gopigoswami's blog http://blogs.rediff.com/gopigoswami आपसे मिलकर खुशी हुई ...............आते रहना Fri, 08 Jul 2011 07:05:38 +0000 http://wordpress.org/?v=2.7.1 en hourly 1 वे मिले http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2011/04/06/452/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2011/04/06/452/#comments Wed, 06 Apr 2011 07:23:48 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2011/04/06/452/






 




 


 


शाम थोड़ी रंगीन है


आकाश भी थोडा-थोडा झुकने लगा है


वासंती हवा के झूले हैं और


आसपास महकते फूलों की


नाजुक जुम्बिशें भी


पार्क का एक कोना


और कोने में घसियाली जमीन पर


बिछी बेंच


और वे दो


एक लड़का और एक लड़की


और है दोनों के मध्य कुछ-कुछ


सकुचाती हुई शर्म


वे पहली बार जो मिले हैं


 


दोनों के चेहरे एक दूसरे के सामने


बिछे हैं प्रश्न पत्रों की तरह


पहली परीक्षा


और दिल में धकधक


 


लड़की ने ढूंढ निकाला है


लड़के की आँखों में सारा आकाश


और लड़के की आँखें


जैसे दो अचंभित भँवरे


जिनके सामने अचानक रख दिया गया है


दुनिया का सबसे


सुन्दर गुलाब


लड़का करीब जाना चाहता है


लड़की ने अभी-अभी


पलकों को किया है बंद  


और खोल दिए हैं ह्रदय के कपाट


लड़के के भीतर


उबल रहा है सूरज


और लड़की के अंतर से


बहने लगी है चांदनी


 


 


और फिर


शाम के धुंधलके में


वह पहला स्पर्श


दोनों ने थाम लिया है


एक-दूसरे का हाथ


लड़के के हाथ लगी एक देह


और लड़की ने ओढ़ ली है छाँव


 


                    ——गोपी


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तुमसे फिर मिलूंगी http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/10/12/aayaaay-aaa-aaaayaaay/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/10/12/aayaaay-aaa-aaaayaaay/#comments Tue, 12 Oct 2010 12:07:28 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=448

 


 


एक दिन


तुमसे फिर मिलूंगी


किसी धूल खाती किताब के पन्नों को


के बीच


मरी हुई खुशबू में लिपटी


मसली-कुचली हुई


गुलाब की पंखुडियाँ


बनकर


 


एक दिन


तुमसे फिर मिलूंगी


किसी बहुत लंबी


डूबते हुए तारों वाली


रात में


जब चाँद गिन रहा होगा


तुम्हारी


छटपटाती करवटों को


और तुम


फिर से उतरोगे अपने


भीतर


 


 


एक दिन


तुमसे फिर मिलूंगी


जब निकलोगे


किसी सड़क पर


सूखी हुई आँखों में


भीगने की चाह लिए 


और फिर


कहीं से उठेगा एक बादल


और


तुम्हारे चेहरे पर गिरेगी


वो पहली बूंद 


 


एक दिन


तुमसे फिर मिलूंगी


तुम्हें वापिस लौटाने


वो आंसू


जो तुम अभी मुझे


देकर जा रहे हो


हाँ,


मैं मिलूंगी तुम्हें


एक खबर


बनकर


 


 


  


 


 

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न बारिश थमेगी, न तुफां रुकेगा http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/09/06/a-aaaaa-ayaayaay-a-aayaaa-aayaayaa/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/09/06/a-aaaaa-ayaayaay-a-aayaaa-aayaayaa/#comments Mon, 06 Sep 2010 09:22:03 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=444

न बारिश थमेगी, न तुफां रुकेगा


सिर्फ इशारों से मेरे ये सूरज ढलेगा


पिघला हुआ लावा है सीने में मेरे


जो आँखों में उतरा तो ये जहाँ भी जलेगा


 


