दोस्तों, आज ( 17 सितंबर ) हिन्दी -ग़ज़ल के जनक, दुष्यंत कुमार का जन्म-दिन है |
आम आदमी की व्यथा के हस्ताक्षर, दुष्यंत कुमार को मेरी यह ग़ज़ल समर्पित है :
ग़ज़ल
लाश है कि ये आदमी सो रहा है |
सारे शहर का ज़मीर सो रहा है |
ये नंगा बच्चा है कि आज का मुस्तकबिल,
इंसानियत का जनाज़ा निकल रहा है |
फुटपाथ को घर बनाए मजदूर पड़ा हुआ है,
विला जो बनाया उसमें मालिक रह रहा है |
लू तो अब बेमौसम भी चलती है,
भीगा हुआ है जंगल सुलग नही रहा है |
हज़ार बदला है ग़ज़ल के अल्फाज़ों को मैने ,
पैग़ाम मेरा संगदिल तक पहुँच नही रहा है |
चेतन प्रकाश ‘चेतन’
very nice gazal chetan..amazingly true pi. of modern times…thnks for sharing..also visit and put ur valuable comments on my posts..take care:)))
Paigham sabhi patthar dil walo tak pahuchega……..”kaun kehta hey aasman main soorakh nahi ho sakta…….Ek patthar tou tabeeyat se uchaalo yaroo……
Thanks for visit……Happy deepavali……
very nice…
GOOD GAZAL
bahut khoob