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By Jagmohan Zigyansu
– September 3, 2009
“आपकी याद”
हमें तो आपकी याद,
कुछ यूँ आई,
तड़फन पैदा हुई,
और तन्हाई.
यूँ न समझना,
हमें आज भी आपसे,
लेकिन,जुदा हो गई राहें,
वो बात आज कहाँ,
वो गीत कहाँ से गाएँ.
आज बदल गए होंगे,
आ़प भी, समय के साथ,
बदल गया हूँ मैं भी,
बदल गए जज्बात.
आदत एक है बुरी,
यादें, मन में उभर आती हैं,
और कहती हैं,
तू क्योँ भूल गया उनको?
उन्हें तो “आपकी याद”,
आज भी आती है.
Copyright@Jagmohan Singh Jayara”Zigyansu”……3.9.09
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By Jagmohan Zigyansu
– September 3, 2009
“अंग्रेजी का आकर्षण”
एक पुत्र पिता के पास,
भागता हुआ आया,
झट से अपना अंक पत्र,
उनके हाथ में थमाया.
पिता ने अंक पत्र देखा,
तुंरत पुत्र को बताया,
दुःख की बात है बेटा,
सबसे ज्यादा अंक हिंदी में लाया.
पुत्र पिता से से बोला,
इसमें दुःख की क्या बात है,
हमारा देश आज़ाद करने में,
हिंदी का बड़ा हाथ है.
रहा होगा, आज नहीं,
अब तो अंग्रेजी का बोलबाला है,
नेता, अफसर, प्रधानमंत्री,
कोई भी हिंदी में बोलने वाला है.
पुत्र बोला, पापा भूल गए,
बाजपेई जी तो हिंदी में बोलते थे,
बोलते हुए एक एक शब्द को,
पहले ह्रदय में तोलते थे.
बोलते होंगे, लेकिन तू अंग्रेजी में,
हिंदी से कम अंक है लाया,
लगवा देता अंग्रेजी का ट्यूशन,
तूने मुझे नहीं बताया.
देख बेटा, अंग्रेजी के अच्छे ज्ञान के बिना,
तू एक सम्मानित व्यक्ति नहीं बन पायेगा,
मान ले मेरी बात, नहीं तो २१वीं सदी में,
तू सबसे पीछे रह जायेगा.
Copyright@Jagmohan Singh Jayara”Zigyansu”……25.8.09
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By Jagmohan Zigyansu
– August 28, 2009
”चोटी पर चढ़कर”
पहाड़ की चोटी पर चढ़कर,
मन में एक ख्याल आया,
क्योँ न छू लूँ आकाश को,
हाथ को ऊपर उठाया.
आकाश की अनंत ऊँचाई,
लेकिन मन की है चाहत,
छू न सका तो क्या हुआ,
चंचल मन नहीं हुआ आहत.
पहाड़ी का मन पहाड़ पर,
प्रफुल्ल हो सर्वदा मंडराए,
क्या अनुभूति होती पहाड़ पर,
यथार्थ पर्वतवासी ही बताए.
पहाड़ प्रकृति को समेटे,
जब बहुरंगी रूप दिखाए,
देखता जब कोई दर्शक,
मोहित हो सब कुछ भूल जाए.
पहाड़ की चोटी पर चढ़कर,
तभी तो मन में ख्याल आया,
कवि “जिज्ञासु” की ये अनूभूति,
आपको विस्तार से बताया.
Copyright@Jagmohan Singh Jayara”Zigyansu”……28.8.09
E-Mail: j_jayara@yahoo.com, (M)9868795187
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By Jagmohan Zigyansu
– August 28, 2009
“बेटा मंग्तु अब मैं एक सुख्याँ डाळा का सामान छौं. मैं आज छौं भोळ कू क्वी पता निछ. अब घौर कू सारू बोझ त्वै फर ही छ.” पिता दयाल सिंह ने मंग्तु को घर से जाते वक्त समझाया. आज मंग्तु रोजगार की तलाश में देहरादून जा रहा था. गाँव से एक घंटे की दूरी पैदल तय करके उसने जामणीखाल से आठ बजे की बस ऋषिकेश के लिए पकड़ी. मंग्तु बस में खिड़की वाली सीट पर बैठकर बस से पीछे की ओर सरकते गौं, पुंगड़े और पहाडों को एक टक्क निहार रहा था. उसे लग रहा था जैसे पहाड़ पर पेड़ आज उसको बस में बैठा देखने को उतावले हो रहे हों. गाड़ी देवप्रयाग की ओर उतरती घुंग्याट और प्वां-प्वां करती सरपट भागी जा रही थी. मंग्तु के मन में घर से दूर घर परिवार से दूर जाने की उदासी साफ़ झलक रही थी.