शोलों में आजमाया है होंसलों को अपने


मुश्किलों की राख उड़ाते हैं चलते


गुजरेंगे जिधर से हम संग धुँआ भी चलेगा


 


इरादों में मेरे बहुत है बारूद भरा


जिस खौफ से कांपने लगी हैं ये हवाएं


तू मुझको इतना बता दे वो कहाँ मिलेगा


 


अब तो बढ़ चले हैं कदम ज़ानिब-ए-मंजिल


फासलों की तू मुझसे बात भी न कर


अगला मुकाम तुझको मेरा अब वहाँ मिलेगा


 


हाथों की लकीरों से से हमें क्या हैं लेना


जिस ओर रुख किया जमीं चली, हवाएं चली


और जो जो खोली मुट्ठी तो आसमां मिलेगा


 


सर कलम करके तू मेरा यूँ खुश न हो


शहादतों का सिलसिला शुरू किया है मैंने


बाद मेरे तुझको अब कारवाँ मिलेगा

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उसने भगवान को देखा था http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/09/03/aaaay-aaauaa-aay-aayaa-aya/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/09/03/aaaay-aaauaa-aay-aayaa-aya/#comments Fri, 03 Sep 2010 10:29:23 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=440

 



 











 





 




 


 उसने कहा


उसने भगवान को देखा है


पेड़-पौंधों ने सर नवाजा


पथरीली पगडंडियों ने


मुस्कुरा कर उसे रास्ता दिया


ठंडी हवाओं ने उसको सहलाया


आसमान से कुछ बूंदें भी


गिरी उसकी अधपकी दाढ़ी पर


वो हँसा


उसने भगवान को


पा जो लिया था


वो चलता रहा


मस्त-मौला


बिखरे-बाल और फटे कम्बल


को ओढ़े


बगल में झोला दबाए


 


यही बात उसने


इंसानों की बस्ती में कही


चिल्ला कर


सुनो, सुनो


देखा है मैंने भगवान को


शहर की चीखती-चिल्लाती


जिंदगी उसे  


अनसुना कर चलती रही


पर वो तो अपनी खुशी


को मुक्त करना चाहता था


अपनी आँखों से


उन सबके लिए


वो फिर चिल्लाया  


सच कहता हूँ


देखा है मैंने उसको …..


कुछ कदम ठिठके, रुके


कौन है ये


पागल, भिखारी, फकीर या


कोई दरवेश


हाँ, देखा है मैंने उसे


वो जो सर्व –शक्तिमान है,


एक इशारे से दुनिया पलट दे,


दयालु भी है, दाता भी है,


प्रेम से लबालब भरा


वो जो है विधाता


देखा है मैंने उसे


कुछ लोग और फिर बहुत से लोग


सुनने लगे उसे….


ये तो सचमुच कोई दिव्य


आत्मा है, चेहरे का तेज देखो


इसकी वाणी में अमृत है


 


कैसा दिखता है वो?


भीड़ ने उछाला प्रश्न


वो राम जैसा दिखता है


कृष्ण जैसा भी


जीसस जैसा, अल्लाह जैसा


वाहे गुरु जैसा भी


बस…..बहुत हुआ


पागल लगता है…


हाँ-हाँ पागल है


फिर एक पत्थर उछला,


फिर दूसरा, फिर तीसरा…


एक लहुलुहान शरीर अब


अकेला गिरा पड़ा था


पर उसके चहरे पर


वही तेज था, वही उमंग,


वो हँस रहा था


मैंने भगवान को देखा है


उसकी आवाज धीमी थी


पर विश्वास से ओत-प्रोत


 


बाबा, क्या तुमने सचमुच


भगवान को देखा है…


एक नन्हा प्रश्न लेकर


दो छोटी-छोटी आँखें


उसके सामने खड़ी थी


हाँ …मैंने देखा है


तुम भी देखोगे….ये लो


देखो ….


