



भारत एक कृषि प्रधान देश है। तो, इसमें नया क्या है। नया ये है कि देश में पहली बार किसी किसान को भी पद्मश्री के लायक समझा गया है। उत्तर प्रदेश के मलीहाबाद के हाजी कलीमउल्ला को ये सम्मान मिला है। पद्मश्री पाने वालों की लंबी सूची में कलीमउल्ला कहीं बहुत नीचे दब गए। लेकिन, सुखद ये रहा कि कई अखबारों में कलीम उल्ला को खासी तवज्जो मिली। कलीम आम के सिर्फ एक पेड़ पर आम की 300 किस्में उगा चुके हैं। बरसों का कलीम का खुद का ही शोध है। अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर अमर उजाला कानपुर के स्थानीय संपादक प्रताप सोमवंशी ने कलीम उल्ला की काबिलियत को जगजाहिर करने वाला एक लेख लिखा है। प्रतापजी के साथ मैंने इलाहाबाद से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। काम करना सीखा था। मैं उस संपादकीय का लिंक दे रहा हूं। कलीम की काबिलियत की पूरी जानकारी के लिए ये लेख पढ़ें




मैं इंजीनियर बनना चाहता हूं … डॉक्टर बनना चाहता हूं … मैनेजर बनना चाहता हूं … आईएएस, पीसीएस अफसर बनना चाहता हूं … हीरो बनना चाहता हूं … बड़ा बिजनेसमैन बनना चाहता हूं … 2007 की आखिरी रात तक देश के ज्यादातर लड़कों की आरजू कुछ ऐसी ही हुआ करती थी। लेकिन, नए साल की पहली सुबह नई आरजू, कुछ नए तरह की तमन्ना लड़कों के अंदर लेकर आई है। लड़कों के सीने में दबे अरमान उबल रहे हैं। वो, कह रहे हैं मैं किसी लड़की के कपड़े फाड़ना चाहता हूं। नहीं फाड़ पाऊंगा तो, कपड़े फटते देखने का सुख तो, जरूर लूंगा।
ये 2008 के लड़के टीवी पर दिखना चाहते हैं। तिलक लगाकर टीवी पर दिख रहे हैं। इनकी मांए-बहनें इन्हें टीका लगाकर शहादत वाले भाव में कैमरों के सामने पेश कर रही हैं। ऐसे, जैसे कह रही हों जाओ, आज इम्तिहान है तुम्हारा कमीनेपन में पुरानी सारी मर्द पीढ़ी को मात देकर लौटना। वैसे पुरानी पीढ़ी के जांबाज मर्द भी उनके साथ खड़े हैं।
भगवान शंकर या फिर छत्रपति शिवाजी किसके नाम पर इन्हें इतना साहस मिलता है, आज तक मैं समझ नहीं पाया। ऐसी नाम से सेना तैयार है। सेना पता नहीं किसे जीतती है लेकिन, ठाकरे नाम जिंदा रहे इसलिए कुछ न कुछ करती रहती है। पता नहीं किसका सामना करने के लिए इनके पास सामना अखबार भी है। संपादकीय से लेकर खबर तक कपड़े फाड़ने वालों के गुणगान हैं। कहा जा रहा है सब मराठा स्वाभिमान और मराठी अस्मिता पर हमला है।
सेना से जुड़ी शहर की साध्वी मेयर का बयान आ जाता है कि मराठी तो, किसी लड़की के कपड़े फाड़ ही नहीं पाता। सब बाहर से आए लोग ही कर रहे हैं। किसी लड़की के कपड़े फाड़ने की आरजू 31 दिसंबर 2007 की रात पूरी कर लेने वालों 14 लड़कों में से 2 लड़के कुछ उत्तर प्रदेश, बिहार जैसी जगहों से आए थे और यहीं बस गए थे। वो, संस्कारी नहीं हैं। मेयर साहिबा और उनकी सेना को शायद मरीन ड्राइव पर बलात्कार करने वाले मराठी कांस्टेबल की याद नहीं रही होगी।
सेना का एक अखबार तो, मराठी अस्मिता की लड़ाई लड़ने लगा। लेकिन, दूसरे अखबारों, टीवी चैनलों को ये बात समझ में नहीं आई। एक अंग्रेजी अखबार के दो फोटोग्राफरों का ही दुस्साहस था कि इन शूरवीरों की आरजू पूरी होने के बाद बेजवह उस पर हंगामा मच गया। मन मारकर पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी। मीडिया ने बेवजह ऐसी घटना को तूल दे दिया जो, मुंबई के पुलिस कमिश्नर के मुताबिक, मुंबई में कहीं भी कभी भी हो जाने वाली छोटी सी घटना थी।
