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  • आप यूँ ना हमें मिले होते...

    manisha 9:17 am on July 16, 2010 | 6 Permalink | Reply Tags: Ansu, chupkidi, khwab, lamha, , zindagi

    http://datastore.rediff.com/h5000-w5000/thumb/615664606B615B292C2D2E31/w6d9kygib2ngx1dr.D.0.223570-lonely-girl.jpg

    आप यूँ ना  हमें मिले होते
    आंखो को हमने भी ना ख्वाब दिए होते.
    मिलती ना चाहे मंझिल हमें,
    पर रास्तों में यूँ ना खोये  होते.
    गुमसुम सी थी…पर झिंदगी थी,
    आज  लम्हों में यूँ ना बंटे होते,
     गर आप यूँ ना हमें मिले होते…
    आंखो ने भी सिख ली थी चूपकिदी,
     पर आज बेतहासा यूँ ना रोये होते.
    गर आप यूँ ना हमें मिले होते…
    ना ख्वाब थे,ना कुछ थी उम्मीदें,
    आज ख्वाबों के मलबों को यूँ ना ढोते होते,
    गर आप यूँ ना हमें मिलें होते…

    रचना:-मनीषा


     
  • दिशाहीन

    manisha 10:22 am on February 7, 2010 | 38 Permalink | Reply Tags: dard, hindi, lonely, manisha, , sad, tanha

    http://lh4.google.com/quinhadantas/SJDTjolNe4I/AAAAAAAACP4/7Bk3cEmtb54/s800/.jpg


    चल
    दिए छोड के हमे यादो के काफ़िले के सहारे,
    जाएँ कहाँ खडे है दिशाहीन से
    आप ही राह थे मेरी,आप ही थे हमराह,
    आप ही थे रूह की तृप्ति मेरी,आप ही से थी प्यास.
    लग रहे सब रास्ते अजनबी से
    जाएँ कहाँ खडे है दिशाहीन से

    -मनीषा

     
  • दौराहे सी जिंदगी

    manisha 10:12 am on October 28, 2009 | 43 Permalink | Reply


    है कभी रास्ता,कभी मंझिल सी,
    कभी कदमों मे जमी सी जिंदगी.


    कभी एक मोड,कभी ढलान सी,
    कभी उलझे दौराहे सी जिंदगी.


    कभी खंडित आशाओं से सिसकति सी,
    कभी उन्हीं आशाओं से पली सी जिंदगी.



    हर सांसो से सिल रही सी कभी,
    कभी लम्हों में बटीं सी जिंदगी.



    समय के दिये झख्मों,सवालों से क्षुब्ध सी,
    कभी खुद से झिझकती सी जिंदगी.


    कभी लगती पल पल पेह्चानी सी उसकी,
    पर कभी लगती बेगानों सी जिंदगी.

    -मनीषा



     
  • कोइ चल दिया...

    manisha 8:22 am on September 27, 2009 | 45 Permalink | Reply


    चलो अच्छा हुआ जो कोइ चल दिया…
    खुद से बन बैठे थे अंजान,खुद से मिल लिया.



    मिटा दिया सेहरे में कुचलकर,
    ना कोइ अपेक्षाओं का बोज अब है,



    किसी के कदमों से सभी रास्ते तय किये थे,
    खुद कि राहों कों ढूंढना शायद सिख लिया.



    भितर ही भितर भटकना छोडा जबसे,
    नयी नजर,नयी डगर जैसे अब है.



    किसी की आंखों से जग को देखा था,
    खुद की नजरों से नजारा देख लिया.



    ना किसी के आने का इन्तजार अब है,
    अपनी ही आहटॊं को भी सूनना भी छोड दिया.

    एक पर्दा सा किये जीते थे खुद से,
    खुद से कर ली नयी पेहचान, खुद से मिल लिये.



