आज बिठा रखा है।


ये वो लोग थे जो, मायावती के बनाए अंबेडकर पार्क में इकट्ठा होते हैं। एक दिन की रोजी-रोटी त्यागकर लखनऊ पहुंचते हैं। मनुवाद की खिलाफत में मायावती के साथ खड़े होने के लिए गंगा का किनारा छोड़कर लखनऊ के अंबेडकर पार्क में बनी नहर को भीमगंगा बना देते हैं। गंगा से पवित्र मानकर उसी पानी से आचमन करते हैं।

अब देखिए मायावती क्या कर रही हैं। मायावती इन अधिकार विहीन लोगों को अधिकार दिलाने की मृगमरीचिका दिखाकर सत्ता में आ गईं। अधिकार छीनने वालों की जिस टोली के मुलायम के साथ होने का ढिंढोरा पीटकर ये सत्ता में आईं सत्ता में आते ही उन्हीं लोगों को मंच पर खड़ा कर दिया। और, उन अधिकार विहीन लोगों से कहा- ये आपके मसीहा हैं इन्हें अधिकार दीजिए ये, आपके अधिकारों के लिए लड़ेंगे।


हाथी इन अधिकार विहीन लोगों की ताकत था। फटे पुराने नीले कपड़े पर हाथी लहराता देख इन्हें अपनी ताकत का अहसास होता था। अब लंबी-लंबी कारों पर साटन-मखमल के कपड़े पर हाथी लहरा रहा है। इन्हें लगता है कि जैसे ठगे गए हों। लखनऊ में खड़े 60 हाथी इन पर भार बन रहे हैं। बहनजी और उनके साथ दूसरे अधिकार विहीनों के लिए लड़ने वाले नेताओं की मूर्तियों पर सिर्फ लखनऊ में 2700 करोड़ रुपए खर्च हो गए। और, कहते हैं न कि हाथी पालने से ज्यादा उसे खिलाना भारी पड़ता है। कुछ ऐसा ही है। यूपी के अधिकार विहीनों की मेहनत की कमाई का 270 करोड़ रुपए हर साल सिर्फ इन पत्थर की मूर्तियों और हाथिय़ों को खिलाने में (मरम्मत) बरबाद होगा।


गांव-गिरांव में इन अधिकार विहीनों की जमीन का पट्टा नहीं हो पा रहा है। रत्ती-धूर जमीन में ये परिवार चला लेते हैं। जमींदार टाइप के लोग इनकी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। इनको गांव की जमीन दिलाने का वादा करने वाला मायावती अब यूपी की सबसे बड़ी जमींदार हो गई है। जमींदार है इसलिए जमींदारी भी कर रही है। सिर्फ लखनऊ में 413 एक़ड़ की इस जमींदारी कब्जे की जमीन पर पत्थर के हाथी, पत्थर की मायावती, पत्थर के कांशीराम और पत्थर के दूसरे नेता खड़े हैं जो, जमींदारी मिटाने की लड़ाई लड़ रहे थे। पूरा का पूरा वो आंदोलन पत्थर होता दिख रहा है जो, नोएडा के एक गांव की अधिकार विहीन सामान्य महिला को कुछ महीने पहले तक देश की प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने की जमीन बना चुका था।


और, ये आंदोलन खत्म होगा ऐसा नहीं है। सिर्फ अधिकार विहीनों की ही बात क्यों। मायावती की जिस सोशल इंजीनियरिंग ने यूपी में सारे समीकरण ध्वस्त कर दिए थे। वो, भी टूटेगा। सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय नारा भर बनकर रहा गया है। मायावती के नजदीकी हिताया और सिर्फ उन्हीं का सुखाय। और, सबको सिर्फ इन पत्थरों में ही अपना सुख खोजना होगा। 413 एकड़ जमीन और 2700 करोड़ रुपए इतनी बड़ी रकम तो, थी ही कि अधिकार विहीनों (5 करोड़ 90 लाख लोग इस प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे हैं) के अधिकार कुछ तो मिल ही जाते।

बात सिर्फ लखनऊ की ही नहीं है। मायावती अपने आखिरी निशान हर जगह छोड़ देना चाहती हैं। दिल्ली से नोएडा घुसते ही लखनऊ जैसे ही गुलाबी राजस्थानी पत्थरों की ऊंची दीवार दिखने लगती है। करीब 3 किलोमीटर का ये पूरा क्षेत्र जंगल था-हरा-भरा था। इन पत्थरों की ऊंची दीवारों के बीच में पत्थर के हाथी और मूर्तियां हैं जो, गर्मी की चिलचिलाती धूप में चिढ़ पैदा करते हैं। मेरा मन इन मूर्तियों को ढहाने का होता है।


नोएडा के दूर-दराज गांवों में भी लोगों के रहने के लिए घर मिलना मुश्किल है। इनता महंगा कि आम आदमी तो, सिर्फ देखते हुए जिंदगी बिता लेता है। ये पत्थर के जंगल वहां तैयार हो रहे हैं जहां, ठीक सामने की जमीन पर करोड़ो के बंगले हैं। मायावती का मनुवाद विरोध एक चक्र पूरा कर चुका है। करोड़पति बंगले वाले और मायावती और उनके पहले के मनुवाद विरोध नेता पत्थर के ही सही लेकिन, पड़ोसी हैं। आमने-सामने रहते हैं। खैर, मैं भी यूपी में ही रहता हूं इसलिए ज्यादा हिम्मत नहीं करूंगा लेकिन, मायावती के पीठ पीछे ये धुन जरा ऊंची आवाज में सुनने का मन करता है।

पत्थर की मायावती … तुझे हमने दलितों का खुदा जाना … बड़ी भूल हुई …

पीछे से बैकग्राउंड स्वर भूल हुई तो, भुगतो


और, सुना-पढ़ा कि सुप्रीमकोर्ट अब इन मूर्तियों के बनने, जनता के पैसे की बर्बादी पर सवाल पूछ रहा है

ऑर्डर .. ऑर्डर .. ऑर्डर .. ये अदालत का मामला है चलता ही जाए

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Last Edit: 01 Jan 1970 @ 05 30 AM

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बीजेपी का घोषणापत्र बहुत बढ़िया है। इतना कि बिना सोचे उसे सरकार चलाने का अधिकार देने का मन हो जाए। खासकर देश के उस 60 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को तो, बीजेपी का घोषणापपत्र खूब लुभा रहा होगा जिनका जीवन चुनावी घोषणापत्रों से गजब का संवर जाता है। अब चुनाव बाद जब घोषणापत्र की ही याद नहीं रह जाती तो, चुनावी घोषणापत्र से जीवन जिनका बदलने वाला था भला उनकी याद कैसे रह जाती। बीजेपी का घोषणापत्र देर से आया इसलिए पूरी तैयारी से कांग्रेस के हर नहले पर दहला मार दिया।

 
 