गृहमंत्री को राजनीति करनी थी इसलिए कमिश्नर को कड़ी कार्रवाई की निर्देश दिया। खैर, न्याय व्यवस्था को ये गंवारा नहीं हुआ और मराठी अस्मिता के सारे प्रतीक लड़के जेल से बाहर आ गए। लेकिन, बात इतने पर ही कहां रुकने वाली थी। एक पुराने सैनिक को याद आया कि उनका तो, जीवन ही सिर्फ महाराष्ट्र के नवनिर्माण को समर्पित है। और, अगर कठिन से कठिन स्थितियों में भी परिस्थितियों में बेशर्मी से खड़े रहने वाले से नौजवान उनके पाले में नहीं रहे तो, नवनिर्माण कैसे होगा। वो, पहुंच गए सबको लेकर गृहमंत्री के दफ्तर कहा- सब मीडिया की गलती है। मीडिया ने इतना बढ़ा-चढ़ाकर मामला पेश किया कि बेगुनाह जेल भेज दिए गए।
ये बेगुनाह लड़के बेचारे तो, सिर्फ ये देख रहे थे कि लड़कियों के कपड़े कौन फाड़ रहा है। कौन है जो, नए साल में नए तरह के संकल्प पूरे करने का साहस कर रहा है। अब मीडिया में फोटो आई तो, ये समझ में ही नहीं आ रहा है कि कौन सिर्फ कपड़े फटते देखने का सुख ले रहा है। कौन ज्यादा साहसी है जो, खुद कपड़े फाड़ रहा है। वैसे ऐसे संकल्पवान नौजवानों ने 31 दिसंबर की रात और उसके बाद देश के अलग-अलग हिस्से में खूब अपने संकल्प पूरे किए।
ये त्यागी नौजवान अपने नए साल के संकल्प को लोगों के सामने जाहिर नहीं करना चाहते थे। लेकिन, बेड़ा गर्क हो ये फोटोग्राफर, कैमरामैन नाम की गंदी प्रजाति का, जिन्होंने इन लड़कों का संकल्प सबके सामने पेश कर दिया। मुंबई, दिल्ली, केरल, गुड़गांव जैसी जगहों के लड़कों का साहस सबके सामने आ गया। ऐसे उत्साही नौजवानों ने संकल्प तो पूरे देश में पूरा किया होगा लेकिन, दूसरे शहरों के फोटोग्राफर नाकारा निकले कुछ दिखा नहीं सके। और, उन लड़कों को हीरो नहीं बना सके। संकलपवान लड़कों के हाथ से प्रेस कांफ्रेंस का मौका भी निकल गया।
नए साल की शुरुआत में ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के अपने जिले के एक गांव के कुछ नौजवानों ने भी ऐसा ही संकल्प पूरा कर डाला। अब ऐसा संकल्प पूरा करने वाले हीरो तो, हो ही गए हैं। टीवी चैनलों पर, अखबार पर आने लगे हैं। देश के दूसरे लड़के भी ऐसे संकल्प ले रहे हैं। मैं भी संकल्पवान होने की हिम्मत जुटा रहा हूं। मै किसी लड़की के कपड़े फाड़ना चाहता हूं। मैं कमीने से भी कमीना बनना चाहता हूं। मैं अपनी जाति के नाम पर समर्थन चाहता हूं। मैं अपने क्षेत्र के लोगों से समर्थन चाहता हूं। मैं अपने प्रदेश के लोगों का समर्थन चाहता हूं। मैं हर उससे समर्थन चाहता हूं जो, मेरे नए साल के संकल्प को पूरा करने के लिए मेरे साथ खड़ा हो सके और अब तो, गंदे पत्रकारों का भी डर नहीं रहा। मेरे संकल्प को उन्होंने सबके सामने दिखाया तो, मैं हीरो तो हो ही जाऊंगा।




जापानी अपने बच्चों को भारतीय स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। दरअसल जापान को लग रहा है कि एशिया में वो चीन और भारत से पिछड़ रहा है और उनके स्कूल आगे की लड़ाई के लिए बच्चों को तैयार नहीं कर पा रहे हैं। अब उनको लगता है कि भारतीय पढ़ाई से वो चीन और भारत के बच्चों को कुछ पकड़ पाएंगे।
