
धन्यवाद, इस शीर्षक को पढ़ कर जिस उतावलेपन से आपने इस ब्लॉग में प्रवेश किया है उसके लिए आप सचमुच बधाई के पात्र हैं. दरअसल कसूर आपका नहीं है ..वो कहते हैं न कि दिल तो बच्चा है और बच्चे तो आजकल वैसे ही शरारती होते हैं. खैर, ये बात बहुत पुरानी है. मैं यानि की आपका फेंकू उन दिनों बालपन की दीवार फांदकर जवानी की हरियाली में कूदने को बैचेन था …और यदि कोई मुझे उस वक्त बच्चा कहता था तो मेरा खून उबलने लगता था. ये दिल्ली की गर्मियों के शुरुआती थपेडों से लिपटे हुए दिन थे. मैं छुट्टियों में अपने एक रिश्तेदार के घर की रोटियों तोड़ रहा था. एक दिन अपने घर की छत पर खड़ा पड़ोस की बालकनी में सूखते कपड़ों को को निहार कर घर के सदस्यों के बारे में अंदाजा लगा रहा था …कि अचानक लू के थपेडों के बीच खुशबूदार हवा के ठन्डे झोंको की तरह एक लीना चंदावरकर टाइप का गोल-मटोल चेहरा मेरे सामने की बाल्कोनी में एक एक कर कपड़ों को सूखते तारों से समेटने लगा और मुझे लगा मेरी धड़कनें अचानक टॉप गियेर में चलने लगी हैं. गुलाबी रंग के ब्लाऊज और गुलाबी ही रंग के पेटीकोट में लिपटी हुई वह पड़ोस की आंटी थी. इस तरह किसी महिला को उचक उचक कर तार से कपड़े उतारते हुए मैं पहली बार देख रहा था. उसने अचानक मेरी तरफ देखा और मैं झेंपते हुए दूसरी तरफ देखने लगा. कुछ क्षणों बाद मैंने वापस अपनी नजरें उस नजारे को अपनी नजरों में समेटने के लिए उस बाल्कानी की तरफ चोरी से उछाली. अफ़सोस, वो वहाँ नहीं थी. मैं निराश हो गया. मैं करीब बीस मिनट तक यूँ ही नजरें गडाये उस बालकनी को बड़ी तनमयता और एकाग्रता से निहारता रहा तब जाके एक बार फिर से लॉटरी लगी. वो नजर आई …पर गजब! उसने आते ही मुझे इशारे करने चालू कर दिए. मैंने अपने आँखें मली…वो सचमुच मुझे बुला रही थी. उसने मुझे इशारे से अपने दरवाजे पर आने के लिए कहा. कट! अगले ही सीन में फेंकू आंटी के दरवाजे के खुलने का इन्तजार कर रहा था. दरवाजा खुला और वो रूपवती महिला गुलाबी साड़ी में मेरे सामने हाजिर थी. वो मुस्कुराई….मैं मुस्कुरा नहीं पाया…मैं स्तब्ध था. वो सचमुच बहुत सुन्दर थी. गौर वर्ण और गोल मटोल चेहरा, गदराया बदन और कुछ उलझे-कुछ सुलझे बेतरतीब से घने-लम्बे केश. उसके मुख मंडल की ख़ूबसूरती से चिपके हुए मेरी आँखों ने उसके गहरे गले वाले गुलाबी ब्लाउज को भी बिलकुल नजरअंदाज कर दिया था. मैं अभिभूत था. “अंदर आओ ना….”, उसकी आवाज में मादकता और आत्मीयता का बहुत ही मधुर घोल था.मैं मंत्रमुग्ध कमरे में प्रविष्ट हो गया.
“आंटी, आप घर में अकेली हैं? मैंने फुसुफुसाते हुए पुछा.
“हाँ, अगर कोई दूसरा होता तो तुम्हें बुलाने की जरुरत पड़ती? - दरअसल मेरी गोल्ड रिंग खो गई है, शायद इस अलमारी के पीछे गिर गई होगी, यही सोच कर तुम्हें बुलाया था, थोड़ी मदद कर दो, इसे खिसकाना पड़ेगा” आंटी ने एक बड़ी सी लोहे की अलमारी की और इशारा किया.
“हाँ, हाँ क्यों नहीं …पर आपने सब जगह ढूँढ लिया था”
“हाँ, सब जगह देख लिया, पर …” आंटी ने नहीं में सिर हिलाया.
“इस पलंग के नीचे भी?”
“अरे, हाँ यहाँ तो मैंने देखा ही नहीं”
आंटी तुरंत घूमी और एक झाडू उठा लाई और तुरंत मदमाती हुई घोड़ी की तरह उन्होंने अपना कमर तक का हिस्सा पलंग के अंदर डाल दिया. अब सोचिये कैसा दृश्य रहा होगा …सोचिये न .. वो झाडू लेकर अंदर घुसी हुई थी और…..आप भी क्या सोचने लगे…छी: …
लेकिन मैं आंटी की गोल्ड रिंग को लेकर बहुत चिन्तित था…फिर एक विजयी मुस्कान लिए ..वो घोड़ी घूमी और मेरे सामने खड़ी हो गई. आंटी के गुलाबी गालों पर मुस्कुराते ही प्यारे प्यारे दायें बाएं दो मासूम से गड्डे पड़ गए जो आजकल प्रीटी जिंटा के गालों के अलावा शायद ही कहीं मिलते हों.
