Skip to content


स्वाधनता िवस , मरका, करार "र हमार राष्ट्रय भावना

चिट् ा?त  धिकृत कड़ स्वाधनता िवस , मरका, करार "र हमार राष्ट्रय भावना — मलेन्ु उपाध्याय
भ बमुश्किल एक शक बता हो?ा ब इस ेश ने आज़ा क पचासवं साल?िरह मनाय हो? "र ेश क संस ने समवेत स्वर से कई महत्वपूर्ण ोशनाएँ क थ. परन्तु यह ोषणाएं "र हलफ एक शक बा ह संस में टूटते ि'ाई िए. ब ब ेश क आज़ा का श्न मनाया ाता है तब तब इस ेश के मर शहों क कुर्बानियों को या किया ाता है कि किस प्रकार इन ्ञात ्ञात शहों ने कुर्बानियां ेकर ेश क आज़ा के लिए संर्ष किया. लेकिन ब पंचशल सि्धांत के प्रणेता "र आधुनिक भारत [ पूर्व नरसिंहाराव - मनमोहन भारत ] के निर्माता प वाहर लाल नेहरु के सि्धांतों को फ़न करने के लिए मनमोहन सिंह मौू हों, डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के सि्धांतों को शर्षासन कराने के लिए मुलायम सिंह मौू हों तो इस ेश क आज़ा का कैसा श्न ?
आज़ा के बा यह पहला वसर है कि हमार र्थव्यवस्था "र विेश नति क नकेल सधे सधे मरका के हाथ में है "र हमारा नव्ध्नाध्य वर्? स्वयं को म्रकमय होने में ?ौरवान्वित महसूस कर रहा है..
बात ?र ेश क आर्थिक विकास र "र उन्नति से शुरू क ाए तो सार ुनिया में १९५ से १९६ के शक में भारत क विकास र बाक ुनिया क तुलना में सर्वाधिक थ. यह वो ौर था कि ब प नेहरु के नेतृत्व में सार्वानिक क्षेत्र के भार उ्यो? ल?ाए ा रहे थे "र भारत रो़?ार सृन के क्षेत्र में भ नए प्रतिमान स्थापित कर रहा था . इस ौर में प्रति व्यक्ति क्रय शक्ति भ ब रह थ . हमारा धन बाँध बनाने में, वि्युत् परियोनायों के क्रियान्वयन में , परिवहन के नए साधन विकसित करने में , कृषि क्षेत्र में नए नुसंधानों "र उ्यो?ों क वस्थापना में तथा इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में ल? रहा था "र ?र आज़ा के तुंरत बा के कुछ समय को छो िया ाए तो यह वो ौर था ब साम्प्रायिक ं?े भ कम हो रहे थे.
प नेहरु के समय में भारत विकास के नए प्रतिमान स्थापित कर रहा था "र हमारा पडोस ेश चन भ तरक्क क राह पर था . यह वो समय था ब सोवियत सं मरका के लिए नय चुनौत बन रहा था . ऐसे में मरका को भविष्य का '़तरा भारत "र रूस से ह था. उस समय हमारे 'िलाफ ो षड़यंत्र मरका ने प्रारंभ किये वो बस्तूर आ भ ार हैं. १९६२ में चन से हमारे ऊपर हमला कराया ?या "र ज़ाहिर है कि नया नया आा हुया एक ?रब मुल्क इस प्रत्याशित हमले का मुकाबला नहं कर साकता था. यह हमार रण नति में बलाव का एक महत्वपूर्ण बिंु साबित हुया/. ो धन हमार विकास परियोनायों में ल? रहा था वो ब हथियारों में ल?ना प्रारंभ हो ?या "र हम विकास क ौड़ में पिछड़ने ल? ?ए.
—- थोडा स्थिति सुधरना शुरू हुय तो= ब इस ेश में इंिरा ?ांध ने पो'रण परक्षण कराकर ेश क ताक़त सार ुनिया को ि'लाई थ . यह वो समय था ब हम मरका क आँ' क सबसे ब किरकिर बन ?ए थे. यह सार बातें हम इसलिए ोहरा रहे हैं क्योंकि आज़ा के साथ साल के बा मनमोहन सरकार "र उसके मरक ुमछल्ले यह प्रचार कर रहे हैं कि ऊर्ा रूरते पूर करने के मामले में ेश में भार काल है "र बिना मरका क ुम बने हम यह रूरतें पूर नहं कर सकते.
ब हमने पो'रण -एक किया था तब न तो हमने कहं से तकनक चुराई थ "र न किस ने हमें यह तकनक मुहैया कराई थ . उस समय हमने यूरेनियम पाने के लिए मरका के सामने हाथ नहं फैलाए थे ? फिर ो काम इंिरा ?ांध कर सकत थं वो हौसला उनके वंश क्यों नहं ि'ा पा रहे हैं?
===
पो'रण -१ के बा मरका ने हर संभव कोशिश हमें तोड़ने "र "र ेश में शांति फैलाने के लिए क थ . ब कें्र में भापा के नेतृत्व वाल सरकार बन तो यह मरका समर्थक सरकार थ "र मरका यह बात सरकार तक पहुचाने में सफल रहा कि पाकिस्तान परमाणु बम बना चूका है "र परक्षण करने वाला है.बस हमारे नााँ हुक्मरानों ने पो'रण -२ कर लिया "र मरका ने हमारे ऊपर पाबंियां आय कर ं .
यहाँ ो बात चिन्हित किये ाने यो?्य है वो यह है कि इन प्रतिबंधों के बा भ हमार आर्थिक विकास र कम नहं हुय "र न मु्रा स्फति क र इतन ते से ब ितन ते से हमारे र्थशास्त्र प्रधानमंत्र के सफल [ ?] नेतृत्व में ब. कारण साफ़ था कि उस समय मरका क ाा?िर के 'िलाफ पूरा ेश एकुट था "र यह आम सहमत बन ?य थ कि भू'े नं?े रह लें?े लेकिन मरका क ाा?िर नहं सहें?े. वो लो? ो मरका के समर्थक थे या मरक एेंट थे , भ ेशवासियों क इस भावना के आ?े नतमस्तक थे.
आ ब करार का मसला आया तो हम राष्ट्रय एकता के सवाल पर बाँट ?ए . सरकार ने मरका के सामने हाथ फैलाया "र ुटने टेके परन्तु मनमोहन, मुलायम "र लालू के विश्वासात पर भ हमार राष्ट्रय भावना उस प्रकार नहं ा? िस प्रकार पो'रण -२ के बा ा? थ. बल्कि हमारा फूहड़ "र संस्कृतिविहन नव धनाड्य वर्? ेश बेचने के इस पुनत कार्य में मनमोहन-मुलायम का सहयो? था.
इस टना का ो फौर नता था वो हमारे सामने है कि महं?ाई पने चरम पर है , संस ” कैश फॉर वोट ” कांड से शर्मसार हुय है "र ेश क रानति पर लालों "र टिया किस्म के ेब्क़तरे टायप छिछोरे रानति्ञों का वर्चस्व कायम हुया िसके चलते ेश बनाम हुआ. सन १९४७ के बा यह पहला वसर है कि ेश का प्रधानमंत्र इतना निरह "र बेबस है कि उसे लल ेन प रह है कि मानसून च्छा आये?ा तो महं?ाई रुके?. क्या इसका वाब यह िया ा सकता है कि फिर सत्र्कार भ मानसून ह चलाये सा"उथ ब्लोक में मनमोहन का क्या काम है?
पो'रण-२ पर हमार राष्ट्रयता ा?ृत हुय चूंकि तब हमारे सामने ुश्मन के रूप में पाकिस्तान प्रोेक्ट किया ?या था.लेकिन परमाणु करार पर हमार राष्ट्रयता ा?ृत नहं हुय चूंकि हमारे सामने पाकिस्तान नहं मरका था? क्या हमार राष्ट्रय भावना ा?ृत करने के लिए एक पाकिस्तान का होना रूर है?
पाकिस्तान के बा हमार राष्ट्रयता का पैमाना चन तय करता है. पो'रण-२ के बा भापा ? बंधन सरकार ने मरका को सफाई थ कि यह परक्षण तो उसने चन के कारण किया था "र ब करार पर बहस हुय तो सपा शासनकाल में नॉएडा "र ?ाि बा में ़मनों पर कब्े करने वाले "र कालाबाार करने वाले "र फसरों क ट्रांसफर पोस्टिं? में वैध धन कमाने वाले भ चन को कोस कोस कर पन ेश््रोहिता को ेशभक्ति साबित करने में ल?े हुए थे.
६ शक पुराने आा भारत को मरका एशिया में भारत को पना सैन्य नुचर बनाना चाहता है "र इसके लिए र्थशास्त्र प्रधानमंत्र उारकरण "र भूमंडलकरण के साथ साथ परमाणु करार करके ़मन आधार तैयार कर रहे हैं./ रि़र्व बैंक मार्का र्थशास्त्र हमार कृषि, आधारभूत उ्यो? "र ेश वित्तय प्रबंधन को नष्ट कर रहा है. ताकि ब हमारा वितय संतुलन बि?डे "र हमारे ेस य््यो? धंधे चौपट हो तो हमारा ?ेंहू १ रूपये किलो बिके तो मरकन बर्?र ५ रुपये का बिके तब मरका को हमारे ेश से फ?ानिस्तान , इरान "र पाकिस्तान के 'िलाफ मोर्चों पर सैनिक मिल सकें?े…
आ काश्मर ल रहा है. वो समय भ इस ेश ने े'ा है ब काश्मर के राा हर सिंह ने काश्मर को स्वतंत्र करने का निर्णय ले लिया था "र पाकिस्तान कश्मर में आ पहुंचा था. प नेहरु प्रधानमंत्र थे. सुना है कि प काश्मर ा पहुंचे तो राा हर सिंह ने प का रास्ता रुकवाया पर प ा धमके "र उनके बर्छियां ल? ?य थ. उस समय कश्मर वाम पाकिस्तान ुसपै ियों को पक पक कर हिन्ुस्तान फौों को सौंपते थे. आ ?र आज़ा के एकसाथ साल बा वह कश्मर वाम “मु़फ्फराबा कूच” के लिए सड़कों पर निकल रहा है तो आप केवल पाकिस्तान को ोष ेकर पन िम्मेार से मुंह नहं मोड़ सकते हैं. ?र कोई बेटा पने बाप से नाराज़ है तो कुछ न कुछ कुसूर बाप का भ हो?ा? हमारा ेशभक्त "र सफल प्रधानमंत्र करार पर मार्केटिं? करने तो बुश से मिलने का वक़्त निकाल्सकता है लेकिन् लते हुए कश्मर को े'ने के लिए प्रधानमंत्र के पास वक़्त नहं है?
आा मुल्क के इतिहास में यह पहला मौका है ब ेश क नैय्या किस काबिल रानति?्य के हाथ न होकर एक मुनम के हाथ में है. पहले प्रधानमंत्र रानेता बनते थे ब चाटुकार बनते हैं. क्या ६ शक क आज़ा का मतलब यह है?