जापानी मानते हैं कि भारत एजुकेशन के मामले में दुनिया का उभरता हुआ सुपरपावर है। एक जमाने में इंटरनेशनल टेस्ट में आगे रहने वाल जापानी जब पिछड़ने लगे तो, उन्हें भारतीय स्कूलिंग ही सहारा नजर आ रही है। जापान की किसी भी अच्छी किताब की दुकान में आसानी से “Extreme Indian Arithmetic Drills” और “The Unknown Secrets of the Indians” जैसे शीर्षक वाली किताबें भरी पड़ी मिल जाएंगी।
जापान के अखबारों में भारतीय बच्चों की जबरदस्त याददाश्त के किस्से खूब छप रहे हैं। अखबारों के मुताबिक, भारतीय बच्चे गुणा यानी मल्टीपिलकेशन के मामले में जापान के स्टैंडर्ड से नौ गुना ज्यादा तेज हैं। गणित के अलावा अंग्रेजी में भी उस्ताद बनने के लिए जापानी अपने बच्चों को भारतीय स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। योग और ध्यान भी इन स्कूलों की दिनचर्या की हिस्सा है।
जापान में जो भी इंडियन इंटरनेशल स्कूल हैं। उसमें जापानी परिवारों से बहुत ज्यादा बच्चे पढ़ने के लिए आ रहे हैं। इन इंडियन इंटरनेशनल स्कूल्स में ज्यादातर टेक्स्ट बुक (किताबें) भारतीय स्कूलिंग सिस्टम के मुताबिक ही होती हैं। पढ़ाने के लिए शिक्षक भी भारत या दूसरे दक्षिण एशियाई देशों से ही हैं।
चौंकाने वाली एक बात तो ये भी है कि जापान में एक बड़े भारतीय किंडरगार्टेन स्कूल लिटिल एंजल ने भारत के नक्शे को हरे और केसरिया रंग में रंग रखा है। इस स्कूल में 45 में से एक ही बच्चा भारतीय है। जापान टाइम्स, न्यूयॉर्क टाइम्स में ऐसी खबरें सुर्खियां बनी हुई हैं। ऐसी ही एक खबर के मुताबिक, एक जापानी ईको किकुटाके खुश हैं कि उनका पांच साल का बच्चा भारतीय स्कूल में पढ़कर अपने आसपास के दूसरे जापानी बच्चों से ज्यादा कबिल है। न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी ऐसी ही खबर पर एक टिप्पणी है- Can American schools learn anything from schools in India? है ना चौंकाने वाली खबर।




किसी एक घर में सबके पास बैंक अकाउंट होना तो, शायद कोई बहुत चौंकाने वाली खबर नहीं होगी। लेकिन, तमिलनाडु का एक पूरा जिला अगले तीन महीने में ऐसा होगा जहां, हर घर में कम से कम एक बैंक अकाउंट तो होगा ही।
तमिलनाडु के सलेम जिले में सात लाख बीस हजार परिवारों में से चार लाख परिवारों में कम से कम एक बैंक अकाउंट तो अभी भी है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया इस जिले को 31 मार्च तक ‘total banking district’ बना देना चाहता है। यानी इस जिले में कम से कम सात लाख बीस हजार अकाउंट तो होंगे ही।
इस जिले में RBI लोगों को ये भी बता रहा है कि नकली और असली नोट का क्या फर्क होता है। इस जिले में किसी को भी बिना कुछ गिरवी रखे या बिना किसी की सिक्योरिटी के पचास हजार रुपए का कर्झ कभी भी मिल सकता है। यही वजह है कि इस जिले में 13,000 महिलाओं के सेल्फ हेल्प ग्रुप अलग-अलग बैंकों से कर्ज लेकर अपना काम कर रहे हैं।