“थेंक यू..सो मच” उसके हाथों में गोल्ड रिंग चमक रही थी जिसे उसने एक बार चूमा और अपने सीने से लगा लिया…तब जाकर मेरी नजर आंटी के सीने पर पहली बार पड़ी. और मैंने तुरंत अपनी नजरें हटा ली.
“क्या देख रहे हो….संतरों पर नजर हैं न तुम्हारी” आंटी ने जैसे ताड़ लिया था.
“जी…..आप ठीक कह रही हैं, में सचमुच संतरे देख रहा था”
“पर तुम्हारे काम के नहीं हैं …खट्टे हैं. आज सुबह ही लिए थे फेरीवाले से, पर फिर भी तुम्हारा मन कर रहा है तो ये लो…” उन्होंने टेबल पर प्लेट में रखे हुए संतरों में से एक बड़ा सा संतरा मेरी तरफ उछाल दिया.संतरा सचमुच खट्टा था…एक ही फाक खाकर मैंने आंटी को बोल दिया …”ये तो सचमुच खट्टे हैं’
“विमला के घर आये हो न, शायद फेंकू नाम है तुम्हारा”
“जी…”
“विमला के हसबेंड का तो सुना है शिमला में ट्रान्सफर हो गया है”
“जी…अगले हफ्ते ही शिफ्ट कर जायेंगे”
“तुम..कौन सी क्लास में पढ़ते हो”
“जी..दसवी..के एक्जाम दिए हैं”
“पास हो जाओगे”
“पता नहीं….”
वो जोर से हँसी …..
“खैर..क्या पियोगे- चाय या कुछ ठंडा”
“कुछ भी नहीं …मैं चलता हूँ”
“ऐसे कैसे चले जाओगे” उन्होंने मेरी कलाई पकड़ ली.
“तुमने मेरा इतना काम किया है..जानते हो ये अंगूठी मुझे बहुत प्यारी थी…तुम्हें कुछ तो लेना होगा”
“ठीक है फिर चाय..” आंटी के छूते ही सरे शरीर में करंट सा दौड़ने लगा था.
वो रसोई की तरफ मुड़ी ही थी कि …उनके मुंह से आऊच ….की आवाज के साथ चीख निकली…शायद उनका पैर मुड गया था.
“क्या हुआ …” मैं लपका. और बिना पल की देरी किये मैंने उनके आधे-झुके शरीर को अपने हाथों से संभाल लिया. पहली बार किसी मखमली बदन को छूने का अहसास हुआ पर अपने संस्कारों की वजह से और हनुमान जी का भक्त होने के कारण मेरे भीतर ऐसी कोई भावना नहीं थी जैसी आप सोच रहे हो. उन्हें सचमुच दर्द हो रहा था…और उनके दर्द की वजह से मैं भी द्रवित हो गया. उन्होंने मेरे गले में अपना हाथ डाल दिया. जिससे उनके उन्नत उरोजों का स्पर्श मेरे शरीर से जैसे लुका-छिपी खेलने लगा. लेकिन मैं संयत और चिन्तित था.
“प्लीज, मुझे बिस्तर में ले चलो…बहुत दर्द हो रहा है…”
मैंने उन्हीं धीरे से पलंग पर लिटा दिया ….इस बीच उनकी सिस्कियों और साँसों को करीब से सुनने का मौका मिला. मैंने उनके दोनों पैर पकड़ कर सीधे करने चाहे तो उनके मुंह से चीख निकली.
“क्या हुआ …”
“बहुत दर्द हो रहा है …सुनो उधर उस शो-केश में बाम के शीशी है …थोड़ा मल दोगे..प्लीज”
अब मेरे हाथ में बाम की शीशी थी…..मैंने झिझकते हुए उनके एड़ी पर बाम मलने की कोशिस की.
“अरे..यहाँ नहीं घुटने में ….” यह कहते हुए उन्होंने अपनी साड़ी को एक झटके में ही जाँघों तक ऊपर कर दिया.
अब उनकी गोरी और बालरहित टाँगे मेरे सामने थी….मैंने झिझकते हुए उनके घुटने पर बाम मलने का उपक्रम शुरू कर दिया. कुछ ही पलों में शायद उन्हें दर्द में कुछ आराम मिला …
“बस …थेंक यू …” उन्होंने मुस्कुराते हुए साड़ी को वापस नीचे कर दिया.