Posted in Politics.

2 comments


क्या सारे आतंकवा मुसलमान हैं का

क्या सारे आतंकवा मुसलमान हैं का ” ूसरा भा? —–
हिन्ुस्तान में ह ?ैर मुस्लिम आतंकवा सं? नो क ताात मुस्लिम आतंकवा सं? नो से ्याा है. फिर सारे आतंकवा मुसलमान कैसे हो ?ए? मैं फिर कहना चाहूँ?ा "र ोर ेकर कहना चाहूँ?ा कि सिर्फ "सामा बिन लाेन, मुल्ला उमर, शह बर या कुछ सौ या कुछ हज़ार आतंकवाियों के आधार पर आप किस एक म़हब को आतंकवा ोषित कैसे कर सकते हैं? क उस प्रकार ैसे आप किस एक नरें्र मो , प्रवण तो?डिया , आडवान या शोक सिंल या बाल ाकरे के कर्मों के आधार पर सारे हिन्ु"ं को हत्यारा या फिरकापरस्त नहं कह सकते !!! या सूरत, मुम्बई, "र हमाबा क सड़कों पर कांच क बोतलों पर "रतों को नं? नचाने वालों के कुकर्मों के आधार पर आप हिन्ू धर्म को बलात्कारियों "र हत्यारों का धर्म नहं कह सकते!!!
कुरान-शरफ क सूर- - इब्राहम क एक आयत कहत है कि -” ये सूर, चाँ , सितारे ़मन आसमान सब ल्लाह तबारक ता आला ने नौ - - इंसान के लिए बनाए हैं "र ल्लाह तबारक ता आला इनका रब्बुलेआल्मन है. सूना आपने …क्या कहत है कुराने पाक ? ये सब नौ - -इंसान के लिए बनाए ?ए हैं …नौ मुसलमान के लिए नहं!!!!! ो म़हब इतना उात्त सन्ेश ेता हो बें?लुरु, हमाबा "र यपुर का बहश रिंा -हत्यारा कम से कम मेर नज़र में उस म़हब को मानने वाला नहं हो सकता!!!!
इस मुल्क ने े'ा कि कैसे इन हासात पर भ ़बरस्त रानति हो रह है. भ तक भापा को ऐसे नाज़ुक हालत में "छ रानति करने के लिए ाना ाता था. लेकिन पिछले ो तन िनों में सरकार के लो?ों क तरफ से ो वाब बयान बा हो रह है उससे कम से कम मेरे ैसे हिन्ुस्तान का माथा शर्म से ुक ाता है .
आम हिन्ुस्तानियों का ये ायित्व है कि संकट क इस में आपस भाईचारा , इंसानियत "र हिंुस्तानियत क रक्षा के लिए कम से कम मिलाकर एकुट रहें "र उन ताकतों के नापाक मंसूबों को ध्वस्त कर ें ो इस ेश के मन "र चैन को नष्ट करना चाहते हैं. ये वो मुल्क है हां से ?र ?ौतम बु्ध ने हिंसा परमो धर्मं: का पा पढाया तो, “वसुधैव कुटुम्बकम” का उ्ोष भ इसे सऱमन से हुआ तो ह़रात निामु्ें "लिया ने सार ुनिया को मोहब्बत का पै?ाम भ इस सऱमन से िया…यह ताकत हिन्ुस्तान का वू कायम र'े? . इस वू को कायम र'ने क िम्मेार आम हिन्ुस्तान क है रानेता"ं क नहं. रानेता"ं से सिर्फ "र सिर्फ लाशों पर रोटियां सेंकने "र बयानबा क उम्म क ा सकत है…
[ ये आर्टिकल व्व्वंएव्स्विन्? "म "र व्व्व.एम्सिन्ि "म नएवसपोर्टल्स ्वारा प्राकशित किया ?या है.}

Posted in Dil ki awaz.

6 comments


क्या सारे आतंकवादी मुसलमान हैं?

क्या सारे आतंकवादी मुसलमान हैं?

“बात लगभग एक वर्ष पहले की है.एक बड़े राष्ट्रीयकृत मीडिया संस्थान में आतंकवाद पर अनौपचारिक चर्चा हो रही थी.एक सज्जन ने कहा कि सारे मुसलमानोंको आतंकवादी कैसे कहा जा सकता है/?बात कुछ कायदे की थी,परन्तु एक बड़े पत्रकार ने सवाल किया कि ठीक है सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, लेकिन सारे आतंकवादी तो मुसलमान हैं? प्रश्न कुछ ऐसा था कि पहले वाले सज्जन निरुत्तर हो गए. बाद में बहस चलती रही. अधिकांशत: बुद्द्धिजीवी ऐसा ही तर्क देते हैं.लेकिन कम से कम मैं तो ऐसे तर्क से सहमत नहीं हो सकता हूँ . अगर यह बात मान भी ली जाए कि सारे आतंकवादी मुसलमान हैं, तो फिर प्रभाकरण , भिन्दर्वाला , लाल्देंगा और परेश बरुआ भी मुसलमान हैं? दरअसल सारे आतंकवादियों को मुसलमान और मुसलमानों को आतंकवादी बताने वाली मानसिकता ही आतंकवादी पैदा कर रही है. इस गंभीर मुद्दे पर जिस प्रकार की ओछी राजनीति और बौध्हिक बहस हो रही है वो आतंकवाद को और बढ़ावा देने वाली ही है. मेरे एक मित्र हैं पेशे से इंजीनिअर हैं, पढ़े लिखे तहजीबयाफ्ता खानदान से ताल्लुक रखते हैं पिछले दिनों किराए पर मकान की तलाश में थे . एक हज़ार मकान देखे होंगे तब जाकर मकान मिला. जब सारी बात तय हो जाती थी तब मालिक मकान साहब पूछते थे किनाम क्या है? नाम के आगे खान सुनते ही उनका किराए पर मकान देने का इरादा बदल जाता था.अब आप तय करें कि जिस शरीफ खानदान के इंसान के साथ यह बर्ताव आम हो क्या वो आतंकवादी नहीं बनेगा? एक विद्वान का लेख पढ़ रहा था. वो विद्वान् बता रहे थे कि कोलकाता में जितनी मस्जिदें और मदरसे हैं उसकी तीन गुने बंगलादेश की सरहदी जिलों पर हैं. यह विद्वान् सारे मदरसों को आतंक वाद का अड्डा निरूपित कर रहे थे . अब अगर हमारे विद्वानों का यह हाल है तो जाहिलों का तो भगवान् ही मालिक है? मेरे मरहूम वालिद ने पहली बार जब कोई अक्षर लिखा था तो वो जगह एक मदरसा थी,सबसे पहले जिस भाषा में उन्होंने लिखना और पढ़ना सीखा वो भाषा फारसी थी और हिंदी उनहोंने तब सीखी जब उनकी उम्र २५ ओअर्ष थी. अब इन विद्वान् को कौन समझाए कि मेरे पिटा एक पुरानपंथी ब्रह्मण परिवार से थी और उनके लगभग सभी समकालीनों ने शिक्षा उन्ही मदरसों में पायी थी जिन्हें आज आतंकवाद का अड्डा बताया जा रहा है. क्या आपने कभी यह सर्वे करने की कोशिश की है कि देश भर की मस्जिदों में ७५% इमाम सरहदी बंगाल और बिहार के बाशिंदे होते हैं जो ७०० रूपये से १००० रूपये प्रतिमाह की पगार पर मस्जिदों में इमामत करते हैं. अब हमारे तथाकथित विद्वान् एक निष्कर्ष में इन सारे इमाम साहबान को आतंकवाद का पुरोधा साबित कर देंगे? लेकिन इसका कारण महज यह है कि सरहदी बंगाल और बिहार में गरीबी और गुरबत इन ऊंचे पायचे का पाजामा पहनने वालो को मजबूर कर देती है कि वो मदरसों में पढें ताकि आगे चलकर उन्हें रोटी मय्यस्सर हो सके . वरना कौन आदमी है जो आज के दौर में अपने बच्चो को अच्छी तालीम नहीं देना चाहेगा? एक शब्द बार बार बड़ी तीव्रता के साथ गूँज रहा है” जेहादी तत्व” . ये शब्द उन लोगों की ईजाद है जो तथाकथित राम मंदिर बनवाने के नाम पर अमरीका और कनाडा से अरबों डालर इकट्ठा करते हैं और आज तक देश को इस धन का कोई ब्योरा नहीं देते. जो लोग धर्म का मर्म नहीं समझ सकते वो जेहाद का उसूल भी नहीं समझ सकते!!! जिस दौर में जेहाद हुआ उसकी एक घटना का जिक्र करना उचित होगा. अरब की फौजों ने रोम को फतह कर लिया . खलीफा बग़दाद से रोम पहुंचे तो उन्होंने अपने सैनिको से पूछा कि रोम करर इमारतें सूना है बहुत खूबसूरत हैं? सैनिको ने जवाब दिया कि उन्हें नहीं मालूम. खलीफा ने पूछा क्यों? सैनिको ने जो जवाब दिया, वो इस मज़हब के करेक्टर को समझने के लिए काफी है. सैनिको ने जवाब दिया कि हुजूर इमारतों पर रोम वसियोम की औरतें खादी रहती हैं इसलिए हम कभी इन इमारतों को देख ही नहीं पाए.!!!जिस मज़हब यह करेक्टर हो , क्या वो मासूम और बेगुनाह बच्चो और औरतो के खून से अपना हाथ लाल कर सकता है? बेशक नहीं . इसलिए मैं कहता हूँ और जोर देकर कहता हूँ कि आतंकवादी किसी भी सूरत में मुसलमान नहीं हो सकता . और अगर वो यह दावा करे कि वो मुसलमान है तो यह जिम्मेदारी उलेमाओं पर आयद होती है कि उसे इस्लाम से बहिष्कृत करे. आतंकवाद का जो नमूना बेंगलुरु,अहमदाबाद और पहले जयपुर में देखने को मिला, यह नामूमना पूरे दुनिया में सबसे पहले श्रीलंकाई छापामारों लिट्टे ने अपनाया और लिट्टे को इस्रायली खुफिया एजेन्सी मोसाद ने प्रशिक्षित किया है . हिन्दुस्तान नम ही गैर मुस्लिम आतंकवादी संगठनो की तादात की ———-जारी भाग-२ में काल मूल रूप में पढने के लिए www.newswing.com पर क्लीक karen

