



रविवार की छुट्टी और जबरदस्त गर्मी की वजह से पूरा दिन घर में बिताया। और लगे हाथ टीवी पर फिल्म देख डाली। फिल्म को बीच से देख पाया। काबुल में कहीं नेताजी भटक रहे थे। भारत से भागने के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस किस तरह से अफगानिस्तान के रास्ते जर्मनी पहुंचते हैं। और, कैसे भारतीय कम्युनिस्ट नेताओं के पत्र और आश्वासन के बाद भी नेताजी को सोवियत संघ अपने यहां आने की इजाजत नहीं देता।
फिल्म में तथ्य कितने सही थे-कितने गलत पता नहीं। लेकिन, जितना भी खोज पाए होंगे bose the forgotten hero फिल्म बनाने वालों ने सही ही दिखाया होगा। मैंने बहुत पहले एक कितना भी पढ़ी थी नेताजी पर। उसके और फिल्म के तथ्य काफी मिल रहे थे। मैं यही सोच रहा था कि आखिर उस समय कैसे एक नेता ने बिना जरूरी संचार माध्यमों, लोगों तक पहुंच और गांधी के प्रभाव के खिलाफ जाकर देश के लिए लोगों का जनमानस अपने लिहाज से तैयार किया होगा।
अपने देश में अपने देश के लोगों को देश के लिए तैयार करने की क्षमता नेताओं में नहीं दिख रही है। ऐसे हालात में नेताजी ने दुनिया के अलग-अलग देशों के भारतीय युद्धबंदियों और दूसरे देश में गए हिंदुस्तानियों को इकट्ठा करना सचमुच बहुत मुश्किल काम रहा होगा।
मेरी बहुत इतिहास की जानकारी नहीं है। अपनी सामान्य समझ है। उसके आधार पर मैं जब नेताजी को समझने की कोशिश करता हूं तो, मुझे लगता है कि काश एक ऐसा नेता आज भारत को मिल पाता। एक कांग्रेसी राजनीतिज्ञ (आजाद भारत के पहले का), कांतिकारी कम्युनिस्ट विचार वाला और जबरदस्त नेशनलिस्ट (राष्ट्रवादी)- कुछ ऐसा था नेताजी का व्यक्तित्व। लेकिन, शायद यही वजह रही कि इस महान नेता की विरासत आगे बढ़ाने का काम न तो कांग्रेस करना चाहती है और न ही इस देश की वामपंथी और राष्ट्रवादी पार्टियां।
मान लो कि कांग्रेसी तो इसलिए याद नहीं करते कि गांधी का विरोध करके कांग्रेस अध्यक्ष बनने वाले नेताजी को याद किया तो, आजावीन कांग्रेस के नेता तो नहीं ही बन पाएंगे। वामपंथी और राष्ट्रवादी पार्टी के लोगों को पता नहीं क्या तकलीफ है। याद भी करते हैं बस ऐसे ही याद भर करने के लिए। वामपंथियों में एक फॉरवर्ड ब्लॉक थोड़ा बहुत याद भी करता है तो, उसकी CPM, CPI तो सुनते ही नहीं दूसरों को वो क्या सुना पाएगा।
मुझे लगता है कि नेताजी होते तो, आज पाकिस्तान न होता। बर्मा शायद भारत का हिस्सा होता। भारत इतना ताकतवर होता कि चीन उसकी जमीन पर कब्जा न कर लेता। देश में राष्ट्रवादी भावना इतनी प्रबल होती कि उसके चलते दूसरी राष्ट्रविरोधी भावनाओं को जगह न मिल पाती। हमारे जैसे भारतीयों को इस भ्रम में न जीना पड़ता कि हम कैसा देश बनें। भारत NAM ummit (गुटनिरपेक्ष देशों के सम्मेलन) की जगह G8 में शामिल होता।
दरअसल हुआ यही था कि अंग्रेजों के साथ गांधी जी के अहिंसा आंदोलन और शांति के रास्ते से आजादी के चक्कर में जवाहर लाल नेहरू तो अंग्रेज ही हो गए थे। उन्हें अंग्रेजों के राज से तो मुक्ति जरूरी लगती थी लेकिन, अंग्रेजों के राज करने का तरीका अच्छा लगने लगा था। यही वजह थी कि 15 अगस्त 1947 को देश तो आजाद हुआ लेकिन, वो आजादी अंग्रेजों के राज से आजादी थी। अंग्रेजी राज से नहीं।
वरना सोचिए कि क्या वजह है कि आज भी जॉर्ज पंचम की शान में गाए गए जन गण मन पर पूरा भारत और भारतीय सेनाएं अपनी छाती चौड़ी किए रहती हैं। क्या वजह है कि अंग्रेज भारत की आजादी के बासठ साल बाद भी भारत आते हैं और विजय दिवस मनाकर शान से चले जाते हैं। विजय दिवस भी ऐसा वैसा नहीं 1857 के शहीदों के विद्रोह (अंग्रेज तो यही करते हैं) को दबाने वाले अफसर की शान में। छाती पर मूंग दलके चले जाते हैं जैसे कि हम अभी भी गुलाम हैं। क्या वजह है कि देश की आजादी के लिए अपना सबकुछ मिटा देने वाले और भारत की आजादी तक न देख पाने वाले जांबाज शहीदों के नाम गलती से दिख जाएं तो, बात अलग है वरना आजाद भारत की हर उपलब्धि पर एक परिवार का ही नाम खुदा दिखता है।
मैं भी कहां अचानक इस सब चिंता में दुबला होना लगा। दुनिया की मंदी के दौर में देश को तरक्की की ओर ले जाने अर्थशास्त्र के डॉक्टरों के हाथ में देश है। ग्लोबल विलेज जैसे विचार खोपड़ी फाड़कर बाहर आए जा रहे हैं। और, मैं भी कहां ऐसा विलक्षण नेता खोजने लगा। इतनी ही इस देश को चिंता होती नेताजी की तो, आजादी के इतने साल बाद कम से कम उनकी मौत का तो सही-सही पता लगा पाती। भारत की आजादी के लिए निर्वासन में जीने वाले नेताजी मौत के बाद भी उसी अवस्था में है। देश का क्या देश तो आजाद हो ही चुका है।




जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है ये मैंने पिछले साल 15 दिसंबर को लिखा था। और, आज 7 महीने के बाद ये बात साबित भी हो रही है कि जरदारी को साथ लेकर भारत वो कर सकता है जो,
62 सालों में सारी मेहनत-मशक्कत के बाद भारतीय सरकारें नहीं कर सकीं।
भारतीय विदेश नीति के जानकार पता नहीं क्यों जरदारी के साथ संवाद बेहतर बनाने का काम नहीं कर पा रहे हैं। जबकि, जरदारी ने वो बात मान ली है जिसे मनवाने के लिए भारत संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका से लेकर दुनिया के हर थोड़ा भी दादा टाइप देश के पास पाकिस्तानी आतंकवाद के सबूतों का पुलिंदा लिए घूम रहा था। अमेरिकी अखबार the Washington post में जरदारी ने माना है कि पाकिस्तान ने छोटे-छोटे हित पूरे करने के लिए सरकारी नीति के तहत आतंकवादियों को पाला-पोसा-बढ़ाया। और, ये आतंकवादी पाकिस्तानी अवाम के साथ इस तरह से जुड़े हुए थे कि अमेरिका के ट्विन टावर पर हुए 9/11 हमले के पहले तक इन्हें हीरो की तरह देखा जाता था।
जरदारी ने एक और बात कही है कि दुनिया की दादागिरी में पाकिस्तान-अफगानिस्तान बर्बाद हो गए। ये भी एक ऐसी बाच है जिसे दुनिया अच्छे से जानती-मानती है लेकिन, तालिबान-अलकायदा-आतंकवादियों के अलावा कुछ रक्षा विश्लेषकों की ही जुबान से ये सुनाई देता था। अब खुद पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने ये कह दिया कि सोवियत संघ और अमेरिका के शीत युद्ध का शिकार पाकिस्तान और अफगानिस्तान हुए हैं।