झोला टटोल कर


उसने एक टूटा हुआ आइना


रख दिया दो नन्हे हाथों में ….


देखो ….तुम भी देखो …


 


अरे! ये तो मैं हूँ …बिट्टू


हट……दूर हट!


उसने आइना बच्चे से


छीन लिया….


मैंने तुझे भगवान दिया


तुने उसे बिट्टू बना दिया


जा चला जा ….


बच्चा डर गया और पलट कर भागा


पर जाते जाते कह गया


पागल कहीं के …..


 


पागल …मैं नहीं तुम सब हो …


इसमें भगवान है


सचमुच ….


उसने आईने में अपना चेहरा देखा


‘मुरारी लाल’ ……


उसका चेहरा सफ़ेद हो गया


तू सचमुच पागल हो गया है


तू सचमुच पागल हो गया है


‘मुरारी लाल’


उसके हाथ से आईना गिर गया


उसके सारे शरीर में दर्द


होने लगा …वो लडखडाते हुए


सड़क की तरफ बढ़ा ……


अब उसके मुँह से


यही निकल रहा था


मुरारी लाल तू पागल हो गया है


सामने से तेज गति से एक


महँगी, बहुत महँगी कार आ


रही है


इतनी महंगी कि


उसकी आँखें फूट गई हैं………………


 


 


(By Gopi Goswami)



 




 

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ओ री महंगाई !!! http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/07/14/a-aay-aaaaaa/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/07/14/a-aay-aaaaaa/#comments Wed, 14 Jul 2010 07:41:11 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=435

                           ओ री महंगाई !!!


 


ओ री महंगाई! अब तू ही बता कहाँ जाऊं मैं


टॉक टाइम खाऊं या फिर मोबाईल चबाऊं मैं


 


तनख्वाह मेरी नाटी रह गई, खूब बड़ी तेरी हाईट


जेबें सारी ढीली हो गई, हालत मेरी फिर भी टाईट


तू मारे है चांटे दनादन, कब तक गाल सहलाऊँ मैं


ओ री महंगाई! अब तू ही बता कहाँ जाऊं मैं


 


 आटा कर गया टाटा मुझको, दालें मारें खूब उछालें


घी-तेल ने बजट बिगाड़ा, मुँह जलाये हैं सारे मसाले


पगार हुई छू-मंतर मेरी, अब खाली पेट बजाऊँ मैं


ओ री महंगाई! अब तू ही बता कहाँ जाऊं मैं


 


 चीनी लागे कड़वी मुझको और दूध-ब्रेड दिखाएँ ठेंगा 


सूनी रसोई अब देती ताने, बिजली महंगी, पानी महंगा


खाली गैस सिलेंडर धमकाता, चूल्हा कहाँ से जलाऊँ मैं


ओ री महंगाई! अब तू ही बता कहाँ जाऊं मैं


 


 आलू-बेंगन, घीया, भिन्डी और तोरी, खूब करे हैं सीनाजोरी


भाव प्याज-टमाटर का सुन के अब हिम्मत मेरी न हो री


तू अकड़ी खड़ी है सब्जी-मंडी में, उलटे पाँव घर आऊँ मैं


ओ री महंगाई! अब तू ही बता कहाँ जाऊं मैं


 


 शिक्षा महंगी, भिक्षा महंगी, महंगा हुआ घर का किराया


बड़े दाम पेट्रोल के लेके, तेरा सारा धुँआ आँखों में आया


दवा-दारू भी न मेरे बस की, जो बीमार भी पड़ जाऊं मैं


ओ री महंगाई अब तू ही बता कहाँ जाऊं मैं


 


टेक्स-बिलों से घिरा मैं, चढ़े हैं कर्जे मुझ पर बहुत सारे


तू महंगाई! छोड़ दे गर्दन मेरी, क्यों गरीब को और मारे


इतनी तो न फाड़ तू जेब मेरी, जो सिल भी न पाऊँ मैं


ओ री महंगाई! अब तू ही बता कहाँ जाऊं मैं


 