Posted in Philosophy.

6 comments


manmohan ne mat jeeta hai lekin vishwas khoya

आखिरकार देश के इतिहास में सर्वाधिक इमानदार और अ -सरदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में विश्वासमत हासिल कर ही लिया है । यह दीगर बात है किउनका नाम चौ० चरण सिंह के बाद इतिहास में इस मायनो में दर्ज हो गया है कि वो ऐसेर प्रधानमंत्री हैं जो अपने विश्वासमत पर ही संसद में बहस का उत्तर नही दे पाए। चौधरी साहेब तो संसद तक विश्वासमत हासिल करने नहीं जा पाए थे परन्तु मनमोहन सिंह इस मामले में अनूठे हैं कि वो संसद में विश्वासमत तो जीत गए परन्तु बहस का उत्तर नहीं दे पाए।
पिछले दिनों में देश ने संसद के जो नज़ारे देखे वो आम हिन्दुस्तानी के लिए शर्मसार करने वाले थे । यह नज़ारे सोचने के लिए विवश कर रहे थे कि क्या यह वही संसद है जहाँ कभी पंडित जवाहर लाल नेहरू , डॉक्टर राममनोहर लोहिया , जयप्रकाशनारायण, चंद्रशेखर, इन्द्रजीत गुप्ता जैसे लोग देश की समस्याओं पर बहस किया करते थे? आज उसी संसद के प्रांगन में एक महिला की अध्यक्षता वाले मोर्चे की तरफ़ से खुलेआम बलात्कार , सुहागरात और वेश्याएं इस्तेमाल किए गए। यह सत्ता के गिरते चरित्र का द्योतक है।
सरकार के जीतने की खुशियाँ मनाई जा सकती हैं, और यह सत्ताधारी लोगों का अधिकार भी है, कि भले ही छल और कपट से सरकार बचायी गई लेकिन बच तो गई? अब मनमोहन बुश से किया वायदा पूरा कर सकेंगे । परन्तु इस जीत के पीछे असल कारन न तो कोयियो दलाल है, न यह बलात्कार और सुहागरात का नतीजा है, यह परिणाम है सिर्फ़ हमारे अन्दुरुनी मामलात में अमरीकी दखलंदाजी का…….
विश्वासमत के प्रथम दिन ही जब अमरीकी विदेश उप मंत्री रिचर्ड बौचेर का बयां आया कि अमरीका अल्पमत सरकार से भी समझौता करने को तैयार है उसी क्षण यह तय हो गया था कि सरकार तो बचेगी और उसे भाजपा बचायेगी। ऐसा निष्कर्ष बचकाना नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के तार मजबूती से अमरीका लॉबी से जुड़े हैं और बाउचर का बयां भाजपा के लिए खुली धमकी था । विश्वासमत से एन दी ऐ के ही सांसद क्यों गायब हुए?
दो दिनी बहस से एक बात और साफ़ हो गई कि सपा के बड़बोले महासचिव लंबे समय से प्रयासरत हैं कि लोग उन्हें नेता मान लें। लेकिन लोग उन्हें नेता मानने के लिए तैयार नहीं हैं। उनकी यह पीड़ा बार बार उभर कर आती है। वो नेता बन्ने का प्रयास करते हैं और जिनके लिए काम कर चुके होते हैं वही उन्हें उन पदवियों से नवाजने लगते हैं जिनसे यह महासचिव पीछा छुडाना चाहते हैं। इन महासचिव का बडबोलापन तो चूर चूर हो गया जब बसपा का एक भी सांसद सत्ता के खेमे में नहीं पहुँचा और सपा के ६ सांसद सपा से बगावत कर गए। क्या इसके बाद भी समाजवादी पार्टी सरकार की जीत पर खुशियाँ मनायेगी ?
अलबत्ता अमर सिंह की अतिसक्रियता का सपा और कांग्रेस को खासा नुक्सान हुआ । अगर सरकार की जीत दीअलों का नतीजा नहीं भी थी तब भी देश की जनता यह भरोसा करने को तैयार नहीं है कि मनमोहन सिंह ने इमानदारी से [ जो जुमला बार बार कहा जा रहा कि वो इमानदार हैं ] विश्वासमत हासिल किया है। मनमोहन सिंह भले ही फिलहाल अपनी सरकार बचने में सफल हो गए हों परन्तु लोगों को नार्सिम्हाराओ का विश्वासमत भी याद है जब इन्ही इमानदार प्रधानमंत्री जो उस समय वित्त मंत्री थे के सहयोग से उनहोंने सरकार तो बच्चा ली थी लेकिन ठीक उसी वक्त उ० प्र० से कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ हो गया था। और कांग्रेस उस स्थिति में पहुँच गई थी जिस स्थिति में १९७७ में भी नहीं पहुँची थी । १९९३ में कांग्रेस को लगा झटका अभी तक उसकी कमर तोडे हुए है । यह नार्सिन्हाराओ के कर्मों का फल है कि एक राष्ट्रिय पार्टी जिसका इस देश की आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान रहा है उसकी नैय्या बचाने का दायित्व घटिया किस्म के दलाल निभा रहे हैं। नार्सिन्हाराओ ने कांग्रेस की जो कब्र खोदी थी उसमें कांग्रेस को दफनाने का काम मनमोहन सिंह पूरा कर चुके हैं।
सोनिया जी ने प्रधानमंत्री बन्ने से इंकार करके त्याग की एक नयी परिभाषा रची थी। लेकिन अगर मनमोहन सिंह २२ जुलाई को से ६ बजे राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र सौंप देते तो उनकी एक छवि निखर कर आती और सरकार के माथे पर लगा होर्सेत्रदिंग का दाग भी धुल जाता .परिणामस्वरूप यह देश सारी दुनिया के सामने शर्मसार होने से बच जाता। सरकार तब ६ महीने चलती अब ८ महीने चलेगी। लेकिन मनमोहन ने देश की इज्ज़त बचने से बेहतर सरकार बचाना समझा ।
सरकार की सफलता पर खुश होने वाले अनजान खतरों की तरफ़ से मुंह फेर रहे हैं। मुझे वो मुलायम सिंह याद हैं [ पता नही कि सोनिया को याद हैं कि नहीं ?] जिन्होंने कहा था कि उन्होंने सोनिया को प्रधानमंत्री बन्ने से इसलिए रोका चूँकि वो देश को विदेशी हाथों में गिरवी रखने से बचाना चाहते थे। बेशक यह लेखक भी उस समय उन लोगों में था जिन्होंने उस समय सपा के उस कदम की मुखालिफत की थी। लेकिन आज मुलायम सिंह का वो जुमला मुझ जैसे एक आम हिन्दुस्तानी को बार बार उद्वेलित कर रहा है कि उस समय शायद मुलायम सही थे? हाँ एक बात निश्चित है कि कि जो सूरत-ऐ-हाल नज़र आ रहे हैं उसमें अगर मनमोहन सिंह भारत के घुर्बचौफ़ साबित हों तो कोई आश्चर्य नही । लेकिन तब इतिहास शायद ऊर्जा जरूरतों से समझौता करने के लिए लोगों को माफ़ भी कर दे लेकिन मुलायम सिंह को तो नहीं ही कर पयेगेया…..
मनमोहन सिंह के सामने असल चुनौतियां तो अब शुरू होंगीं । अभी तक वो यह आरोप लगा सकते थे कि वामपंथी दल मुनाफा कमा रहे सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने की राह में रोड़ा बन रहे थे, आर्थिक उधारीकरण में रोडा बन रहे थे। लेकिन अब पूंजीपति घरानों के झगडे , बॉलीवुड की नार्त्किओयों के किस्से भी प्रधानमंत्री को निपटाने होंगे। और सपा प्रमुख मुलायम सिंह को भी तैयार रहना पड़ेगा कि देश में १२.३% के स्टार तक पहुँचती महंगाई और देश में आत्महत्या करते किसानों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदारी उनकी भी उतनी ही होगी जितनी मनमोहन सिंह की।
सरकार के सामने अब अजब तरीके का दवाब होगा । सपा अपनी तयशुदा डील के तहत अब मायावती को जेल भिजवाना चाहेगी और अगर मनमोहन इस दवाब के आगे झुकेंगे तो देश यह समझेगा कि मायावती के आरोप सही थे और अगर वो यह नाजायज़ मांग नहीं मानेंगे तो जो तथाकथित दलाल सरकार को हलाल होने से बचाकर हराम कर सकते हैं वो कल सरकार को हलाल भी तो करवा सकते हैं
कुल मिलाकर सबक यह है कि दलाल चाहे सोनागाछी का हो या राजनीती का उसका चरित्र समान होता है और प्रश्न यह कि क्या बलात्कार और सुहागरात और वेश्याएं देश की सर्वोच्च सत्ता का निर्धारण भी करती हैं? सरदार मनमोहन सिंह असरदार तो साबित हुए हैं । उनहोंने केवल विश्वासमत जीता है लेकिन देश की जनता का भरोसा खोया है…..