“तुम बहुत अच्छे लड़के हो …मेरे पास बैठो न, अफ़सोस कि तुम्हें चाय नहीं पिला सकी” उन्होंने मेरे हाथ को धीरे से थामा और अपने माथे पर रख कर कहा “ थोड़ा सहला दो …थोड़ा सा बाम मेरे माथे पर भी मल दो….सिर भी दर्द कर रहा है …क्या बताऊं कल रात ठीक से सो भी नहीं सकी…तुम्हारे अंकल ने सारी रात सोने नहीं दिया “
‘कैसे…’ मेरे मुंह से अचानक निकला.
“खर्राटे….सारी रात उनके खर्राटों की वजह से मैं सो नहीं पाई”
“ओह…”
“सारा शरीर टूट रहा है…थोड़ा प्लीज मेरी पीठ में भी बाम लगा दोगे….शर्म आ रही है?
“नहीं….”
“तो फिर ..लगाओ ना….”
“और फिर वो उल्टा लेट गई और मैंने बाम आपने हाथों में लगाया और उनकी पीठ पर ब्लाऊज के अंदर हाथ डाल कर मालिश करने लगा….”
“अरे, पहले दरवाजा तो बंद कर दो…कोई आ गया तो “ आंटी ने कहा और मैंने दरवाजा बंद कर दिया. मैंने पुन: उनके ब्लाउज के अंदर हाथ डाल कर मालिश की..जिस से उन्हें सचमुच सुकून मिला.
“तुम बहुत अच्छे हो फेंकू…तुम्हें देखकर मुझे अपने वो दिन याद आने लगे हैं जब मैं तुम्हारी उम्र की थी….बहुत सुन्दर हुआ करती थी…..”
“सुन्दर तो आप अब भी हैं आंटी” मैंने शरारती अंदाज में कहा.
“सचमुच?”
“हाँ …सचमुच”
वो हँसी ….”उन दिनों में बहुत तीखी मिर्च की तरह हुआ करती थी…सभी लड़के मुझसे डरते थे …हाँ ..एक लड़का था …दुबला पतला मच्छर सा …कुछ कुछ तुम्हारी तरह….मुझे पता चला कि वो मुझसे प्यार करता है…बस एक दिन स्कूल के रास्ते में वो मिल गया …और फिर मैंने उसका कालर पकड़ लिया और अपनी तरफ खींचा….”
आंटी ने वास्तव में मेरा कालर पकड़ लिया था और मुझे अपनी तरफ खींचना शुरू कर दिया …मेरा मुंह सीधा आंटी की छाती से जा लगा….
“क्यों बे सुना है तू मुझ से प्यार करता है ..? मेरे साथ सोयेगा तू …मेरी इज्जत लूटेगा….?”
“आंटी …प्लीज मुझे तो छोड़ दीजिए…” मेरा दम घुटने लगा था.
उन्होंने मुझे छोड़ दिया.
“सॉरी….हाँ फिर वो लड़का पत्ते की तरह काम्पने लगा ….और नहीं …नहीं कहता हुआ भाग खड़ा हुआ….हा …हा..हा ..” आंटी बहुत देर तक हँसती रही.
“फिर …आगे जब कभी वो मुझे देखता तो दूम दबा कर भाग खड़ा होता ….”
“फिर क्या हुआ…”
“फिर होना क्या था…..कुछ नहीं वो लड़का कहाँ गया पता ही नहीं चला …पर बहुत सालों बाद मेरे लिए एक रिश्ता आया …एक वकील का रिश्ता …और जानते हो वो कौन निकला …वही मच्छर..” वो फिर हँसी ….बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपने हंसी पर काबू पाया.
“आज वही तुम्हारे अंकल हैं …बस आने ही वाले हैं….”
आंटी के इतना कहना ही था …कि दरवाजे की घंटी बजी.
और आंटी ने लपक कर दरवाजा खोल दिया. अंकल सामने थे. उन्होंने मेरे बारे में पूछा तो आंटी ने सब बता दिया कैसे …गोल्ड रिंग ढूँढने में मैंने उनकी मदद की और कैसे वो गिर पड़ी और कैसे मैंने उनके बाम लगाया.
“थेंक यू, बेटे …तुम सचमुच बहुत अच्छे लड़के हो …कभी कभी दिन में आ जाया करो ..तुम्हारी आंटी बोर हो जाती है अकेली पड़े पड़े …”
“लेकिन ये तो एक ही हफ्ते है …यहाँ पर …लेकिन बहुत अच्छा लड़का है…सुनो मैं तुम दोनों के लिए अच्छी सी चाय बनाती हूँ” यह कह कर आंटी उठने लगी.
“अरे…तुम्हारे पैर में चोट लगी है …चाय मैं बनाता हूँ…फेंकू तुम अपनी आंटी से बातें करो …मैं किचन में जाता हूँ…”
……….सचमुच बहुत अच्छे थे दोनों ..पर आजकल ऐसे लोग कहाँ मिलते हैं…..और ऐसी अंटियाँ तो बिलकुल भी नहीं मिलती हैं….
तो कैसी लगी आपको फेंकू की ये मुलाक़ात एक दोपहर में एक अकेली आंटी से ….
…लोग भी जाने क्या क्या सोचने लगते हैं….क्यों ठीक कहा न मैंने?