तुम्हारे इंतजार की ये इन्तिहा थी
हर आहट में तुम्हारी निशानी थी..


हर लम्हा तेरे गम में बोझिल सा
हर पल जैसे कातिलाना थी…


बैरी ये रात भी चलती नही
निंद भी जैसे चिलमन पे जमी सी थी…


तेरे आने की उम्मीद बिखरती रही
पर सांसे चल रही थी,एक तसल्ली सी थी…


हर मोड पे मिल रही थी मुझे नये रूप में
जिंदगी मुझसे अजनबी सी थी…


-मनीषा