जरदारी का ये बयान और कुछ दिन पहले दिया गया हिलेरी क्लिंटन का बयान एक दूसरे को और सच बनाता है। अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि पिछले 2-3 दशकों से अमेरिकी मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान में आतंकवादियों के सफाए के बजाए उन्हें बढ़ाने में हो रहा था। अब इन तीनों बयानों को साथ रखिए-
पाकिस्तान सरकार छोटे हितों को पूरा करने के लिए आतंकवादियों को पाल पोसकर बड़ा कर रही थी।
अमेरिका-सोवियत संघ के शीत युद्ध में अफगानिस्तान-पाकिस्तान, आतंकवादियों का गढ़ बन गए।
और, खुद हिलेरी का कहना कि आतंकवादियों को सफाए के लिए दी जा रही अमेरिकी मदद पाकिस्तान में आतंकवादियों को बढ़ाने में की जा रही थी।
साफ है दुनिया के दादा देश एशिया में अपना अड्डा मजबूत करने के लिए भारत-पाकिस्तान को लुरियाने में जुटे थे। भारत-पाकिस्तान का धर्म के आधार पर हुआ अलगाव सोवियत संघ-अमेरिका को ये आधार अपने आप ही दे दे रहा था कि भारत-पाकिस्तान एक दूसरे से लड़ने में उनकी मदद मांगते रहें। अब सोवियत संघ भले खत्म हो गया। लेकिन, अमेरिका ने खुद ही ये नीति बना ली कि दोनों की पटका-पटकी को बढ़ावा देते रहो। बचा-खुचा काम पाकिस्तान को बढ़ावा देकर चीन करता रहता ही है। वैसे अब चीन में हो रहे दंगों पर चीन सरकार ने पाकिस्तान से सफाई मांगी है।
कश्मीर जैसा नासूर दोनों देशों के पास राष्ट्रवादी होने का सबसे बड़ा आधार बनाता ही था। अच्छा हुआ कि हिंदुस्तानी संस्कृति, संस्कार नफरत की आग में इतना नहीं जले कि वो, आतंकवादी तैयार करने की ओर बढ़ते। लेकिन, सिर्फ मजहबी आधार पर बना पाकिस्तान इससे बच नहीं पाया। अफगानिस्तान-पाकिस्तान की अस्थिर सत्ता, लोकतंत्र का अभाव आतंकवाद की आग के लिए विशुद्ध देसी घी साबित होता रहा। और, इस आग में पाकिस्तान-अफगानिस्तान के जलने के साथ तेज लपटों से आज भी भी भारत झुलस रहा है।
कश्मीर में बेवजह आग लगी हुई है। उमर अब्दुल्ला जैसा नौजवान-आगे की सोच रखने वाला मुख्यमंत्री भी असहाय है। उसे टीवी पर आकर सफाई देनी पड़ रही है कि CRPF और पैरामिलिट्री की 75 कंपनियां तैनात हैं उन्हें हटाकर राज्य पुलिस की सिर्फ 25 कंपनियों से कैसे काम चल पाएगा। लेकिन, अलगाववादियों के लिए ये सबसे अच्छा समय होता है। वो, दबाव बढ़ाते जा रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों को काबू करने के लिए चली गोलियों से हमारा कश्मीरी नौजवान हलाल होता है और अलगाववादियों की बात के समर्थन में और सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों की मजबूती बढ़ती ही जाती है।
बस अच्छी बात ये है कि कश्मीरी अवाम का लोकतंत्र में भरोसा टूटा नहीं है। लेकिन, सरकार, सेना के खिलाफ ढेरों हवाई किस्से उनके जनमानस में घर कर गए हैं। मैं करीब ढाई साल पहले शादी के बाद श्रीनगर गया था तो, डल लेक पर जिस बोट में रुका था। उसके मालिक ने जो किस्सा सुनाया वो, चौंकाने वाला था। बेहद अच्छे स्वभाव के सुपर डीलक्स बोट के मालिक ने कहाकि- कश्मीर में आतंकवाद है ही नहीं। ये तो हिमाचल प्रदेश के सेब कारोबारियों और सेना की मिलीभगत हैं। क्योंकि, हिमाचल के सेब कारोबारियों को डर है कि कश्मीर में माहौल अच्छा रहा तो, कश्मीरी सेबों के आगे उनके सेब कौन खाएगा। ये सिर्फ बानगी है- ऐसे हजारों मनगढ़ंत नफरत भरने वाले किस्से कश्मीरियों के मानस का हिस्सा बन चुके हैं।
अब 62-63 सालों की नफरत के बाद जब आग लगाते-लगाते पाकिस्तानी सरकार का हाथ खुद जलने लगा तो, जरदारी कह रहे हैं कि बातचीत, शांति उनका सबसे बड़ा हथियार है। अच्छा है भारत सरकार को भी 5 साल के लिए जनादेश मिला है। स्थिर सरकार है जरदारी को साथ लीजिए, संवाद बेहतर कीजिए। ISI और कठमुल्लाओं के खिलाफ जूझ रह जरदारी का साथ दीजिए। अंतरराष्ट्रीय मंचों के लिए हिलेरी क्लिंटन जैसों को आगे रखिए। कश्मीर में जलती आग ऐसे ही बुझ पाएगी। वरना तो, CRPF, सेना हटाने और लगाने में अगले कई सौ साल बीत जाएंगे। और, कुछ निकलकर आने वाला नहीं है।




पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का खुदा जाना … बड़ी भूल हुई। फिल्म में ये गाना दो लोगों के निजी प्रेम संबंधों के उम्मीदों पर खरा न उतरने को बखूबी बयां करता है। लेकिन, गीत लिखने वाले को शायद ये अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि ये लाइनें किसी ऐसी शख्सियत पर बखूबी फिट बैठेगा जो, करोड़ो की उम्मीदों को तोड़ रही है। धूल-धूसरित कर रही है।
मनुवाद, ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद की विरोधी मायावती की मूर्तियां लखनऊ में हर थोड़ी दूर पर नजर आने लगी हैं। मायावती शायद देश की पहली नेता होंगी जो, जीते जी ही खुद अपनी मूर्तियां लगाने पर जुटी हैं। गांव-समाज में एक देसी कहावत अकसर सुनने को मिल जाती है फलनवा बड़ा आदमी रहा। अपने जीते जी मरे के बादौ क इंतजाम कई गवा। काहे से कि केहु ओकरे करै वाला नहीं रहा। मायावती भी कुछ गांव-समाज के उसी बड़े आदमी जैसा बर्ताव कर रही हैं। लेकिन, मामला सिर्फ ये नहीं है कि मायावती ने किसी से प्रेम नहीं किया-शादी नहीं की तो, उनकी फिकर करने वाला भी कैसे होगा। दरअसल, ये मायावती तो, उन करोड़ों लोगों की उम्मीद थी जिन्हें लगता था कि ये हमारे लिए बहुत कुछ करने के लिए शादी-ब्याह नहीं कर रही। अपना जीवन-करियर सब त्याग दिया।
ये वो मायावती थी जिसकी मूर्ति कहीं नहीं थी लेकिन, यूपी का करोड़ो दबा-कुचला अधिकारविहीन पीछे डंडा-झंडा लिए गर्मी-पानी-जाड़ा में मायावती के नाम का झंडा बुलंद करता घूम रहा था। फिर मायावती को ये करने की क्यों सूझी। इन करोड़ो लोगों पर मायावती को भरोसा क्यों नहीं रहा कि ये उनके मरने के बाद भी उनका नाम उसी बुलंदी पर रखेंगे जहां आज बिठा रखा है।
ये वो लोग थे जो, मायावती के बनाए अंबेडकर पार्क में इकट्ठा होते हैं। एक दिन की रोजी-रोटी त्यागकर लखनऊ पहुंचते हैं। मनुवाद की खिलाफत में मायावती के साथ खड़े होने के लिए गंगा का किनारा छोड़कर लखनऊ के अंबेडकर पार्क में बनी नहर को भीमगंगा बना देते हैं। गंगा से पवित्र मानकर उसी पानी से आचमन करते हैं।
