
अब आगे ……
आइए अब भगवान शिव को सामने रखते हैं … हम क्या कहते हैं शिव ज्योतिर्लिन्गम ( भगवान शिव के बारह (द्वादश ज्योतिर्लिन्गम) मत मशहूर हैं).
अब ध्यान से शब्दों को देखिए ज्योतिर्लिन्गम …. अर्थात ज्योति की तरह के लिंग वाला. लिंग का एक अर्थ होता है पहचान. अब शिव लिंगो के देखिए उनका आकार ज्योति की तरह का ही होता है (जैसे दीये या मोमबत्ती की लौ) … इस लौ की तुलना शिव लिंगो ने करें तो दोनो का स्वरूप समान ही है. शिव ज्योतिर्लिंग को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाने के लिए इन लिंगो का रूप बनाया गया. किसी भी शिवलिंग का नाक कान नहीं होता या आकारी देवता का रूप नहीं बनाया जाता है.
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम शिवलिंगो का स्वरूप समान होता है, आकार भले ही छोटा बड़ा बनाया जाता है, लेकिन स्वरूप एक ही जैसा होता है …
रामचन्द्र जी ने रमेश्वरम में शिवलिंग की ही पूजा और स्थापना की थी, रामेश्वर के नाम से अर्थात राम के भी ईश्वर (राम विष्णु के अवतार माने जाते हैं यानी शिव उनसे (विष्णु) भी ऊँचे हैं). कृष्ण ने गोपेश्वर में शिवलिंग की स्थापन की. शंकराचार्य ने भारत के चारो कोनो (दिशाओं) में शिवलिंगो की स्थापना की थी (शंकर की मूर्तियों की नहीं).
अगर आप पूरे भारत के मंदिरों का अध्ययन करें तो हर एक गावों में आपको, शिव मंदिर मिल जाएंगे. पूरे भारत में सबसे ज्यादा शिव मंदिर ही हैं.
परमात्मा सदा एकरस, शांति का सागर, प्रेम का सागर, गुणों का सागर, आनंद का सागर, है, अब तुलना करे शंकर से तो शंकर जी को क्रोध भी आता हैं वो दुखी भी होते हैं (पार्वती के जल कर भस्म हो जाने पर) , वो तपस्या रत भी हैं, अगर वो भगवान हैं तो उन्हे तपस्या करने की क्या जरूरत? और किसकी तपस्या करते हैं? इसका अर्थ है कोई उनसे बड़ा है तभी तो उसकी तपस्या करते हैं. अगर आप शंकर की प्रतिमा या फोटो को देखें तो उसके आगे भी एक शिव लिंग रखा है. ठीक इसी तरह ब्रह्मा के हाथों में माला है, अगर वो भगवान हैं? तो वो किसकी माला फेर रहे हैं, यानी कोई उनसे भी ऊँचा है ……
अगर विभिन्न मंदिरों की स्थिति को देखें तो देवताओ की मूर्तियाँ शिवलिंग के अगल बगल ही मिलेगी और शिवलिंग बीच में स्थापित होगा …. जैसा की हम पढ़ते आए हैं की “शिव लिंग”, शंकर का अंग विशेष है … तो एक बात का ध्यान रखें की जिस अंग की बात हम सार्वजनिक रूप से नहीं करते हैं उसकी हम पूजा क्यों करेंगे? ये एक तरह से भगवान की ग्लानि ही हुई.
”शिवलिंग” ज्योति स्वरूप निराकार परम आत्मा का यादगार (प्रतीक) है, और हम सभी उसी की ही पूजा करते हैं. निराकार का अर्थ ये नहीं है की उसका आकार नहीं है, हाँ एक आकार (साकार मनुष्य रूप) की तुलना में वो निराकार है.
सारे विश्व की आत्माएं एक शिव की ही संतान हैं, हमारे (आत्मा का) रूप भी ज्योति का है और उसी तरह हमारे पिता परम पिता परमात्मा का भी स्वरूप ज्योति की तरह का है हम आत्मा हैं और वो परम आत्मा , है वो भी आत्मा परंतु परम अर्थात ऊँचे से ऊँचा. भगवान शब्द की व्याख्या करते हैं भ - भूमि, ग- गगन, व- वायु, आ- अग्नि, न-नीर अर्थात पाँचो तत्वो से परे रहने वाला
हम कहते हैं हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई, परंतु हम एक पिता की संतान हैं ये ना जान ने के कारण हम विभिन्न, धर्म भेद में पड़े रहते हैं और धर्म के नाम पर आपस में एक दूसरे के दुश्मन बने रहते हैं और लड़ते रहते हैं, और एक दूसरे को मिटाने की बाते करते रहते हैं …
अगर सही रूप में अपनी (आत्मा) और परमात्माकी खोज करें तो पाएंगे की हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आत्मा रूप में भाई भाई और हमारे पिता ज्योति स्वरूप शिव. आप उसे परम पिता परमात्मा कह लें या शिव पिता या भगवान या खुदा या अल्लाह या कुछ और, परंतु इस बात का ध्यान रखें हम सभी आपस में भाई भाई ही हैं कोई अलग शख्शियत नहीं …
इति शुभं ….
सभी धर्म समान रूप से परमात्मा का स्वरूप ज्योति का ही मानते हैं और शिव हैं उनकी सही पहचान..
आगे विभिन्न धर्मो में शिव का स्थान …. रहस्य और भी हैं शिव के बारे में ….