क्यों नही
क्यों नही वक़्त ने पत्थर कर दिया है मुझको मगर जानती हूँ मैं बर्फ़ का पत्थर हूँ मुझको तोड़ भी दो अब तराश भी दो
Dear Friends This is one of my fav poem … found somewhere .. so i m sharing it with u all … hope u will also like it … any ways … I will be out of station from 1 -10 december .. and will miss u all …a lot … take care
तुम तराशते क्यों नही मुझे तोड़ते क्यों नही
मैं हां कहूँगी तभी नज़दीक आयोगे
अजीब ज़िद है तुम्हारी ये ज़िद छोड़ते क्यों नही
मेरी बाहों का इंतज़ार ना करो
तुम मुझे बाहों में भर लो
एक तरफ़ा ही सही ए मेरे खुदा
एक बार मुहब्बत कर लो
बर्फ़ आँच से पिघल जाएगी
तुम गुनगुना दो मुझे मेरे शाएर
तुम्हारी ग़ज़ल की तसीर बदल जाएगी
हर बर्फ़ पिघल जाएगी
तुम क्यों सोचते हो मुझको
बुतो का वजूद चाहिए
मुझ को तुम्हारी हां
मेरी ना के बावज़ूद चाहिए
मुझ को प्यार भी दो मुझको प्यास भी दो
क्यों सोचते हो मुझ में अहसास नही है
क्यों सोचते हो बर्फ़ में प्यास नही है
क्यों सोचते हो तुम्हे ई मेरी जुस्तज़ू है
क्यों सोचते हो मुझे तलाश नही है
क्यों सोचते हो बर्फ़ में प्यास नही

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