Posted in Atomic Deal.

2 comments


karar par Mulayam Amar ka danv

Posted in Atomic Deal.

1 comment


आएने में समय के हम फिर 'ड़े

यनारायण व्यास विश्ववि्यालय ोधपुर के हिन् विभा? में सोसयेट प्रोफेस्सार कौशलनाथ उपाध्यया का पहला काव्या सं?्रह ?आएने में समय के हम फिर 'ड़े? पिच्छले िनों प्रकाशित हुआ है.ईससे पूर्वा उनक काई आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हो चुक हैनऽ के ौर में ब मनुष्या के बच फ़ासले बढ़ रहे हैं "र संवाा के सिलसिले टूट रहे हैं , कौशलनाथ क कविताएँ आएने से सामना करते हैं "र आ एना है क ू बोलता ह नहं . परंतु हमने आएने से सामना करने क क्षमता 'ो ड है, चूंकि हमें एहसास है क आएना हमारे ंर च्छिपा हुआ सब कुच्छ बाहर निकल े?ा. इस धरत पर मित्रता हो या ुश्मन , स्वार्थ हो या परमार्थ, ृणा हो या प्यार, च्च्हा हो या बुरा कुच्छ भ निराधार नहं है.Y ि हम यह सोचते हैं क यह सारे ़्बात निराधार हैं तो यह सोच स्वयं के साथ च्चाल है.शच से बहुत समय तक मुँह नहं चुराया ा सकता चूंकि एक ना एक ं आएने से सामना कर्मा ह पड़ता है. कौशल सवाल करते हैं क ूसरों में ते़ धार हो, आ? हो, "र स्वर रसयुक्त हो ,यह चाह आपमें है परंतु यह धार, आ? "र स्वर आपका क्यों नहं है?यह ावा तो हू नहं करते हैं क वह भूत-भविष्या, आ?त- ना?त,ेश-विेश, "र समय वा समय से परे सभ को पढ़ सकते हैं. आर्शों का वन ब नहं बचा चूंकि ब ूषित हवा चल पड़ है िसने पन रति ?वां ड है.
हालांकि यह ले'क का पहला काव्या सं?्रह है परंतु सं?्रह में एक भ रचना ऐस नहं िसे परिपक्वा कहा ा सके, हँ कभ कभ ध्यापकयता परिलक्षित होत है, परंतु यह उनके कर्म क्षेत्रा का प्रभाव है. इन कविता"ं के मध्यम से कौशल स्वयं से "र समा ोनों से मु भेड़ करते चलेत हैं .इस उधेड़बुन में आएना चमका म?र धुंधला ?या, सच कहते कहते शाय तक ?या हो , परंतु समय के आएने में हम फिर 'ड़े हैं "र सच को ु ला पाना हंस 'ेल नहं हैं, चूंकि चेतना को चमक, चाह को न्म आएने ने ह िया है "र ते़ को भतर ?ाया है. सं?्रह में 43 रचनाएँ हैं "र पने में पूर्ण हैं. पुस्तक में ो शब् या भूमिका नहं है चूंकि सच को किस भूमिका क आवश्यकता ह कहाँ है?
पुस्तक:–आएने में समय के हम फिर 'ड़े
ले'क:–कौशलनाथ उपाध्यया
मूल्या:–80र्स.
प्रकाशक:–रास्थाने साहित्या संस्थान, ोधपुर.

Posted in Books.

1 comment


Satya jeetta hai

भूमण्डलीकरण के आगमन के बाद भौतिकता की दौड़ शुरू हो गयी है और इस दौड़ में हर कोई उचक कार् हू सब कुच्छ हासिल कार लेना चाहता है, जो एक भौतिकवादी संसार में आवश्यक है. लेकिन इस दौड़ में अगर कुछ बाधक है तो वो अंतरात्मा है. इसीलिए आदमी अंतरात्मा को गिरवी रखने पर आमादा है.ईसी अंतरात्मा को "सत्य जीतता है" काव्य संग्रह में मुरली मनोहर श्रीवास्तव ने झकझोरने का प्रयास किया है. प्रयाग के मूल निवासी और पेशे से अभियंता मुरली मनोहर श्रीवास्तव ने अपने ताज़ा काव्य ग़ज़ल संग्रह "सत्य जीतता है" में जीवन के अनेक पहलुओं पर कलम चलाई है जिसमें उनका प्रेरणास्रोत किसी एक नायिका के इर्द गिर्द नहीं घूमता है. उनकी चिंता है की आदमी का हृदय मशीन हो गया है जो हर सही गलत बात पर बस ऊपर नीचे सर हिलाता है. मुरली मनोहर श्रीवास्तव की दृष्टि में शून्य मात्र ख़ालीपन नहीं है बल्कि शून्य एक उपलब्धि है चूंकि कभी कभी शून्य से ख़ालीपन भरा जाता है. भगवान को भी वो चुनौती देने से हिचकते नहीं हैं क़ी भगवान बनना तो आसान है लेकिन इंसान बनना बहुत मुश्किल.
लेखक और प्रकाशक के संबंधों पर भी मुरली बाबू वॉर करने से चोक नहीं हैन.ऊन्की पीड़ा है की एक रचना को लेखक हृदय में धीरे धीरे सेता है, असीम पीड़ा के साथ जाम देता है और सरस्वती के पुत्रा की यह रचना जब प्रकाशनार्थ लुक्शमीपुत्रा प्रकाशक के पास पहुँचती है तो हू रचना के साथ बलात्कार कार कूड़े की टोकरी में फेंक देता है.
संग्रह की भूमिका जाने माने कवि अशोक चक्रधर ने लिखी है.शन्ग्रह में 48 कविताएँ हैं और 6 ग़ज़लें हैं. परंतु मुरली बाबू ग़ज़लों के साथ न्याय नहीं कार पाए हैं या बेलाग कहें तो ग़ज़ल की टांग उन्होने ज़बरदस्ती मरोदी है चूंकि यहाँ भाषागत वा व्याकरणीय अशुद्धियाँ हैं. बेहतर होता की मुरली बाबू कविता में ही हाथ आजमाते चूंकि ज्यादा लिखना जरूरी नहीं है परंतु अच्च्हा लिखना जरूरी है.बहर्हल कुलमिलाकर काव्या संग्रह औसत दर्ज़े से कुच्छ बेहतर है 'थीम' के कारण. अगर अशोक चक्रधर के शब्दों में कहें तो-" इन कविताओं को पढ़िए नहीं इनसे मिलिए."

पुस्तक:– सत्या जीतता है
लेखक:– मुरली मनोहर श्रीवास्तावा
मूल्या:–80 र्स.
पृष्ठ:–72
प्रकाशक:– साहित्या वीथी, डेल्ही.

रिव्यू बाइ

अमलेन्दु उपाध्याय

Posted in Books.