कांग्रेस 3 रुपए में 25 किलो गेहूं-चावल गरीब परिवारों को देने का वादा कर रही है तो, बीजेपी ने 2 रुपए में हर महीने में 35 किलो गेहूं-चावल देने का वादा कर डाला है। वैसे इसका एलान पहले ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी आडवाणी के लोकसभा क्षेत्र गांधीनगर में पहली चुनावी रैली में ही कर चुके हैं।  
 
 
ये अलग बात है कि नरेंद्र मोदी का 2 रुपए किलो चावल/गेहूं का फॉर्मूला शायद ही गुजरात में ज्यादा असर करता हो। लेकिन, देश भर में तो जमकर असर करता ही है। गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान राजकोट से 22 किलोमीटर दूर एक गांव राजसमढियाला गया। इस गांव की सालाना कमाई है करीब पांच करोड़ रुपए। 350 परिवारों वाले इस गांव के ज्यादातर लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन खेती ही है। लेकिन, इस गांव की कई ऐसी खासियत हैं जिसके बाद शहर में रहने वाले भी इनके सामने पानी भरते नजर आएं। 2003 में ही इस गांव की सारी सड़कें कंक्रीट की बन गईं। 350 परिवारों के गांव में करीब 30 कारें हैं तो, 400 मोटरसाइकिल। 

इस गांव में कांग्रेस के 3 रुपए किलो और नरेंद्र मोदी के 2 रुपए किलो चावल का कोई खरीदार नहीं है। और, इस गांव में न तो गरीबी मुद्दा है न वोट बैंक है। क्योंकि, गांव में अब कोई परिवार गरीबी रेखा के नीचे नहीं है। इस गांव की गरीबी रेखा भी सरकारी गरीबी रेखा से इतना ऊपर है कि वो अमीर है। सरकारी गरीबी रेखा साल के साढ़े बारह हजार रुपए कमाने वालों की है। जबकि, राजकोट के इस गांव में एक लाख रुपए से कम कमाने वाला परिवार गरीबी रेखा के नीचे माना जाता है।
 
 
गांव में विकास के नाम पर नेता वोट मांगने से डरते हैं। विकास में ये सरकारों की भागीदारी अच्छे से लेते हैं। यही वजह है कि चुनावों के समय भी इस गांव में कोई भी चुनावी माहौल नजर नहीं आता। न किसी पार्टी का झंडा न बैनर। गांव बाद में एक साथ बैठकर तय करते हैं कि वोट किसे करना है। लेकिन, जागरुक इतने कि अगर किसी ने वोट नहीं डाला तो, पांच सौ रुपए का जुर्माना भी है।
 
 
 
लेकिन, ये तो गुजरात के एक गांव की अपनी इच्छाशक्ति है कि वहां गरीब नहीं है और गरीबी मुद्दा नहीं है इसलिए गरीबों का वोटबैंक भी नहीं है। लेकिन, पूरे देश में गरीबों का ये वोटबैंक- जाति, धर्म, कम्युनल, सेक्युलर सबसे ज्यादा बड़ा है और आसानी से पकड़ में भी आ जाता है। दरअसल ये 2 रुपए-3 रुपए किलो चावल/गेहूं सरकारी खजाने को भले ही जमकर चोट पहुंचाता हो और जिनको ये दिया जाता है उन लोगों को अगले चुनाव तक फिर उसी हाल में रहने का आधार तैयार कर देता है कि वो तथाकथित सरकारी गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवार यानी BPL परिवारों में शामिल रहें। लेकिन, इस तरह के एलानों से वोट थोक में मिलते हैं और चुनाव के बाद चूंकि इन BPL परिवारों की चर्चा न तो मीडिया में होती है न तो, राजनीतिक पार्टियों में। इसलिए, अलोकप्रिय होने का कोई खतरा भी नहीं होता है।
 
 
कांग्रेस तो, पिछले करीब 35 सालों से हर चुनावी घोषणापत्र में गरीबी हटाने की बात कर रही है। कांग्रेस है तो, गांधी परिवार की विरासत कैसे भूल सकती है। इंदिरा गांधी को गरीबी हटाओ के नारे ने ही प्रधानमंत्री बना दिया था। इसलिए कांग्रेस के घोषणापत्र पर हाय गरीब-हाय गरीबी हावी हो गई। कांग्रेस ने कहा कि उनकी सरकार बनती है तो, गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को 3 रुपए किलो गेहूं, चावल दिया जाएगा। यानी देश पर सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाली कांग्रेस ने लगे हाथ ये मान लिया कि गरीबी की रेखा के नीचे इतने लोग हैं कि वो, वोट देकर उसे चुनाव जिता सकते हैं वो, भी सिर्फ तीन किलो चावल-गेहूं के लिए।
 
 
 
कांग्रेस एक फूड सिक्योरिटी एक्ट की भी बात कर रही है जिसमें सबको खाना देने का वादा है। इसके लिए नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट बनेगा। कांग्रेस को लगता है कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना उसकी सबसे बड़ी यूएसपी है। इसीलिए वो, नरेगा योजना में लोगों को 100 दिन रोजगार के साथ 20 रुपए ज्यादा रोजाना की मजूरी यानी 100 रुपए की मजूरी का भी पक्का वादा कर रही है। जाहिर है ये फूड सिक्योरिटी एक्ट से खाना, नरेगा की मजदूरी वही लोग करेंगे जिनका जीवनस्तर आजादी के 62 सालों बाद भी इस लायक नहीं हो पाया है कि वो अपने अगल-बगल खुले चमकते डिपार्टमेंटल स्टोरों, मॉल से खरीदारी न कर सकें।
 
 
 
रहमान की जय हो धुन को जब ऑस्कर सम्मान मिला तो, कांग्रेस को लगा कि इससे बेहतर स्लोगन चुनाव जीतने के लिए हो ही नहीं सकता। आखिर, ये धुन तो दुनिया जीतकर लौटी है तो, इसके बूते कांग्रेस को देश का राज जीतने में भला क्यों मुश्किल होगी। लेकिन, स्लमडॉग मिलिनेयर फिल्म के बच्चों से मिलने की तस्वीरें जब टीवी चैनलों पर झुग्गी वाले भारत की कहानी दिखाने लगीं तो, कांग्रेस को लगा शायद थोड़ी गलती हो गई है। तब से कांग्रेस ने जय हो गाने की धुन जरा धीमी कर दी है।
 
 
कांग्रेस कह रही है कि उसका राज आया तो, सबको शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी। महंगाई कम करने और तेज विकास का वादा भी किया गया है। छोटे उद्योगों को मदद दी जाएगी। नौजवान बेरोजगार नहीं रहेगा इसका भी भरोसा दिलाने की कोशिश है।
 
सोनिया के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भाषण दे रहे हैं कि देश से गरीबी हटाने में अभी 15-20 साल लगेंगे। यानी अगले करीब चार लोकसभा चुनावों तक चुनावी घोषणापत्रों में सस्ते गेहूं-चावल और 100 रुपए की मजूरी पर जनता को लुभाया जाता रहेगा। क्योंकि, दुनिया के अमीरों में हमारे अमीरों के जब और आगे बढ़ने की खबर आती है तो, दूसरी सच्चाई जो थोड़ा धीरे से सुनाई जाती है जिससे फीलगुड कम न हो वो, ये है कि भारत की एक बड़ी आबादी अभी रोजाना एक बिसलेरी की बोतल यानी 20 रुपए से भी कम में गुजारा करती है। 

