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 ”पर्वतीय महिलाएं”
 
आज भी दम तोड़ती हैं,
घास काटते हुए’
जब फिसल जाता है पैर,
पहाड़ी ढलान पर,
और गिर जाती हैं,
गहरी खाई में.
 
 जंगलों में, 
जंगली जानवरों के हमले से,
विषैले सांपों के काटने से,
पेड़ों की टहनी काटते हुए,
पेड़ से गिरने से,
कहीं पेड़ों को छूते,
बिजली के तारों द्वारा,
करंट लगने के कारण,
हो जाती है अकाल मृत्यु,
पर्वतीय महिलाओं की.
 
प्रसव पीड़ा में,
घायल अवस्था में,
अस्वस्थ होने पर,
उत्तराखंड सरकार की,
१०८ एम्बुलेंस सेवा,
राहत प्रदान करती है,
जो एक सार्थक प्रयास है,
पर्वतीय महिलाओं  और,
सभी  के लिए.
 
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयारा “ज़िग्यांसू”
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
ग्राम: बागी-नौसा, चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल
E-mail: j_jayara@ yahoo.com
७.१२.२००९

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“उम्र”

चेहरा बताता है हमारी,
जो जीवनकाल होता है,
जीता हैं इंसान अपनी,
हँसता और रोता है.

जब तक जियेगें,
मुड़कर देखेंगे,
अपनी गुजरी जिंदगी,
जहाँ मिला हमें,
माता-पिता और अपनों का प्यार,
प्रकृति का भी,
प्राप्त किये उसके उपहार.

उम्र लम्बी हो,
सभी यही कामना करते हैं,
बढती रहती है जीने की तमन्ना,
जब तक शरीर साथ न छोड़े.

उम्र दीर्घ हो मित्रों,
लेकिन!
देवभूमि उत्तराखंड को मत भूलना उम्र भर,
ये अनुभूति है “ज़िग्यांसू” की.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयारा “ज़िग्यांसू”
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
ग्राम: बागी-नौसा, चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल
E-mail: j_jayara@ yahoo.com
२२.११.२००९


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“आपकी दुआओं ने”

नहीं होने दिया आपसे दूर,
भले ही वक्ष में उठी वेदना ने,
बेदर्द होकर अपना वार किया,
याद आई, देवभूमि के देवताओं की,
वेदना से त्रस्त होते हुए भी,
बार-बार उनका नाम लिया,
जो जी रहा हूँ आज,
बद्रीविशाल जी ने मुझे,
जीवनदान दिया.

लौटा ही था मैं पहाड़ से,
लाया था कुछ छायाचित्र,
लिखी थी एक कविता आपके लिए,
“पहाड़ पूछ रहे थे”
शायद पढ़ी होगी आपने.

मैं तो यही कहूँगा मित्रों,
मुझे बचाया,
“आपकी दुआओं ने” भी.


जगमोहन सिंह जयारा “ज़िग्यांसू”
ग्राम: बागी-नौसा, चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल
E-mail: j_jayara@ yahoo.com

१२.१०.२००९ को मेरे दिल में दर्द(हृदयघात)  हुआ. वेदना के उन छणों  में  मित्रों मुझे आप लोगों की बहुत याद आई.  आज मैं ठीक होकर आपके बीच लौट आया हूँ. भीष्म कुकरेती जी
 और पराशर गौड़ जी ने  दूरभास पर मेरा  हाल पूछा,  शुभकामनाएं दी…कैसे भूल सकता हूँ.

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“होलु क्वी दगड़्या”

धार ऐंच बैठ्युं, दगड़्यौं का दगड़ा,
स्कुल्या दिनु की, बात बतौणु,
क्वांसु होयुं होलु, मन भी वैकु,
बचपन याद, करि करिक,
होलु अफुमा खोणु.

औणि होलि, याद वैकु मेरी,
गौं कू बाटु, हेरी हेरी,
हे दगड़्या तू, कख होलि लठ्याळा,
याद औणि छ तेरी.

ऐजा लठ्याळा, हमारा गौं मा,
काखड़्यौं की लबद्यारि,
मुंगरी पकिग्यन, छकि छक्कि खौला,
भैन्सि ब्ययीं छ हमारी.

दूर परदेश, बिराणा मुल्क,
या छ होईं लाचारी,
बौळ्या बणिक, दिन भर भागा,
या छ जिंदगी हमारी.

बग्त बदली, मन भी बदली,
ऊ दिन याद मा ख्वैगि,
मै जना दगड़्या, कुजाणि कख होला,
ऊंकू मन भी, क्वांसु हवैगि.