5 comments


MEDIA ke marm ko bachane kee chunautee

This Article was published http://jansamachar.net

आजकल एलेक्ट्रॉनिक मीडीया में डी पी एस छात्रा आरूषि मर्डर केस की टी आर पी आई पी एल खेलों से ऊपर जेया रही है. आरूषि की हत्या एक पहेली है लेकिन पिछले सप्ताह में जिस प्रकार मीडीया और खासतौर पर टी वी चॅनेल्स ने इस हत्याकांड को हवा दी है उसको देखकर तो लगता है क़ी आरूषि का क़त्ल हर उस पल किया जेया रहा है जिस जिस पॅल उसकी हत्या की तहक़ीक़ात हमारे खबरिया चॅनेल कार रहे हैं.लगता है क़ी पोलीस, जुद्गे, और गवाह सबकी भूमिका अकेले मीडीया ही अदा कार रहा है.
  टी वी चॅनेल्स ने जिस प्रकार से पिछले दिनों एक अबोध बालिका की निज़ी ज़िंदगी को बाज़ार का माल बनाकर बेचा उसने मीडीया के लोकतंत्रा के चौथे स्तंभ की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. लगातार तरक़ दिया जा रहा है क़ी खबरिया चॅनेल्स वो दिखाते हैं जो जनता देखना चाहती है. लेकिन क्या इस देश की सवा अरब आबादी में से किसी एक व्यक्ति ने भी िंखबरिया चॅनेल्स को कहा क़ी हमें इस हत्या कांड की तहक़ीक़ात करके और प्रेम कहानी बताओ. फिर वो कौन सा पैमाना है जो इन खबरचियों को जज और पोलीस दोनों की भूमिका अदा करने की छूट देता है ?
   एक सोशियल नेत्वोर्किन्ग साइट पर मैने ब्लॉग लिखकर मीडीया की इस करतूत की निंदा की , परिणामस्वरूप 95 % लोगों ने मीडीया के खिलाफ अपनी प्रतिक्रिया लिख और कहा क़ी यह सब च्रितरररित्र हॅना करके टी आर पी बा का फौर्मूला हैं . यह थे janta kee awaz ki woh kya dekhna chahtee hai. kewal ek sajjan ne kaha ki yeh karne ke liye main camera lekar is ksetra men utroon.maine unhen bataya ki main pichhale bees varshon se media se kisee na kisee roop men juda raha hoon aur crime reporting bhee kee hai.
    Yad hai kuchh samay poorv “Hans” ne T V patrkarita par ek visheshank nikala thaa aur Ajeet anjum uske atithi sampadk the.Jahan Anjum jee apne lekh men electronik media ke in karnamon ke samarthak bane huye the to usee ank men kam se kam aadha dozzen lekh aur kahaniyan hee anjum jee ke tarkon kee khilafat kar rahe the, tajjub yeh thaa ki inke lekhak bheee electronik media se jude bade nam the.
     Kaha ja sakta hai ki TV Channels ne loktantra ke prahree kee bhoomika nibhayi hai aur kuchh mamlon men yeh sach bhee sabit huya lekin is bhoomioka ke peechhe bhee media kee prahree kee bhoomika kam aur vyavsayik swarth jyada thaa. Abhee tak aam aadmee rajneton kon lashon kee rajneeti karne ke liye dosh diya karta thaa lekin aarushi murder case men media ne jo khel khela hai use aap kya kahenge? Ek abodh balika kee nijee zindgee ko gulchharre udakar jis prakar se relay kiya gaya uskee izazat kum se kum koi sabhya samaj to naheen de sakta.Hamare yahan parampra rahee hai ki mritak ke bad uskeee buraiyon kee charcha naheen kiya karte hain.Lekin koi channel to Aarushi kee diary ke ansh padhkar suna raha tha to koi prem kahanee bata raha thaa.
     Ek channel kee tipaddni thee ki sara desh is kand kee sachchayi jana chahta hai. Pata nahin ki us channel ka desh kaun sa hai ? Sirf Aarushi ki hatya par media ko itnee chintaa kyon hai ?Kya aapne U.P. men BUDAUN, ETAH, MAINPUREE ka nam suna hai ? In Zilon men shayad hee koi din aisaa jata ho jab do char hatyen na hotee hon ! Lekin yeh hatyen Media kee surkhiyan naheen bantee hain choonki marne wale aarushi jaise sadhan sampann gharanon ke naheen hote hain. Doosare In T V Channels ka Desh DELHI aur N C R se aage samapt ho jata hai.
    { Read more in detail please copy paste below mentioned link. http://www.jansamachar.net/display.php3?id=&num=12118&lang=Hindi }

Posted in Dil ki awaz.

7 comments


Jaipur Blasts

Gulabi Shahr kal Khoon se lal ho gaya. Kuchh sirfire logon ne khoon ki holi kheli.Ham sabko is ghatna ki khule dil aur dimag se majammat[Ninda] karni chahiye.Nischiy roop se marne wale na Hindu the na musalman woh sirf aur sirf hindustani the.Jabki Yeh hatyakand ravhne wale ek adad wahshi darinde.Yeh hindustaniyat ka takaza hai ki is sankat ki ghadi men hum aapsi mohabbat aur ekta ko purjor tareeqe se mazboot karen aur hamari qaumi ekta ko todne ki sajish rachane wali har taqat ko munhtod jawab den.

JAI HIND

MANAVTA AMAR RAHE

Posted in Dil ki awaz.

15 comments


Mauavati Sarkar ke 6 Mah Janta ki kasauti par

This review was broadcasted on All India Radio on 14-11-2007

 

 

      ek;korh ljdkj ds Ng ekg turk

This review was broadcasted on All India Radio on 14-11-2007

 

 

      ek;korh ljdkj ds Ng ekg turk dh dlkSVh ij

                                                              &&& veysUnq mik/;k;

               Izkns'k esa ek;korh ds usr`Ro okyh clik ljdkj dks cus Ng ekg dk dk;Zdky iwjk gks x;k gSA gkykWafd Ng ekg dk dk;Zdky fdlh eq[;ea=h ;k ny dh uhfr;ksa dk fu"i{k vkWadyu djus ds fy;s Ik;kZIr ugha gksrk gS] ijUrq bl nkSjku mldh uhfr;ksa dk vDl t:j mlds QSlyksa ij mHkjrk gSA chrs Ng  ekg ds nkSjku ek;korh dh ljdkj us tks FkksMs cgqr dk;Z fd;s gSa muds vk/kkj ij ,d ckr fuf'pr rkSj ij dgh tk ldrh gS fd dkuwu O;oLFkk vkSj vuqlwfpr tkfr;ksa dk dY;k.k nks izeq[k eqnns ljdkj ds ,ts.Ms esaeq[;r%'kkfey gSaA ;g vyx ckr gS fd nnqvk vkSj uwjk tSls vkradokfn;ksa vkSj cMs vijkf/k;ksa ds lQk;s ds ckotwn izns'k dh dkuwu O;oLFkk esa dksbZ visf{kr lq/kkj ekywe ugha iMkA

                        Ng ekg iwoZ tc ek;korh us izns'k dh ckxMksj laHkkyh Fkh rc mUgksaus izns'k dh turk dks xq.Mkjkt ls eqfDr vkSj ljdkjh /ku dh ywV jksdus dks viuk pqukoh eqnnk cuk;k FkkA iwoZorhZ lektoknh ikVhZ dh ljdkj ds dbZ eaf=;ksa vkSj ftyksa esa rSukr muds ftyk eSustjksa ds tqYeksa ls =Lr izns'k dh turk us ek;korh ds ok;nksa ij Hkjkslk trkdj mUgsa lRrk lkSaih FkhA bl ckr ls badkj ugha fd;k tk ldrk gS fd eqyk;e flag ds 'kklu dky esa cMs iwWthifr;ksa] dqN vQljksa] ckWyhcqM ds pUn vnkdkjksa vkSj ckgqcyh jkt& usrkvksa dk ,d fl.MhdsV izns'k dh jktuhfr ij gkoh FkkA ,slk yxus yxk Fkk fd ;g fl.MhdsV ljdkj vkSj iz'kklfud e'khujh ij Hkkjh FkkA bl ckr dk gh ifj.kke lektoknh ikVhZ dks pqukoksa esa Hkqxruk iMk FkkA csjkstxkjh HkRrk] dU;k fo|k /ku vkSj vusd dY;k.kdkjh ;kstuk,a lapkfyr djus ds ckotwn lektoknh ikVhZ vke pquko esa jsr ds egy dh rjg

                          ;g rks vkus okyk le; gh crk;sxk fd ek;korh us vius fojksf/k;ksa ls D;k lcd lh[kk gS \ ysfdu bruk t:j dgk tk ldrk gS fd lRrk laHkkyus ds ckn igyk fu.kZ; tks lkeus vk;k ] mlesa cnys dh Hkkouk ls dke u djus dh viuh ks"k.kk ds ckotwn ek;korh us izns'k ds csjkstxkjksa dks viuk igyk fu'kkuk cuk dj viuh [kqUul xjhc ukStokuksa ls fudkyh vkSj csjkstxkjh HkRrk dks lekIr dj fn;kA tcfd ckck lkgsc vEcsMdj us ljdkj ds tks ewy dRrZO; crk;s Fks muesa csjkstxkjh HkRrk nsuk] lcdks f'k{kk vkSj LokLFk; eqgS;k djkuk izeq[k FksA