कांग्रेस-बीजेपी इस बात की होड़ लगाए हुए हैं कि कागजी वादों से कौन इस वोट बैंक के ज्यादा बड़े हिस्से को भरमा पाता है। क्योंकि, देश की दोनों सबसे बड़ी पार्टियों को पता है कि ये पब्लिक है सब जानती है बस फिल्मी गाना भर है – पब्लिक तो सब जानकर भी वोट उन्हीं को देती है। और, मुद्दों की बात होती है तो, किसी भी सर्वे में अब गरीबी जैसा मुद्दा होता-दिखता ही नहीं है। लेकिन, दरअसल ये गरीब और गरीबी इस देश का सबसे बड़ा वोटबैंक है जो, चुनावों तक पार्टियों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा होता है। लेकिन, जैसे ही वोट बैलट बॉक्स में गए गरीबों की किस्मत और उनकी चर्चा भी अगले चुनाव तक ताले में ही चली जाती है। भारतीय लोकतंत्र में गरीबों का वोट जय हो। चुनाव तक गरीबों की भी जय हो …

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चीनी खिलौनों पर भारत सरकार ने 6 महीने के लए पाबंदी लगा दी है। लेकिन, ये कदम दुनिया के बाजार में चीन की हैसियत के सामने बच्चों के खेल जैसा ही नजर आता है। क्योंकि, जब इंडिया के बड़े हिस्से पर ही मेड इन चाइना का ठप्पा लगता जा रहा हो तो, खिलौनों पर रोक कितनी असरदार होगी।

 

चीनी खिलौनों पर सरकारी रोक शायद इतनी ही कारगर होगी कि भारत के बड़े डिपार्टमेंटल स्टोरों में चीनी खिलौने अब बच्चों को लुभा नहीं पाएंगे। लेकिन, उस देश में जहां सारी मारामारी के बाद भी मॉल और बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर सड़क किनारे लगने वाली और फुटकर दुकानों के मुकाबले बमुश्किल 10 प्रतिशत हिस्सा ही हथिया पाए हैं। वहां भारत सरकार घटिया चीनी खिलौनों पर 6 महीने की रोक लगाकर क्या कर पाएगी। समझ पाना मुश्किल है।

 

फिर भी चीनी खिलौनों पर रोक की ये खबर इतनी बड़ी थी कि सभी अखबारों-टीवी चैनलों की बड़ी खबर बनी। क्योंकि, कहीं न कहीं से हम सबको ये अच्छे से पता है कि चीन का बना सामान घटिया होता है और वो भी इतना कि वो हमारी मेहनत की कमाई के साथ हमारी अनमोल सेहत पर भी खतरा डाल रहा है। ये सब जानते-बूझते भी सरकार घटिया चीनी खिलौनों पर सिर्फ 6 महीने की रोक लगा पाई है। जबकि, ये चीनी खिलौने हमारी कमाई, सेहत के साथ ही हमारे देश के लाखों छोटे, कुटीर खिलौना उद्योगों की बरबादी का कारण भी बन रहे हैं।

 

दरअसल, ऐसी घटनाएं शायद बीच-बीच में हमें झकझोरती हैं। ठीक वैसे ही जब करीब डेढ़ साल पहले अगस्त 2007 में चीन में बनी नोकिया की BL-5C बैटरियों ने इंडिया को ऐसा दहशत में डाल दिया था कि कई नोकिया सेंटर पर मारपीट की नौबत आई। जबकि, नोकिया ने तुरंत उन सारी बैटरियों को वापस लेने का एलान कर दिया था। नोकिया जैसी बड़ी कंपनी थी, उसे अपनी प्रतिष्ठा की परवाह थी इसलिए 8 करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्च झेलकर भी नोकिया ने इस सिरीज की 30 करोड़ बैटरियों में से 4 करोड़ 60 लाख वो बैटरियां वापस ले लीं। जो, नोकिया को जापानी कंपनी मात्सुशिता ने बनाकर दी थीं। आपको लगता होगा कि जापानी कंपनियां तो क्वालिटी के मामले में समझौता नहीं करतीं। फिर ये कैसे हो गया। दरअसल ये सारी बैटरियां मात्सुशिता के चीन के प्लांट में लगी हुई थीं।

 

ऐसे ही एक बार फिर अमेरिकी खिलौना कंपनी मटेल टॉयज के जहरीले खिलौनों ने बच्चों के साथ उनके मां-बाप को भी दहशत में डाल दिया था। यहां भी मामला वही निकला कि अमेरिकी कंपनी ने सस्ते के चक्कर में जो खिलौने चीन के प्लांट में बनवाए थे। उनमें बच्चों की सेहत के लिए खतरनाक मेटल ज्यादा मात्रा में थे।

 

चीन के घटिया सामानों के ये उदाहरण भर हैं। चीन हमसे तेज रफ्तार से तरक्की कर रहा है। और, कई मामलों हमारे देश के नीति-नियंता भी चीन का ही उदाहरण देकर विकास की गाड़ी चीन से भी तेज रफ्तार से दौड़ाना चाहते हैं। तेज रफ्तार से विकास करते चीन का यही हल्ला आज भारत के विकास को बट्टा लगा रहा है। अब आप सोच रहे होंगे, इससे भारत के विकास पर कैसे असर पड़ सकता है। दरअसल चीनी सामानों ने कुछ इस तरह से हमारे आसपास घर कर लिया है कि अब तो, मेड इन चाइना के ठप्पे पर नजर भी नहीं जाती। चीनी सामानों की घटिया क्वालिटी के बारे में जानने के बाद भी जाने-अनजाने भारत के लोग इसे खरीद रहे हैं और चीन के विकास की रफ्तार और तेज कर रहे हैं।

भारत में कंज्यूमर नाम का प्राणी सबसे तेजी से बढ़ा है। यानी वो खर्च करने वाले जिनकी जेब में पैसा है जो, मॉल में शॉपिंग करता है, मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखता है। कंज्यूमर नाम का ये प्राणी कंज्यूम करना जानता है, इसे इस बात की ज्यादा परवाह नहीं होती कि खरीदा हुआ सामान कितना चलेगा। कंज्यूमर के पास पैसे हैं तो, उस पैसे को खींचने के लिए हर मॉल में माल ही माल भरा पड़ा है।

 

देश में ऑर्गनाइज्ड रिटेल क्रांति की बात जोर-शोर से सुनाई दे रही है। और, ये भी कहा जा रहा है कि यही रिटेल देश में लाखों लोगों को रोजगार के नए मौके देगा। भारतीय कंपनियों की तरक्की का भी रास्ता खुलेगा। लेकिन, कुछ छोटे आंकड़े हैं जिससे साफ होता है कि भारत में हो रही रिटेल क्रांति के फायदे से चीन के विकास की गाड़ी भारत के ही विकास को मात देगी।