कमर तोड़ के तू मेरी, क्यों आसमान मैं जा बैठी


मैं गुहार लगाता नीचे से, तू मगर है ऐंठी की ऐंठी 


बोल तू नीचे आती है या कि फिर ऊपर जाऊं मैं


 


ओ री महंगाई! अब तू ही बता कहाँ जाऊं मैं


टॉक टाइम खाऊं या फिर मोबाईल चबाऊं मैं


 


                                                       (By Gopi Goswami)


]]> http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/07/14/a-aay-aaaaaa/feed/ monsoon http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/07/06/monsoon/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/07/06/monsoon/#comments Tue, 06 Jul 2010 10:42:45 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=427

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Pinjre ka tota http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/06/25/pinjre-ka-tota/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/06/25/pinjre-ka-tota/#comments Fri, 25 Jun 2010 13:11:31 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=420


उसने लिखा था
रात तेजी से गुजर रही है
होस्टल के कमरों की बत्तियाँ
एक-एक कर दम तोड़ रही हैं
पर वो सोना नहीं चाहता है
इस आखिरी रात को
जी भर कर जीना चाहता है
उसने लिखा था
आज उसने बहुत सारी
सिगरेट पी
कमरे में धुँआ ही धुँआ है
जो उठकर
छत से लटके पंखे
तक पहुँच गया है

उसने लिखा था
ये कुछ अजीब है
इस बार वो जरुर पास हो जायेगा
पर फिर भी ये फैसला
उसके दोस्तों को हैरत में डालेगा
कुछ भी उसके साथ नहीं जाएगा
न केमिस्ट्री की मिस्ट्री
न फिजिक्स के फल्सफे
न किताबों का जखीरा
न टी शर्ट्स और न इतनी सारी जींस
ये लैपटॉप और डीवीडी का बॉक्स
सब उस दोस्त के नाम
जिसने उसकी गर्लफ्रेंड को उससे छीना है

उसने लिखा था
बहुत दिनों बाद उसने आईना देखा
तो उसने पाया
वो तो तोता बनता जा रहा है
ठीक अपने बड़े भाई की तरह
जिसे अब सोने का पिंजरा
चाहिए
और जो बाबूजी से कह रहा है
जमीन बेच दो

उसने लिखा था
वो तोता नहीं बन सकता
आज वो इस तोते की गर्दन
मरोड़ने जा रहा है
वो मुक्ति चाहता है

उसने लिखा था
उसके जाने के बाद
कोई उसे याद न करे
कोई उसके फैसले पर
ऊँगली न उठाये
क्योंकि ये उसका अपना
फैसला है

उसने लिखा था
उसे अपने दिमाग की
सीमा और हाथों कि क्षमता
का ज्ञान हो गया है
वो लौट रहा है
वापस अपने गाँव
अपने खेतों में
जहाँ
उसकी अपनी ही जमीन
ने माँगा है फिर से
उसका पसीना

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Three idiots http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/06/16/three-idiots/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/06/16/three-idiots/#comments Wed, 16 Jun 2010 11:42:16 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=418





एक कत्ल हुआ
बीच सड़क पर दिन-दहाड़े
शहर जगा था
पर न ठिठका, न रुका
आँखें मूंदे
बस चलता रहा
अगर होती इस शहर की
संवेदन तंत्रिका की
कुछ कोशिकाएं भी जंगरहित
तो शायद ये शहर कुछ पल
ठिठक कर देख पाता कि
मरने वाली का नाम
‘मानवता’ था
शहर को इससे क्या
उसे तो
आदत है लाशों को लांघकर
आगे बढ़ने की