अब देखिए मायावती क्या कर रही हैं। मायावती इन अधिकार विहीन लोगों को अधिकार दिलाने की मृगमरीचिका दिखाकर सत्ता में आ गईं। अधिकार छीनने वालों की जिस टोली के मुलायम के साथ होने का ढिंढोरा पीटकर ये सत्ता में आईं सत्ता में आते ही उन्हीं लोगों को मंच पर खड़ा कर दिया। और, उन अधिकार विहीन लोगों से कहा- ये आपके मसीहा हैं इन्हें अधिकार दीजिए ये, आपके अधिकारों के लिए लड़ेंगे।
हाथी इन अधिकार विहीन लोगों की ताकत था। फटे पुराने नीले कपड़े पर हाथी लहराता देख इन्हें अपनी ताकत का अहसास होता था। अब लंबी-लंबी कारों पर साटन-मखमल के कपड़े पर हाथी लहरा रहा है। इन्हें लगता है कि जैसे ठगे गए हों। लखनऊ में खड़े 60 हाथी इन पर भार बन रहे हैं। बहनजी और उनके साथ दूसरे अधिकार विहीनों के लिए लड़ने वाले नेताओं की मूर्तियों पर सिर्फ लखनऊ में 2700 करोड़ रुपए खर्च हो गए। और, कहते हैं न कि हाथी पालने से ज्यादा उसे खिलाना भारी पड़ता है। कुछ ऐसा ही है। यूपी के अधिकार विहीनों की मेहनत की कमाई का 270 करोड़ रुपए हर साल सिर्फ इन पत्थर की मूर्तियों और हाथिय़ों को खिलाने में (मरम्मत) बरबाद होगा।
गांव-गिरांव में इन अधिकार विहीनों की जमीन का पट्टा नहीं हो पा रहा है। रत्ती-धूर जमीन में ये परिवार चला लेते हैं। जमींदार टाइप के लोग इनकी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। इनको गांव की जमीन दिलाने का वादा करने वाला मायावती अब यूपी की सबसे बड़ी जमींदार हो गई है। जमींदार है इसलिए जमींदारी भी कर रही है। सिर्फ लखनऊ में 413 एक़ड़ की इस जमींदारी कब्जे की जमीन पर पत्थर के हाथी, पत्थर की मायावती, पत्थर के कांशीराम और पत्थर के दूसरे नेता खड़े हैं जो, जमींदारी मिटाने की लड़ाई लड़ रहे थे। पूरा का पूरा वो आंदोलन पत्थर होता दिख रहा है जो, नोएडा के एक गांव की अधिकार विहीन सामान्य महिला को कुछ महीने पहले तक देश की प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने की जमीन बना चुका था।
और, ये आंदोलन खत्म होगा ऐसा नहीं है। सिर्फ अधिकार विहीनों की ही बात क्यों। मायावती की जिस सोशल इंजीनियरिंग ने यूपी में सारे समीकरण ध्वस्त कर दिए थे। वो, भी टूटेगा। सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय नारा भर बनकर रहा गया है। मायावती के नजदीकी हिताया और सिर्फ उन्हीं का सुखाय। और, सबको सिर्फ इन पत्थरों में ही अपना सुख खोजना होगा। 413 एकड़ जमीन और 2700 करोड़ रुपए इतनी बड़ी रकम तो, थी ही कि अधिकार विहीनों (5 करोड़ 90 लाख लोग इस प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे हैं) के अधिकार कुछ तो मिल ही जाते।
बात सिर्फ लखनऊ की ही नहीं है। मायावती अपने आखिरी निशान हर जगह छोड़ देना चाहती हैं। दिल्ली से नोएडा घुसते ही लखनऊ जैसे ही गुलाबी राजस्थानी पत्थरों की ऊंची दीवार दिखने लगती है। करीब 3 किलोमीटर का ये पूरा क्षेत्र जंगल था-हरा-भरा था। इन पत्थरों की ऊंची दीवारों के बीच में पत्थर के हाथी और मूर्तियां हैं जो, गर्मी की चिलचिलाती धूप में चिढ़ पैदा करते हैं। मेरा मन इन मूर्तियों को ढहाने का होता है।
नोएडा के दूर-दराज गांवों में भी लोगों के रहने के लिए घर मिलना मुश्किल है। इनता महंगा कि आम आदमी तो, सिर्फ देखते हुए जिंदगी बिता लेता है। ये पत्थर के जंगल वहां तैयार हो रहे हैं जहां, ठीक सामने की जमीन पर करोड़ो के बंगले हैं। मायावती का मनुवाद विरोध एक चक्र पूरा कर चुका है। करोड़पति बंगले वाले और मायावती और उनके पहले के मनुवाद विरोध नेता पत्थर के ही सही लेकिन, पड़ोसी हैं। आमने-सामने रहते हैं। खैर, मैं भी यूपी में ही रहता हूं इसलिए ज्यादा हिम्मत नहीं करूंगा लेकिन, मायावती के पीठ पीछे ये धुन जरा ऊंची आवाज में सुनने का मन करता है।
पत्थर की मायावती … तुझे हमने दलितों का खुदा जाना … बड़ी भूल हुई …
पीछे से बैकग्राउंड स्वर भूल हुई तो, भुगतो
और, सुना-पढ़ा कि सुप्रीमकोर्ट अब इन मूर्तियों के बनने, जनता के पैसे की बर्बादी पर सवाल पूछ रहा है
ऑर्डर .. ऑर्डर .. ऑर्डर .. ये अदालत का मामला है चलता ही जाए




राज ठाकरे को जमानत मिल गई। अगर किसी ने बुधवार चार बजे के पहले टेलीविजन बंद कर दिया होगा और किसी वजह से सात बजे तक टीवी नहीं देख पाया होगा तो, उसे लगेगा कि राज को जमानत क्यों लेनी पड़ी। जब पिछले 48 घंटों से राज्य सरकार की पूरी मशीनरी और केंद्र की ओर से भेजी गई अतिरिक्त अर्द्धसैनिक बलों की फौज राज के घर का सुरक्षा घेरा प्रधानमंत्री निवास से भी ज्यादा किए हुए थी और गिरफ्तारी नहीं हो पाई तो, फिर ये जमानत का ड्रामा क्या है।
बुधवार शाम चार से सात बजे के बीच की गिरफ्तारी से लेकर जमानत तक का ये ड्रामा महाराष्ट्र की गंध भरी राजनीति की असली कहानी कह देता है। शुरुआत में राज ठाकरे की उत्तर भारतीयों के खिलाफ गंदगी करने की कोशिश सिर्फ ठाकरे खानदान के वर्चस्व की लड़ाई के तौर पर देखी जा रही थी। लेकिन, अब ये पूरी तरह साफ हो गया है कि मायानगरी में अब तक बनी किसी भी फिल्म से ज्यादा ड्रामे वाली इस पटकथा को राज्य के सबसे कमजोर मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख और राज्य के वोटविहीन (शायद रियल लाइफ की बांटो-काटो की राजनीति कुछ वोट भीख में दे दे) नेता राज ठाकरे ने मिलकर तैयार किया है। और, पिक्चर अभी खत्म नहीं हुई है। क्योंकि, वोटों के लिहाज से राज ठाकरे को ज्यादा फायदा नहीं होगा। हां, कांग्रेस-एनसीपी के कमजोर, बेतुके शासन को एक और मौका मिलने में ये मदद करेगा।
ये दोनों नेता कितने दोगले हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज की जमानत से से ठीक पहले तक मुख्यमंत्री एक टीवी चैनल पर ये कह रहे थे कि राज्य में सभी की सुरक्षा की जिम्मेदारी उनकी है। और, राज ठाकरे की गिरफ्तारी एकदम जायज है। उस समय विक्रोली कोर्ट में महाराष्ट्र पुलिस राज ठाकरे को 12 दिन की न्यायिक हिरासत में लेने का आधार तक नहीं पेश कर पाई। और, मुंबई के अलावा महाराष्ट्र के कई हिस्सों खासकर नासिक, औरंगाबाद, पुणे में एमएनएस की गुंडागर्दी जमकर चल रही थी। वैसे राज पहले तो दहाड़ रहे थे कि वो जमानत किसी भी कीमत पर नहीं लेंगे फिर धीरे से भीगी बिल्ली की तरह जमानत लेकर निकल आए।