कमाल ये भी है कि अगर यहां किसी बैंक के खिलाफ कोई शिकायत है तो, ग्राहक सीधे RBI की चेन्नई शाखा में शिकायत कर सकता है। और, RBI भरोसा दिला रहा है कि 45 दिन के भी ऑम्बुड्समैन उनकी शिकायत का निस्तारण कर देगा।
पूरे जिले में हर परिवार के पास कम से कम एक बैंक अकाउंट होने की खबर वैसे तो, सामान्य सी ही खबर लगती है। लेकिन, जब मैं इसके असर पर ध्यान देता हूं तो, ये सीधे-सीधे देश का सबसे बड़ा बचत अभियान नजर आता है।
मैंने इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान (इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लेने से पहले) अपने एक मित्र की गारंटी पर बैंक अकाउंट खुलवा लिया था। वैसे, खुद मेरे पिताजी बैंक मैनेजर हैं लेकिन, जानबूझकर मैंने उनके बैंक में या उनकी गारंटी पर अकाउंट नहीं खुलवाया कि ये सबसे बचा के पैसे बचाना है। और, आप सोचिए कि मेरे अंदर एक अजीब सी आदत हो गई थी कि महीने में 300 रुपए तो कम से कम मैं चुपचाप उस अकाउंट में डाल ही देता था। अब सोचिए पूरे जिले को बचत की ये आदत लगी तो, देश के लिए और निजी तौर पर उन लोगों के विकास के लिए इससे बेहतर खबर क्या होगी।




50 साल का हो गया इलाहाबाद का कॉफी हाउस
इलाहाबाद का कॉफी हाउस। शहर के सबसे पॉश इलाके सिविल लाइंस में रेलवे के नजदीक बसा ये कॉफी हाउस इलाहाबाद की खास संस्कृति का वाहक, पहचान रहा है। ये खास पहचान थी, इलाहाबाद की कला साहित्य, संस्कृति, आंदोलन और राजनीति में खास भूमिका की। वो, भूमिका जो, याद दिलाती है कला, साहित्य के क्षेत्र में इलाहाबाद की अगुवाई की। माना ही ये जाता है कि कोई इस शहर से गुजर भी गया तो, साहित्य, संस्कृति और राजनीति के दांव-पेंच से अछूता, अपरिचित तो रह ही नहीं सकता।
एक जमाने में मशहूर प्रकाशन लोकभारती, नीलाभ, हंस, शारदा, अनादि, परिमल इलाहाबाद शहर में थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से निकली साहित्यकारों से निकली टोली का जमावड़ा यहां होता था। अस्सी के दशक तक इलाहाबाद का कॉफी हाउस देश की राजनीति और साहित्य में सबसे ज्यादा प्रासंगिक था। यहां के सफेद फीते वाली ड्रेस में सजे सिर पर लाल फीत वाली लटकती टोपी को सिर पर सजाए बेयरे पूरी अंग्रेजी नफासत के साथ लोगों को कॉफी सर्व करते थे। और, बेहद पुरानी स्टाइल की चौकोर मेज के चारों तरफ राजनीति और साहित्य के साथ देश की दशा-दिशा पर जोरदार बहस यहां किसी भी समय सुनने को मिल जाती थी।
राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेता और हेमवती नंदन बहुगुणा यहां राजनीतिक गुणा-गणित का हिसाब लगा रहे होते थे तो, इसी कॉफी हाउस में फिराक गोरखपुरी, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे देश के दिग्गज साहित्यकारों का दरबार लगा रहता था। और, इनकी बहसों से निकलने वाली बातें इलाहाबाद के आम लोगों की चर्चा मे अनायास ही शामिल हो जाती थीं। उपेंद्रनाथ अश्क, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीकांत वर्मा जैसे लोगों की चर्चा में लोगों की इनकी अगली कहानी के प्लॉट मिलते थे। कमलेश्वर जब भी इलाहाबाद में होते थे, कॉफी हाउस जरूर जाते थे। दूधनाथ सिंह तो, अब भी इलाहाबाद में कॉफी हाउस में कभी-गोल जमाए मिल सकते हैं।
