(सर्वाधिकार सुरक्षित)
ग्राम: बागी-नौसा, चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल
E-mail: j_jayara@ yahoo.com
७.१२.२००९
Broadcasting my thoughts
Posted in Poetry.
– December 7, 2009
“उम्र”
चेहरा बताता है हमारी,
जो जीवनकाल होता है,
जीता हैं इंसान अपनी,
हँसता और रोता है.
जब तक जियेगें,
मुड़कर देखेंगे,
अपनी गुजरी जिंदगी,
जहाँ मिला हमें,
माता-पिता और अपनों का प्यार,
प्रकृति का भी,
प्राप्त किये उसके उपहार.
उम्र लम्बी हो,
सभी यही कामना करते हैं,
बढती रहती है जीने की तमन्ना,
जब तक शरीर साथ न छोड़े.
उम्र दीर्घ हो मित्रों,
लेकिन!
देवभूमि उत्तराखंड को मत भूलना उम्र भर,
ये अनुभूति है “ज़िग्यांसू” की.
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयारा “ज़िग्यांसू”
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
ग्राम: बागी-नौसा, चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल
E-mail: j_jayara@ yahoo.com
२२.११.२००९
Posted in Poetry.
– December 4, 2009
“आपकी दुआओं ने”
नहीं होने दिया आपसे दूर,
भले ही वक्ष में उठी वेदना ने,
बेदर्द होकर अपना वार किया,
याद आई, देवभूमि के देवताओं की,
वेदना से त्रस्त होते हुए भी,
बार-बार उनका नाम लिया,
जो जी रहा हूँ आज,
बद्रीविशाल जी ने मुझे,
जीवनदान दिया.
लौटा ही था मैं पहाड़ से,
लाया था कुछ छायाचित्र,
लिखी थी एक कविता आपके लिए,
“पहाड़ पूछ रहे थे”
शायद पढ़ी होगी आपने.
मैं तो यही कहूँगा मित्रों,
मुझे बचाया,
“आपकी दुआओं ने” भी.
जगमोहन सिंह जयारा “ज़िग्यांसू”
ग्राम: बागी-नौसा, चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल
E-mail: j_jayara@ yahoo.com
१२.१०.२००९ को मेरे दिल में दर्द(हृदयघात) हुआ. वेदना के उन छणों में मित्रों मुझे आप लोगों की बहुत याद आई. आज मैं ठीक होकर आपके बीच लौट आया हूँ. भीष्म कुकरेती जी
और पराशर गौड़ जी ने दूरभास पर मेरा हाल पूछा, शुभकामनाएं दी…कैसे भूल सकता हूँ.
Posted in Poetry.
– December 3, 2009
Posted in Poetry.
– September 17, 2009
Posted in Poetry.
– September 17, 2009
Posted in Poetry.
– September 17, 2009
“बरखा तूने”
पर्वतवासियौं, शहरवासियौं,
ग्रामवासियौं, कृषकों को,
पहले बिन बरसे,
खूब तरसाया,
उड़ गई नींद,
सत्तासीन सरकार की,
खूब छकाया,
क्या अहमियत है मेरी?
यह भी बताया,
और अब इंतज़ार के बाद,
प्यासी धरती को,
प्यासे पर्वतों को,
सभी को, खूब हर्षाया,
बूँद-बूँद बचाओ मेरी,
सबक लेकर सभी,
अपना सन्देश बताया.
लेकिन!
अपने शहर दिल्ली में,
“जिज्ञासु” और मित्रों को,
बरस कर भी सताया,
बरखा तूने.
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू”
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास: संगम विहार, नई दिल्ली
11.9.२००९, दूरभास:9868795187
E-Mail: j_jayara@yahoo.com
Posted in Poetry.
– September 14, 2009
“गैरसैण..गैरसैण”
बैरा नि छौं सुण्यालि,
दीक्षित साबन देखा,
कनु बुरु करयालि,
आँख्यौं मा.. ऊंका भी,
लोण मर्च धोळ्यालि,
गैरसैण कतै ना,
यनु भी देखा..बोल्यालि.
चर्चा होंणि धार खाळ,
मन मा औणा छन ऊमाळ,
उत्तराखंड की राजधानी,
गैरसैण..गैरसैण…
छबीला गढ़वाल अर्,
रंगीला कुमाऊँ मा,
यनु बोन्ना छन लोग,
उत्तराखंड की राजधानी,
गैरसैण..गैरसैण…
Copyright@Jagmohan Singh Jayara”Zigyansu”……4.9.09
E-Mail: j_jayara@yahoo.com, (M)9868795187
Posted in Poetry.
– September 4, 2009