    -मनीषा



     
  • comfort zone

    manisha 8:28 am on September 13, 2009 | 34 Permalink | Reply


    सलामत दायरों में सिमटा हुआ जीवन, जीवन से अंजान हो जाता है.“-मनीषा


    हमनें अपने जीवन में कई “comfort zone“ बना रखें है.चाहे वो रिश्तों में हो,

    कार्यक्षेत्रों में हो,सामाजिक व्यवहार में हो,अपने विचारों या अपने व्यक्तिगत व्यवहार में

    हो.हम अपने “comfort zoneमें ही अपनी जिंदगी को समेटे रखते है…

    यदी आप एक दायरे मे सिमट चूके है तो जिंदगी स्थगित सी हो जाती है,

    जिंदगी अपना निराला स्वरूप खो देती है,कुछ नया करने की चाह और

    तडप अगर हमें बरकरार रखनी हो तो हमें अपनी सोच के वर्तुल को विस्तृत करना

    होगा.बाहर मिलने वाली निष्फलताओं का डर शायद हमें अपने “comfort zone” से

    निकलने नहीं देता…कुछ नया करने की चाह तो है मन में पर साथ में असफलता का

    साया…क्या करें???पर खूद पे अगर भरोसा हो,अपनी काबिलियत पे नाज हो तो

    बढाओ कदमों को नयी सोच और नयी दिशाओं की ओर…

    हालांकि जब आप पहली बार अपनी सुविधा क्षेत्र के बाहर कदम


    रखोगे तो असुरक्षित और थोडा सा भयभीत मेहसूस कर सकते हो…

    पर विश्वास करो थोडे समय पश्चात वहां पर भी आप अपने आप को

    सुविधायुक्त मेहसूस करोगे…



    -मनीषा



     
  • हदे इंतजार....

    manisha 11:40 pm on August 22, 2009 | 37 Permalink | Reply



    हद इंतजार की हमें यहां तक लाई,
    हर आहट पे दिल में लौ सी जले.


    ढूंढा हर कदमों के निशां में,पर
    हर कदमों पे एक नई राह सी दीखे.



    हर रात है जैसे उलझनों का समंदर,पर
    हर रात में एक सुबह सी पले.



    हो चूके बेजुबान सारे शब्द,पर
    तेरी हर नझर में एक जुबां सी खुले.


    तन्हाई में भी कहां तन्हा हम थे,
    तेरी यादें पल पल काफिले सी चले

    -मनीषा



     
  • तेरा जाना....

    manisha 7:12 am on August 12, 2009 | 39 Permalink | Reply



    तुम्हारे इंतजार की ये इन्तिहा थी
    हर आहट में तुम्हारी निशानी थी..


    हर लम्हा तेरे गम में बोझिल सा
    हर पल जैसे कातिलाना थी…


    बैरी ये रात भी चलती नही
    निंद भी जैसे चिलमन पे जमी सी थी…


    तेरे आने की उम्मीद बिखरती रही
    पर सांसे चल रही थी,एक तसल्ली सी थी…


    हर मोड पे मिल रही थी मुझे नये रूप में
    जिंदगी मुझसे अजनबी सी थी…


    -मनीषा



     
  • कैसे ???

    manisha 5:30 pm on July 3, 2009 | 44 Permalink | Reply



    है धूंध से लिपटी हर राहें

    खोये है,मंझिल का पता पायें कैसे?

    बडी खामोश है बेबसी,

    नि:शब्द है,शब्दों का पता पायें कैसे?


    हर रात तेरी यादों का कहर ढाती आयी,

    कातिल है अंधेरा,सुबह का पता पायें कैसे?

    उलझनें रिश्तों की कुछ ऐसी पायी,

    खो चूके है,अब खूद का पता पायें कैसे?

    -मनीषा





     
  • लुटे वो जमाने...

    manisha 8:11 am on June 28, 2009 | 41 Permalink | Reply



    चेहरे पे बयां अफसाने हजार दिखे,

    तेरी नजरों में लुटे वो जमाने हरबार दिखे.



    हर आंसु है जैसे भरा भरा,
    हर आंसुओ मे तूटे वो फसाने बार बार दिखे.



    हर कदमों मे जैसे कोइ राह सिमटी थी,
    तेरे हर कदमों मे खोये वो चौराहे लगातार दिखे.



    बुझी बुझी सी हंसी से ना छीपा पाये,
    मुस्कुराने की हर कोशिश में उजडे वो लम्हे तारतार दिखे.

    -मनीषा



     
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