भारत के जितने भी बड़े ऑर्गनाइज्ड रिटेल स्टोर आ रहे हैं उसमें जिन सामानों को आप ये समझकर खरीदते हैं कि ये पैसे भारतीय कंपनियों के पास जा रहे हैं वो, पैसे चीन की कंपनियों के पास जाते हैं। ग्रॉसरी और फर्नीचर आइटम्स का 65 प्रतिशत चीनी कंपनियों का ही माल भरा पड़ा है। फैशन-कॉस्मेटिक्स-बनावटी गहने इसके 75 प्रतिशत पर चीनी कंपनियों का ही कब्जा है। मॉल से खिलौने खरीदने वाले करीब 15 प्रतिशत बच्चे ही देसी खिलौने के साथ अपना बचपन बिता पाते हैं।

चीनी सामानों का ये कब्जा सिर्फ भारत के मॉल के माल में ही नहीं है। सड़कों पर होने वाला व्यापार जिसे अनऑर्गनाइज्ड रिटेल कहा जा रहा है। वहां चीन का कब्जा और मजबूत है। सड़क किनारे बिकने वाले अजीब-अजीब से खिलौने, टॉर्च, बैटरी, कॉस्मेटिक्स, कैलकुलेटर, डिजिटल डायरी- सब कुछ चाइनीज है। सामान बेचने वाला चिल्ला-चिल्लाकर पहले ही बता देता है कि सामान मेड इन चाइना है कोई गारंटी नहीं है। फिर भी मोलभाव कर खरीदने वाले की लाइन लगी है। सड़क किनारे लगे इस बाजार में तो, 90 प्रतिशत सामान मेड इन चाइना ही है। और, देश के रिटेल बाजार में अनऑर्गनाइज्ड रिटेल का हिस्सा 95 प्रतिशत है।

यहां तक कि मेहनती जापानियों के बाजार में भी चीन ने जमकर कब्जा कर रखा है। जापान के बाजार में भी जापानी में मेड इन चाइना लिखे सामान भरे पड़े हैं। मेड इन इंडिया का एक भी ब्रांड अब तक वहां के बाजार में जगह नहीं बना पाया है। वजह वही कि एक तो हम दुनिया के पीछे-पीछे सामान बनाना शुरु करते हैं। यानी ये कि जब तक हम सामान बनाकर अमेरिका, चीन, जापान के सामान की बराबरी में पहुंचते हैं। तब तक दुनिया की जरूरत बदल जाती है।

चीनी सामान किस तरह से हमारे घरों में जगह बना लेता है और हमें पता ही नहीं चलता। मैं चाइनीज सामान जाबूझकर तो, नहीं ही खरीदना चाहता। लेकिन, जाने-अनजाने मुझ पर भी थोड़ा बहुत मेड इन चाइना का ठप्पा हावी हो ही गया है। मेरे पास लेनोवो का लैपटॉप है वो, चीन में बना है। मैंने देसी कंपनी रिलायंस से नेट कनेक्शन लिया। लेकिन, जब मैं कनेक्शन की डिवाइस ध्यान से देखता हूं तो, HUWAI के USB मोडम पर असेंबल्ड इन चाइना की मोहर लगी थी।

 

अगर आपके घर में  WWIL का कनेक्शन है तो, ध्यान से देखिएगा देसी कंपनी WWIL का सेटटॉप बॉक्स भी मेड इन चाइना ही मिलेगा। यानी हमारी तरक्की को दिखाने वाले सारे प्रतीक चिन्हों पर चीन ने कब्जा कर रखा है। चीन की तरक्की की वजह भी साफ पता चल जाती है। दुनिया जिन सामानों को आगे इस्तेमाल करने वाली हो, उसे बनाने में आगे निकलो। दुनिया के बाजार को अपने माल से पाट दो, जब तक दुनिया को ये समझ में आएगा कि ये सामान कहां से आ रहा है तब तक दुनिया उन्हीं सामानों की आदी हो जाएगी। ये बात भारतीय कंपनियों के लिए समझने की है। भारतीय कंपनियां दुनिया में झंडे गाड़ रही हैं। लेकिन, देश की जरूरत के सामान बनाने में पीछे हैं।

 

वीडियोकॉन के अलावा दूसरी भारतीय टेलीविजन बनाने वाली कंपनी का नाम भी याद नहीं आता। टाटा का वोल्टास का एसी बढ़िया होने के बावजूद मार्केटिंग और समय के साथ न बदल पाने की वजह से सैमसंग और एलजी से रफ्तार में पीछे छूट रहा है वैसे, अभी दूसरा सबसे ज्यादा बिकने वाला एसी वोल्टास का ही है। कार-मोटरसाइकिल के मामले में भारतीय कंपनियां अभी आगे हैं लेकिन, विदेशी कंपनियां तेजी से ये हिस्सा कम कर रही हैं।

 

दुनिया भर के लोगों को सॉफ्टवेयर ज्ञान भारतीय दे रहे हैं लेकिन, एक भी ऐसी भारतीय कंपनी लैपटॉप या कंप्यूटर नहीं बना रही है जो, डेल और लेनोवो को थोड़ा भी मुकाबला दे सके। हाल ये है कि कभी-कभी तो, पूरे इंडिया पर ही मेड इन चाइना का ठप्पा सा लगा दिखने लगता है। अच्छा ये है कि अभी पूरा देश इंडिया नहीं बना है, भारत का बड़ा हिस्सा इंडिया बनने से बचा हुआ है, इसीलिए मेड इन चाइना के ठप्पे से अभी देश का बड़ा हिस्सा बचा है। यही बचा हुआ भारत का बड़ा हिस्सा भारतीय कंपनियों के लिए बड़ा बाजार बन सकता है। वरना तो, इन खिलौनों पर 6 महीने की रोक से क्या होगा।

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(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव का मैं एक बड़ा चित्र खींचने की कोशिश कर रहा हूं। इसी श्रृंखला की ये पांचवी कड़ी। इस कड़ी में गांवों में सिकुड़ती, सूखती जमीन और इसकी वजहों की चर्चा। अच्छी बात ये कि बरबादी के बाद थोड़ी उम्मीद की रोशनी भी दिख रही है।)

गांवों से लोग शहरों की तरफ बेतहाशा भाग रहे हैं फिर भी जमीन सिकुड़ती जा रही है। जमीन सिकुड़ती जा रही है यानी जोत का आकार छोटा होता जा रहा है। और, उस पर भी काम करने वाले लोग नहीं मिल रहे हैं। मेरे गांव के आसपास काफी उपजाऊ जमीन है। लेकिन, प्रतापगढ़ के ज्यादा इलाकों में ऊसर (बंजर) जमीन ज्यादा है। और, जिस तरह से जमीन के नीचे का जलस्तर तेजी से और नीचे जा रहा है। वो, भयावह स्थिति बना रहा है।

