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A Telephonic Conversation with Baapu

” Hello, Main Baapu Bol Raha Hoon”.
2 October,2008—- एक ओर ईद परने कि ख़ुशी तो दूसरी ओर गाँधी जयंती मनाने कि औपचारिकता. गाँधी जयंती कि औपचारिकता निभाते हूए मैने कुछ लोगों को गाँधी जयंती कि बधाई देते हूए अपने मुस्लिम दोस्तों को ये साफ़ साफ़ कह दिया कि भाई आज गाँधी जयंती है सो मैं मांसाहारी खाना नहीं खाऊंगा. भाई अपने रास्ट्रपिता कि सम्मान में इतना तो मैं कर ही सकता हूँ. खैर ईद कि दावत से जब मैं लौट रहा था तो उस इन्सानरूपी कुत्ते ने आज फिर मुझ पर एक कमेन्ट पास किया. मन किया कि उस नाली के कीडे को २-४ लाफा वहीँ दे दू. पर ये सोच कर खुद को रोक लिया कि कुत्ते कि पूँछ कभी सीधी हो सकती है भला? वैसे भी ये जिस caste-dominated समाज में मैं रहता हूँ वहां लोग आपके सही या गलत होने से पहले आपकी जाति-वर्ण देखते हैं. अगर आपकी जाति उनके साती से मातच कर गयी तो उनका आपकी साइड लेना पका समझो. फिर ये बात मायेने नहीं रखेगी कि आपकी गलती है या नहीं. वेल पिछली बार जो हुआ था उसी कि बुनियाद पर मैं ये कह रहा हूँ. हुआ यूँ कि पिछली बार जब उसने मुझे प्यारे प्यारे अपशब्द कहे थे तो मैंने भी उसे उसकी जुबान में ही जवाब देने कि गुस्ताखी कर दी थी.


उसके बाद से उसके खानदान वालों ने जो मेरी शान में गालीओं कि बरसात मुझपर कि, वो आज तक मैं नहीं भूल सका हूँ. भाई उस बारिश में मैं इतना भीग गया था कि अगले २-३ दिनों तक मुझे नहाने कि जरूरत भी नहीं परी थी. लगता है कि उसी बारिश कि बूंदे वो आज भी मुझ पर मारता रहता है. खैर ‘कुत्ते भौकें हज़ार हाथी चले बीच बाज़ार’ मुहावरे को याद करता हुआ मैं आगे बढ़ गया. पर कहीं ना कहीं उसको लेकर मन में रोष अभी भी था. मन कर रहा था कि कुछ कुछ होता है के स्वीट लवर बॉय शाह रुक खान कि जगह जोश फिल्म के शाह रुक खान का रूप लेकर उसे सबक सीखा ही दूं.सारा किस्सा आज खत्म ही कर देता हूँ, जो होगा देखा जायेगा. मेरी खामोशी को कहीं मेरी कमजोरी ना समझ बैठा हो वो. २-४ कान के नीचे पडेगा तो होश आ जायेगा उसे. ऐसे ही विचारों के साथ मैं अपने रूम में बैठा था कि बाहर बरामदे में किसी चीज़ कि धडाम से गिरने कि आवाज़ आई. मैं जल्दी से वहां गया तो क्या देखता हूँ कि मेरी अचार कि शीशी टूट कर बिखरी पड़ी हूई थी. कांच के टुकडो के बीच में एक हरे रंग कि रबड़ कि गेंद पड़ी हूई थी जो कि उसी लड़के ने फेकी थी.
“होता है रे, चल हो गया घर चल”, अपने एक दोस्त से ये कहते हूए बडे आराम से अपना बल्ला घुमाते हूए वो वहां से जाने लगा.” गेंद रख रखते हो तुम यार”, मेरी ओर देख कर उसने कहा. मुझे खुली चुनौती दी उसने! उसकी इतनी मजाल कि मेरे घर का सामन तोड़ कर मुझे कि ताना माके चला जाए. मैने तय कर लिया कि आज या तो आर नहीं तो पार. इसी इरादे के साथ मैं नीचे जाने के लिए मुडा कि तभी फोन कि घंटी बजी. घर में अकेले होने कि वजह से मुझे ना चाहते हूए फोन उठाने के लिए जाना पडा. हो सकता है कोई important कॉल हो. वैसे भी मेरे बीमार दादाजी जिनका ऑपरेशन AIIMS में चल रहा था,उनका फोन आने वाला था. सो अपने JOSH वाले शाह रुक खान को थोडे देर के लिए रेस्ट देते हूए मैं फोन उठाने के लिए बढा.


“हेलो”, मैंने फोन का रिसीवर उठाते हूए कहा.



“हेलो”, उधर से आवाज़ आई.



‘कौन बोल रहा है?” , मैंने पुछा.



“मोहनदास करमचंद गांधी बोल रहा हूँ बेटा”



” क्या? देखो भाई मेरा दिमाग वैसे ही गरम है. तुम और दिमाग का दही नहीं करो.”, मैंने जुन्झलाकर कहा.



“बेटा अगर मुझ पर चिल्ला कर या मुझे किसी तरह का नुक्सान पहुचा कर अगर तुम्हारा गुस्सा शांत हो सकता है तो उस लड़के कि भडास तुम मुझ पर निकाल सकते हो.”, उस आवाज़ ने कहा.



मैं एक पल के लिए चौंका. इन्हे कैसे पता चल उसके बारे में. आखिर कौन है ये इंसान?


” अरे मेरे बाप सच सच बता तू है कौन?”, मैंने कहा.



“बाप नहीं बेटा बापू बोलो. बोला ना कि मैं मोहनदास करमचंद गांधी बोल रहा हूँ.”