लेकिन, आज 50 साल बाद शहर की इस खास पहचान के बारे में शहर के लोगों को भी बहुत कुछ खास पता नहीं रह गया है। यहां तक कि हाल ये है कि कला, साहित्य, संस्कृति, आंदोलन और राजनीति की दशा-दिशा तय करने वाला कॉफी हाउस में अब चंद ही ऐसी रुचि के लोग मिलते हैं। अब ज्यादातर समय इस कॉफी हाउस में इलाहाबाद हाईकोर्ट के कुछ वकील, कुछ पुराने नेता, कुछ ऐसे बुजुर्ग जो, पुराने दिन याद करने चले आते हैं या फिर कुछ ऐसे लोग जो, कॉफी हाउस में बैठने की बस परंपरा निभाने के लिए ही बने हैं यानी एकदम खाली हैं।
कमाल तो है कि इलाहाबाद के इंडियन कॉफी हाउस के सामने सड़क पर अंबर कैफे खुला। ये कैफे खुला तो था सड़क पर अपना धंधा जमाने के लिए। लेकिन, कॉफी हाउस के सामने सड़क पर इसका खुलना ऐसा हो गया है कि नए जमाने के लड़के-लड़कयों को तो शायद ही अब असली कॉफी हाउस का पता होगा। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुराने-नए नेताओं का जमावड़ा भी इसी अंबर कैफे पर ही होता है। लेकिन, कॉफी हाउस की पुरानी पहचान आज भी शहर के लोगों को रोमांचित करती है। इलाहाबाद के कॉफी हाउस से जुड़ी बहुत कम बातों की जानकारी के लिए मुझे माफ करिएगा। और, अगर इलाहाबाद में पुराने दौर से जुड़ा आपमें से कोई इस कॉफी हाउस से जुड़े कुछ और रोचक या जानकारी बढ़ाने वाली बात जोड़ सके तो, स्वागत है।




जैसी घटनाएं साल भर घटती रहती हैं उसी समय अगर वो सब उसी तरह से गूगल अंकल के सर्च इंजन में जुड़ जाए तो, कौन सा शब्द खोजने पर क्या मिल सकता है। ये मैंने 2007 जाते-जाते खोजने की कोशिश की है।
हरामीपना सर्च मारोगे तो, जॉर्ज बुश की जगह मुशर्रफ का नाम आएगा
हिंदुत्व की वकालत करने वाले सबसे बड़े नेता को खोजोगे तो, लाल कृष्ण आडवाणी की जगह नरेंद्र मोदी का नाम आएगा
विहिप का वजूद अब कहां बचा है ये जानने की कोशिश करोगे तो, राम की अयोध्या के आसपास कहीं नहीं मिलेगा। अब वो राम के पुल से पार उतरने की कोशिश करते दिखेंगे, तमिलनाडु से लंका के बीच कहीं
सांप्रदायिक हमला सर्च करोगे तो, एम एफ हुसैन फटी पेंटिंग के साथ नहीं अब तसलीमा नसरीन द्विखंडिता के साथ मिलेंगी
सबसे बड़े ब्लैकमेलर खोजोगे तो, मुशर्रफ के साथ लेफ्ट पार्टियों के नेता नजर आएंगे
बरबाद सड़कें खोजोगे तो, अब बिहार में नहीं बंबई में मिलेंगी
दलित उत्थान प्रणेता के बारे में जानना चाहोगे तो, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जगह अब सुश्री मायावती की जीवनी और फिल्में दिखेंगी
चाणक्य खोजोगे तो, कलजुगी चाणक्य सतीश चंद्र मिश्रा का नाम आएगा
स्टिंग ऑपरेशन की खोज करने पर आजतक या स्टार न्यूज की जगह अब लाइव इंडिया चमकेगा
राजनीतिक विरासत सर्च मारोगे तो, सोनिया, राहुल गांधी के साथ मुस्कुराती दिखेंगी और पड़ोसी पाकिस्तान में बेनजीर खुदा के घर से बिलावल को हाथ हिलाती दिखेंगी
नरसंहार खोजने पर गुजरात की जगह नंदीग्राम का नाम चमकता दिखेगा
शैया पर पड़े भीष्म पितामह खोजने पर अटल बिहारी वाजपेयी नजर आएंगे
आप सभी को Happy new year 2008