पर खबर तो बन गई न
और खबरिया चेनलों की तो
निकल पड़ी
हत्या ! वो भी मानवता की
इस शहर में हो क्या रहा है?
इसने, उसने, किसने,
जिसने भी मारा
कयास और दावों का युद्ध
लड़ा जाने लगा है
और ब्रेकिंग न्यूज की सडांध
बेचकर टी आर पी कमाने वाले
खबरिया चैनल
लगे पड़े हैं ‘मानवता’ की
लाश का पोस्टमार्टम करने


पर मानवता तो मर गई
पहले चीर-हरण फिर हत्या
कृष्ण की अनुपस्थिति खेदजनक
और हत्यारा
फिर से छुप गया है, या मिल गया
या फिर घुल गया है
इसी शहर में
पर सबने देखा है हर नुक्कड़
पर बिक रहे हैं मुखौटे
भ्रष्टाचार,व्याभिचार, लालच, आतंक,
द्वेष-घृणा सबके मुखौटे उपलब्ध हैं
फिर से निकलेगा शहर की
महत्वकांक्षा की कोख में पल रहा
स्वार्थ
खरीदेगा फिर से एक मुखौटा
और फिर से होगी ‘हत्या’
हर बार की तरह फिर मरेगी
‘मानवता’
पर शहर चलता रहेगा
जिन्दा रहेगा,
पर खामोश रहेगा


गांधीजी के तीनो बन्दर
उदास हैं
सीधे, सरल वो तीन अनमोल वचन
क्या किसी कूट-भाषा का तिलस्म थे?

उसके कानों कि
ऊँचाई तक कोई पहुंच भी गया
तो यही पायेगा कि कानों पर
हाथ धरे बैठा है प्रशासन

और किसने कहा कि
क़ानून अंधा है
क्या आँखों पर हाथ रखने से
भला कोई अंधा हो जाता है

और आप जनाब?
आप क्यों चुप हैं
मुँह पर हाथ?
अरे! आप तो जनता हैं?

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Ek Tha Manglu http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/06/04/ek-tha-manglu/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/06/04/ek-tha-manglu/#comments Fri, 04 Jun 2010 10:15:49 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=416

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एक था मंगलू


था इसलिए


क्योंकि अब वो नहीं रहा


 


जब वो सचमुच था


तब भी वो कहाँ था  


सिवाय वोटर लिस्ट के


 


पर अब जब वो नहीं है


तो सब जगह है


अखबार के पन्नों में,


टीवी की गर्मागर्म बहसबाजियों में


संसद के हंगामे में


दफ्तरों की गप्पबाजियों में


विपक्षी दलों के पोस्टरों में  


स्वयमसेवी संगठनों की


चंदा उगाहती पुस्तिकाओं में   


 


अब सब को पता है


उसका नाम


मंगलू था


जिसकी मौत


भूख से हुई थी


 


 


भूख से भी


कोई मर सकता है


यही बताने भ्रमण पर निकली है


एक निकृष्ट जर्जर काया मंगलू की  


अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा,


और इंग्लेंड जैसे देशों में


अखबारों और मेग्जीनों


के पन्नों पर


 


इधर खबर छपी है


गोदामों में अनाज सड़ रहा है


और मैंने अभी-अभी सुना है


मंगलू की आत्मा का ठहाका !

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Bhikhaarin ka katora http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/06/01/bhikhaarin-ka-katora/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/06/01/bhikhaarin-ka-katora/#comments Tue, 01 Jun 2010 08:00:40 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=412




उसे बुलाओ जिसने लगाया था
इस शहर के जिन्दा होने पर प्रश्नचिन्ह
जो कहता था इंसानों की ये बस्ती
पत्थरों और मशीनों से नहीं है भिन्न

वो जिसने लगाया था आरोप
कि इस शहर के सीने में नहीं है दिल
और यदि है तो दया और करूणा का है विलोप

उसे बुलाओ और दिखाओ जो अंधा है भ्रमित है
यह शहर मरा नहीं
इसकी शिराओं में है दर्द, यहाँ संवेदनाएं भी जीवित हैं

सबूत है भिखारिन का यह कटोरा


ये कटोरा पैसों के बोझ से लुढ़का हुआ है
हाथ याचना के लिए उठे नही हैं
चेहरा भी भिखारिन का उतरा हुआ है
कल तक सब देखते थे उसकी छाती से
लिपटा हुआ दुधमुंहा
लोग निकल जाते थे मुंह पलटा कर
पर आज ये क्या हुआ?


