



चीनी खिलौनों पर भारत सरकार ने 6 महीने के लए पाबंदी लगा दी है। लेकिन, ये कदम दुनिया के बाजार में चीन की हैसियत के सामने बच्चों के खेल जैसा ही नजर आता है। क्योंकि, जब इंडिया के बड़े हिस्से पर ही मेड इन चाइना का ठप्पा लगता जा रहा हो तो, खिलौनों पर रोक कितनी असरदार होगी।
चीनी खिलौनों पर सरकारी रोक शायद इतनी ही कारगर होगी कि भारत के बड़े डिपार्टमेंटल स्टोरों में चीनी खिलौने अब बच्चों को लुभा नहीं पाएंगे। लेकिन, उस देश में जहां सारी मारामारी के बाद भी मॉल और बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर सड़क किनारे लगने वाली और फुटकर दुकानों के मुकाबले बमुश्किल 10 प्रतिशत हिस्सा ही हथिया पाए हैं। वहां भारत सरकार घटिया चीनी खिलौनों पर 6 महीने की रोक लगाकर क्या कर पाएगी। समझ पाना मुश्किल है।
फिर भी चीनी खिलौनों पर रोक की ये खबर इतनी बड़ी थी कि सभी अखबारों-टीवी चैनलों की बड़ी खबर बनी। क्योंकि, कहीं न कहीं से हम सबको ये अच्छे से पता है कि चीन का बना सामान घटिया होता है और वो भी इतना कि वो हमारी मेहनत की कमाई के साथ हमारी अनमोल सेहत पर भी खतरा डाल रहा है। ये सब जानते-बूझते भी सरकार घटिया चीनी खिलौनों पर सिर्फ 6 महीने की रोक लगा पाई है। जबकि, ये चीनी खिलौने हमारी कमाई, सेहत के साथ ही हमारे देश के लाखों छोटे, कुटीर खिलौना उद्योगों की बरबादी का कारण भी बन रहे हैं।
दरअसल, ऐसी घटनाएं शायद बीच-बीच में हमें झकझोरती हैं। ठीक वैसे ही जब करीब डेढ़ साल पहले अगस्त 2007 में चीन में बनी नोकिया की BL-5C बैटरियों ने इंडिया को ऐसा दहशत में डाल दिया था कि कई नोकिया सेंटर पर मारपीट की नौबत आई। जबकि, नोकिया ने तुरंत उन सारी बैटरियों को वापस लेने का एलान कर दिया था। नोकिया जैसी बड़ी कंपनी थी, उसे अपनी प्रतिष्ठा की परवाह थी इसलिए 8 करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्च झेलकर भी नोकिया ने इस सिरीज की 30 करोड़ बैटरियों में से 4 करोड़ 60 लाख वो बैटरियां वापस ले लीं। जो, नोकिया को जापानी कंपनी मात्सुशिता ने बनाकर दी थीं। आपको लगता होगा कि जापानी कंपनियां तो क्वालिटी के मामले में समझौता नहीं करतीं। फिर ये कैसे हो गया। दरअसल ये सारी बैटरियां मात्सुशिता के चीन के प्लांट में लगी हुई थीं।
ऐसे ही एक बार फिर अमेरिकी खिलौना कंपनी मटेल टॉयज के जहरीले खिलौनों ने बच्चों के साथ उनके मां-बाप को भी दहशत में डाल दिया था। यहां भी मामला वही निकला कि अमेरिकी कंपनी ने सस्ते के चक्कर में जो खिलौने चीन के प्लांट में बनवाए थे। उनमें बच्चों की सेहत के लिए खतरनाक मेटल ज्यादा मात्रा में थे।
