चलो अच्छा हुआ जो कोइ चल दिया…
खुद से बन बैठे थे अंजान,खुद से मिल लिया.



मिटा दिया सेहरे में कुचलकर,
ना कोइ अपेक्षाओं का बोज अब है,



किसी के कदमों से सभी रास्ते तय किये थे,
खुद कि राहों कों ढूंढना शायद सिख लिया.



भितर ही भितर भटकना छोडा जबसे,
नयी नजर,नयी डगर जैसे अब है.



किसी की आंखों से जग को देखा था,
खुद की नजरों से नजारा देख लिया.



ना किसी के आने का इन्तजार अब है,
अपनी ही आहटॊं को भी सूनना भी छोड दिया.

एक पर्दा सा किये जीते थे खुद से,
खुद से कर ली नयी पेहचान, खुद से मिल लिये.



-मनीषा