राज को जमानत देते समय अदालत ने जो दो बातें कहीं जरा उसे भी पढ़ लीजिए।
पहला- शहर में शांति का ख्याल रखें।
क्या, कानून तोड़ने वाले और देश बांटने की कोशिश करने वाले किसी व्यक्ति को इतनी इज्जत दी जा सकती है
दूसरा- पढ़े-लिखे व्यक्ति की तरह व्यवहार करें। ये एकदम सही सलाह लगी लेकिन, क्या ये बताने की जरूरत है पढ़े-लिखे हैं इसीलिए वो सारी गंदगी सोच-समझकर फैला रहे हैं।
राज के सिर्फ इस कुतर्क पर उन्हें जमानत मिल गई कि उनके बयानों को पूर्ण परिदृश्य में रखे बिना मीडिया ने उसका गलत इस्तेमाल किया। वैसे ऐसे’>http://batangad.blogspot.com/2008/01/blog-post_11.html”>ऐसे कुतर्कों के साथ राज पहले भी कानून को ठेंगे पर रखते रहे हैं। लेकिन, पुलिस अदालत को ये क्यों नहीं बता पाई कि पिछले दस दिनों में मुंबई एक गुंडा राज की बंधक हो गई थी। जबकि, अदालत में चल रही बहस के समय भी राज के गुंडे महाराष्ट्र में गैरमराठियों के लिए दहशत बढ़ाने की कोशिश छोड़ नहीं रहे थे। अब पुलिस अदालत को क्यों ये नहीं बता पाई कि टैक्सियों के तोड़े जाने, लोगों को सड़कों पर, ट्रेन में, बसों में पीटे जाने की तस्वीरें को अब भला किस पूर्णता की जरूरत है। पुलिस चाहती तो, किसी भी टीवी चैनल से वो तस्वीरें लेकर अदालत से गुंडा राज की रिमांड ले सकती थी। कल नासिक से जिस तरह से उत्तर भारतीयों के आपात खिड़की से किसी तरह घुसकर नासिक छोड़कर जाने की तस्वीरें थीं वो, भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद की ट्रेन की याद दिला रही थीं।
फिर भी अगर देशमुख की पुलिस राज को हिरासत में नहीं रख पाई तो, इसके पीछे ज्यादा कहानी खोजने की जरूरत है क्या। देशमुख ने वोटविहीन नेता को पिछले दस दिनों से सुर्खियों में रखा हुआ है। टैक्सी वालों को पीटने और टैक्सियां तोड़ने की पहली घटना के बाद अगर उस इलाके के थानेदार को ही प्रशासन ने कार्रवाई की छूट दी होती तो, रोनी सूरत वाले गृहमंत्री शिवराज पाटील और गृहराज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल के मुर्दा वक्तव्य टीवी पर देखने की जरूरत नहीं होती। राज किसी आम गुंडे की तरह जेल की सलाखों के पीछे होता और मीडिया उसकी जमानत या गिरफ्तारी के ड्रामे पर अपना कैमरा न फोकस करता।
एक’>http://batangad.blogspot.com/2008/02/blog-post_09.html”>एक थानेदार के हाथों खत्म हो जाने वाली गुंडागर्दी पर कांग्रेस की केंद्र और राज्य सरकारें 48 घंटों तक आपात बैठक करती रही और गुंडा राज मराठियों का सबसे बड़ा नेता बनता गया। राज को जमानत मिलने के बाद जो, लोग टीवी चैनल पर एमएनएस समर्थक के तौर पर नाच रहे थे, भांगड़ा कर रहे थे, उनमें से ज्यादातर 18 साल तक के नहीं थे। जो 18 साल के ऊपर के थे वो, ज्यादातर खाली बैठे लोग थे जो, काम नहीं करना चाहते लेकिन, राज की सेना में शामिल होकर रुआब झाड़ना चाहते हैं।
मराठी माणुस के हितों की रक्षा करने के राज ठाकरे के खोखले दावे के साथ शुरू हुआ गुंडा राज एक मराठी माणुस की जान ले चुका है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में इंजीनियर 52 साल के अंबादास धारराव की राज ठाकरे के भक्तों के पथराव में मौत हो गई। अबंदास की बीवी के मराठी हितों की रक्षा का क्या हुआ। राज ने अदालत में भी मराठी माणुस के हितों की रक्षा करते रहने की प्रतिबद्धता दोहराई है यानी अभी पिक्चर बाकी है तो, अभी कितनी जानें जाएंगी, फिर वो मराठी माणुस की हों या फिर उत्तर भारतीयों की।




मायावती को उनके प्रदेश के अपराधी डराते हैं। कहा जाता है कि अगर कोई किसी को कभी झापड़ भी मार दे तो, झापड़ खाने वाला चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, झापड़ मारने वाले से हमेशा डरता रहता है। यही मायावती के साथ हो रहा है। वैसे मायावती का अतीक से डरना बेवजह नहीं है।
मायावती को लखनऊ के वीवीआईपी गेस्ट हाउस में समाजवादी पार्टी के रमाकांत, उमाकांत यादव और अतीक अहमद की बदसलूकी आज भी डराती होगी। वैसे जब मायावती ने अतीक से अपनी जान का खतरा बताया तो, पहले से ही उत्तर प्रदेश से भगोड़ा घोषित किए जा चुके अतीक की पुलिस मुठभेड़ में हत्या की आशंका बलवती हो गई। लेकिन, न तो कल्याण सिंह का जमाना था और न ही अतीक अहमद, शिव प्रकाश शुक्ला की तरफ सिर्फ अपराधी था। अतीक माननीय सांसद हैं और आने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस, सपा के लिए काम की ताकत बन सकते हैं।
अब अगर दिनदहाड़े हुई हत्या के बाद भी अतीक जैसा बदमाश मुस्कुराते हुए मुख्यमंत्री पर आरोप लगाकर मजे से जेल जा सकता है तो, मारे गए बीएसपी विधायक राजू पाल की विधवा पूजा पाल और राजू की मां रानी पाल का डरना तो बेवजह नहीं ही है। उनके पास तो मुख्यमंत्री जैसी सुरक्षा भी नहीं है। राजू पाल हत्याकांड में गवाह उमेश की तो जैसे सांस ही रुक गई है।
इधर, दिल्ली पुलिस के बड़े-बड़े कारनामे कर रही है। बड़े-बड़े भगोड़े बदमाशों को दिल्ली पुलिस धर दबोच रही है, सलाखों के पीछे पहुंचा दे रही है। खासकर उत्तर प्रदेश के भगोड़े बदमाशों के लिए तो दिल्ली पुलिस काल बन गई है। खबरों को देखकर पहली नजर में तो ऐसा ही लगता है। दो दशक से भगोड़े पांच लाख के इनामी बदमाश बृजेश सिंह के बाद इलाहाबाद का कुख्यात भगोड़ा माफिया सांसद भी दिल्ली पुलिस की गिरफ्त में आ गया है।
लेकिन, एक बड़ा इत्तफाक दिख रहा है जिससे सवाल भी खड़े हो सकते हैं कि आखिर उत्तर प्रदेश के अपराधी दिल्ली पुलिस की ही पकड़ में क्यों आ रहे हैं। बृजेश सिंह के भुवनेश्वर से पकड़े जाने के बाद जब अतीक अहमद दिल्ली से पकड़े गए तो, मुझे लगने लगा कि कहीं मायावती सही तो, नहीं कह रही थी। मायावती ने कुछ दिन पहले ही प्रेस कांफ्रेंस करके कहा था कि समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुना गया भगोड़ा सांसद अतीक अहमद उनकी हत्या करने की फिराक में हैं। और केंद्र की कांग्रेस सरकार उसकी मदद कर रही है। वैसे तो इतनी तगड़ी सिक्योरिटी में रहने वाली मुख्यमंत्री को कोई अपराधी कैसे मार सकता है। लेकिन, आरोप जब मुख्यमंत्री खुद लगा रही हो तो, उस पर कुछ तो यकीन करना ही पड़ता है।