                            le; le; ij ek;korh ;g ks"k.kk djrh jgh gSa fd mudh ljdkj cnys dh Hkkouk ls dk;ZokbZ ugha djsxh A ysfdu izeq[k foi{kh ny lektoknh ikVhZ yxkrkj ;g vkjksi yxk jgh gS fd mlds dk;ZdrkZvksa vkSj usrkvksa ij  QthZ eqdnesa yxk;s tk jgs gSaA lik dk ;g vkjksi dgha u dgha lp yxrk gSA ysfdu lektoknh ikVhZ dks ;g vkjksi yxkus ls igys vius fxjscku esa Hkh >kWd dj ns[kuk pkfg;sA lik 'kkludky esa cnk;wW] ,Vk vkSj fQjkstkckn tSls lik ds x< le>s tkus okys ftyks esa Hkh rks lik dk;ZdrkZvks ij QthZ eqdnesa yxs FksA lik mu QthZ eqdneksa ds fy;s fdldks nks"k nsxh \

                             xUnxh lkQ djus ds fy;s dhpM ugha cfYd LoPN ty dh vko';drk gksrh gSA clik ljdkj us tks nks ekg dk fo'ks"k ,Q0 vkbZ0 vkj0 pyk;k mlls rks vius dkjukeksa ls cSd QqV ij vkbZ lik dks gh ek;korh ljdkj ds f[kykQ ,d /kkjnkj gfFk;kj gkFk yx x;kA vxj ljdkj us fo'ks"k ,Q0 vkbZ0 vkj0 vfHk;ku ds LFkku ij ;g vfHk;ku pyk;k gksrk fd chrs lk                                                                      eqdnesa yxk;s x;s gSa oks crk;sa vkSj ljdkj tkWp djkdj U;k; fnyk;sxh rks turk esa ,d vPNk lans'k tkrkA ysfdu lkaln vf[kys'k ;kno ij cykRdkj tSlk fukSuk QthZ eqdnek yxkdj ek;korh ljdkj lokyks ds sjs esa fj xbZ vkSj lik ds vkjksi yksxksa dks lgh yxsA

                           dkuwu O;oLFkk og eqnnk Fkk] tks clik ds fy;s lathouh cuk FkkA ysfdu bl eqnns ij chrs Ng ekg larks"ktud ugha dgs tk ldrsA izns'k esa cSad MdSrh] vigj.k] gR;k vkSj ywV tSlh okjnkrsa cnLrwj tkjh gSaAgkykafd vusd ckj eq[;ea=h us ks"k.kk dh fd iqfyl fcuk fdlh ncko ds dk;Z djs vkSj vijkf/k;ksa dk lQk;k djsA ysfdu eq[;ea=h dh ks"k.kk dk tehuh Lrj ij dksbZ [kkl izHkko ns[kus dks ugha feykA gkWa bruk t:j gqvk fd vusd ekeyksa esa iqfyl vf/kd mnn.M gks xbZA gn rks rc gks xbZ tc cfy;k ftys ds jsorh Fkkus esa clik ds lsDVj izHkkjh ijegal oekZ  lfgr pkj fujijk/k yksxksa dks Fkkuk/;{k us csjgeh ls ihVkA vkt rd iqfyl dk tks pfj= jgk gS]mlds eqrkfcd rks iqfyl dks [kqyh NwV ugha cfYd mldh yxke dlus dh vko';drk gSA gekjs ;gkW iqfyl fu"i{k vkSj bZekunkj ugha jg xbZ gS vkSj mlds mPp vf/kdkfj;ksa esa jktusrkvkSa dh rjg xqVckth pje ij gSA dkuwu O;oLFkk og eqnnk gS ftl ij dksbZ Hkh ljdkj vk tk;s rc rd lQy ugha gks ldrh tc rd fd iqfyl dh dk;Ziz.kkyh esa vkewy pwy ifjorZu ugha fd;k tkrkA

                              laxfBr vijkf/k;ksa ij yxke dlus ds fy;s ljdkj ;wihdksdk 2007 ykbZ] tks foi{k ds rxMs fojks/k ds pyrs fo/kku ifj"kn esa ikfjr ugha gks ldkA bl dkuwu dk izns'k esa ftl iSekus ij Lokxr gksuk pkfg;s Fkk og ugha gqvkA tcfd lQsniks'k vijk/kh gj ljdkj vkSj turk ds fy;s xEHkhj pqukSrh gSaA ysfdu ;wihdksdk esa rks iqfyl dks vlhfer vf/kdkj ns fn;s x;s gSa tks Lora= vkSj fu"i{k U;k; izfdz;k ds fy;s LoLFk ladsr ugha gSA ;fn ljdkj bl dkuwu es iqfyl ds vf/kdkj de djds U;k;ikfydk ds vf/kdkj c

                                 fu.kZ; ysus ls T;knk dfBu dk;Z vius fu.kZ; ij MVs jguk gSA ek;korh dh ljdkj bLk iSekus ij [kjh ugha mrjh gSA dbZ egRoiw.kZ fo"k;ksa ij ljdkj us xtc dh myVcWaklh fn[kkbZaA dbZ fu.kZ; rks ,d i[kokjs ls de esa gh cny fn;s x;sA dkUVSDV QkfeZax vkSj Nk=lakSa ij izfrc/k nks ,sls cMs eqnns Fks ftu ij ljdkj vius fu.kZ; ij dk;e u jg ldhA dkUVSDV QkfeZax dks ljdkj us chl fnuksa esa okfil ys fy;k vkSj Nk=laksa ij izfrca/k ij Hkh ek;korh ljdkj us viuh fdjfdjh djkdj vxys l= esa tqykbZ ls pquko djkus dh ks"k.kk dj nh

                             vHkh Ng ekg esa ljdkj ds tks Hkh QSlys vk;s oks lHkh cMs jktuhfrd fo"k;ksa ij FksA bu fo"k;ksa ij ljdkj dHkh ,d dne vkxs rks dHkh ,d dne ihNs dh eqnzk esa utj vkbZA ;gkW ;g dg nsuk mfpr gksxk fd lRrk laHkkyus ds ckn gj jktusrk dks ;g /;ku j[kuk pkfg;s fd oks ,d tkfr] /keZ ;k ikVhZ dk usrk ugha jg x;k gS]cfYd vc mldh lksp lcdks lkFk ysdj pyus dh gksuh pkfg;sA ysfdu fiNys nks n'kd esa izns'k D;k ns'k dh jktuhfr us tks djoV cnyh gS mlesa  tkfr vkSj /keZ jktusrkvks ij gkoh gks x;k gS A vc jktusrkvksa ls cMk fny okyk gksus dh vk'kk djuk csekuh gSA ;g detksjh chrs Ng ekg esa ljdkj ds dkedkt ij gkoh jghA

                            foxr ljdkj esa HkrhZ fd;s x;s 18000 ls vf/kd flikfg;ksa dh HkrhZ bl vk/kkj ij fujLr dj nh xbZ fd mlesa vfu;ferrk gqbZA bruh cMs iSekus ij gqbZ HkrhZ esa dqN xMcfM;ksa dh laHkkouk ls badkj ugha fd;k tk ldrk gsA ysfdu ,d ekg esa ftl rjg ls 22000 HkfrZ;ksa dh tkWp dh xbZ mlesa rks ,d HkrhZ dh tkWp ij 30 lsd.M dk Hkh le; ugha vk;kA D;k ;g tkWp lokyksa ds sjs esa ugha gS \ vxj ljdkj us dsoy vfu;ferrk cjrus okys vf/kdkfj;ksa vkSj xMcMh djds ukSdjh ik;s yksxksa ds  fo:) dk;Zokgh dh gksrh rks Lokxr gksrkA vk'kk dh tkuh pkfg;s fd ftl izdkj dkUVSDV QkfeZax okfil yh xbZ dqN ,slk gh bl izdj.k ij Hkh gksxk \

                             Ng ekg esa ljdkj ftl rjg ikdksZa ij fd;s tk jgs fQtwy[kphZ ij foi{kh                                                                      

nyksa ds fu'kkus ij jgh gS og ,d xEHkhj elyk gSA foRrh; o"kZ 2007&08 esa dka'khjke] vEcsMdj] jekckbZ ds uke ij cu jgs  ikdkaZas ij yxHkx 428 djksM :Ik;k vkcafVr fd;k x;k tcfd vuqiwjd ctV esa yxHkx 624 djksM :I;k vkcafVr fd;k x;k gSA foi{kh ny bls fQtwy[kphZ vkSj turk ds /ku dh ywV crk jgs gSaA foif{k;ksa ds vkjksi vius LFkku ij gSA ysfdu vkf[kj fdl vk/kkj ij bu ikdksZa dks tk;t Bgjk;k tk;s \ dka'khjke ;k vEcsMdj dk bl izns'k ds fy;s dksbZ ;ksxnku ugha gSA vkSj vxj bUgsa egkiq:"k eku Hkh fy;k tk;s gkykafd ,slk dguk lkjs egkiq:"kksa dk vieku gS] pwqfd egkiq:"k fdlh ,d /keZ ;k tkfr dk ugha gksrk ] rks vLlh&vLlh yk[k :Ik;s dh ykxr ls tks chl gkFkh yxk;s tk jgs gSa ] mu gkfFk;ksa dk D;k ;ksxnku gS \ D;k ;g gkFkh Hkh egkiq:"k dh Js.kh esa vkrs gSa \ bl X;kjg djksM dh Hkkjh Hkjde jkf'k ls vxj vEcsMdj] dka'khjke ds uke ij gh Ldwy] vLirky vkSj lMd curs] u;s m|ksx yxrs ;k ifjogu ds lk/ku c

                       jktuhfrd fu.kZ;ksa dh vxj ckr NksM nh tk;s rks ek;korh vius ftu rsojks ds fy;s izfl) gsa og Ng ekg esa ns[kus dks ugha feysA ek;korh dh fo'ks"krk gh ;g ekuh tkrh gS fd og dMd iz'kklfud QSlys ysus okyh jktusrk gSA muds lkeus vQlj'kkgh Hkhxh fcYyh cuh jgrh gSA tcfd muds iwoZorhZ eqyk;e flag ds 'kklu esa vQlj csyxke jgrs Fks vkSj ;g yxrk gh ugha Fkk fd ljdkj dk ykyQhrk'kkgh ij dksbZ vadq'k gSA Ng ekg ckn ek;korh us vius iqjkus rsoj fn[kk;s gSa vkSj rhu fnuksa ds vUnj yxHkx rhu ntZu cMs vQlj fuyEfcr fd;s x;s gSaA eq[;ea=h Lo;a xkoksa dh xfy;ksa dk fujh{k.k dj jgh gSaA ;g gekjs vU; jktusrkvksa ds fy;s ,d lcd gSA