जलस्तर लगातार घटने के लिए ज्यादातर गांव के लोग ही जिम्मेदार हैं। पानी घटा तो, शहरों से जाकर गावों में जल संरक्षण की बात हो रही है, आंदोलन चल रहे हैं। एनजीओ संगठित तरीके से काम कर रहे हैं। जब पानी ही पानी था तो, जल का अपमान किस तरह हुआ इसका बेहतरीन उदाहरण मैंने देखा है। शायद ये हर किसी को अपने गांव की कहानी लगे। मेरे गांव में तीन कुएं थे। और, गांव के अगल-बगल तीन तालाब थे। एक मेरे घर के सामने की चकरोड के पार और दो गांव के पिछले हिस्से में। तीन कुओं में से एक मेरे दरवाजे पर ही था। लेकिन, पता नहीं कौन से बंटवारे के लिहाज से पूरी जमीन तो हमारी थी लेकिन, हमरे दुआरे का कुआं सुकुलजी क रहा। औ, सुकुलजी का घर हमारे घर के पीछे है। अब सुकुलजी न तो उस कुएं से कभी पानी भरने आते थे और कुआं कच्चा होने की वजह से न तो हम लोग ही उस कुएं का इस्तेमाल करते।

पता नहीं क्या वजह थी मैंने एकाध बार पिताजी से पूछा- ये कुआं हम्हीं लोग क्यों नहीं बनवा लेते। पता चला सुकुलजी को ऐतराज है। खैर, शायद हमारे घर वाले भी यही चाहते थे और, कच्चा कुआं धीरे-धीरे भंठ गया (कुआं रह ही नहीं गया)। बचा-खुचा कुआं, कुएं के आगे की हमारी बैठकी की मिट्टी से पट गया। हमारा घर पहले ही पक्का था। मिट्टी-गारे से बनी दोनों बैठकी भी धीरे-धीरे करके खत्म हो गई। दूसरी बैठकी की ही जगह पर दादा ने नया पक्का घर बनवाया है। अच्छे कमरे बने हैं। शहरातू लैट्रिन भी बन गई है। हैंडपंप घर के अंदर लग गया है (पहले हैंडपंप बाहर था। कोई बी प्यासा राहगीर दो हाथ चलाकर अपनी प्यास बुझा लेता था)। टुल्लू लगा है जो, लाइट रहने पर टंकी भर देता है और लैट्रिन का दरवाजा बंद करने पर नल से गिरता पानी शहर में होने का अहसास दिलाता है। पहले सुबह जल्दी उठकर खेत में दिशा-मैदान जाना शहर वालों को अचरज में डालता था। अब गांव वाले भी दिशा-मैदान नहीं जाते। लैट्रिन जाते हैं। दिशा-मैदान अब तो पता नहीं कितने लोग ही समझते होंगे।

कच्ची बैठकी-कुएं क साथ दुआरे प खड़ा महुआ औ मदीना क पेडौ समय क भेंट चढ़ि ग। महुआ सूखि ग तो, दूसर लगावा नाहीं ग। औ, पिताजी-दादाजी म बंटवारा के बाद मदीना क पेड़ कटवाए दीन ग। दूसरी कच्ची बैठकी में सिर्फ दो बहुत लंबे-लंबे कमरे ( कमरे क्या बड़े से एरिया को चारों तरफ से घेरकर बीच में एक और मिट्टी की दीवार बनाई गई थी) थे। कच्ची मिट्टी के कमरे खपरैल की छत। कुल मिलाकर इस बैठकी में एक साथ 50 से कुछ ज्यादा ही चारपाई बिछ जाती थी। और, ये ज्यादातर गांव की बारात का जनवासा बन जाती थी। अब तो एक दूसरे से इतने मधुर संबंध भी नहीं रहे कि अपनी बारात रुकवाने के लिए कोई किसी दूसरे की बैठकी मांगे। अब तो, गांव में भी बरात टेंट कनात में रुक रही है।

गरमी कितनी भी हो, कच्ची बैठकी में एयरकंडीशनर जैसी ठंडक का अहसास मिलता था। और, दो महीने की गरमी की छुट्टियों में खेलकूद से फुरसत मिलने पर इसी कच्ची बैठकी में गजब की नींद आती थी। लेकिन, धीरे-धीरे गरमी की छुट्टियों में सबका जाना कम हुआ। मिट्टी-गारा की दीवार और खपरैल की छत का रखरखाव महंगा (झंझटी) लगने लगा। क्योंकि, हर साल गोबर और पिड़ोर (नदी से निकली मिट्टी) से दीवारों की पुताई करनी पड़ती थी। जिससे दीवार कमजोर न पड़े और बाहर के तापमान को संतुलित किए रहे। खपरैल भी हर दूसरी बारिश के पहले फिर से बदलवानी पड़ती थी। लेकिन, खपरा छावै वाले औ मिट्टी-गारा क देवाल बनवै वाले कम होत गएन (ज्यादातर पंजाब से लैके महाराष्ट्र तक टैक्सी, रिक्शा चलाने, फैक्ट्री में काम करने चले गए)।

घर के सामने चकरोड के पार वाले तलाव म बेसरमा क फूल (पता नहीं कितने लोग अब बेशरमा क गोदा औ ओकर फूल देके होइहैं) इतना बढ़िया खिलत रहा कि मन खुश होए जाए। 1991 में मेरी छोटी दीदी की शादी की वीडियो रिकॉर्डिंग में ये तालाब ऐसे दिख रहा था जो, किसी फिल्म में खूबूसरत लोकेशन पर हीरो-हीरोइन के गाने के लिए तैयार की जाती है। इस खूबसूरत का अहसास भी हमें अच्छे से रिकॉर्डिंग का कैसेट टीवी पर देखते ही हुआ। यही तालाब था जिसकी वजह से पांडेजी लोगों के हिस्से (पड़ान) में जाने के लिए थोड़ा घूमकर जाना पड़ता था। लेकिन, इस बार मैं गया तो, चकरोड ने तालाब का कुछ और हिस्सा लील लिया था। और बचा हिस्सा जिनके सामने तलाव रहा उनकर दुआर बनि ग। 

गांव के बीच के दोनों कुएं बचे तो हैं लेकिन, उनका इस्तेमाल अब ना के बराबर होता है। रस्सी में बाल्टी बांधकर पानी बांधने से बेहतर गांवावालों को हैंडपंप चलाना लगता है। गांव के पीछे के दोनों तालाब भी सूख गए हैं। इन तालाबों में मैंने भी खूब रंगबिरंगी गुड़िया पिटी है। बांसे क कैनी से गुड़ियां पीटै म खुब मजा आवत रहा।

वैसे, अब पड़ान घूमके जाए क जरूरत नाहीं तालाब पटि ग। दुआरे प मदीना क फूल से गंदगी नाहीं होत। महुआ बिनै वालेन से झगड़ा नाही करै क परत। मिट्टी-गारा क दीवार पोतावै औ खपरा छवावै से मुक्ति मिली। सब बड़ा अच्छा होइ ग। बस गरमी कुछ बढ़ि ग। नवा हैंडपंप म पानी अब 70 मीटर नीचे मिलत बा। 10 साल पहिले तक 30 मीटर पर बढ़िया मीठा पानी मिल जात रहा। 