अतीक का दिल्ली पुलिस की गिरफ्त में आना कई सवाल खड़े करता है। क्या उत्तर प्रदेश पुलिस में अतीक का जाल इतना मजबूत हो चुका है कि अतीक की सारी बातचीत रिकॉर्ड होने के बाद भी पुलिस उसे पकड़ नहीं सकी। कहते हैं कि फरारी में अतीक ने 65 से ज्यादा सिमकार्ड इस्तेमाल किए। अतीक का भाई अशरफ और हमजा अभी भी पुलिस की पकड़ में नहीं आए हैं। साफ है माहौल ठीक होते ही ये दोनों भी दिल्ली पुलिस की गिरफ्त से यूपी की जेल में महफूज हो जाएंगे। अतीक ने दिल्ली पुलिस (मुझे साफ मिलीभगत लगती है) को खुद को सौंपने से पहले दिल्ली में टीवी चैनलों को जिस ठाट से इंटरव्यू दिया था वो, देखने लायक था। साफ दिख रहा था कि दिल्ली में किसी सांसद आवास पर इंटरव्यू दिया गया था।
एक और बात छोटे-छोटे मामलों में आजकल पुलिस अपराधियों से सच उगलवाने के लिए नारको टेस्ट का सहारा लेने लगी है। फिर अतीक को इससे क्यों बख्शा जा रहा है। साफ है अगर बेहोशी में अतीक ने सारी सच्चाई उगली तो, राजू पाल का हत्यारा साबित होने के साथ वो कई बड़े नेताओं और उत्तर प्रदेश पुलिस के कई बड़े अफसरों को भी नाप लेगा। इलाहाबाद शहर और अतीक के संसदीय क्षेत्र फूलपुर में तो सबकी बोलती सी बंद हो गई है। सब कह रहे हैं कि जेल में बैठा अतीक तो अब वहीं से किसी की भी हत्या करवा सकता है।
अब सोचिए कि मायावती क्या कर लेंगी अगर सपा और कांग्रेस दोनों को अतीक नेता लग रहे हैं अपराधी नहीं। मुझे तो लगता है कि मायावती सच ही कह रही हैं कि केंद्र की कांग्रेस सरकार भी अतीक की मदद कर रही है। और, अगले लोकसभा चुनाव में नेहरू-गांधी की विरासत की मलाई खा रही सोनिया अम्मा की कांग्रेस अतीक अहमद को नेहरू जी की लोकसभा सीट फूलपुर से अपना प्रत्याशी बना सकती है। जीतने में कोई दिक्कत तो है ही नहीं।




नेताजी की आत्मा इस देश की सरकारों पर पता नहीं दुखी हो रही होगी, रो रही होगी या हंस रही होगी। जिस देश को आजाद कराने के लिए उन्होंने सबकुछ किया। उसी देश में आजादी के बाद उनको याद तक करने से सरकारें डर रही हैं। पता नहीं कौन सी वजह है जो, सरकारों को नेताजी को याद तक करने से डराती रहती है। वैसे तो, कांग्रेस की सरकार गांधी-नेहरू परिवार के अलावा किसी को देश के लोगों को याद नहीं कराना चाहती। लेकिन, नेताजी के मामले में कांग्रेस को ये भी लगता है कि नेताजी को जितने ज्यादा लोग देश में याद करेंगे, कांग्रेस के आजादी के पहले की उनकी भूमिका के गुणगान में उतनी कमी हो जाएगी।
आज नेताजी की 111वीं जयंती है। लेकिन, देश भर में कहीं इस सरकार ने छोटा सा कार्यक्रम भी नेताजी की याद में नहीं किया। RTI यानी सूचना के अधिकार के तहत सरकार को ये जानकारी देनी पड़ी है कि इस सरकार ने नेताजी पर एक छोटा सा भी विज्ञापन नहीं दिया। जबकि, ऐरे-गैरे नत्थू खैरे टाइप के चिरकुट नेताओं की गंदी सी फोटो लगे विज्ञापनों पर सिर्फ साल भर में सरकार ने 209 करोड़ रुपए खर्च कर दिए।
और, ये भी तब जब बंगाली प्रियरंजन दासमुंशी के पास ही सूचना और प्रसारण मंत्रालय है जो, सरकारी विज्ञापन तय करता है। सरकार अब तक ये भी नहीं बता रही है कि नेताजी की मृत्यु की जांच करने वाले आयोग ने क्या रिपोर्ट सौंपी है। सरकार की बेशर्मी ये है कि आजाद हिंद फौज के कमांडर इन चीफ नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सरकार देश के पहले कमांडर इन चीफ का खिताब देने को तैयार नहीं है। जबकि, ये नेताजी की आजाद हिंद फौज ही थी जिसने देश की आजादी से तीन दिन पहले भारत का झंडा लहरा दिया था।
खैर, देश नेताजी को पूरे सम्मान के साथ याद कर रहा है। क्योंकि, इन कांग्रेसियों का हाल तो ये है कि ये सोनिया और राहुल-प्रियंका को तो सम्मान दे सकते हैं लेकिन, सुभाष चंद्र बोस को याद करने से भी डरते हैं। ये बेशर्म ये तक भूल जाते हैं कि नेताजी भी आजादी के पहले की कांग्रेस के अध्यक्ष तक रह चुके थे। लेकिन, शायद महात्मा गांधी के विरोध की वजह से कोई कांग्रेसी सुभाष को याद करके महात्मा गांधी का विरोधी नहीं कहलाना चाहता।




घर-गांव में अकसर कुछ लोगों के लिए कहा जाता है कि ये तो हद कर देता है। जब देखो तब मांगता रहता है। घर में भी कुछ लोग होते हैं जो, किसी दूसरे को कुछ भी मिला तो, भले ही कुछ देर पहले उनको भी मिला हो, फिर मांगने लगते हैं। दरअसल ये एक पूरी की प्रजाति है जो, मानती है कि मांगे बिना कुछ मिल ही नहीं सकता। चाहे वो मांगना अपने लिए हो या फिर अपने हित में किसी और के लिए।
वैसे ऐसे भीख मांगने वाले समाज में बड़ी हेय दृष्टि से देखे जाते हैं। लेकिन, राजनीति में भिखमगते बड़ा ऊंचा स्थान पा गए हैं। इतना ऊंचा कि भारत रत्न मांगने लगे हैं। कमाल ये है कि भारत रत्न कोई भी अपने लिए नहीं मांग रहा है। अपने लिए क्यों नहीं मांग रहे हैं उसकी वजह अलग है। कुछ जिंदा लोगों के लिए मांग रहे हैं तो, कुछ को मुर्दों को भारत रत्न समर्पित कर उनका सच्चा उत्तराधिकारी होना साबित करना है। सब अपने हित के लि ही जिंदा या मुर्दा को भारत रत्न दिलाना चाहते हैं अभी तक एक बी निष्पक्ष प्रस्ताव भारत रत्न के लिए नहीं आया है।
इसकी शुरुआत की ताजा-ताजा भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने लाल कृष्ण आडवाणी ने। अटल बिहारी बाजपेयी ने आडवाणी का रास्ता साफ किया तो, आडवाणी ने इसका धन्यवाद देने का अनोखा तरीका खोजा। अटल बिहारी बाजपेयी के लिए भारत रत्न की मांग कर डाली। अटल बिहारी बाजपेयी निर्विवाद तौर पर देश के ऐसे नेताओं में हैं जिनका स्थान पार्टी से अलग भी बहुत ऊंचा है लेकिन, आडवाणी की ओर से ये प्रस्ताव आते ही कांग्रेस ने इसे राजनीतिक बढ़त लेने की कोशिश के तौर पर देखा और सिरे से खारिज कर दिया।
