कर्म का आधार

वृत्ति में परिवर्तन से वायुमंडल में परिवर्तन आता है, कर्म का आधार है वृत्ति, वृत्ति बदलने से कर्म बदल जाता है, प्रवृत्ति की पवित्रता का आधार है वृत्ति, वृद्धि कर कारण है वृत्ति. वृत्ति ऊंची है तो प्रवृत्ति भी ऊंची होगी.

–भगवान शिव 


होली

होली  को शूद्रों का  त्योहार  क्यों कहते हैं


मिलन

मेरी आँखें भर आई, उस निर्मोही के जाने का वक्त हो गया था, मैने आँखों ही आँखों में इल्तजा की थोड़ी देर और रूक जाते,  दिल कर रहा था बस उसे अपलक निहारता रहूँ..वह भी आँखों ही आँखों में मुस्कुरा गया और बोला कुछ नहीं, दिन भर उसके आने की खुशी में पलक पावड़े बिछाये था,वो आया भी तो बस 3 घंटो के लिए, सदियों की प्यास इतनी देर में बुझ सकती थी क्या? लेकिन वो रुका नहीं और चला गया फिर आने का वादा कर के,वो थोड़ी देर और रूक जाता तो उसका का बिगड़ जाता, लेकिन नियम शायद नियम होते हैं और वो नियमों से बंधा हुआ है, एक का भी उल्लंघन नहीं कर सकता, यही उसकी दुश्वारी है. और शायद इसी लिए ही वो रुका नहीं … उसके  नियम कभी नहीं बदलते स्वयं उसके लिए भी नहीं…. मै अगले मिलन की इंतज़ार में खो गया ….शायद कुछ ज्यादा अपनी बात कह पाऊँ और उसकी सुन पाऊ…


डुबक,,,, डुबक

(अभी एक खबर आई कि अमेरिका ने पानी कि खोज मे चांद पर एक मिसाईल दागी है जिस से वहां पर १३ फुट लम्बा और ६५ फुट गहरा गड्ढा हो गया और उसकी धूल १० किलोमीटर ऊपर तक उठी,  ये सारी कयावाद उसने भारत के चंद्रमा पर पानी खोजो अभियान (चंद्रयान) के रिजल्ट के आने के बाद की)


डुबक,,,, डुबक

एक गाँव में एक झगडालू बुढ़िया रहती थी… उसका काम था बिना बात के भी लडाई करना ये उसकी आदत में शुमार था, उसकी इस आदत से परेशान गाँव वालों ने एक दिन ये निर्णय लिया की आगे से कोई भी उस से बात नहीं करेगा, और अगले दिन ऐसा ही हुआ, बुढ़िया की लाख कोशिशों के बावजूद किसी ने उस से बात नहीं की…बुढ़िया से चुप ना रहा जाए बिना लड़े उसका खाना हज़म नहीं हो रहा था… आखिर कार थक हार कार वो गाँव के बाहर के कुँए के पास गई और कुँए में पत्थर फेंके, पत्थरों के डूबने से आवाज़ आई डुबक डुबक … बस बुढ़िया शुरू हो गई …तू डुबक …तेरा बाप डुबक …तेरी मां डुबक ….

ठीक यही हाल अमेरिका का है …. रूस क्यूबा के साथ शीत युद्घ का दौर ख़त्म हो चुका है, इराक में कुछ करने को नहीं है, और अफगानिस्तान में पाकिस्तान को आगे कर दिया है…. बैठा ठाले क्या करे तो भारत ने चंद्रमा पर पानी का सुराग दिया और उसने मारे गुस्से के (भारत की उपलब्धि से जल भुन कर), चाँद पर भारत के पानी का घड़ा ही फोड़ दिया…. ऊपर से तुर्रा ये की चाँद पे पानी कितना है इसकी जाँच कर रहा है …वाह जी वाह धरती का पानी संभलता नहीं …ये भईया चाँद से पानी लायेंगे …. साथ ही साथ उसने चीन को भी उसकी औकात दिखाई ( अपने परेड दिवस पर चीन ने अपने नए आधुनिक शास्त्रों का प्रदर्शन किया था ) . रूस भईया गोर्शकोव को लेकर भारत से थोड़े रूसे हुए थे.. इस तरह उसने भारत को हथियारों के नए  नमूने भी दिखाए… बैठे बिठाए एक तीर से कई निशाने साध लिए… तथा कथित बुद्धिजीवियों को भी काम मिल गया… आधे आधे बंट के पक्ष विपक्ष में टीका टिप्पणियों का दौर चल रहा है… चलो भाई उन्हें भी काम मिल गया और मुझे भी काम मिल गया ब्लॉग लिखने का हा हा हा…और आप लोगों को भी…  हा हा हा हा (माफ़ कीजियेगा) …हा हा  हा हा $$$$$


शुभ दीपावली

सुख शांति समृधि से छलकते हुए ज्योति पर्व एवं उषा की प्रस्फुटित लालिमा से सुशोभित नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ !!!