” ये क्या मज़ाक है? वैसे ही मैं बहुत परेशान हूँ. अब आप मेरे साथ ये मज़ाक नहीं करिए.”,मैने विनम्रतापूर्वक कहा.


बापू- ” उस लड़के के दुरवेहवार को लेकर परेशान हो ना?”



मैं- ” हाँ, उस २ टके के लड़के को लेकर थोडा परेशान हूँ.”



बापू-” २ टके का नहीं बल्कि अनमोल लड़का कहो बेटा”



मैं- “अनमोल? आप जानते भी हैं उसे? कितना बत्तमीज़ और घटिया लड़का है वो. और आप उसे अनमोल कह रहे हैं?”



बापू- ” वो लड़का तुम्हारे लिए कुछ तो मायने रखता है तभी तो तुम उसकी बातों को दिल से लगा लेते हो. तुम उसे कुछ तो एहमियत देते ही हो तभी तो तुम अपना कीमती समय उस लड़के के बारे में सोचने में लगा रहे हो. अब वो तुम्हारे ज़िन्दगी में एक important है तभी तो तुम उसकी बात से प्रभावित हो जाते हो.”



मैं निरुत्तर हो गया. आखिर बापू बात भी तो सही ही कर रहे हैं. क्यूँ मैं उसे इतनी importance दे रहा हूँ कि वो मेरे मेंटल पिस को डिस्टर्ब कर सक रहा है. After all no can make one feel interior or angry, without one’s consent.


मैं- ” बापू, बात तो आप ठीक कर रहे हैं पर आप ही बताइये कब तक मैं उसे बर्दाश्त करूँ? वो जो बिना बार के मुझ से लगता रहता है क्या वो सही है?”



बापू- जो वो कर रहा है वो उसकी संस्कृति है. उसके संस्कारों का प्रदर्शन है. तुम्हारा उसकी हरकतों पर कोई नियंत्रण नहीं.”



मैं- ” तो आप ही बताएं बापू कि मैं क्या करू?”



बापू- ‘ कुछ नहीं.”
मैं- “क्या? कुछ नहीं का क्या मतलब है?”



बापू-” तुम कुछ नहीं करके भी बहुत कुछ कर सकते हो. बस नज़रंदाज़ करते raho उसे. वो जो कुछ भी kahay, तुम पलट कर कोई प्रतिक्रिया नहीं करो.”



मैं- ” क्या? चुप चाप उसकी गालियाँ सुनता रहू? रिएक्ट ना करू? ये तो कायरता होगी.”



बापू-” बहादुरी उसे बलात कर जवाब देने में नहीं बल्कि अपने आप पर और अपने गुस्से पर काबू रखने में है. भले ही कोई हमसे कितना ही खराब वयवहार करे, अगर हम उससे अच्छा वयवहार करेंगे तो इससे उसके मन में हमारे प्रति कटुता कम होगी और उसमें हमारे लिए धीरे धीरे सम्मान कि भावना जागेगी.”



मैं- ” बापू क्या आपको लगता है कि that will work?”.



बापू-” bilkul. तुम kosish कर के तो देखो.”.



मैं- ” तो मैं suruaat कहाँ से करू?”.



बापू- सबसे पहले तो उसकी गेंद उसे लौटा दो.”.



मैं- ” क्या? ये क्या कह रहे हैं आप बापू? उसने मेरे घर का कांच तोडा और आप के रहे हैं कि मैं उसे गेंद लौटा दूँ? गेंद रख लेने से कम से कम कुछ दिनों कि शान्ति तो मिलेगी.”.



बापू- ” अगर जैसा मैंने कहा अगर तुम वैसे करते हो तो इससे उसके मन में तुम्हारे प्रति कटुता घटेगी. वो भी यही सोच रहा होगा कि वो गेंद उससे कभी वापस नहीं मिलेगी. तुम्हारा उसे गेंद लौटाना उसने जरूर थोडा ही सही पर एक सकरात्मक परिवर्तन जरूर लाएगा.”.



मैं- ” are u sure baapu?”.



बापू- ” जो रास्ते मैंने तुम्हे सुझाए हैं उसपर चल कर तो देखो. परिणाम खुद ब खुद तुम्हारे सामने आ जायेंगे. ये सिर्फ उस लड़के के मामले के लिए मैं नहीं कह रहा हूँ. मेरी ये बातें तुम हर जगह लागू कर के देखना. जैसा मैंने कहा है वैसा ही होगा. सिर्फ मुझे याद भर कर लेना या फिर मेरी तस्वीर या स्मारक पर फूल-माला चढाना ही मेरे प्रति सम्मान दिखाना नहीं है. अगर तुम मेरी शिक्षाओँ को अपने ज़िन्दगी में अपनाते हो तो वही मेरे लिए सच्ची श्रधांजलि होगी.”


मैं– ” जी बापू. मैं पूरी कोशिश करूंगा.”



बापू–”अच्छा अब फोन रखता हूँ. किसी और को अभी मेरी जरूरत है.”



मैं–” बापू….. बापू…….. अगर आपसे फिर से बात करनी हो या आपकी किसी तरह कि मदद चाहिए हो तो आपसे किस तरह contact हो सकेगा?”.



बापू- ” तुम्हे जब भी मेरी जरूरत होगी, मैं किसी ना किसी रूप में तुम्हारे पास आ जाऊँगा.”



मैं– ” ठीक है बापू. thank u very much. वैसे जनम दिन कि बधाइयाँ. शास्त्री जी को भी मेरा नमस्कार बोलना.उन्हें भी जन्मदिन कि बधाई.”

Posted in Philosophy.



One Response

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  1. Swati says

    very well written…..u hv created a nice scene….god bless…..bye.