मंग्तु कल्पना में डूबा अपनी सीट पर अलसाया हुआ बैठा था. गाड़ी जब देवप्रयाग पहुंची तो ड्राईवर ने गाड़ी रोकी. मंग्तु अलकनन्दा, भागीरथी का संगम और रघुनाथ मंदिर निहारने लगा. वेग से बहती भागीरथी और अलकनन्दा की खामोशी, देवप्रयाग का विहंगम दृश्य सब कुछ देखकर मंग्तु का मन जस का तस था. जबकि इस प्रथम प्रयाग की खूबसूरती देखने यात्री दूर देश प्रदेशों से आते हैं.
गाड़ी फिर घुंग्याट और प्वां-प्वां करती ऋषिकेश की तरफ चढाई चढ़ने लगी. बस में बैठि सवारी झपकी लिए अंदाज में मोड़ों पर इधर उधर हिल रही थी. कंडक्टर ने अपना हिसाब किताब लगाया और ड्राईवर के पास जाकर बीड़ी सुलगाकर ड्राईवर को भी देकर पीनें लगा. मंग्तु उनकी जलती बीड़ी के धुँए की ओर एक टक्क देख रहा था. अचानक! उसकी नजर बस पर लिखे वाक्य “अपना घर अगर सुन्दर होता तो क्यों दर दर फिरती” पर पड़ी. वो सोचना लगा, अगर रोजगार अपने घर की तरफ मिल जाता तो आज क्यों दर दर भटकने के लिए घर से दूर जाता.
“अपना घर अगर सुन्दर होता तो क्यों दर दर फिरती” भागती बस के परिपेक्ष में लिखा था. बस अगर खड़े खड़े आय कर ले तो उसे सम्पूर्ण उत्तराखंड में बेबस हो क्यों भागना पड़ता. यही मंग्तु भी सोच रहा था. ड्राईवर ने गाड़ी रोकी, स्टेशन था तीन धारा. तीन धारा कुछ वर्षों से प्रसिद्ध हुआ है. पहले आती जाती सभी गाडियां व्यासी ही रूकती थी. व्यासी के छोले प्रसिद्ध थे, जो व्यासी रुके वो व्यासी के छोले न खाए कैसे हो सकता है. तीन धारा जैसे की नाम से पता चलता है वहां पर “छोया ढुंग्यौं का पाणी है”. खाना खा लो….खाना खा लो…. गाड़ी बीस मिनट बाद जायेगी. मंग्तु ने तीन धारे का पानी पिया और होटल में चाय के साथ “ब्वै का हाथ की” तेल भीगी रोटी खाई.
ड्राईवर ने बस का हार्न बजाया, सभी यात्री बस में बैठ गए और गाड़ी फिर अपनी मस्तानी चाल में साकनीधार की तरफ घुंग्याट और प्वां-प्वां करती, काला धुआं उगलती अपनी मंजिल ऋषिकेश की ओर चलने लगी. कहीं घुगुती बासती, कोई पक्षी हे कीडू़ बोलता और तोता घाटी में पेडों पर बैठे फुदकते बड़े बड़े लंगूर, बांदर, दूर से दिखती लकीरनुमा गँगा, ये सब कुछ दिख रहा था बस से चलचित्र की तरह. मंग्तु मन में खोया अपनी मंजिल की तरफ बढ़ता जा रहा था.
बस ऋषिकेश पंहुची मंग्तु ने अपना झोला उठाया और देहरादून की बस में बैठ गया. अब बस से बड़े पहाड़ उत्तर दिशा की तरफ ही नजर आ रहे थे. दून घाटी की तरफ जाती बस से कहीं घने जंगल, टेहरी डाम से खींची विशालकाय ट्रांस्मिसन लाइन, पहाड़ जैसे लोग भी नजर आ रहे थे. लगभग दो बजे मंग्तु देहरादून रिस्पना पुल पर बस से उतर कर धरमपुर अपने गाँव के महिपाल के पास पहुंचा.
सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिग्यांसू”
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
5.6.2009
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By Jagmohan Zigyansu
– August 26, 2009
देवभूमि उत्तराखंड के एक गाँव में शेर सिंह और उसकी पत्नी बैशाखी हमेशा एक चिंता में खोये रहते थे. शादी हए बहुत साल हो गए पर औलाद की प्राप्ति नहीं हुई. शेर सिंह की माँ धार्मिक विचारों की थी. बेटे की कोई संतान अब तक न होने के कारण बहुत उदास और दुखी रहती थी. कामना करती “हे कुल देवतों दैणा होवा, आज तक मैकु नाती नतणौं कू मुख देखणौ नसीब नि ह्वै सकि”. उसके साथ की गाँव की महिलाएं “नाती नतणौं” का सुख देख रही थी.
समय बीतता गया, एक दिन शेर की माँ चैता को चन्द्रबदनी मंदिर जाने का मौका मिला. घर से नहा धोकर उसने भगवती माँ चन्द्रबदनी के लिए अग्याल रखी. गाँव की बहुत सी महिलाएं बच्चे और पुरूष माँ चन्द्रबदनी के दर्शनों के लिए जा रहे थे. चैता अपनी लाठी के सहारे ऊकाळ का रास्ता चढ़ने लगी. उसकी आँखों में आज एक चमक थी. मन में सोच रही थी आज मैं भगवती से अपने शेर सिंह के लिए संतान की कामना करूंगी.
चैता जब चन्द्रबदनी परिसर में जब पहुँची तो उसने दोनों हाथ जोड़कर दूर से भगवती को मन ही मन याद किया. अष्टमी होने के कारण मंदिर में बहुत भीड़ थी. चैता किसी तरह आगे बढ़ रही थी. मंदिर के अन्दर पंहुंच कर चैता ने भेंट अर्पित की और माँ से मन्नत मांगी. दर्शन करने के बाद सथियौं के साथ चैता घर के लिए वापस लौटी. चारौं और उसने नजर दौडाई और कहने लगी “आज ऐग्यौं माँ मैं, अब कुजाणि अयेन्दु छ की ना”.
बहुत दिन गुजर जाने के बाद चैता को वह ख़ुशी जो वह चाहती थी सुनने को मिली. वह अपनी ब्वारी का खूब ख्याल रखने लगी. बेटा शेर सिंह भी बहुत खुश था. अपनी माँ के चेहरे पर रौनक देखकर वह मन ही मन खुश रहने लगा. चैता ने एक दिन शेर सिंह से कहा, बेटा तू एक मीटर पीला कपड़ा ले आना. शेर सिंह कैसे मन कर सकता था. उसने अपनी माँ से कहा मैं आज ही ला देता हूँ. शेर सिंह जब दुकान से एक मीटर पीला कपड़ा लाया तो चैता ने सुई धागे से एक झगुली सिलना शुरू किया. मन में सोचने लगी अगर बहु का लड़का हुआ तो उसका नाम “झगुल्या” रखूँगी.
चैता ने झगुली सिलकर अपने लकडी के संदूक में रखी थी. दिन माह गुजरते वह समय आ गया जिसकी चैता को इंतजारी थी. बहु बैसाखी ने पेट दर्द बताया तो चैता की आँखों में चमक और चिंता के भाव आने लगे. गाँव की दाई रणजोरी को तुंरत बुलाया गया. रणजोरी कहने लगी “दीदी चैता तू चिंता न कर, ब्वारी कू ज्यूजान ठीक तरौं सी छूटी जालु”. शेर सिंह तिबारी में बैठा अपना हुक्का गुड़ गुडा रहा था. उसे इंतज़ार थी कब पत्नी का प्रसव हो जाए. वह इन्तजार में ही था, बच्चे के रोने की आवाज आने लगी. रणजोरी ने चैता को बधाई दी और कहा “दीदी तेरी इच्छा पूरी करियाली माँ चन्द्रबदनी न…नाती छ तेरु होयुं” . चैता मन ही मन माँ चन्द्रबदनी का सुमिरन करने लगी और कहने लगी “माँ सुण्यालि त्वैन मेरी पुकार”. चैता के मन में बिजली सी दौड़ गई और अपना बुढापा भूलकर प्रफुल्लित होकर इधर उधर जाने लगी.
पंचोला का दिन जब आया तो चैता ने नाती को झगुलि पहनाई और कहा “येकु नौं मैं “झगुल्या” रखणु छौ”. हे भगवती राजि खुशि राखि मेरा नाती तैं”. चैता की दिन रात खुश रहने लगी. गौं का लोग रौ रिश्तेदार सब्बि चैता तैं बधाई देण का खातिर ऐन. जब “झगुल्या” साल भर हो गया तो चैता ने शेर सिंह को चन्द्रबदनी का पाठ और बड़ा सा चाँदी का छत्र चढाने के लिए कहा. शेर सिंह माँ की की इच्छा के अनुसार चाँदी का छत्र लाया और पाठ करवाकर चन्द्रबदनी माँ के मंदिर यात्रा ले गया. सारे गाँव को उसने दावत दी और औजि को बुलाकर मंडाण लगवाया.