जाति प्रथा सभ्यता बचाने में मदद कर रही है। ये सुनकर अटपटा लगता है। जाति प्रथा को ज्यादातर सामाजिक बुराइयों के लिए दोषी ठहरा दिया जाता है। लेकिन, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मानव शास्त्र विभाग के अध्यक्ष और प्रसिद्ध समाज मानवशास्त्री प्रोफेसर वीएस सहाय का एक शोध कह रहा है कि जाति प्रथा की वजह से ही भारतीय सभ्यता इतने समय तक बची रही है। वो कहते हैं कि भारत और चीन को छोड़कर दूसरी सारी सभ्यताएं इसीलिए नष्ट हो गईं। लेकिन, वो जिस जाति प्रथा की बात करते हैं वो, पिता से बेटे को तभी मिलती थी जब बेटा पिता के ही कर्म करता था। वो, पेशा आधारित जाति प्रथा की वजह से सभ्यता बचने की बात खोजकर लाए हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें




दस साल पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रावासों और डेलीगेसीज में लड़कों के कमरे में (शायद देश भर के छात्रावासों के कमरों में) एक साथ 3 पोस्टर नजर आते थे। ब्लैक एंड व्हाइट पोस्टर मधुबाला का, जिसमें मधुबाला के माथे से एक लट आंखों से थोड़ा बगल से होकर लटक रही होती थी। उससे सटकर एक कलर्ड पोस्टर होता था। काफी कुछ मधुबाला जैसी दिखने वाली माधुरी दीक्षित का। माधुरी दीक्षित का अंदाज भी काफी कुछ मधुबाला जैसा ही होता था। और, उसी से सटा नीली आंखों वाली विश्व सुंदरी ऐश्वर्या राय का। मधुबाला एक पीढ़ी पुरानी, माधुरी उस दौर की और ऐश्वर्या आने वाली पीढ़ी की सबसे खूबसूरत और सबसे ज्यादा लोगों की पसंद वाली हीरोइन की पहचान जैसी थीं।
नंबर एक अभिनेत्री माधुरी ने आज से 5 साल पहले जब संजय लीला भंसाली की देवदास में ऐश्वर्या के साथ काम किया तो, दोनों के एक साथ थिरकने वाले गाने पर पूरा देश थिरका था। साथ ही एक चर्चा ये भी चल पड़ी थी कि माधुरी दीक्षित की नंबर वन की विरासत को संभालने के लिए ऐश्वर्या पूरी तरह तैयार हैं। फिर माधुरी ने परिवार बसा लिया। पति के साथ न्यूयॉर्क में बस गईं। 5 सालों तक मीडिया, मायानगरी से किनारा सा कर लिया। दो प्यारे बच्चों की मां बन गईं और लगा कि माधुरी का दौर पूरी तरह खत्म हो गया। लेकिन, कमाल ये था कि इन 5 सालों में कई प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों के आने के बावजूद एक भी अभिनेत्री ऐसी नहीं आई जिसे बिना किसी बहस के नंबर एक कहा जा सके।
और, माधुरी दीक्षित की 5 साल बाद बड़े परदे पर वापसी के साथ दो बातें हो गईं। एक तो ये कि देश की नंबर वन हीरोइन की सीट खाली नहीं है। माधुरी से ये ताज छीनने के लिए दूसरी अभिनेत्रियों को अभी बहुत दम लगाना पड़ेगा। दूसरी ये कि हॉलीवुड से मुकाबला करते बॉलीवुड में आने वाले दिनों में बिना गाने की सफल फिल्में बनाना अभी बहुत दूर की कौड़ी है। मनमोहिनी मुस्कान वाली माधुरी की आजा नचले भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे अच्छी म्यूजिकल ड्रामा फिल्म बन गई है।
मेरे नजरिए से आजा नचले के बारे में मैं पहले साफ कर दूं कि ये फिल्म अभिनय के लिहाज से बहुत अच्छी नहीं है। ऐसा नहीं है कि अभिनय करने वाले कमजोर है। फिल्म की कहानी ही कुछ ऐसी है। हां, अच्छा हुआ कि माधुरी को नृत्य सिखाने वाले गुरुजी फिल्म में बहुत कम देर के लिए थे। वरना फिल्म की कलेक्शन बरबाद करने में उनका योगदान बढ़ जाता। गुरुजी के दुनिया से ऊपर उठने के बाद ही फिल्म चलनी (दर्शकों को अच्छी लगनी) शुरू हुई। इरफान जैसे अभिनेता के पास फिल्म में करने के लिए कुछ खास नहीं है। रणवीर-विनय ने अपनी भूमिका अच्छे से निभाई है। लेकिन, भेजा फ्राई से आगे निकलने के लिए किसी बहुत बेहतरीन स्क्रिप्ट की उन्हें सख्त दरकार होगी। कोंकणासेन ने भी अपने हिस्से का बेहतर काम किया है।
