gopigoswami’s blog

आपसे मिलकर खुशी हुई ……………आते रहना
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Archive for March, 2010

aakhiri khat -a new hindi poem

March 22, 2010 By: Category: Uncategorized


  

 आखिरी खत  
               

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तुम कभी मुझे मत मिलना 

हो सके तो 
बस खत लिखना  

कुछ भी लिखना 
उम्मीदें, आशाएं और  मुस्कुराहटें लिखना 
कुछ दर्द, कुछ शिकवे, बेशक अपने आंसू भी तुम लिखना पर अपनी यादें मत लिखना  


कुछ भी लिखना 
सपनों को लिखना, 
अपनों को लिखना 
मौसम की करवटें
और 
जिंदगी में फैले  रंगों को भी
तुम लिखना

पर अपनी यादें मत लिखना  

कुछ भी लिखना 
अपने इर्द-गिर्द तैरते 
चेहरों को लिखना 
अखबारों की सुर्खियों 
में लिपटी ख़बरों को 
भी तुम लिखना 
पर अपनी यादें मत लिखना  

 
लेकिन मैं जानता हूँ 
तुम भी लिखोगी मेरी तरह 
अपनी यादें 
जैसे मेरी कलम 
उतर गई है यादों 
के गलियारों में 
और शब्दों के गीलेपन 
के पीछे मेरी भीगी पलकें 
देख रही हैं 
तुम्हारा 
सिर्फ तुम्हारा चेहरा  
                     


Aadmi aur machine-ek nai hindi kavita

March 17, 2010 By: Category: Uncategorized

              आदमी और मशीन 

अंधी-बहरी जिंदगी बोलती है रुकना मना है
वो नहीं मानता थक कर सो जाता है
या यूँ कहें कि मशीन बनते-बनते रह जाता है

अंधी-बहरी जिंदगी फुसलाती है
मैं तेरे साथ हूँ पर रोज पेट में आग लगाती है
वो ईंधन जुटाता है, अपनी हड्डियों को
एक एक कर डालता है और फिर सो जाता है
या यूँ कहें कि मशीन बनते बनते रह जाता है
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अंधी-बहरी जिंदगी धमकाती है
तेरे बाद क्या होगा उनका जो मैं तुझे छोड़ दूँ
वो सचमुच डर जाता है और कुछ अपनी साँसें,
कुछ लहू के कतरे अपनों में बाँट आता है
पर करवट बदल कर फिर से सो जाता है
या यूँ कहें कि मशीन बनते बनते रह जाता है

अंधी-बहरी जिंदगी सताती है
उम्र नोचती है, ताकत सोखती है
झुर्रियों से चेहरा पोतती है
वो खांसता है, रात भर जागता है
पर जिंदगी को धता बता कर
मौका मिलते ही सो जाता है
या यूँ कहें कि मशीन बनते बनते रह जाता है

अंधी-बहरी जिंदगी रूठ जाती है
वो भी कब तक चलता साथ जिंदगी के
अस्थि-मज्जा, चमड़ी, रक्त-लहू
सौंप सब जिंदगी को चिर निद्रा में सो जाता है
या यूँ कहें कि मशीन बनते बनते रह जाता है

A new post-katra-E-Ashk

March 11, 2010 By: Category: Uncategorized

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a new poem

March 08, 2010 By: Category: Uncategorized

 


    औरतें


 


किस मिट्टी से गढ़ी हैं


औरतें


मर्द ढूंढ रहे हैं छाँव पेड़ की


चिलमिलाती धूप में


खड़ी हैं औरतें


 


अबलाओं के विश्वास


का बल देखो


जहाँ से लौट आये थे


मर्द प्यासे


कुदालें ले कर


निकल पड़ी हैं औरतें  


 


केवल तन और मन


ही है कोमल


इरादे उनके हैं


सख्त बहुत


लोहे से भी मढ़ी हैं


औरतें


 


वो सृजन कर भूला


दे कर


दूध, लहू अपना


सींच रही हैं जीवन को


ईश्वर से भी


बड़ी हैं औरतें

Koi Itna akela kyon

March 04, 2010 By: Category: Uncategorized

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