सलामत दायरों में सिमटा हुआ जीवन, जीवन से अंजान हो जाता है.“-मनीषा


हमनें अपने जीवन में कई “comfort zone“ बना रखें है.चाहे वो रिश्तों में हो,

कार्यक्षेत्रों में हो,सामाजिक व्यवहार में हो,अपने विचारों या अपने व्यक्तिगत व्यवहार में

हो.हम अपने “comfort zoneमें ही अपनी जिंदगी को समेटे रखते है…

यदी आप एक दायरे मे सिमट चूके है तो जिंदगी स्थगित सी हो जाती है,

जिंदगी अपना निराला स्वरूप खो देती है,कुछ नया करने की चाह और

तडप अगर हमें बरकरार रखनी हो तो हमें अपनी सोच के वर्तुल को विस्तृत करना

होगा.बाहर मिलने वाली निष्फलताओं का डर शायद हमें अपने “comfort zone” से

निकलने नहीं देता…कुछ नया करने की चाह तो है मन में पर साथ में असफलता का

साया…क्या करें???पर खूद पे अगर भरोसा हो,अपनी काबिलियत पे नाज हो तो

बढाओ कदमों को नयी सोच और नयी दिशाओं की ओर…

हालांकि जब आप पहली बार अपनी सुविधा क्षेत्र के बाहर कदम


रखोगे तो असुरक्षित और थोडा सा भयभीत मेहसूस कर सकते हो…

पर विश्वास करो थोडे समय पश्चात वहां पर भी आप अपने आप को

सुविधायुक्त मेहसूस करोगे…



-मनीषा