उम्मीद की रोशनी
मैं गांव गया तो, एक निमंत्रण में दिन में ही जाकर लौटा तो, एक बाघराय बाजार से एक नहर के रास्ते जाना था। इस तरफ कुछ ज्यादा ही बंजर जमीन है। दूर-दूर तक ऊसर जमीन की सफेद मिट्टी दिखती है। लेकिन, उसके बीच-बीच में कुछ छोटे-छोटे चौकोर गड्ढे खुदे दिख रहे थे। जहां सरकारी बोर्ड लगा हुआ था। मौसी के लड़के ने जो, रहता तो, इलाहाबाद में है लेकिन, अक्सर गांव आता-जाता रहता है। उससे मैंने पूछा तो, उसने बताया कि सरकारी नियम आए ग बा। जे तलाव भंठवाए के दुआर बनै लेहे रहेन या घर बनवाए लेहे रहे उनकै घर तोड़वाए क तलाव बनावावा जात बा। और, दूसरी जगहों पर भी छोटे-छोटे गड्ढे खुदवा दिए गए हैं कि बारिश में इन तालाबों में कुछ जल संरक्षण हो जाए। जल’>http://batangad.blogspot.com/2007/12/5.html”>जल संरक्षण के जरिए गांव की तकदीर बदलने की एक कहानी मैंने गुजरात के एक गांव में देखी है। अब गुजरात के मुकाबले तो, यूपी के खड़ा होने में बहुत टाइम लगेगा। लेकिन, अगर ये मुहिम कुछ रंग लाई तो, फिर से मीठा पानी तो तीस मीटर पर मिल सकेगा। 

अगली कड़ी में गांवों में राजनीति के सहारे बनती-बिगड़ती आर्थिक-सामाजिक हैसियत

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(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव का मैं एक बड़ा चित्र खींचने की कोशिश कर रहा हूं। इसी श्रृंखला की ये चौथी कड़ी।)

मैंने पहली कड़ी में ही बताया था कि मेरे गांव में पिताजी की जेनरेशन में ज्यादातर लोग सरकारी नौकरी में थे। थोड़ा ऊपर-थोड़ा नीचे। और, जो नीचे या थोड़ा पीछे रह गए उन्होंने अपने बच्चों के जरिए अपनी अधूरी ख्वाहिशें पूरी करने की कोशिश की। गांव में उन्होंने अपने बच्चों के नाम जेई, गार्ड, टीटी रख दिए लेकिन, इनमें से कोई भी उसके आसपास भी नहीं पहुंच सका।

दोनों मेरे चचेरे दादा लगेंगे। एक रेलवे में ड्राइवर थे अब रिटायर हो गए हैं तो, दूसरे पीडब्ल्यूडी में अभी भी मेठ हैं। ड्राइवर दादा के दो लड़के हैं। एक का नाम है गार्ड दूसरे का टीटी। ये अलग बात है कि बड़ा गार्ड बनने के बजाए उनके ही जुगाड़ से किसी तरह से गार्ड का बक्सा ढोने की नौकरी पा गया तो, दूसरा ट्रेनों में टिकट चेक करने के बजाए खेती का काम देख रहा है लेकिन, ज्यादा पढ़ा लिखा न होने के कारण खेती का हिसाब भी बहुत अच्छा नहीं लग रहा है। टीटी की पत्नी यानी मेरी भाभी जो, शादी के बाद गांव की सबसे खूबसूरत बहुओं में से थी। इस बार उनकी शकल मुझे कुछ डरावनी सी लग रही थी।

टिटियाइन भाभी अब पहले की तरह हंसी-मजाक भी कम ही कर रहीं थीं। जबलपुर में अपने मामा के यहां पढ़ीं-लिखीं और बचपन में ही शादी हुई। आधार वही कि ससुर रेलवे मे ड्राइवर है। इलाहाबाद के सूबेदारगंज में बड़ा सा घर है। खैर, टीटी भैया कुछ कर नहीं पाए और भाभी के चेहरे की चमक धीरे-धीरे गायब होती गई। इस बार तो वो, अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही बुढ़ाई दिख रही थीं। ये भाभी वही हैं अन्नू की मां। भाभी ने बताया लड़ाई हे के बाद अन्नूआ क कुछ दिन के बरे हियां से हटाई देहे अही। बुआ के हियां रही तो, कम से कम झगड़ा झंझट तो न करी। ये बताते वक्त उनकी आंखों में ये डर साफ दिख रहा था कि बेटा कहीं बाप (टीटी) की तरह बेकार न रह जाए।

भाभी ने मुझसे पूछा- का भइया तू तो बंबइया होइ गया। अब कहां तू गांव अउब्या। का, इलाहाबादौ नाही आइ सकत्या। मैं सिर्फ मुस्कुराकर रह गया। मैं कम बोल रहा था। शायद उनसे संवाद के लिए मेरे पास शब्द कम हो गए थे। भाभी ने कहा- तू तो ऐसे चुपचुप बइठा अहा। जैसे बरदेखुआ आय होवा। मैंने भी थोड़ा मजाक किया अब तोहका का देखी तू तो बुढ़ाइ गइउ। फीकी हंसी हंसते भाभी ने कहा- भइया, हम तो बुढ़ाए गए। नानी बनि गए। तब मुझे ख्याल आया कि भाभी की बेटी, जिसकी उम्र अभी भी इतनी ही है कि वो, पढ़े-लिख-कुछ करे, के भी बच्चा हो गया है। सचमुच गांव बदलने में अभी बहुत समय लेंगे। शायद यही वजह थी कि पिछले साल मेरी शादी होने के पहले तक गांव में ये होने लगा था कि अरे भइया रमेंद्र (मेरा घर में बुलाने का नाम) क तो बियाहवै नाहीं होत बा। चाचा (मेरे पिताजी) मोट असामी (ज्यादा दहेज देने वाला) खोजत होइहैं औ का। जबकि, शादी के लिए मैं अपने करियर के थोड़ा सेट होने का इंतजार कर रहा था और पिताजी को बार-बार गच्चा दे रहा था। 

खैर, गार्ड-टीटी का ये हाल ता तो, जेई का हाल भी कम नहीं है। पीडब्ल्यूडी में मेठ हमारे पट्टीदारी के दादा ने बेटे का नाम जेई सोचकर तो यही रखा होगा कि जेई न सही पीडब्ल्यूडी में बाबू तो हो ही जाएगा। लेकिन, वो भी आरईएस डिपार्टमेंट में मेठ से आगे न बढ़ पाए। पत्नी शहरी मिली। तेज थी, गांव के लड़कों (देवरों) से जरा खुलकर-हंसकर बात करती थी। इसलिए गांव के बूढ़े-बुजुर्ग जेइयाइन भाभी के चरित्र पर भी टिप्पणी करने से नहीं चूकते थे। बाद में भाभी की इसी योग्यता ने उन्हें पहले गांव का नेता और बाद में भाजपा महिला मोर्चा का बिहार ब्लॉक का अध्यक्ष बना दिया था। उनके साथ टिटियाइन भाभी भी कभी-कभी पार्टी की बैठकों में जाने लगीं। अच्छी बात बस इतनी है कि अभी भी उन लोगों में थोड़ा बहुत ही सही लेकिन, जोश (जिंदादिली ज्यादा सही शब्द होगा) बाकी है।