राष्ट्र-II

(अपने पिछले ब्लॉग “राष्ट्र” को आज complete कर रहा हूँ… )..अब आगे…


भ्रष्ट आचरण होने के कारण आज हम दीन हीन हैं शक्ति संपन्न होते हुए भी शक्तिहीन हो गए हैं, ग्यान वान होने के बावजूद विग्यान का आयात हो रहा है. आज भ्रष्ट आचार भारत की नस नस में व्याप्त हो गया है. कुछ समय पहले मैने अपने एक ब्लॉग में पूछा था कि “क्या हम कायर हैं या सहनशील ?”, मेरा उत्तर है आज हम कायर हैं… कारण है कि हम कर्म भ्रष्ट, धर्म भ्रष्ट, पथ भ्रष्ट हो गए हैं. हमारा एक मेव उद्देश्य पैसा कमाना रह गया है, चाहे वो किसी भी तरीके स आए, हमारे पूर्वज वीर थे, सहनशील थे, सारा विश्व हमें नमन करता था.


एक छोटी सी बानगी देखिए आज घर छोटे छोटे टुकड़ों में बँट गया है, बुजुर्गों को दरकिनार कर दिया गया है…कहते हैं न्यूक्लियर फॅमिली है. क्यों भाई वीर हो तो ये हाल क्यों हो गया हैं??? घर परिवार में सहनशीलता कि कमी हो गई है..भाइयों कि आपस में पटती नहीं है, … निष्कर्ष क्या निकला … हमारे आपसी संबंधों मैं कड़वाहट हैं क्योंकि हम सहनशील नहीं हैं…. यानी हम कायर हैं…. परिस्थितियों से घबराकर भागते हैं, घर जोड़ नहीं सकते देश को क्या जोडोगे? व्यक्ति मजबूत होता हैं तो घर मजबूत होता है, घर मजबूत होता है तो समाज मजबूत होता है और समाज मजबूत होता है तो राष्ट्र मजबूत होता है… जब घर ही नहीं जोड़ सकते तो राष्ट्र क्या जोडोगे??? “जरा इस पर मंथन करिए


अब प्रश्न उठता है कि क्या पुनः भारत महान राष्ट्र बन सकता है? तो उत्तर है जी हाँ अभी भी इस राष्ट्र के अंदर इतनी उर्जा बची हुई है कि ये पुनः अपने गुणो से सज संवर कर विश्व का ताज बन सकता है. आज हमारे बुरे संस्कार हम पर हावी हैं समय के कारण या कहें परिस्थितियों कि कारण. आज आवश्यकता इस बात कि है कि हम अपने दैनिक जीवन में अध्यात्मिकता का समावेश करें. अपने गुणो को पहचाने , उन्हे इमर्ज करें और इमर्ज रखें. इमर्ज रखेंगे तो बुरे कर्मों से और बुरे कर्मों के प्रभाव से बच जाएंगे और साथ ही साथ दूसरों को भी बचा सकेंगे. बुरे कर्मों से बचेंगे तो घर समाज और देश का भला कर सकेंगे.


अब लोग कहते हैं कि भाई ये भौतिकता का युग है इसमे गुणो को अध्यात्मिकता को तिलांजलि देकर ही , दूसरों के सिरों पर पैर रख कर ही आगे बढ़ा जा सकता है. तो एक प्रश्न पूछता हूँ - क्या आगे बढ़ने का एक यही रास्ता है? क्या पहले जब हमारे अंदर दैवीय गुण थे तो क्या हम भूखों मरते थे? गरीब थे? धार्मिक कहानियों को छोड़ दें और जितना भी लिखित इतिहास उपलब्ध है उनका अध्ययन करें तो उत्तर से दक्षिण तक पूरब से पश्चिम तक भारत में कहीं भी गरीबी या गरीबों का वर्णन नहीं मिलता है. (भारत पर विदेशियों के आक्रमण से पहले कि स्थिति). जब हम आचरण में, चरित्र में पवित्र थे तब हमारे पास
भौतिक रूप से धन धान्य अनाज ग्यान विग्यान कला साहित्य हर विधा में हर चीज कि भरपूरता थी. और आज जब हमारे आचरण में चरित्र में गरीबी है तो भौतिक धन कि भी कमी आ गई है.