आजा नचले मैं उन लोगों को खास तौर पर देखने को कहूंगा जो, माधुरी, माधुरी की मुस्कान, माधुरी के नृत्य के चाहने वाले हैं। पूरी फिल्म माधुरी के आसपास ही घूमती है। माधुरी का हर अंदाज कुछ खास दिखता है। एकाध नजदीक के दृश्यों को छोड़ दें तो, ये समझ पाना मुश्किल होगा कि ये 2 बच्चों की 42 साल की माधुरी है। और, माधुरी थिरकना शुरू करती हैं तो, शायद किसी के लिए भी ये याद करना असंभव सा हो जाता होगा।
खैर, मैं फिर से लौटता हूं आज के इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रावासों और डेलीगेसीज में लड़कों के कमरे में। अलग-अलग कमरे में मधुबाला, माधुरी जमी हैं। लेकिन, ऐश्वर्या की फोटो हर दूसरे कमरे में बदल रही है। कहीं ऐश्वर्या की जगह प्रीती जिंटा हैं, कहीं करीना कपूर, कहीं सुष्मिता सेन, कहीं लारा दत्ता, कहीं, प्रियंका चोपड़ा, कहीं बिपाशा बसु, कहीं … । लिस्ट लंबी है। अभिनेताओं में अमिताभ बच्चन महानायक हो गए। इस बेरहम इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा समय तक नंबर एक अभिनेता बने रह गए। अभी भी नए जमाने के अभिनेताओं की तुलना उन्हीं के बाद शुरू होती है। फिर भी, शाहरुख खान ने अब नंबर एक का खिताब लगभग छीन ही लिया है। अब सवाल ये है कि क्या अभिनेत्रियों में एक भी अभिनेत्री नहीं है जो, 5 साल खाली रहने के बाद भी नंबर एक अभिनेत्री का खिताब ले सके। आप भी आजा नचले देखकर आइए। फिर बात करते हैं।




दया चौधरी पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की पहली महिला जज बन गई हैं। सीनियर एडवोकेट दया को एडीशनल जज नियुक्त किया गया है। 88 साल के हाईकोर्ट के इतिहास में ये पहली बार है जब कोई महिला जज बनी है। दया चौधरी पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट बार की पहली महिला प्रेसिडेंट और केंद्र सरकार की एडीशनल सॉलीसिटर जनरल भी रह चुकी हैं।
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में एक महिला जज की नियुक्ति इसलिए भी मायने रखती है कि ये दोनों ही राज्य लड़के-लड़कियों के मामले में सबसे खराब अनुपात रखते हैं। पंजाब और हरियाणा से कन्या भ्रूण हत्या के भी बड़े मामले सामने आते रहे हैं। देश में लड़के-लड़कियों का सबसे खराब अनुपात इन्हीं दोनों राज्यों में है। पंजाब और हरियाणा में 1000 लड़कों पर सिर्फ 704 लड़कियां हैं। जबकि, देश में 1000 लड़कों पर 933 लड़कियां हैं।
पंजाब और हरियाणा की ही तरह चंडीगढ़, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और उत्तरांचल में भी लड़कों के मुकाबले लड़कियां कम हो रही हैं। अमीर राज्यों के साथ ही दिल्ली के पॉश इलाके साउथ दिल्ली में कन्या भ्रूण हत्या सबसे ज्यादा होती है जो, साफ दिखाता है कि ज्यादा पढ़े-लिखे और समृद्ध भारत को लड़कियां कम पसंद हैं। इसका दुष्परिणाम भी सामने आता दिख रहा है। अगर यही हाल रहा तो, 42 साल बाद करीब 3 करोड़ लड़के कुंआरे रह जाएंगे।