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिग्यांसू”
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
10.7.2009
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By Jagmohan Zigyansu
– August 26, 2009
“गथ्वाणि”
बात उन दिनों की है जब चन्दु की दादी जीवित थी. पहाड़ में कड़ाके की ठण्ड थी और ऊंची ऊंची पहाड़ियौं पर भारी बर्फ़बारी हो रही थी. चन्दु के सारे परिजन ठण्ड के मारे चूल्हे को घेर कर आग सेक रहे थे. पॉँच दिन से लगातार बरखा होने के कारण बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया था. बार्गुर और चन्द्रबदनी का डांडा सफ़ेद बर्फ की चादर ओढ़ चुका था. पौड़ी गढ़वाल का सामने दिखता दृश्य मनभावन लग रहा था. खिर्सू से लेकर खाण्ड्यौंसैण और सितौन स्यूं तक खूब बर्फ पड़ी हुई थी.
ठण्ड में तो बहुत भूख लगती है. चन्दु के पेट में भूख के कारण चूहे कूद रहे थे. चन्दु अपनी दादी जी से बोला “दादी…दादी…आज गौथ ऊस्याकर “गथ्वाणि” तो बना दे.” चन्दु की बात सुनकर दादी झट्ट से बोली “ये छ्वारा का पेट फर त आग लगिगि, हाथ ध्वैक फटाफट बोंनु छ, भूख लगिगि”. चन्दु दादी की बात सुनकर दादी जी से बोला “दादी.. मैन क्या कन्न..कुजाणि क्योकु मेरि पोट्गी फर भूख की बणांग लगणी छ”. दादी जी के मन में कुछ दया का भाव उभरा और बोली ” चन्दु मेरा नाती…तू फिकर न कर…ठैर धरदु छौं फूल्टि भरि गौथ चुल्ला फर “गथ्वाणि” का खातिर.” चन्दु खुश होकर अपनी दादी से लिपट गया.
चन्दु की दादी जी ने फूल्टि में गौथ रखकर चूल्हे में चढा दिए. चन्दु चूल्हे में मोटी मोटी लकड़ी लगाता हुआ फूल्टि में रखे गौथ के थिड़कने की इन्तजार कर रहा था. कभी वो चूल्हे की तरफ देखता और कभी फूल्टि की तरफ. फूल्टि के ऊपर रखा ढक्कन खन-खन ऊपर नीचे होने लगा और भाप भी निकलने लगी. चन्दु की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. दौड़कर अपनी दादी जी के पास गया और कहने लगा “दादी…दादी…थिड़कण लगि फूल्टि”. दादी जल्दी से बोली “अरे छोरा…फूल्टि न…गौथ बोल”.
चन्दु इंतज़ार करते करते थक गया. उसने चुपके से से फूल्टि का ढक्कन खोला, फूल्टि चूल्हे से गिरते गिरते बची. कर्छुले से थोड़ा सा गौथ निकालकर उसने चखे. अभी भी गौथ पूरी तरह से पके नहीं थे. गौथ जितने देर तक थिड़कें तो “गथ्वाणि” का स्वाद उतना ही अच्छा होता है. “गथ्वाणि” पीने से तो पथरी ठीक हो जाती है. जिसे पथरी की शिकायत हो तो उसके लिए “गथ्वाणि” अचूक औषधि का काम करती है.
शाम हुई तो चन्दु की दादी जी ने “गथ्वाणि” बनाया. कुछ गौथ बचाकर उनकी भरीं रोठी बनाई. चन्दु अपनी दादी जी से बोला “दादी…दादी…थोड़ा कन्क्रयाळु घ्यू त दी भरीं रोठी का दगड़ा.” दादी बोली “अरे! ये छोरा की बात क्य बोन्न, कनि स्याणि छन ये तैं लगणी.” चन्दु की दादी ने घरया घ्यू की ठिक्की गाड़ी अर् बोलि “खा मेरा चन्दु छक्किक “गथ्वाणि” अर् कन्क्रयाळु घ्यू”.