आज पहली बार इस शहर की नजर
उसकी छाती पर पड़ी है
आज सचमुच लोगों की करूणा उमड़ी है
सुना है कि इसका बच्चा मर गया है
क्या इसीलिए इसका कटोरा भर गया है

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मैं जिन्दा हूँ - main jind hun http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/04/30/aaya-aaaayaa-aaya-main-jind-hun/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/04/30/aaya-aaaayaa-aaya-main-jind-hun/#comments Fri, 30 Apr 2010 11:10:17 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=403

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दिन है, रात है यहाँ


साँसे चलती है, रूकती हैं


आँखें खुलती हैं, बंद होती हैं


बगल से आती उखड़ती सांसों ने


भी दम तोड दिया है शायद


अब इस खामोशी में


केवल मैं हूँ


तुम्हारी अर्धांगिनी


अर्धजले शरीर में


पूरी जली, पूरी छली


आत्मा लिए एक सुहागिन


हाँ,  मैं जिन्दा हूँ


बर्फ के इस घर में


 


सुन रही हूँ


तो बस आवाजें


जैसे पापा से जिद  


जैसे मम्मी की डोंट


जैसे भैय्या से झगड़ा


जैसे सखियों की ठिठोली


जैसे शहनाई


जैसे विदाई


जैसे चूडियों की खन-खन


जैसे घुन्घरुओं की रुनझुन


 


सुन रही हूँ


तो बस आवाजें


जैसे बर्तनों का बजना


जैसे पैसों की बातें


जैसे दहेज पर लानतें


जैसे तानों की बरसातें


जैसे बदन पर पड़ते घूंसे और लातें


जैसे अपना ही रोना


रोना, बस रोना और रोना


 


सुन रही हूँ


तो बस आवाजें


क्योंकि देखने से डरती हूँ


अगर आँख खोली मैंने


तो कहीं फिर से दिख जाए


वो हाथ में पेट्रोल की बोतल


वो माचिस की जलती तीली


वो मेरे दाह-संस्कार को आतुर  


तुम्हारा वहशी चेहरा


 


 


 


 


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jung jaari hai -a new hind poem http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/04/21/jung-jaari-hai-a-new-hind-poem/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/04/21/jung-jaari-hai-a-new-hind-poem/#comments Wed, 21 Apr 2010 12:36:11 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=393




http://www.topnews.in/files/Naxalites_0.jpg

वो तने खड़े हैं 

एक मुठ्ठी धूप की चाहत में 
अंधेरे को ओढ़े हुए 

खाली पेट से 
उपजी हुंकार जंगलों से 
शहर को हैं ललकारती 
पर जिन लाशों पर 
उनके दांत गड़े हैं 
वो तो दीवारें भर थी 
कुछ घरों की 


बैलट बक्सों को
झौंक आये हैं 
अपने ही झोपड़ों की चिता पर 
उठा तो ली हैं बंदूकें 
पर रुख किस ओर है 
नहीं जानते अब तक 

अखबारों के पन्ने 
रोज बोलते हैं 
कभी उधर 
तो कभी इधर 
लाशें बिछती हैं अपनों की ही 
बस जंग जारी है  
 