अगली कड़ी में गांवों में सूखती जमीन, जमीन का झगड़ा

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Last Edit: 01 Jan 1970 @ 05 30 AM

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(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव का मैं एक बड़ा चित्र खींचने की कोशिश कर रहा हूं। इसी श्रृंखला की ये तीसरी कड़ी।)

तो, मेरी नजदीकी बाजार में एयरटेल का टावर लग गया। अब हर हाथ में काम तो, सिर्फ नेताओं के भाषण में ही रह गया है लेकिन, हर हाथ में मोबाइल जरूर नजर आने लगा है। गांवों में नोकिया के सस्ते मोबाइल और बीएसएनएल के बाद गांव-गांव में पहुंचे एयरटेल, आइडिया के टावर ने सबके मोबाइल में सिगनल दे दिया है। और, जहां हवा, पानी, बिजली तक नहीं है वहां भी रिलायंस की फुल कवरेज मिलने लगी है। मोबाइल के चमत्कार से चमत्कृत होने की 2002 की एक घटना मुझे याद है। तब नया-नया बीएसएनएल का मोबाइल शुरू हुआ था। इलाहाबाद-लखनऊ रूट पर सारे रास्ते मोबाइल मिलता था। और, इसी वजह से मेरे गांव पर भी बीएसएनएल का सिगनल टूट-टूटकर मिल जाता था। मामा की लड़की की शादी में नजदीकी गांव के एक प्रधान के लड़के को सुबह का कुछ जरूरी काम याद आया और उसने आधी रात को कहाकि अब तो घर जाना ही पड़ेगा। हां, अगर बाबू को बताके आए होते तो, कोई बात नहीं थी। मैंने कहा तो, फोन कर लो। चूंकि प्रधानजी के यहां भी एंटीना वाला टेलीफोन लगा हुआ था। मैंने भी डरते-डरते बड़ा सा एंटीना वाला मोबाइल निकाला और इत्तफाकन फोन लग गया।

मोबाइल ने तो गांवों को बदला ही है। टीवी और विज्ञापन के जरिए ब्रांडेड प्रोडक्ट जिस तरह गांव को अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं। वो, मेरे लिए थोड़ा चौंकाने वाला अनुभव रहा। मुझे याद है कि पहले मैं एक वुडलैंड के जूते पहनकर गांव गया था तो, उसकी कीमत पूछने के बाद बाजार में गांव के ही एक सज्जन इस बात पर हंसे कि हजार रुपया का जूता पहिरब कउन बुद्धिमानी है। लेकिन, अब गांव के लड़के ब्रांडेड चड्ढियां पहन रहे हैं।

बुजुर्गों के पटरे वाली चड्ढी यानी कपड़े से कटवाकर नाड़ा वाली चड्ढी तो वैसे भी पुराने जमाने की बात हो चुकी ती। उसकी जगह वीआईपी और लड़कों में वीआईपी फ्रेंची ने ले ली थी। लेकिन, अब जॉकी ने सबका खेल बिगाड़ दिया है। और, ये जॉकी गांवों में भी नंगई फैला रहा है। नंगई गांव के लोगों को शहर के साथ आधुनिकता की दौड़ में साथ चलने का झूठा अहसास भी करा रही है। मैं चार साल पहले मुंबई आया था तो, अपने न्यूजरूम से लेकर सड़कों-लोकल में लड़के-लड़कियों की खिसकती पैंट (ज्यादातर जींस) के नीचे लड़कों की ब्रीफ और लड़कियों की पैंटी के ब्रांड दिख गए। और, अब पांच साल बाद गांव गया तो, मेरी मौसी का लड़का जो, बेहद शर्मीला है (अभी हाईस्कूल में है) जब हम लोगों का पैर छूने के लिए झुका तो, उसकी आधी सरकी जींस से जॉकी की लाल मोटी पट्टी चमकती दिखी। गांव ने शहरों का ये बदलाव तो आत्मसात कर लिया है।

शहरों से आधुनिकता की दौड़ में साथ देने के लिए और भी बदलाव हुए हैं। प्रतापगढ़ के गावों में अगर बाभन के लड़के के बारे में अगर ये झूठा हल्ला भी उड़ जाए कि वो, सिगरेट, शराब पीता है। अंडा या मास-मच्छी खाता है तो, जिले का कोई बाभन तो, उसे अपनी लड़की देने को तैयार नहीं ही होता था। अब पंडितों की बारात में भी दारू पीकर उत्पात मचाने वाले बारातियों की पूरी जमात आ रही है। अब बस इतना बचाया जा रहा है कि सबके सामने तो नहीं पीता-खाता ना। लेकिन, बाभन होने का ढोल पीटने में कोई कमी नहीं है।

अगली कड़ी में – मेरे गांव के जेई, गार्ड-टीटी का हाल..

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Last Edit: 01 Jan 1970 @ 05 30 AM

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(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। जैसे शहर वाले होते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। मैं पहले एक पोस्ट में समेटने वाला था। अब कोशिश करता हूं कि भले पोस्ट कई हो जाएं, कुछ ज्यादा बड़ा चित्र खींच सकूं।)

तो, मैं 5 साल बाद गांव गया लेकिन, घर की चाभी खो जाने की वजह से करीब दो साल से बंद पड़े घर में नहीं जा पाया। दादा (पिताजी के बड़े भाई) के यहां ही बैठना होता है। दादाजी साल डेढ़ साल पहले प्राइमरी के प्रिंसिपल से रिटायर हुए हैं। गांव में जिसे राजनीति कहा जाता है वो, करना उन्हें खूब आता है। बाबा हमारे रेलवे सर्विस कमीशन में थे और पिताजी बैंक में हैं। इसलिए दोनों भाइयों में बंटवारे के पहले तक दादाजी को किसी तरह की कोई चिंता नहीं थी। खेती में लगने वाला खर्च पिताजी देते थे और बदले में खाने भर का राशन शहर (इलाहाबाद) आ जाता था। गांव में एक अजीब से रुतबे की प्रतीक एक बंदूक (वही बंदूक जिसको निकालने की धमकी देने पर हमारा गांव घेरे दूसरे गांव के लोग भाग खड़े हुए और इसके अलावा तो, तीस साल से ज्यादा के समय में मुझे भी उसका इस्तेमाल याद नहीं है) भी दादा के नाम है। गांव की पहली और क्षेत्र में शायद तब गिनी-चुनी बंदूकें रहीं होंगी।

