Skip to content


Sanghrsh ab bhi jaari hai !

तारों और गगन को चूमा तूने, खुले आकाश को नापा तूने.
बनी तू वीरता कि परिभाषा, वर्दी को जब अपनाया तूने.
शब्दों के सुंदर सृजन से,कई पुरस्कारों को जीता तूने.
खेलकूद के मैदानों में कीर्तिमानों को बनाया तूने.

उठाकर खतरें, तूने पूरी दुनिया क़ी ख़बरों को पहुँचाया है.
उच्च पदों पर हो सुशोभित, अपना लोहा मनवाया है.
नही कोई क्षेत्र अब अछूता , पहुँची सभी जगह नारी है,
आँचल में दूध, आँखों में पानी, परिभाषा अब भी क्यों जारी है?

साधारण वर्ग क़ी साधारण नारी, संघर्ष उसका है अब भी जारी.
रोज़मर्रा के जीवन में ,निर्णय लेने क़ी अब उसकी बारी.
नित्य नई परिभाषा बनाती,उल्टे पुलटे रिवाज़ों को तोड़ती.
कभी टूटती, कभी लड़खड़ाती.पर चलने को फिर उठ खड़ी होती.

गाँवों में छोटें शहरों में क्या कभी आपने झाँका है ?
अक्सर नारी को शरीर से ज्यादा कभी किसी ने आंका है?
बड़े शहरों में भी अक्सर बात नही कोई निराली है,
सामाजिक सोंच के आगे कितना वो झुकने वाली है?

शिक्षा,बौद्धिकता के बल पर , जब लेती है वो निर्णय सही,
बेकार स्त्रीवादी बातें,कह खारिज कर देतें हैं सभी वहीं.
बात नहीं ये सिर्फ पुरुषो की, स्त्री भी उसमें शामिल है,
हर पल समझायें सभी को, यही उसकी मुश्किल है.

मित्रो नही ये खेल शब्दों का, कहने को कि नारी बेचारी है.
मजबूती से चल रही है, संघर्ष उसका जारी है.
बैर नही उसका पुरुषों से , क्या वो समझ ये पाएँ हैं?
सामाजिक नियम नही उसके पक्ष में, क्या वो ये सोच पायें हैं?

Disclaimer : This poem is NOT in the background of the recent Mangalore incident, but a reflection of the social standing of a woman .

Posted in Poetry.



3 Responses

Stay in touch with the conversation, subscribe to the RSS feed for comments on this post.

  1. RAMESH says

    very good

  2. Think Tank says

    Very beautiful poem… Let us work towards a better tomorrow…

  3. Sunrise Marketing Services says

    Ok! So you can sing a different tune!