चीन के घटिया सामानों के ये उदाहरण भर हैं। चीन हमसे तेज रफ्तार से तरक्की कर रहा है। और, कई मामलों हमारे देश के नीति-नियंता भी चीन का ही उदाहरण देकर विकास की गाड़ी चीन से भी तेज रफ्तार से दौड़ाना चाहते हैं। तेज रफ्तार से विकास करते चीन का यही हल्ला आज भारत के विकास को बट्टा लगा रहा है। अब आप सोच रहे होंगे, इससे भारत के विकास पर कैसे असर पड़ सकता है। दरअसल चीनी सामानों ने कुछ इस तरह से हमारे आसपास घर कर लिया है कि अब तो, मेड इन चाइना के ठप्पे पर नजर भी नहीं जाती। चीनी सामानों की घटिया क्वालिटी के बारे में जानने के बाद भी जाने-अनजाने भारत के लोग इसे खरीद रहे हैं और चीन के विकास की रफ्तार और तेज कर रहे हैं।
भारत में कंज्यूमर नाम का प्राणी सबसे तेजी से बढ़ा है। यानी वो खर्च करने वाले जिनकी जेब में पैसा है जो, मॉल में शॉपिंग करता है, मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखता है। कंज्यूमर नाम का ये प्राणी कंज्यूम करना जानता है, इसे इस बात की ज्यादा परवाह नहीं होती कि खरीदा हुआ सामान कितना चलेगा। कंज्यूमर के पास पैसे हैं तो, उस पैसे को खींचने के लिए हर मॉल में माल ही माल भरा पड़ा है।
देश में ऑर्गनाइज्ड रिटेल क्रांति की बात जोर-शोर से सुनाई दे रही है। और, ये भी कहा जा रहा है कि यही रिटेल देश में लाखों लोगों को रोजगार के नए मौके देगा। भारतीय कंपनियों की तरक्की का भी रास्ता खुलेगा। लेकिन, कुछ छोटे आंकड़े हैं जिससे साफ होता है कि भारत में हो रही रिटेल क्रांति के फायदे से चीन के विकास की गाड़ी भारत के ही विकास को मात देगी।
भारत के जितने भी बड़े ऑर्गनाइज्ड रिटेल स्टोर आ रहे हैं उसमें जिन सामानों को आप ये समझकर खरीदते हैं कि ये पैसे भारतीय कंपनियों के पास जा रहे हैं वो, पैसे चीन की कंपनियों के पास जाते हैं। ग्रॉसरी और फर्नीचर आइटम्स का 65 प्रतिशत चीनी कंपनियों का ही माल भरा पड़ा है। फैशन-कॉस्मेटिक्स-बनावटी गहने इसके 75 प्रतिशत पर चीनी कंपनियों का ही कब्जा है। मॉल से खिलौने खरीदने वाले करीब 15 प्रतिशत बच्चे ही देसी खिलौने के साथ अपना बचपन बिता पाते हैं।
चीनी सामानों का ये कब्जा सिर्फ भारत के मॉल के माल में ही नहीं है। सड़कों पर होने वाला व्यापार जिसे अनऑर्गनाइज्ड रिटेल कहा जा रहा है। वहां चीन का कब्जा और मजबूत है। सड़क किनारे बिकने वाले अजीब-अजीब से खिलौने, टॉर्च, बैटरी, कॉस्मेटिक्स, कैलकुलेटर, डिजिटल डायरी- सब कुछ चाइनीज है। सामान बेचने वाला चिल्ला-चिल्लाकर पहले ही बता देता है कि सामान मेड इन चाइना है कोई गारंटी नहीं है। फिर भी मोलभाव कर खरीदने वाले की लाइन लगी है। सड़क किनारे लगे इस बाजार में तो, 90 प्रतिशत सामान मेड इन चाइना ही है। और, देश के रिटेल बाजार में अनऑर्गनाइज्ड रिटेल का हिस्सा 95 प्रतिशत है।
यहां तक कि मेहनती जापानियों के बाजार में भी चीन ने जमकर कब्जा कर रखा है। जापान के बाजार में भी जापानी में मेड इन चाइना लिखे सामान भरे पड़े हैं। मेड इन इंडिया का एक भी ब्रांड अब तक वहां के बाजार में जगह नहीं बना पाया है। वजह वही कि एक तो हम दुनिया के पीछे-पीछे सामान बनाना शुरु करते हैं। यानी ये कि जब तक हम सामान बनाकर अमेरिका, चीन, जापान के सामान की बराबरी में पहुंचते हैं। तब तक दुनिया की जरूरत बदल जाती है।