क्या भारत पश्चिमी तरीकों से वापस धनवान बन सकता है? जैसा कि आज कल कि पीढ़ी सोचती हैं. उत्तर है बिल्कुल नहीं. दूसरे राष्ट्रों से अलग हमारा चित्र है और चरित्र है, हमारी मर्यादाएँ अलग है. हमारा चरित्र है विश्व बन्धुत्व ” सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः” . एक बार आप चरित्र वान बनिए तो सही, पवित्र बनिए. कोई भी आपकी तरफ आँख उठा कर
देख भी नहीं सकेगा. (आज कि परिस्थितियों में भी). क्या हम पुनः उस उँचाई को छू सकते हैं? उत्तर है जी हाँ. एक कोशिश कर के तो देखिए….


शिव भावानुवाच ” होलीयेस्ट (Holiest),हैईएस्ट (highest), रिचेस्ट (richest) आप आत्माएं (भारतवासी) ही हो, कर्म, धर्म , आचरण, मर्यादा सब आपका ही तो गायन है पूरे विश्व में”



भारत देश कि महिमा महान इसमें आते शिव भगवान….



इति शुभम्…..ओम शांति



अमर शहीद मदन लाल धींगरा

Amar Shahid Madan Lal Dhingra (1883 - 1909)

वोमन्स डे, मॅदर’स डे, फ्रेंड्स डे…. और भी ना जाने कौन कौन से डे….. ब्लॉगर्स मनाते आ रहे हैं लगातार… उपरोक्त दिनों में इन विषयों पर लेखों की बाढ़ सी आ जाती है… मगर कल (17.08.) को अमर शहीद मदन लाल धींगरा का शहीदी दिवस था और सारे दिन मैं इंतज़ार करता रहा की कोई तो उस अमर शहीद को याद करेगा… मगर किसी ने एक भी शब्द उस शहीद तो अर्पण नहीं किया…. थोड़ा सा तो उस महान आत्मा का ख्याल कीजिए, जिसने अपना जीवन देश को अर्पित कर दिया नौजवानी में ही…. उम्मीद करता हूँ… आप सभी अपने श्रधा सुमन उस वीर को अर्पित करेंगे…ओम शांति


राष्ट्र

कुछ समय पहले मैने एक अपने एक ब्लॉग में एक सवाल पूछा था अपने आई लैंड मित्रों से…. और उसके जवाब मैं बहुत सारे दोस्तों ने बहुत अच्छे जवाब दिए….आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद….
मेरे सवाल के पीछे एक मकसद था की हम अपनी जड़ों को जाने की हम क्या हैं … हमारे देश का नाम भारत हैं ना की हिन्दुस्तान … हिन्दुस्तान विभिन्न आक्रमण करियों के आने के बाद पड़ा…. इतिहास हम अंग्रेजों के चश्मे से देखते और पढ़ते हैं.. इसलिए ही सारी गड़बड़ हो गई है और हम अपने जड़ों से कट गए हैं भारत की हर बात पर हीन भावना से ग्रसित रहते हैं… हमारा धर्म भी हिन्दू नहीं है…, हम भारत में रहने वालों का धर्म है आदि सनातन देवी देवता धर्म…. भारत आदि सनातन देश है… देवी देवताओं के समान गुणों वाले इंसान यहाँ रहते थे /हैं….. तभी सारे विश्व से अलग हमारी नैतिकता है मर्यांदा है… और ये इतनी ऊँची है जिसका कोई देश कोई सभ्यता इसका मुकाबला नहीं कर सकती/सकता.. ..
पवित्रता,,क्षमा, प्रेम, वीरता, बन्धुत्व, सहनशीलता, संयम, धैर्य, दान ये हमारे मौलिक गुण थे… लेकिन कालांतर में विभिन्न सभ्यताओं के जबरन तलवार के जोर पर प्रवेश…छल कपट प्रपंच का सहारा लेकर हमारी आस्थाओं को भस्मीभूत कर दिया गया..इस कारण हम धीरे धीरे अपने इन गुणों को भूलते गए और आज ये अवस्था आ पहुँची है की अगर आज मैं ये कहूँ की हम भारतीय देवताओं की संतान हैं तो शायद कोई मानने को तैयार भी नहीं हो… क्योंकि देवताओं वाले गुण अब हमारे अंदर रहे ही नहीं हैं… इस लिए हम देवताओं की वंदना करते तो हैं लेकिन उन जैसा बनने की सामर्थ्य नहीं रखते हैं… जो भारत कभी विश्व का गुरु था, आज मोहताज हो गया है…. विश्व गुरु आज भी है लेकिन आज आचरण की पवित्रता ना होने के कारण, कोई इसे विश्व गुरु की मान्यता देने को तैयार नहीं है…. संसार को दिशा दिखाने का माद्दा आज भी सिर्फ भारत में ही है लेकिन आज पवित्रता ना होने के कारण, उस माद्दे को कोई मान्यता देने को तैयार नहीं है, आज हमने धन को अपना लक्ष्य बना लिया है और आदर्श अमेरिका यूरोप बना लिया है जिसके कारण हम चारित्रिक पतन की ओर जा रहे हैं, अगर विश्व के अन्य धर्मों को देखें तो उन्होने धर्म के लिए लड़ाई को मुख्य हथियार बनाया लेकिन भारत कभी इस नीचता के रास्ते पर गया ही नहीं… क्योंकि धर्म का मूल स्वभाव ही शांति, क्षमा और समभाव है और था… पूर्व काल में हम छोटे छोटे राज्यों में तो बंटे रहे परंतु राष्ट्र का स्वरूप वा आचरण कभी बदला नहीं..एक राष्ट्र के अंदर विभिन्न राज्य तो रहे परन्तु आने जाने , तीर्थ यात्रा , कहीं भी बसने की आजादी सभी की बनी रही…. मर्यादा की पराकाष्ठा देखिए की राज्यों के अन्द् रूनी युद्ध होते रहते थे और किसान खेत में हल चलाते रहते थे…. लगातार आक्रमणों से धीरे धीरे हमारा मनोबल क्षीण होता गया और आज हम शूद्रों चाण्डालों (विदेशियों) से अपनी प्रतियोगिता करते हैं जिनके शब्दकोश में छल प्रपंच द्रोह… के अतिरिक्त मर्यादा शीलता नामक शब्द ही नहीं हैं…. आज हमें जरूरत है आचरण में चरित्र में एक रूपता की (अंदर बाहर एक समान) , मर्यादा की शीलता की, और सबसे बड़ी जरूरत पवित्रता की… आज हमारी श्रेष्ठता का मापदंड बदल गया है जिसके कारण हम आज धर्म भ्रष्ट कर्म भ्रष्ट आचरण भ्रष्ट हो गये हैं