लेकिन, राजनीतिकों की यही खासियत होती है कि एक बार किसी भी तरह का मुद्दा हाथ लगे तो, उसे थोड़ा कम-थोड़ा ज्यादा के अंदाज में सभी दल आजमा लेना चाहते हैं। वोट बैंक जुटाने से लेकर भारत रत्न बटोरने तक ये फॉर्मूला चालू है। आडवाणी ने बाजपेयी के लिए मांगा तो, मायावती को लगा कि यही सही मौका है कांशीराम का कर्ज उतारने का। मायावती ने कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग कर डाली। कांशीराम ने देश में दलितों के उत्थान के लिए जितना किया, मेरा मानना है कि उतना डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भी चाहकर नहीं कर पाए थे। लेकिन, क्या मायावती कांशीराम के लिए भारत रत्न सिर्फ इसलिए नहीं मांग रही हैं कि किसी तरह से सवर्णों के ज्यादा नजदीक जाने के आरोपों को राजनीतिक तौर पर खारिज किया जा सके।
करुणानिधि की पार्टी डीएमके करुणानिधि के लिए भारत रत्न चाहती है। तो, अजीत सिंह को अपने पिता चरण सिंह अचानक बहुत महान लगने लगे। अजीत सिंह कह रहे हैं कि भारत रत्न तो, चरण सिंह ही होने चाहिए। अभी शायद हर प्रदेश से कई नामों का आना बाकी है। और, हालात जो दिख रहे हैं इसमें भारत रत्न के लिए भी लॉबी तैयार करनी पड़ेगी।
वैसे राजनीति सहित ज्यादातर क्षेत्रों में हाल यही है भिख मंगता समाज ही आगे निकल पाता है। मंगतई का सबसे बेशर्म फॉर्मूला जो, हमारी आपकी बातचीत में भी अकसर आता है, खूब इस्तेमाल हो रहा है। फॉर्मूला ये कि कोई भीख नहीं देगा तो, तुमड़ी थोड़ी न तोड़ देगा। कोई किसी काम के लिए, किसी पद के लिए कितना ही योग्य न हो, अगर वो मांग नहीं रहा है या उसक लिए कोई मांग नहीं रहा है तो, फिर समय से तो, कुछ मिलने से ही रहा। अब भारत रत्न देने का मापदंड तो तैयार हो नहीं सका है। सीधा सा फॉर्मूला एक लाइन का ये कि ऐसा व्यक्ति जिसने देश के लिए कुछ अप्रतिम किया हो। अप्रतिम करने के भी अपने-अपने कायदे हैं।
इतनी मारामारी में ये भी हो सकता है कि मॉल में मिलने वाली छूट की तरह भारत रत्न देने के लिए पहले आओ-पहले पाओ का फॉर्मूला काम में लाया जाए। इसलिए भैया लगे हाथ मैं भी भारत रत्न के लिए खुद को प्रस्तावित करता हूं। मेरे लिए कोई दूसरा अभी भीख मांगने को तैयार नहीं है। इसलिए मेरे नाम का प्रस्ताव मैं खुद कर रहा हूं। अलग-अलग पार्टियों, प्रदेशों, विचारधारा की तरह ब्लॉग समाज से अभी तक भारत रत्न के लिए मैं अकेला उम्मीदवार हूं। मैं खुश हूं कि अब तक की जिंदगी में पहली बार कुछ मांग रहा हूं वो, भी भी भारत रत्न। जय हो भिखमंगता समाज की, मगतई की अवधारणा की।




आजीवन बलिया से सांसद रहे चंद्रशेखर की मृत्यु के बाद बलिया की जनता ने उनके बेटे को सांसद बना दिया। अब उत्तर प्रदेश की एक लोकसभा सीट के उपचुनाव के नतीजे आए तो, राजनीतिक विश्लेषक और पार्टियों इस जीत के राजनीतिक मायने निकालने में जुट गए हैं। लेकिन, अगर ईमानदारी से इस चुनाव के नतीजे को देखें तो, इसके मायने देश की राजनीति के युवा तर्क को बलिया की जनती अंतिम श्रद्धांजलि से ज्यादा ये कुछ नहीं है।
मेरे ऐसा कहने की पीछे खास वजह भी है। चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर समाजवादी पार्टी के टिकट से सांसद चुने गए हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि सपा इसका जोर-शोर से हल्ला करेगी और इसे राज्य में आने वाले लोकसभा चुनाव के राजनीतिक रुझान के तौर पर बताएगी। उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार आने के बाद से मांद में छिप गए सपा के कार्यकर्ता-नेता बलिया जीतने के बाद चौराहों, बैठकों पर फिर से लोहिया के आधुनिक चेले मुलायम को धरती पुत्र बताने लगे हैं।
लेकिन, क्या बलिया सपा ने जीता है। एकदम नहीं। बलिया की लोकसभा सीट बलिया वालों ने चंद्रशेखर को पैतृक संपत्ति जैसा बनाकर दे दिया था। अब पैतृक संपत्ति थी तो, स्वाभाविक है कि बेटे को इसे विरासत में मिलना ही था। समाजवादी पार्टी ने तो, बस मौके की नजाकत भांपकर नीरज शेखर को साइकिल पर बिठा दिया। बलिया को स्वर्गीय चंद्रशेखर की पैतृक संपत्ति मैं इसलिए कह रहा हूं कि बलिया जाने पर कहीं से भी ये अहसास नहीं होता कि ये भारतीय राजनीति के एक सबसे ताकतवर नेता की आजीवन लोकसभा सीट रही है।
विकास बलिया में रहने वालों को टीवी चैनल या फिर अखबारों की खबरों के जरिए ही पता है। या फिर जो, दिल्ली में चंद्रशेखर के बंगले जाते थे उन्होंने, ही देखा-जाना है। लेकिन, फिर भी चंद्रशेखर जिंदा रहते (और शायद अब भी) बलिया में चंद्रशेखर फोबिया ऐसा था कि बलिया से विधानसभा चुनाव जीतने वाले भाजपा के कई विधायक, मंत्री भी लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर के पक्ष में ही चीखते नजर आते थे।
यहां रहने वालों को चंद्रशेखर ने विकास के नशे से इतना दूर रखा कि लोग उन्हें सिर्फ चंद्रशेखर होने के नाम से ही सारी जिंदगी जिताते रहे। बलिया में विकास न करने के लिए चंद्रशेखर से बड़ा कुतर्क शायद ही कोई दे सके। चार महीने के लिए इस देश के प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर कहते थे- मैं देश का नेता हूं। मुझे देश की तरक्की करनी है, देश तरक्की करेगा तो, बलिया भी विकसित हो जाएगा। चंद्रशेखर अब हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन, चंद्रशेखर की इस बात पर बहस होनी इसलिए जरूरी है कि कोई नेता जिस लोकसभा सीट से चुनकर संसद मे पहुंचता हो, वहां के विकास पर ऐसे अजीब कुतर्क कैसे गढ़ सकता है।
लेकिन, बलिया के लोग शायद ऐसे ही हैं। बस चंद्रशेखर ने उनकी नब्ज पकड़कर उसी हिसाब से उन्हें उन्हीं की अच्छी लगने वाली भाषा में उसी बात को उनके दिमाग में बसा दिया कि वो देश में सबसे अलग और कुछ श्रेष्ठ हैं। बलिया के लोगों को मैं अपनी पढ़ाई के दौरान इलाहाबाद में बड़े ठसके से ये नारा लगाते सुनता था कि अदर जिला इज जिल्ली, बलिया इज नेशन। बागी बलिया कहकर वो खुश हो लेते हैं। देश से दस दिन पहले बलिया आजाद हुआ था, बस इतने से ही खुश हो लेते हैं। इस आत्ममुग्धता के शिकार बलिया वालों को पता ही नहीं लगा कि कब वो देश की मुख्य धारा से पूरी तरह से अलग हो गए हैं। यहां तक कि बलिया वालों को बगल के मऊ को देखकर भी शर्म नहीं आती लिया जो, कल्पनाथ राय के सांसद रहते हुए तहसील से चमकता हुआ जिला बन गया था।
