Noto ki maala
नोटों की माला
इन दिनों देश में बड़ा बवाल खड़ा हो गया है. एक प्रतिष्ठित पार्टी की सम्मानीय, महा-माननीया महामहिम जो जीवन में कभी जयमाला तो नहीं पहन पाई नोटों की माला पहन कर भयंकर चर्चा में हैं.
मायावती जो हमेशा कौए को कौआ ही कहती हैं कोयल नहीं,
एक जानी-पहचानी मधुरभाषिणी महिला हैं और उत्तरप्रदेश जैसे जटिल प्रदेश की
सरल, सरस-ह्रदया मुख्यमंत्री भी हैं. उन्होंने देश के तमाम नेताओं को आईना दिखाया है
नोटों की भारी-भरकम माला पहन कर. क्या कांग्रेसी, क्या भाजपाई, क्या सपाई, क्या चारपाई, क्या तिपाई
सबके गले में सांप लोटने लगे हैं. हज़ार हज़ार के इतने सारे नोट? आई…ला….इनका स्त्रोत क्या है…आखिर क्या करोगे बहनजी का नुस्खा जानकर….
और जान भी लिया तो तुमने कौन सी माला बनानी है ..तुम तो स्विश बैंकों में ही जमा करोगे ना …ये तो बहनजी का ही चमत्कार है…और वैसे भी इतनी वजनी माला उनकी जैसी कदकाठी पर ही फब्ती है.
कोई जले तो जले…लो फिर पहन ली एक और माला. क्या बिगाड़ लोगे.
उनके यानि मायावती के इस सुकृत्य पर मेरा मन हुआ कि मैं भी उन्हें बधाई दे आता हूँ…सो मैं सीधे जा पहुंचा बसपा के दफ्तर पर. गेट पर खड़ा चोकीदार नोट गिन रहा था…मैंने उससे कहा मुझे माया जी से मिलना है (मैं उन्हें माया जी ही कहता हूँ).
मेरे हाथ में बैग देखा तो वो बोला ..नोट लायो हो? तो फिर सीधा अंदर जाओ…वो जो माली बगीचे के पास खड़ा नोट गिन रहा है…उससे पूछने कि जरुरत नहीं है…बस इतना बोल देना वो कि माला के लिए नोट लाये हो…मैंने वही किया …माली ने नोट नोट गिनते गिनते इशारा किया और बोला जाके लाइन में खड़े हो जाओ.
मैंने देखा सभी लाइन में खड़े हुए लोग बैग लिए खड़े थे.
पर मेरे थैले में तो दो किलो आलू, एक पाँव टमाटर और आधा किलो प्याज
और एक गोभी का बड़ा सा फूल था…जो मैंने अपने घर के लिए अभी अभी ख़रीदे थे.
मैं तो मात्र बधाई देने के लिए खड़ा था. अब क्या करूँ…तभी मुझे एक जाना पहचाना चेहरा दिखा…. तिवारी जी….
जो हाथी कि प्रतिमा के पास खड़े हो कर नोट गिन रहे थे.
मैंने उन्हें नमस्कार किया और अपना प्रयोजन बताया.
खाली बधाई…अरे! नोट नहीं लाये …उधर देखो उस खिडकी पर कैसे दनादन नोट दीये जा रहे हैं…थैले में क्या है?.
सब्जी…..मेरे मुंह से पता नहीं क्यों सच निकल गया….
ठीक है…ऐसा करो ये थैला यहीं छोड़ दो…मेरे पास…आज मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं थे…..समझ गए न…और तुम आओ मेरे साथ और देखो शोर मत करन, मैं तुम्हें बहन जी से मिलाता हूँ …बस अगर कोई पूछे तो कहा देना माला के निर्माण में अपना सहयोग तुमने दे दिया है.
मैं तिवारी जी के पीछे चल पडा.
कुछ ही देर बाद में उस हाल मैं पहुँच गया जहाँ मायावती जी भिन्न भिन्न प्रकार की नोटों की मालाओं
को पहन पहन कर रिहर्सल कर रही थी.
मैं आपका प्रशंसक हूँ…आपका दास हूँ …मैंने मायावती का अभिवादन किया
-कौन से जिले के डी.ऍम हो? मायावती का ध्यान अब भी नोटों की माला कि तरफ था. जी…नहीं मैं तो बस यूँ ही चला आया बधाई देने…मैं कोई नहीं हूँ
क्या मतलब? तो तुम पार्टी -वर्कर हो …माला के निर्माण में सहयोग दिया?
जी…नहीं…केवल बधाई…देने आया था..
बधाई? केवल बधाई?…इसकी तलाशी लो…ये मुझे बाबा रामदेव का गुप्तचर लगता है…
और फिर…मेरी तलाशी ली गई ….हज़ार हज़ार के पांच नोट जो मैंने माला में से साफ़ कर लिए थे
और मन ही मन खुश हो रहा था अपनी कलाकारी पर ….
मायावती के हाथों में पहुँच चुके थे …. उसके बाद …उसके बाद मेरी वो खातिरदारी हुई कि मत पूछो…
.अंत में बड़े ही राजकीय सम्मान के साथ मुझे गेट से बाहर धकेला गया…
.इस हिदायत के साथ कि अगली बार पार्टी दफ्तर के आस पास भी मैं नज़र आया तो…….

excellent dear……….. excellent…
Great……..
bahut achha likhte hai aap……….. maza aya padhkar.
ha…ha…ha…Nice humour, Fenku. It’s a real tragedy that the main motive of our most politcians is to make money for themselves; only the styles are different.