क्रमशः…..

(वचन जरा कड़वे हो गए हैं… लेकिन आज राष्ट्र को मीठी बातों की जरूरत नहीं है…. सच के आईने की जरूरत है…)


माँ

मदर्स डे के उपलक्ष्य में ब्लॉगर्स ने ढेर सारे वेब के पन्ने रंग दिए माँ के प्रसंशा में , लेकिन माँ की हालत देखी है आज के संसार में. जो नाती पोतों वाली माँ एं हैं, उनकी हालत देखी है घरों में? या तो वे बहुओं या बेटों द्वारा सताई जा रही हैं, घरों में…. देख कर बहुत दुख होता है… और लगभग हर घर की ही यही कहानी है, लेकिन कोई सत्य को समझने और स्वीकार करने को तैयार नही है. एक दिन खूब ढोल पीट लिया मदर्स डे का खूब प्यार दिखाया और बाकी के दिन पूछने भी नही गए की माँ कहाँ है किस हाल में है… सबसे बड़ी बात ..नई नवेली जिस घर में आ रही है और सास को तंग कर रही है वहीं …वहीं उसके मायके में उसकी माँ की भी वही हालत है, फिर भी दिमाग नही खुल रहा है की मैं क्या कर रही हूँ… आगे मेरा भविष्य क्या होगा…..जो फसल बो रहीं हूँ वही आगे काटनी भी पड़ेगी ….. सबसे ज्यादा ब्लॉग बहनों ने लिखे हैं और सबसे ज्यादा दुखी वही हैं (बुजुर्ग माता एं)….. वो माँ , बहू बेटी है फिर भी सताई जा रही है हम जिंस से…. क्या होगा इस भारत का??? नकारात्मक तरंगो…बद दुवाओं से कितने दिन चलेगा ये देश… हम दूसरों को क्यों सिखाते हैं, घर में स्वयं क्यों नहीं आचरण में लाते हैं……..


भारत…..

कई दिनों से एक सवाल मन में उभर रहा था…. आपके सामने प्रस्तुत है:-

एक देश—हिन्दुस्तान
एक भाषा - हिन्दी
एक धर्म - हिन्दू
बसा हुआ है हिन्द महासागर पे

इतनी similarity….

विश्वा के और देशों को देखें तो धर्म अलग भाषा अलग देश का नाम अलग

सिर्फ हिन्दुस्तान के साथ ही इतनी समानता क्यों?

क्या हम हिन्दू हैं या कोई और? क्या देश हिन्दुस्तान है? हम इतने सहनशील क्यों हैं? हम आक्रामकता से पेश क्यों नहीं आ पाते किसी के साथ…. हम कायर हैं या सहन शील हैं?

सोचिए और जवाब दीजिए…….