चन्दु की दादी आज जीवित नहीं हैं. उसको दादी जी का वो जमाना रह रहकर याद आता है. पहाड़ से दूर परदेश में कहाँ मिलता है पहाड़ का खाना. पहाड़ कू कन्क्रयाळु घ्यू अर् “गथ्वाणि” अब कल्पना मा ही रैगि. चन्दु आज ज़माने के साथ बदल गया. अगर साथ हैं तो बचपन के यादें “गथ्वाणि” के रूप में.
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू”
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
12.8.2009
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By Jagmohan Zigyansu
– August 26, 2009
“पहाड़ पर”
ऊंची धार में,
बैठ अकेला, बजा रहा था बांसुरी,
एक पहाड़ी मन में खोया,
बेडु पाको बारमासा…..
कैल बाजी मुरुलि हो बैणा,
ऊंचि-ऊंचि डांड्यौं माँ…..
प्यारी धुनों को.
कहीं दूर बैठि एक महिला को,
लगि मन में खुद मायका की,
करने लगि कामना,
मेरा मैत की भगवती,
तू दैणा ह्वै जाई……
ब्वै मेरी सोचणि होलि,
नौनि किलै नि आई?
दूर बैठे एक वृद्ध ने,
जब सुनी बांसुरी की धुन,
उसे याद आने लगि,
अपनी जवानी के दिनों की,
और सोचने लगा,
हर्चिगी व ज्वानि मेरी,
याद औणि आज,
फुंड फूका क्या बतौण,
भला नि मिजाज.
एक पहाड़ी नौजवान ने,
जब सुनी बांसुरी की धुन,
वो बहुत खुश हुआ,
कू भग्यान होलू डांड्यौं मा,
यनि भली बांसुरी बजाणु,
कख होलि मेरी वा,
आंख्यौं की सुपन्याळि,
मैकु तैं रिझाणि,
कखि डांड्यौं मा खोजणि,
चोळी बणि बणि.
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू”
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
11.8.2009
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By Jagmohan Zigyansu
– August 26, 2009
“कुमायूँ की बाल मिठाई”
खीम सिंह धन सिंह द्वी,
ठेट पहाड़ी भाई,
मिठाईयौं मा प्यारी ऊंतैं,
पहाड़ की बाल मिठाई.
खीम सिंह एक दिन बोन्न बैठि,
भुला, उत्तरैणी मेळा जौला,
गुमानी दिदा की दुकान मा,
प्यारी बाल मिठाई खौला.
द्वी भाई जब पौन्छिन,
उत्तरैणी का मेळा,
गुमानी दिदा वख बेचण लग्युं,
बाल मिठाई अर् केळा.
खीम सिंह अर् धन सिंह न,
गुमानी दिदा तैं, सेवा सौंळि लगाई,
गुमानी न बोलि,
आवा भुला खीम सिंह धन सिंह,
खावा बाल मिठाई.
देशी घ्यू मा बणै मैन,
ऐन्सु या बाल मिठाई.
तुम जरूर ऐला उत्तरैणी मेळा,
मेरा ज्यू न बताई.
खीम सिंह धन सिंह मेळा घूमिन,
देखिन ढोल, दमौं अर् झोड़ा,
गुमानी दिदा की दुकान बिटि ल्हेन,
“जिज्ञासु” का खातिर,
प्यारी बाल मिठाई थोड़ा.
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू” (दूरभास:9868795187)
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास: संगम विहार, नई दिल्ली
२६.८.२००९,
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By Jagmohan Zigyansu
– August 26, 2009
“खड़ु उठा हे लाठ्याळौं”
डांडी काँठ्यौं ऐंच ऐगि,
देखा हे चुचों घाम,
खड़ु उठा बिजि जावा,
करा कुछ काम…….
ऊजाळु ह्वैगि सबक लेवा,
फन्सोरिक कतै नि सेवा,
बिंगा दौं हपार,
डांडी कांठी बिजिग्यन,
पनेरा पाणी चलिग्यन,
ह्वैगि ऊदंकार……….
घंटा शंख बजणा छन,
जख, देवतों का धाम,
सब्बि मनखी लेणा छन,
बद्रीविशाल कू नाम……
ऊंचा डांडा बोन्ना छन,
खड़ु उठा, ऊब उठा,
अळगसि होन्दा छन,
दुनिया मा झूठा…….
खड़ु उठा हे लाठ्याळौं,
तुम सुणि लेवा,
ऊजाळु ह्वैगि पहाड़ मा,
फंसोरि नि सेवा……
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू”
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास: संगम विहार, नई दिल्ली
21.8.2009 दूरभास:9868795187
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By Jagmohan Zigyansu
– August 26, 2009