                         leh{kk cSBdks dk nkSj vkxs Hkh tkjh jgsxk vkSj vke vkneh ds eqnns ij iz'kklfud lfdz;rk eq[;ea=h dh leh{kk dk egRoiw.kZ fcUnq gksxkA vk'kk dh tkuh pkfg;s fd dMd vkSj l[r iz'kklfud rsoj okyh eq[;ea=h dh Nfo dks ek;korh vkus okys fnuks esa vkSj etcwr cuk;saxhA lkFk gh lkFk fookfnr jktuhfrd eqnnksa ij gVks cpks dh j.kuhfr viuk dj fooknks ls cpus dk iz;kl Hkh djsaxh] gkykafd ;g muds LoHkko ds foijhr gSA ek;korh ds ny dks fo/kkulHkk es iw.kZ cgqer izkIr gS blfy;s mUgsa cgqr gMcMh fn[kkus dh vko';drk ugha gsA gkWa yksdra= esa cgqer dk e.M ugha djuk pkfg;s] pwafd turk dks 'kkld ds e.M ls l[]r uQjr gksrh gSvkSj cgqer dk e.M jktusrk dks QkflLV cuk nsrk gSA blh izns'k esa  bfUnjk xkW/kh dk Hkh e.M pwj&pwj gqvk FkkA vxj jkx&}s"k ls ij mBdj ek;korh LoPN iz'kklu] csgrj dkuwu O;oLFkk vkSj lUrqfyr fodkl ns ik;s arks mUgsa fdlh fojks/kh ds lokyksa ds tokc nsus dh vko';drk ugha gksxh ] pwafd rc muds dke cksysaxsA

ys[kd jktuhfrd leh{kd vkSj Lora= i=dkj gSaA

dh dlkSVh ij

                                                              &&& veysUnq mik/;k;

               Izkns'k esa ek;korh ds usr`Ro okyh clik ljdkj dks cus Ng ekg dk dk;Zdky iwjk gks x;k gSA gkykWafd Ng ekg dk dk;Zdky fdlh eq[;ea=h ;k ny dh uhfr;ksa dk fu"i{k vkWadyu djus ds fy;s Ik;kZIr ugha gksrk gS] ijUrq bl nkSjku mldh uhfr;ksa dk vDl t:j mlds QSlyksa ij mHkjrk gSA chrs Ng  ekg ds nkSjku ek;korh dh ljdkj us tks FkksMs cgqr dk;Z fd;s gSa muds vk/kkj ij ,d ckr fuf'pr rkSj ij dgh tk ldrh gS fd dkuwu O;oLFkk vkSj vuqlwfpr tkfr;ksa dk dY;k.k nks izeq[k eqnns ljdkj ds ,ts.Ms esaeq[;r%'kkfey gSaA ;g vyx ckr gS fd nnqvk vkSj uwjk tSls vkradokfn;ksa vkSj cMs vijkf/k;ksa ds lQk;s ds ckotwn izns'k dh dkuwu O;oLFkk esa dksbZ visf{kr lq/kkj ekywe ugha iMkA

                        Ng ekg iwoZ tc ek;korh us izns'k dh ckxMksj laHkkyh Fkh rc mUgksaus izns'k dh turk dks xq.Mkjkt ls eqfDr vkSj ljdkjh /ku dh ywV jksdus dks viuk pqukoh eqnnk cuk;k FkkA iwoZorhZ lektoknh ikVhZ dh ljdkj ds dbZ eaf=;ksa vkSj ftyksa esa rSukr muds ftyk eSustjksa ds tqYeksa ls =Lr izns'k dh turk us ek;korh ds ok;nksa ij Hkjkslk trkdj mUgsa lRrk lkSaih FkhA bl ckr ls badkj ugha fd;k tk ldrk gS fd eqyk;e flag ds 'kklu dky esa cMs iwWthifr;ksa] dqN vQljksa] ckWyhcqM ds pUn vnkdkjksa vkSj ckgqcyh jkt& usrkvksa dk ,d fl.MhdsV izns'k dh jktuhfr ij gkoh FkkA ,slk yxus yxk Fkk fd ;g fl.MhdsV ljdkj vkSj iz'kklfud e'khujh ij Hkkjh FkkA bl ckr dk gh ifj.kke lektoknh ikVhZ dks pqukoksa esa Hkqxruk iMk FkkA csjkstxkjh HkRrk] dU;k fo|k /ku vkSj vusd dY;k.kdkjh ;kstuk,a lapkfyr djus ds ckotwn lektoknh ikVhZ vke pquko esa jsr ds egy dh rjg

                          ;g rks vkus okyk le; gh crk;sxk fd ek;korh us vius fojksf/k;ksa ls D;k lcd lh[kk gS \ ysfdu bruk t:j dgk tk ldrk gS fd lRrk laHkkyus ds ckn igyk fu.kZ; tks lkeus vk;k ] mlesa cnys dh Hkkouk ls dke u djus dh viuh ks"k.kk ds ckotwn ek;korh us izns'k ds csjkstxkjksa dks viuk igyk fu'kkuk cuk dj viuh [kqUul xjhc ukStokuksa ls fudkyh vkSj csjkstxkjh HkRrk dks lekIr dj fn;kA tcfd ckck lkgsc vEcsMdj us ljdkj ds tks ewy dRrZO; crk;s Fks muesa csjkstxkjh HkRrk nsuk] lcdks f'k{kk vkSj LokLFk; eqgS;k djkuk izeq[k FksA

                            le; le; ij ek;korh ;g ks"k.kk djrh jgh gSa fd mudh ljdkj cnys dh Hkkouk ls dk;ZokbZ ugha djsxh A ysfdu izeq[k foi{kh ny lektoknh ikVhZ yxkrkj ;g vkjksi yxk jgh gS fd mlds dk;ZdrkZvksa vkSj usrkvksa ij  QthZ eqdnesa yxk;s tk jgs gSaA lik dk ;g vkjksi dgha u dgha lp yxrk gSA ysfdu lektoknh ikVhZ dks ;g vkjksi yxkus ls igys vius fxjscku esa Hkh >kWd dj ns[kuk pkfg;sA lik 'kkludky esa cnk;wW] ,Vk vkSj fQjkstkckn tSls lik ds x< le>s tkus okys ftyks esa Hkh rks lik dk;ZdrkZvks ij QthZ eqdnesa yxs FksA lik mu QthZ eqdneksa ds fy;s fdldks nks"k nsxh \

                             xUnxh lkQ djus ds fy;s dhpM ugha cfYd LoPN ty dh vko';drk gksrh gSA clik ljdkj us tks nks ekg dk fo'ks"k ,Q0 vkbZ0 vkj0 pyk;k mlls rks vius dkjukeksa ls cSd QqV ij vkbZ lik dks gh ek;korh ljdkj ds f[kykQ ,d /kkjnkj gfFk;kj gkFk yx x;kA vxj ljdkj us fo'ks"k ,Q0 vkbZ0 vkj0 vfHk;ku ds LFkku ij ;g vfHk;ku pyk;k gksrk fd chrs lk                                                                      eqdnesa yxk;s x;s gSa oks crk;sa vkSj ljdkj tkWp djkdj U;k; fnyk;sxh rks turk esa ,d vPNk lans'k tkrkA ysfdu lkaln vf[kys'k ;kno ij cykRdkj tSlk fukSuk QthZ eqdnek yxkdj ek;korh ljdkj lokyks ds sjs esa fj xbZ vkSj lik ds vkjksi yksxksa dks lgh yxsA

                           dkuwu O;oLFkk og eqnnk Fkk] tks clik ds fy;s lathouh cuk FkkA ysfdu bl eqnns ij chrs Ng ekg larks"ktud ugha dgs tk ldrsA izns'k esa cSad MdSrh] vigj.k] gR;k vkSj ywV tSlh okjnkrsa cnLrwj tkjh gSaAgkykafd vusd ckj eq[;ea=h us ks"k.kk dh fd iqfyl fcuk fdlh ncko ds dk;Z djs vkSj vijkf/k;ksa dk lQk;k djsA ysfdu eq[;ea=h dh ks"k.kk dk tehuh Lrj ij dksbZ [kkl izHkko ns[kus dks ugha feykA gkWa bruk t:j gqvk fd vusd ekeyksa esa iqfyl vf/kd mnn.M gks xbZA gn rks rc gks xbZ tc cfy;k ftys ds jsorh Fkkus esa clik ds lsDVj izHkkjh ijegal oekZ  lfgr pkj fujijk/k yksxksa dks Fkkuk/;{k us csjgeh ls ihVkA vkt rd iqfyl dk tks pfj= jgk gS]mlds eqrkfcd rks iqfyl dks [kqyh NwV ugha cfYd mldh yxke dlus dh vko';drk gSA gekjs ;gkW iqfyl fu"i{k vkSj bZekunkj ugha jg xbZ gS vkSj mlds mPp vf/kdkfj;ksa esa jktusrkvkSa dh rjg xqVckth pje ij gSA dkuwu O;oLFkk og eqnnk gS ftl ij dksbZ Hkh ljdkj vk tk;s rc rd lQy ugha gks ldrh tc rd fd iqfyl dh dk;Ziz.kkyh esa vkewy pwy ifjorZu ugha fd;k tkrkA