चीनी सामान किस तरह से हमारे घरों में जगह बना लेता है और हमें पता ही नहीं चलता। मैं चाइनीज सामान जाबूझकर तो, नहीं ही खरीदना चाहता। लेकिन, जाने-अनजाने मुझ पर भी थोड़ा बहुत मेड इन चाइना का ठप्पा हावी हो ही गया है। मेरे पास लेनोवो का लैपटॉप है वो, चीन में बना है। मैंने देसी कंपनी रिलायंस से नेट कनेक्शन लिया। लेकिन, जब मैं कनेक्शन की डिवाइस ध्यान से देखता हूं तो, HUWAI के USB मोडम पर असेंबल्ड इन चाइना की मोहर लगी थी।
अगर आपके घर में WWIL का कनेक्शन है तो, ध्यान से देखिएगा देसी कंपनी WWIL का सेटटॉप बॉक्स भी मेड इन चाइना ही मिलेगा। यानी हमारी तरक्की को दिखाने वाले सारे प्रतीक चिन्हों पर चीन ने कब्जा कर रखा है। चीन की तरक्की की वजह भी साफ पता चल जाती है। दुनिया जिन सामानों को आगे इस्तेमाल करने वाली हो, उसे बनाने में आगे निकलो। दुनिया के बाजार को अपने माल से पाट दो, जब तक दुनिया को ये समझ में आएगा कि ये सामान कहां से आ रहा है तब तक दुनिया उन्हीं सामानों की आदी हो जाएगी। ये बात भारतीय कंपनियों के लिए समझने की है। भारतीय कंपनियां दुनिया में झंडे गाड़ रही हैं। लेकिन, देश की जरूरत के सामान बनाने में पीछे हैं।
वीडियोकॉन के अलावा दूसरी भारतीय टेलीविजन बनाने वाली कंपनी का नाम भी याद नहीं आता। टाटा का वोल्टास का एसी बढ़िया होने के बावजूद मार्केटिंग और समय के साथ न बदल पाने की वजह से सैमसंग और एलजी से रफ्तार में पीछे छूट रहा है वैसे, अभी दूसरा सबसे ज्यादा बिकने वाला एसी वोल्टास का ही है। कार-मोटरसाइकिल के मामले में भारतीय कंपनियां अभी आगे हैं लेकिन, विदेशी कंपनियां तेजी से ये हिस्सा कम कर रही हैं।
दुनिया भर के लोगों को सॉफ्टवेयर ज्ञान भारतीय दे रहे हैं लेकिन, एक भी ऐसी भारतीय कंपनी लैपटॉप या कंप्यूटर नहीं बना रही है जो, डेल और लेनोवो को थोड़ा भी मुकाबला दे सके। हाल ये है कि कभी-कभी तो, पूरे इंडिया पर ही मेड इन चाइना का ठप्पा सा लगा दिखने लगता है। अच्छा ये है कि अभी पूरा देश इंडिया नहीं बना है, भारत का बड़ा हिस्सा इंडिया बनने से बचा हुआ है, इसीलिए मेड इन चाइना के ठप्पे से अभी देश का बड़ा हिस्सा बचा है। यही बचा हुआ भारत का बड़ा हिस्सा भारतीय कंपनियों के लिए बड़ा बाजार बन सकता है। वरना तो, इन खिलौनों पर 6 महीने की रोक से क्या होगा।






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harsh ji bahut sunder lekh hai apka….thanx to u
china. ki pragti, ek niyam hai,jitan jaldi upar jata hai, utana jaldi niche aata hai, aur baki bat ,china ke priduct ban karne ki , ye sab rajnitik khel hai, ,isme koi dam nahi hai, sab janata ko ,bewkuf banane ki bate hai