सिर्फ केरल ही अकेला राज्य है जहां लड़कों से ज्यादा लड़कियां हैं। केरल में 1000 लड़कों पर 1058 लड़कियां हैं। देश में सामाजिक संतुलन बने इसके लिए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा लड़कियों को समाज में आगे बढ़ने का मौका मिले। अब ये आश्चर्य की ही बात है कि 88 साल से पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट को एक लायक महिला वकील नहीं मिल पाई थी जो, जज बन सकती। दया चौधरी जैसे उदाहरण शायद लोगों को कन्या भ्रूण हत्या से रोक पाएं और भारत संतुलित विकास कर सके।




नियम-कायदे तोड़ना और उसी से तरक्की की कोशिश करना हमारे मिजाज में गजब का रच बस गया है। हाल ये है कि भ्रष्टाचार की हमें इस तरह आदत पड़ गई है कि इसके लिए हमने ढेर सारे तर्क-कुतर्क भी ढूंढ़ लिए हैं।
आज मैं अपने मोहल्ले की दुकान से स्प्राइट लेने गया। वैसे तो मैं कोई भी कोल्डड्रिंक नहीं पीता हूं। लेकिन, जब पेट साफ न हो रहा हो या फिर किसी पार्टी में तेल से भरा खाना ज्यादा खा लेने से पेट अजीब भाव दिखाने लगे तो, मैं कोल्डड्रिंक पी लेता हूं। और, ये मेरा भ्रम ही होगा लेकिन, मुझे लगता है कि कोल्डड्रिंक पी लेने के बाद पेट की सफाई बड़ी अच्छी हो जाती है।
खैर, मोहल्ले की दुकानवाले से मैंने स्प्राइट मांगा। बोतल पर MRP 20 रुपए लिखी हुई थी। 20 रुपए देने लगा तो, उसने 22 रुपए मांगे। मैंने कहा इस पर तो 20 रुपए लिखा है। उसने कहा तो, क्या बाबूजी हम कुछ न कमाएं। मैंने कहा कंपनी तो तुम्हें इस पर कमीशन देती ही है। फिर उसके पास जवाब तैयार था और इस बार पहले से तीखा जवाब था। बाबूजी कानून मत बताइए और जब आप इस तरह के सवाल कर रहे हैं तो, फिर इसे ठंडा करने में हमें जो बिजली का बिल देना पड़ता है। वो, कौन भरेगा। उसकी दुकान में फ्रिज भी कोल्डड्रिंक कंपनी का दिया हुआ लगा था।
मैंने कहा तुम्हारी दुकान में तो, फ्रिज भी कंपनी का ही दिया हुआ है। उसने फिर अचानक पैंतरा बदला। दुकानदार ने कहा साहब बहुत चोर कंपनियां हैं ये। अब दो-चार रुपए कमा लेता हूं इसलिए रखता हूं नहीं तो, ये सब सामान तो इस्तेमाल ही नहीं करना चाहिए पीने लायक थोड़े ना होता है। इसी बीच उसके मुंह से निकल गया बिना ठंडा किया लेना हो तो, ले लीजिए। मैं भी 2 रुपए ज्यादा न देने पर अड़ा था। मैं 20 रुपए में ही बोतल लेकर आ गया।
ये दुकानदार भ्रष्ट होने के लिए अजीब तर्क गढ़ रहा था। एक कंज्यूमर चैनल में काम करने के नाते मुझे अच्छे से पता है कि MRP पर ही बेचने वाले को कंपनियां कमीशन देती हैं। ये दुकानदार महाशय ज्यादातर दूध, दही, मक्खन जैसी चीजें बेचते हैं। उसमें भी हर आधे किलो के पैकेट 50 पैसे और एक किलो के पैकेट पर 1 रुपए ज्यादा उसे ठंडा रखने के नाम पर ले लेते हैं। शायद भ्रष्टाचार हमारी आदत में शामिल हो गया है। और, हमें लगता है कि अपनी तरक्की के लिए दूसरों से जरूरत से ज्यादा पैसे वसूल लेने से ही बड़ा आदमी बना जा सकता है।


More Options ...
Categories
Tag Cloud
Blog RSS
Comments RSS

Void « Default
Life
Earth
Wind
Water
Fire
Light 