एक चाँद था एक रात थी पर् तुम ना थे
एक बाग था कुछ फूल थे पर् तुम ना थे
एक सुर्ख हसीन शाम थी खामोशी और जाम थे
महफिल मेरी सुनसान थी चरचे ही चरचे आम थे
कहने को एक बात थी होठों मे एक सौगात थी
महफिल थी सब लोग थे पर् तुम ना थे
सावन की वो बरसात थी कागज की छोटी नाव थी
ख्याल थे जो बूँद थे सवालों की बरसात थी
एक दिल था अहसास थे पर् तुम ना थे
very beautiful poem…………….
hum sochte rahe Kyun na the….
wonderful poem, you have done great….!
per tum na the………..aaha
bahut bahut khub… par tum na the… very nice…
REALLY SETS ME THINKING…UR LONLINESS IS WELL CONVEYED!
beautiful lines……