Updates from June, 2009

  • कोइ चल दिया...

    manisha 8:22 am on September 27, 2009 | 45 Permalink | Reply


    चलो अच्छा हुआ जो कोइ चल दिया…
    खुद से बन बैठे थे अंजान,खुद से मिल लिया.



    मिटा दिया सेहरे में कुचलकर,
    ना कोइ अपेक्षाओं का बोज अब है,



    किसी के कदमों से सभी रास्ते तय किये थे,
    खुद कि राहों कों ढूंढना शायद सिख लिया.



    भितर ही भितर भटकना छोडा जबसे,
    नयी नजर,नयी डगर जैसे अब है.



    किसी की आंखों से जग को देखा था,
    खुद की नजरों से नजारा देख लिया.



    ना किसी के आने का इन्तजार अब है,
    अपनी ही आहटॊं को भी सूनना भी छोड दिया.

    एक पर्दा सा किये जीते थे खुद से,
    खुद से कर ली नयी पेहचान, खुद से मिल लिये.



    -मनीषा



     
  • comfort zone

    manisha 8:28 am on September 13, 2009 | 34 Permalink | Reply


    सलामत दायरों में सिमटा हुआ जीवन, जीवन से अंजान हो जाता है.“-मनीषा


    हमनें अपने जीवन में कई “comfort zone“ बना रखें है.चाहे वो रिश्तों में हो,

    कार्यक्षेत्रों में हो,सामाजिक व्यवहार में हो,अपने विचारों या अपने व्यक्तिगत व्यवहार में

    हो.हम अपने “comfort zoneमें ही अपनी जिंदगी को समेटे रखते है…

    यदी आप एक दायरे मे सिमट चूके है तो जिंदगी स्थगित सी हो जाती है,

    जिंदगी अपना निराला स्वरूप खो देती है,कुछ नया करने की चाह और

    तडप अगर हमें बरकरार रखनी हो तो हमें अपनी सोच के वर्तुल को विस्तृत करना

    होगा.बाहर मिलने वाली निष्फलताओं का डर शायद हमें अपने “comfort zone” से

    निकलने नहीं देता…कुछ नया करने की चाह तो है मन में पर साथ में असफलता का

    साया…क्या करें???पर खूद पे अगर भरोसा हो,अपनी काबिलियत पे नाज हो तो

    बढाओ कदमों को नयी सोच और नयी दिशाओं की ओर…

    हालांकि जब आप पहली बार अपनी सुविधा क्षेत्र के बाहर कदम


    रखोगे तो असुरक्षित और थोडा सा भयभीत मेहसूस कर सकते हो…

    पर विश्वास करो थोडे समय पश्चात वहां पर भी आप अपने आप को

    सुविधायुक्त मेहसूस करोगे…



    -मनीषा



     
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