Copyright@Jagmohan Singh Jayara”Zigyansu”……1.9.09
E-Mail: j_jayara@yahoo.com, (M)9868795187

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“गितांग का गीतुन”

गितांग दिदा का गीतु सुणिक,
लगि मैकु कुत्ग्याळि,
याद आई मैकु, मेरा मुल्क की,
जाण छ मैं सोच्यालि…….

बिराणा मुल्क, सदानी रन्दिन,
सब्बि धाणी की स्याणी,
बांज बुरांश की, डाळी नि छन,
छोया ढ़ुंग्यौं की पाणी……

घौर बिटि चिठ्ठी, अयिं छ ब्वै की,
कैन हौळ लगाण,
ऐजा बेटा तू, घौर बोड़िक,
मेरु खुदयुं छ पराण…….

ब्यो करि त्वैकु, ब्वारि भि ल्हयौं,
भागिगी बौग मारिक
अब सोचणु छौं, क्या पाई मैन,
त्वै नौना पाळिक……

गितांग दिदा का, गीतु मा छन,
बानी बानी की गाणी,
कुत्ग्याळि सी, लगणी छ मन मा,
आज कू सच बताणी….

गितांग दिदा का गीतु सुणिक,
लगि मैकु कुत्ग्याळि,
मन मा ऊमाळ, ऐगि मेरा,
जाण छ मैन सोच्यालि….


Copyright@Jagmohan Singh Jayara”Zigyansu”……6.9.09
E-Mail: j_jayara@yahoo.com, (M)9868795187

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“ज्वानि का बाद”

औजि ब्वडा कू ढोल बजि,
तब पैटि थै बारात,
लगि लंगट्यार, पौणौं की,
ज्वानि की छ या बात….

बामण दादान मंत्र पढिन,
तब ह्वै थान फेरा,
ब्योलि कू थौ, मुक्क ढ़कैयुं,
खुशि थै मन मा मेरा…..

दगड़्यौन खाई दारू माशु,
ब्यो का दिन की बात,
ब्योलिन लिनि बचन मैसि,
निभौणु होलु साथ……

जिंदगी की, गाड़ी अग्वाड़ि,
ज्वानि कू जोश,
कुजाणि कब, बितिगी सारी,
अब औणि छ होश….

बितिगी अब, सुणा हे दगड़्यौं,
अब छ गधा चाल,
भारी छ बितणी,
“जिज्ञासू” कू कवि मन,
पौंछ्युं छ, वे छबीला गढ़वाल….


(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू”
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास: संगम विहार, नई दिल्ली
13.9.२००९, दूरभास:9868795187
E-Mail: j_jayara@yahoo.com

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“बरखा तूने”

पर्वतवासियौं, शहरवासियौं,
ग्रामवासियौं, कृषकों को,
पहले बिन बरसे,
खूब तरसाया,
उड़ गई नींद,
सत्तासीन सरकार की,
खूब छकाया,
क्या अहमियत है मेरी?
यह भी बताया,

और अब इंतज़ार के बाद,
प्यासी धरती को,
प्यासे पर्वतों को,
सभी को, खूब हर्षाया,
बूँद-बूँद बचाओ मेरी,
सबक लेकर सभी,
अपना सन्देश बताया.

लेकिन!
अपने शहर दिल्ली में,
“जिज्ञासु” और मित्रों को,
बरस कर भी सताया,
बरखा तूने.

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू”
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास: संगम विहार, नई दिल्ली
11.9.२००९, दूरभास:9868795187
E-Mail:
j_jayara@yahoo.com  
 

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“गैरसैण..गैरसैण”
   
बैरा नि छौं सुण्यालि,
दीक्षित साबन देखा,
कनु बुरु करयालि,
आँख्यौं मा.. ऊंका भी,
लोण मर्च धोळ्यालि,
गैरसैण कतै ना,
यनु भी देखा..बोल्यालि.

चर्चा होंणि धार खाळ,
मन मा औणा छन ऊमाळ,
उत्तराखंड की राजधानी,
गैरसैण..गैरसैण…
छबीला गढ़वाल अर्,
रंगीला कुमाऊँ मा,
यनु बोन्ना छन लोग,
उत्तराखंड की राजधानी,
गैरसैण..गैरसैण…

Copyright@Jagmohan Singh Jayara”Zigyansu”……4.9.09
E-Mail:
j_jayara@yahoo.com, (M)9868795187

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