खैर, चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर बलिया से जीतकर लोकसभा में यानी दिल्ली पहुंच गए हैं। वैसे बलिया के लोगों को पता नहीं कैसे ये भ्रम हो रहा है कि चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को उन्होंने बलिया से दिल्ली पहुंचा दिया। चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर तो पहले से ही दिल्ली में थे। और, ऐसे दिल्ली में थे कि इस लोकसभा चुनाव से पहले मुश्किल से ही बलिया के लोग चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को पहचानते थे। यही वजह थी कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी बलिया में चंद्रशेखर के ही बेटे को बाहरी बताने का दुस्साहस कर रही थी। लेकिन, ब्राह्मण स्वाभिमान के तथाकथित, स्वयंभू प्रतीक हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी पर दांव लगाना बसपा के काम नहीं आया। चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को 2,95,000 वोट मिले जबकि, हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर को 1,64,000 यानी लड़ाई में बहुत फासला था। कुल मिलाकर चंद्रशेखर का बेटा चंद्रेशखर से भी ज्यादा वोटों से जीतकर संसद पहुंच गया।
कांग्रेस की तो वैसे भी उत्तर प्रदेश में कोई गिनती है नहीं तो, फिर बलिया में अचानक होने की कोई वजह भी नहीं थी। लेकिन, यहां बीजेपी की जो दुर्गति हुई वो, देखने लायक है। भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता और एक जमाने में चंद्रशेखर के ही प्रिय शिष्यों में गिने जाने वाले वीरेंद्र सिंह को सिर्फ 22,000 वोट मिले। यानी साफ है कि फिलहाल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के समय वाले ही हालात हैं। सीधी लड़ाई बसपा और सपा के बीच ही है।
यही समीकरण 2009 के लोकसभा चुनाव तक भी बना हुआ दिख रहा है। और, अगर यही रहा तो, 2009 में भाजपा की ओर से PM in Waiting लाल कृष्ण आडवाणी 2009 लोकसभा चुनाव के बाद Ex PM in Waiting हो जाएंगे। बलिया लोकसभा उपचुनाव के नतीजे का संदेश मुझे तो साफ दिख रहा है। आप लोगों की क्या राय है बताइए।




देश के इतिहास में ये पहली बार हुआ है कि किसी सांसद के खिलाफ पुलिस ने अपराधियों की तरह स्केच जारीकर उसे भगोड़ा घोषित कर दिया। माननीय (मुझे ये लिखते हुए शर्म आ रही है) सांसदों की सुरक्षा के लिए लगी रहने वाली पुलिस एक सांसद की तलाश में पिछले कई महीनों से घूम रही है। सफलता नहीं मिली तो, सांसद के चेहरे के सात संभव तरीके वाले स्केच जारी किए।
ये सांसद हैं इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से सांसद अतीक अहमद। अतीक अहमद पर वैसे तो इतने अपराधिक मामले और आरोप दर्ज हैं कि उनकी बिना पर ही सांसद को दो-तीन जन्म तो जेल में काटने ही पड़ सकते हैं। लेकिन, एक अपराधी से लगातार चार बार विधायक और फिर उसी जिले की एक सीट से अतीक को संसद का भी सफर करने का रास्ता मिल गया।
अतीक उस फूलपुर सीट से सांसद हैं जहां से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु सांसद थे। और, जिस सीट से दलित चेतना के प्रणेता कांशीराम को चुनाव हारना पड़ा था। अतीक पर आरोप सामान्य नहीं है। सांसद अतीक और उनके विधायक भाई अशरफ पर बसपा से विधायक चुने गए राजू पाल की हत्या का आरोप है। इलाहाबाद की शहर पश्चिमी सीट से लगातार चार बार विधायक अतीक ने जब अपनी विधानसभा सीट अपनी पैतृक संपत्ति समझकर आपने छोटे भाई अशरफ को सौंपी तो, समाजवादी पार्टी ने जिताऊ गणित के तहत अशरफ को टिकट भी दे दिया। क्योंकि, 2004 में अतीक को फूलपुर से लोकसभा से चुनाव लड़ना था।
लेकिन, बरसों से अतीक के आतंकराज से डरी-सहमी-ऊबी जनता ने नवंबर 2004 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा के राजू पाल को जिता दिया। राजू पाल भी अपराधी था लेकिन, जनता को लगा कि अतीक से तो बेहतर ही होगा। लेकिन, जनता को क्या पता था कि पैतृक विरासत छिनने पर कोई अपराधी क्या-क्या कर सकता है। आरोप है कि अतीक अहमद और अतीक के छोटे भाई अशरफ ने मिलकर राजू पाल की हत्या की साजिश रची और हत्या करवा दी। सपा के शासन में ये सब हुआ था तो, पार्टी के ही बाहुबली सांसद और उसके छोटे भाई के खिलाफ कोई कार्रवाई कैसे हो सकती थी। कुछ हुआ भी नहीं।
25 जनवरी 2005 को राजू पाल की हत्या हुई थी उसके बाद हुए दूसरे उपचुनाव में अतीक का छोटा भाई अशरफ जीतकर विधानसभा पहुंच गया। लेकिन, जब 2007में राज्य में विधानसभा के चुनाव हुए तो, अतीक, अशरफ के साथ पूरे राज्य सपा के पापों का घड़ा भर चुका था और पश्चिमी विधानसभा से अपराधी अशरफ और राज्य से अपराधियों की सरकार कही जाने वाली सपा सरकार गायब हो गगई और राजू पाल की पत्नी पूजा पाल विधायक हो गई।
उत्तर प्रदेश में ही एक और फैसला आया है। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने फैसला किया है कि उत्तर प्रदेश में पक्षी विहार प्रतापगढ़ की कुंडा तहसील में बेंती में ही बनेगा। बेंती अब भी रजवाड़ा है और बाहुबली उदय सिंह और सामान्य अपराधी से नेता, विधायक और मंत्री तक बन चुके उनके बेटे रघुराज प्रताप सिंह के आतंक से त्रस्त है। मायावती के शासन में बेंती में रजवाड़े के अवैध कब्जे वाली झील को पक्षी विहार बनाया गया और सरकार ने लाखों रुपए खर्च करके वहां पर पक्षी विहार बनाया। बसपा की सरकार गई और सपा की सरकार आ गई। बस इतने से ही सारा मामला बदल गया अपराधी कहे जा रहे रघुराज प्रताप सिंह सपा की सरकार में मंत्री बन गए। अब सरकारी पैसे से बना पक्षी विहार राजा रघुराज प्रताप सिंह की निजी संपत्ति बन गया । लेकिन, अच्छा हुआ कि मायावती ने फिर से सरकारी पैसे का दुरुपयोग और एक बाहुबली के आतंक को थोड़ा कम करने की कोशिश की।