                              laxfBr vijkf/k;ksa ij yxke dlus ds fy;s ljdkj ;wihdksdk 2007 ykbZ] tks foi{k ds rxMs fojks/k ds pyrs fo/kku ifj"kn esa ikfjr ugha gks ldkA bl dkuwu dk izns'k esa ftl iSekus ij Lokxr gksuk pkfg;s Fkk og ugha gqvkA tcfd lQsniks'k vijk/kh gj ljdkj vkSj turk ds fy;s xEHkhj pqukSrh gSaA ysfdu ;wihdksdk esa rks iqfyl dks vlhfer vf/kdkj ns fn;s x;s gSa tks Lora= vkSj fu"i{k U;k; izfdz;k ds fy;s LoLFk ladsr ugha gSA ;fn ljdkj bl dkuwu es iqfyl ds vf/kdkj de djds U;k;ikfydk ds vf/kdkj c

                                 fu.kZ; ysus ls T;knk dfBu dk;Z vius fu.kZ; ij MVs jguk gSA ek;korh dh ljdkj bLk iSekus ij [kjh ugha mrjh gSA dbZ egRoiw.kZ fo"k;ksa ij ljdkj us xtc dh myVcWaklh fn[kkbZaA dbZ fu.kZ; rks ,d i[kokjs ls de esa gh cny fn;s x;sA dkUVSDV QkfeZax vkSj Nk=lakSa ij izfrc/k nks ,sls cMs eqnns Fks ftu ij ljdkj vius fu.kZ; ij dk;e u jg ldhA dkUVSDV QkfeZax dks ljdkj us chl fnuksa esa okfil ys fy;k vkSj Nk=laksa ij izfrca/k ij Hkh ek;korh ljdkj us viuh fdjfdjh djkdj vxys l= esa tqykbZ ls pquko djkus dh ks"k.kk dj nh

                             vHkh Ng ekg esa ljdkj ds tks Hkh QSlys vk;s oks lHkh cMs jktuhfrd fo"k;ksa ij FksA bu fo"k;ksa ij ljdkj dHkh ,d dne vkxs rks dHkh ,d dne ihNs dh eqnzk esa utj vkbZA ;gkW ;g dg nsuk mfpr gksxk fd lRrk laHkkyus ds ckn gj jktusrk dks ;g /;ku j[kuk pkfg;s fd oks ,d tkfr] /keZ ;k ikVhZ dk usrk ugha jg x;k gS]cfYd vc mldh lksp lcdks lkFk ysdj pyus dh gksuh pkfg;sA ysfdu fiNys nks n'kd esa izns'k D;k ns'k dh jktuhfr us tks djoV cnyh gS mlesa  tkfr vkSj /keZ jktusrkvks ij gkoh gks x;k gS A vc jktusrkvksa ls cMk fny okyk gksus dh vk'kk djuk csekuh gSA ;g detksjh chrs Ng ekg esa ljdkj ds dkedkt ij gkoh jghA

                            foxr ljdkj esa HkrhZ fd;s x;s 18000 ls vf/kd flikfg;ksa dh HkrhZ bl vk/kkj ij fujLr dj nh xbZ fd mlesa vfu;ferrk gqbZA bruh cMs iSekus ij gqbZ HkrhZ esa dqN xMcfM;ksa dh laHkkouk ls badkj ugha fd;k tk ldrk gsA ysfdu ,d ekg esa ftl rjg ls 22000 HkfrZ;ksa dh tkWp dh xbZ mlesa rks ,d HkrhZ dh tkWp ij 30 lsd.M dk Hkh le; ugha vk;kA D;k ;g tkWp lokyksa ds sjs esa ugha gS \ vxj ljdkj us dsoy vfu;ferrk cjrus okys vf/kdkfj;ksa vkSj xMcMh djds ukSdjh ik;s yksxksa ds  fo:) dk;Zokgh dh gksrh rks Lokxr gksrkA vk'kk dh tkuh pkfg;s fd ftl izdkj dkUVSDV QkfeZax okfil yh xbZ dqN ,slk gh bl izdj.k ij Hkh gksxk \

                             Ng ekg esa ljdkj ftl rjg ikdksZa ij fd;s tk jgs fQtwy[kphZ ij foi{kh                                                                       

nyksa ds fu'kkus ij jgh gS og ,d xEHkhj elyk gSA foRrh; o"kZ 2007&08 esa dka'khjke] vEcsMdj] jekckbZ ds uke ij cu jgs  ikdkaZas ij yxHkx 428 djksM :Ik;k vkcafVr fd;k x;k tcfd vuqiwjd ctV esa yxHkx 624 djksM :I;k vkcafVr fd;k x;k gSA foi{kh ny bls fQtwy[kphZ vkSj turk ds /ku dh ywV crk jgs gSaA foif{k;ksa ds vkjksi vius LFkku ij gSA ysfdu vkf[kj fdl vk/kkj ij bu ikdksZa dks tk;t Bgjk;k tk;s \ dka'khjke ;k vEcsMdj dk bl izns'k ds fy;s dksbZ ;ksxnku ugha gSA vkSj vxj bUgsa egkiq:"k eku Hkh fy;k tk;s gkykafd ,slk dguk lkjs egkiq:"kksa dk vieku gS] pwqfd egkiq:"k fdlh ,d /keZ ;k tkfr dk ugha gksrk ] rks vLlh&vLlh yk[k :Ik;s dh ykxr ls tks chl gkFkh yxk;s tk jgs gSa ] mu gkfFk;ksa dk D;k ;ksxnku gS \ D;k ;g gkFkh Hkh egkiq:"k dh Js.kh esa vkrs gSa \ bl X;kjg djksM dh Hkkjh Hkjde jkf'k ls vxj vEcsMdj] dka'khjke ds uke ij gh Ldwy] vLirky vkSj lMd curs] u;s m|ksx yxrs ;k ifjogu ds lk/ku c

                       jktuhfrd fu.kZ;ksa dh vxj ckr NksM nh tk;s rks ek;korh vius ftu rsojks ds fy;s izfl) gsa og Ng ekg esa ns[kus dks ugha feysA ek;korh dh fo'ks"krk gh ;g ekuh tkrh gS fd og dMd iz'kklfud QSlys ysus okyh jktusrk gSA muds lkeus vQlj'kkgh Hkhxh fcYyh cuh jgrh gSA tcfd muds iwoZorhZ eqyk;e flag ds 'kklu esa vQlj csyxke jgrs Fks vkSj ;g yxrk gh ugha Fkk fd ljdkj dk ykyQhrk'kkgh ij dksbZ vadq'k gSA Ng ekg ckn ek;korh us vius iqjkus rsoj fn[kk;s gSa vkSj rhu fnuksa ds vUnj yxHkx rhu ntZu cMs vQlj fuyEfcr fd;s x;s gSaA eq[;ea=h Lo;a xkoksa dh xfy;ksa dk fujh{k.k dj jgh gSaA ;g gekjs vU; jktusrkvksa ds fy;s ,d lcd gSA

                         leh{kk cSBdks dk nkSj vkxs Hkh tkjh jgsxk vkSj vke vkneh ds eqnns ij iz'kklfud lfdz;rk eq[;ea=h dh leh{kk dk egRoiw.kZ fcUnq gksxkA vk'kk dh tkuh pkfg;s fd dMd vkSj l[r iz'kklfud rsoj okyh eq[;ea=h dh Nfo dks ek;korh vkus okys fnuks esa vkSj etcwr cuk;saxhA lkFk gh lkFk fookfnr jktuhfrd eqnnksa ij gVks cpks dh j.kuhfr viuk dj fooknks ls cpus dk iz;kl Hkh djsaxh] gkykafd ;g muds LoHkko ds foijhr gSA ek;korh ds ny dks fo/kkulHkk es iw.kZ cgqer izkIr gS blfy;s mUgsa cgqr gMcMh fn[kkus dh vko';drk ugha gsA gkWa yksdra= esa cgqer dk e.M ugha djuk pkfg;s] pwafd turk dks 'kkld ds e.M ls l[]r uQjr gksrh gSvkSj cgqer dk e.M jktusrk dks QkflLV cuk nsrk gSA blh izns'k esa  bfUnjk xkW/kh dk Hkh e.M pwj&pwj gqvk FkkA vxj jkx&}s"k ls ij mBdj ek;korh LoPN iz'kklu] csgrj dkuwu O;oLFkk vkSj lUrqfyr fodkl ns ik;s arks mUgsa fdlh fojks/kh ds lokyksa ds tokc nsus dh vko';drk ugha gksxh ] pwafd rc muds dke cksysaxsA

ys[kd jktuhfrd leh{kd vkSj Lora= i=dkj gSaA

Posted in Politics.

4 comments