सिरहाने पर गिरी बूंदे सूख गयी है अब तो रात अंधेरी सिसक सिसक के डूब गयी है अब तो
सुर्ख आसमां कह रहा है सकुचा के सबको
वो रोया है रात सारी रख सिराहने सर को
सुर्ख आँखें उथली उथली उनीदी है अब को
सीने की सिसकारी पगली काख रही है अब तो
बदला बदला सूरज है तो क्या बतलाए रब को
फीकी सी मुस्कान ओढ़ के घूम रहे अब तो
चलो हुआ जो अछा हुआ समझाते है खुद को
अब ना बुनेके ख्वाब कटीले चुभते से है अब जो
लूटे पीटे से समझे ना मखमल पहनेगे अब को
अट्टाहासो मे डुबोएगे अब सात समन्दुर अब को
Friends' Update
-
Loading ...Please wait..
waki aacha likha hai….
very nice..
aap ka likna…….bhagwan ne aap ko ashirwaad diya hai….very gud!!
Bahut khub likha hai aap ne…
bahut sundar…
Bahu, bahut…. hi sundar rachana hai…….
servottam……………
Dev …bahut achaa likha hai aapne……….likhte rahiye….