है धूंध से लिपटी हर राहें

खोये है,मंझिल का पता पायें कैसे?

बडी खामोश है बेबसी,

नि:शब्द है,शब्दों का पता पायें कैसे?


हर रात तेरी यादों का कहर ढाती आयी,

कातिल है अंधेरा,सुबह का पता पायें कैसे?

उलझनें रिश्तों की कुछ ऐसी पायी,

खो चूके है,अब खूद का पता पायें कैसे?

-मनीषा