इस बंदूक का कोई इस्तेमाल नहीं होता सिवाय शादी-तिलक में द्वारचार में कुछेक गोलियां दागने के। मैंने भी एकाध बार तिलक में उससे गोली दागी है। अब तो हाल ये है कि शादी-तिलक में गोलियां किसी ने चलाईं तो, सबसे पहले मेरे ही गुस्से का शिकार होता है(गांव में रुतबा बढ़ाने वाली गोलियां अब शहरी जीवन जीते मुझे बुरी लगने लगी हैं)।  खैर, दादाजी प्राइमरी में मास्टर थे। ब्राह्मण थे। और, क्षेत्र में अच्छी प्रतिष्ठा होने से हमारी ग्रामसभा में जीतने वाले प्रधान के लिए उनका आशीर्वाद जरूरी होता था। हमारे ट्रैक्टर पर बैठकर कई प्रधानों ने विजय जुलूस निकाला और सबसे पहले दादा का ही आशीर्वाद लेने आए। ये अलग बात है कि पिछले करीब डेढ़ दशक में लगातार उनके आशीर्वाद का मतलब बस कुछ वोटों तक सिमट गया और अब शायद वो अपने परिवार भर का वोट ही रह गया है।

अब हमारे भैया (दादाजी के बड़े लड़के) दादा से कह रहे हैं कि अब आप चुनाव लड़ जाइए। करीब चालीस सालों से सबको चुनाव हराने-जिताने का दम भरने वाले मेरे दादा डर रहे हैं। कहेन चुनावै लड़ै क होई तो, फिर कम से कम जिला पंचायत क लड़ब। प्रधानी लड़के इज्जत थोड़ो न गंवावै क बा। वैसेओ जब तक राजा (कुंडा के विधायक रघुराज प्रताप सिंह) उधरान अहैं इज्जत इही म बा कि चुप मारके बैठा रहा। न जीता तो, समाज में इज्जत जाई औ जीत गया तो, राजा के दरबार में हाजिरी दैके इज्जत गंवावा। इलाहाबाद-लखनऊ के रास्ते पर कुंडा के पहले लालगोपालगंज बाजार से हमारे गांव के लिए मुड़ना होता है। बाजार में सीमेंटेड सड़क बन रही थी। पूछने पर पता चला कि ये सड़क लालगोपालगंज की स्थानीय परिषद का अध्यक्ष बनवा रहा है। और, ये बस बाजार और उससे थोड़ा आगे तक ही बनेगी। साथ ही खबर ये भी सुनने को मिली कि लालगोपालगंज बाजार से प्रतापगढ़ की डबललेन सड़क राजा ने रुकवा दी। अब ये पता नहीं कितनी सच है लेकिन, हर दूसरे कदम पर एक रजवाड़े वाले प्रतापगढ़ में उन्हीं राजाओं के चुनाव जीतने के बाद बदहाल सड़कें इस खबर पर यकीन करने को कहती हैं। क्योंकि, विकास ऐसे स्वयंभू राजाओं के लिए तो, मुश्किल ही बनता है ना। 

और, ये गांव के समाज में इज्जत का मसला भी अजब है। शहर में पैसा, पोस्ट इज्जत दिलाने में मदद करती है। लेकिन, गांव में जाति और जाति के बाद जुड़ा पैसा और विद्वता (पता नहीं आज के संदर्भ में कितनी बची रह गई है) इज्जत दिलाती है। हमारे ही एक चचेरे दादा हैं जो, इलाहाबाद के एक इंटर कॉलज में लेक्चरर हैं। खुद भी अकेले थे, उनके बेटा भी अकेला है। इस वजह से आर्थिक स्थिति भी ठीक-ठाक है। शहर में हिंदी के अध्यापक हैं लेकिन, गांव में पुलिस थाने में उनका बहुत जुगाड़ होता था। जुगाड़ की वजह ये कि वो किसी न किसी अखबार के बिहार संवाददाता बने रहते थे। और, छठहें छमासी अखबार में छपी अपनी एक खबर दिखाकर बाघराय (हमारा पुलिस थाना) में आने वाले हर दरोगा को काबू में किए रहते थे। खैर, गांवों में आए बदलाव की वजह से अब ये हथकंडा थोड़ा काफी कमजोर पड़ गया है।

इस बार मैं गांव गया तो, हमारी नजदीकी सियारामगंज बाजार में ग्रामीण पत्रकार दादा की जमीन पर एयरटेल का टावर खड़ा था। पता चला किराए पर दिया है। आज ये जमीन उनको कमाकर दे रही है लेकिन, इसी जमीन ने उन्हें समाज में हंसी का पात्र बना दिया था। हंस तो सभी जातियां रही थीं। सारे बाभनों और कुछ ठाकुरों ने तो उनको न्यौतना भी बंद कर दिया। दरअसल, दादा को किसी ने कहा कि सुअर पालन से अच्छी कमाई हो सकती है। गांव के बगल के एक पासी को उन्होंने सुअर पालने के लिए रखा और उसे वही जमीन दे दी थी। पता नहीं कमाई कितनी हुई लेकिन, समाज निकाला का दबाव ऐसा बनाकि उन्हें परंपरा से हटकर अपनी कमाई का नुस्खा बंद डब्बे में डालना पड़ा। अब बेटा उसी बाजार में सरिया, सीमेंट, बालू बेच रहा है, अच्छी कमाई कर रहा है।

हमारी नजदीकी बाजार सियारामगंज भी गांवों के सामाजिक बदलाव की गजब की मिसाल है। पंद्रह साल पहले तक एक ठाकुर साहब की तीन दुकानें थीं। जिसमें सीमेंट, सरिया से लेकर घर का हर जरूरी सामान, रस्सी, राशन का तेल सब मिलता था। ठाकुर साहब सेना में सिपाही रहे थे। इसके अलावा बाजार में बस गिनी-चुनी दुकानें थीं। कुछ चाय-समोसा टाइप की। फिर धीरे-धीरे ठाकुर-बाभनों के बेरोजगार लड़कों के लिए उनके घर के लोगों ने, खासकर शहरों में कमा रहे लोगों ने बाजार में ही दुकानें बनवाकर दे दीं। अब एक ही लाइन में बाभन, ठाकुर, बनिया, अहिर, चमार, पासी (इन जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किसी को कमतर या ज्यादा दिखाने के लिए नहीं बल्कि, गांव की सामाजिक स्थिति को शीशे में दिखाने की कोशिश के लिए है) सबकी दुकानें हैं। दुकानों में भी कोई बंटवारा नही। बाभन ठाकुर भी चाय-पान-कपड़ा बेच रहे हैं और दूसरे भी। जाति नहीं काम पैमाना बन रहा है। ऐसा नहीं है कि जाति की ठसक पूरी तरह से खत्म हो गई है लेकिन, काम की जरूरत उसे दबा रही है। अब उसी आधार पर दोस्ती-यारी और दुराव के मापदंड भी बदल रहे हैं।

जारी है

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