उत्तर प्रदेश सरकार का इलाहाबाद के एक अपराधी सांसद और उसके छोटे अपराधी भाई और उससे सटे प्रतापगढ़ जिले के एक रजवाड़े (अब विधायक) के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान निश्चित तौर पर काबिले तारीफ है। ये गलत कामों के खिलाफ चल रहा अभियान है। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये अभियान इसीलिए चल रहा है क्योंकि, इन दोनों ने समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान मायावती से निजी पंगा ले लिया था। और, एक मुख्यमंत्री की निजी रुचि लेने की वजह से ही ये सब हो पा रहा है।
सवाल ये है कि क्या एक सरकार बदलने की वजह से ही सिर्फ अपराधी है या नहीं ये तय होता है। मायावती की ही सरकार में उनके कई मंत्री, विधायक, नेता अपराध कर रहे हैं और पुलिस उन्हें सलामी बजा रही है। अतीक अहमद और अशरफ को भी पुलिस की सुरक्षा मिली हुई थी। क्या वो पुलिस भी उन्हें बचाने में लगी रही जो, अब तक उन दोनों अपराधियों को पुलिस पकड़ नहीं सकी। सांसद अतीक के खिलाफ यूपी पुलिस ने संसद से अपील की है कि वो, अपराधी अतीक को शरण न दे। लेकिन, देश में उत्कृष्ट मापदंड की बात करने वाले सभी पार्टियों के नेता क्या अतीक जैसे अपराधी को संसद में अब तक शरण नहीं दे रहे थे।
फिर सब कुछ जानते-बूझते इस तरह के सवाल पहेली क्यों बने हुए हैं। जिसका खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ता है। लेकिन, शायद जनता खुद ही इसकी जिम्मेदार है क्योंकि, हो सकता है अगले लोकसभा चुनाव में अतीक को वो फिर से सांसद और उसके छोटे भाई अशरफ को विधायक बना दे। साफ है सरकार बदली या फिर केंद्र में कहीं सपा के समर्थन से कोई लंगड़ी सरकार बनने की नौबत आई तो, अतीक जैसे लोग दिल्ली में शाही मेहमाननवाजी का भी मजा पा सकते हैं। लोकतंत्र की कुछ बड़ी खामियों में से ये सबसे बड़ी है।




राष्ट्रीय राजनीति में मायावती की बड़ा बनने की इच्छा बीजेपी के खूब काम आ रही है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बुरी तरह से पटखनी देने वाली मायावती देश के दूसरे राज्यों में बीजेपी के लिए सत्ता का रास्ता आसान कर रही हैं। जबकि, केंद्र में भले ही मायावती कांग्रेस से बेहतर रिश्ते रखना चाहती हो। राज्यों में बहनजी की बसपा कांग्रेस के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी कर रही है।
गुजरात के बाद हिमाचल की सत्ता भी सीधे-सीधे (पूर्ण बहुमत के साथ) भारतीय जनता पार्टी को मिल गई है। गुजरात में जहां मोदी सत्ता में थे लेकिन, मोदी के विकास कार्यों के साथ हिंदुत्व का एजेंडे की अच्छी पैकेजिंग असली वजह रही। वहीं, हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में थी और उसके कुशासन की वजह से देवभूमि की जनता ने दुबारा वीरभद्र पर भरोसा करना ठीक नहीं समझा। और, उन्हें पहाड़ की चोटी से उठाकर नीचे पटक दिया।
दोनों राज्यों में चुनाव परिणामों की ये तो सीधी और बड़ी वजहें थीं। लेकिन, एक दूसरी वजह भी थी जो, दायें-बायें से भाजपा के पक्ष में काम कर गई। वो, वजह थी मायावती का राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडा। उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आई मायावती को लगा कि जब वो राष्ट्रीय पार्टियों के आजमाए गणित से देश के सबसे बड़े राज्य में सत्ता में आ सकती हैं। तो, दूसरे राज्यों में इसका कुछ असर तो होगा ही। मायावती की सोच सही भी थी।
मायावती की बसपा ने पहली बार हिमाचल प्रदेश में अपना खाता खोला है। बसपा को सीट भले ही एक ही मिली हो। लेकिन, राज्य में उसे 7.3 प्रतिशत वोट मिले हैं जबकि, 2003 में उसे सिर्फ 0.7 प्रतिशत ही वोट मिले थे। यानी पिछले चुनाव से दस गुना से भी ज्यादा मतदाता बसपा के पक्ष में चले गए हैं। और, बसपा के वोटों में दस गुना से भी ज्यादा वोटों की बढ़त की वजह से भी भाजपा 41 सीटों और 43.8 प्रतिशत वोटों के साथ कांग्रेस से बहुत आगे निकल गई है। कांग्रेस को 38.9 प्रतिशत वोटों के साथ सिर्फ 23 सीटें ही मिली हैं।
गुजरात में भाजपा की जीत इतनी बड़ी थी कि उसमें मायावती की पार्टी को मिले वोट बहुत मायने नहीं रखते। लेकिन, मायावती को जो वोट मिले हैं वो, आगे की राजनीति की राह दिखा रहे हैं। गुजरात की अठारह विधानसभा ऐसी थीं जिसमें भाजपा प्रत्याशी की जीत का अंतर चार हजार से कम था। इसमें से पांच विधानसभा ऐसी हैं जिसमें बसपा को मिले वोट अगर कांग्रेस के पास होते तो, वो जीत सकती थी। जबकि, चार और सीटों पर उसने कांग्रेस के वोटबैंक में अच्छी सेंध लगाई।
इस साल हुए छे राज्यों के चुनाव में भाजपा को चार राज्यों में सत्ता मिली है। हिमाचल प्रदेश, गुजरात और उत्तराखंड में भाजपा ने अकेले सरकार बनाई है जबकि, पंजाब में वो अकाली की साझीदार है। कांग्रेस सिर्फ गोवा की सत्ता हासिल कर पाई और बसपा को उत्तर प्रदेश में पहली बार पांच साल शासन करने का मौका मिला है।
2008 में होने वाले चुनावों को देखें तो, दिल्ली में कांग्रेस की सरकार दो बार से चुनकर आ रही है। सत्ता विरोधी वोट तो कांग्रेस के लिए मुश्किल बनेंगे ही। बसपा भी यहां कांग्रेस के लि मुश्किल खड़ी करेगी। दिल्ली नगर निगम में बसपा के 17 सभासद हैं। मध्य प्रदेश बसपा, भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन सकती है। शिवराज के नेतृत्व से लोग खुश नहीं हैं और शिवराज सिंह चौहान, मोदी या फिर उमा भारती जैसे अपील वाले नेता भी नहीं हैं। वैसे, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव भी अगले साल ही होने हैं। और, दोनों ही राज्यों में भाजपा के लिए सरकार बनाना बड़ी चुनौती होगी।
गुजरात चुनावों में भारी जीत और हिमाचल में मिली सत्ता के बाद भले ही लाल कृष्ण आडवाणी और दूसरे भाजपा नेता दहाड़ने लगे हों कि ये दोनों जीत 2009 के लोकसभा के चुनाव में भाजपा की सत्ता में वापसी के संकेत हैं। ये इतना आसान भी नहीं दिखता। क्योंकि, पंजाब और उत्तराखंड में मिली जीत के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा को मात खानी पड़ गई थी।


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