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http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/04/21/jung-jaari-hai-a-new-hind-poem/feed/
Dantevaada ka dukh- ek kavita http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/04/16/dantevaada-ka-dookh-ek-kavita/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/04/16/dantevaada-ka-dookh-ek-kavita/#comments Fri, 16 Apr 2010 13:15:59 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=386
http://datastore.rediff.com/h5000-w5000/thumb/5C65676160696E735E6B68/17w9c6k4i13oz7i8.D.0.CRPF1_102714e.jpg


               
दंतेवाडा के जवानों 
तुमने संसद की दीवारों 
में अपनी लाशें क्यों लटका दी 
संसद तो अंधी है 
तुम्हारी चीख पुकार भी 
तो दंतेवाडा के जंगलों 
में ही दब गई थी 

ये संसद का जो शोर है 
यहाँ और हैं बहुत से 
मुद्दे जो गला फाड़ फाड़ 
चिल्ला रहे हैं 
पर ओ शहीद जवानों 
तुम्हारी लाशों से
बहुत भारी हैं 
रुपयों से लदे हुए ये मुद्दे

और तुमसे क्या कहूँ 
ये चीखती चिल्लाती संसद 
दरअसल बहरी है 
नहीं तो क्यों नहीं सुना 
किसी ने 
चूडियाँ का टूटना 
बूढ़े की लाठी का चटकना
माँ की गोद में 
सन्नाटे का पसरना 
नन्हीं आँखों में 
अचानक गूंगेपन का 
उतरना 

ये संसद बहरी है 
नहीं सुन सकती है 
पर जो सचमुच 
सुनते हैं वो जानते हैं कि 
बहुत भीषण आवाज के 
साथ गिरती है  
कोई खबर बिजली 
की तरह 
एक समूचे घर पर 

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nav-srijan-ek nai rachna http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/04/12/nav-srijan-ek-nai-rachna/ http://blogs.rediff.com/gopigoswami/2010/04/12/nav-srijan-ek-nai-rachna/#comments Mon, 12 Apr 2010 11:31:08 +0000 http://blogs.rediff.com/gopigoswami/?p=369

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मेरी कलम ने कहा 
मत गहराने दो 
इन अंधेरों को और तुम 
खुद से ही बांटों 
दर्द अपना 
चलो अपनी वेदना लिखो 


कुछ अर्थ मरे हुए शब्दों के 
ढूँढ रहे हो क्यों 
अपनी खाली जेब में 
तलाश में बीते कल की 
देखोगे आज को मरते 
आईने के फरेब में 
पूर्व आगे बढ़ने से 
अपने अत्तीत की लाशों पर 
चलो अपनी संवेदना लिखो  


आँखों की तरलता 
मैं कुछ स्वप्न 
यदि डूबने से हैं बचे हुए 
कुछ प्रश्न यदि 
हों अभी भी जीवित 
जीवन के गणित में उलझे हुए 
सिर उठाने से पहले 
अपने इन हाथों से 
चलो उनकी विवेचना लिखो  

सत्य है दिन मरता है 
शोक अँधेरे का रात भर 
मगर चलता है 
पर हर सुबह 
उमीदों की किलकारी में 
फिर एक नया 
स्वप्न पलता है 
इस नव-सृजन की बेला में 
साथ नए वादों के 
चलो अपनी मनोकामना लिखो


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                           ये आँसू  http://datastore.rediff.com/h5000-w5000/thumb/5C65676160696E735E6B68/q5hy8e2koedtue5s.D.0.vidisha-0065.jpg


गीलेपन में ही है छुपा सूखे सपनों का राज भी 
यूँ ही नहीं हम छलकाते हैं इन आँखों से पानी 
है कोई, जिसे देते हैं ये आँसू हमारे आवाज भी 

दर्द सुनाते हैं अक्सर ये आँसू बनकर साज भी 
गिरते हैं बेशक आँखों से पर बजते हैं दिल में 
है अलग दिल बहलाने का इनका ये अंदाज भी 

हर जुल्म कुबूल हमें, गिरती है तो गिरे गाज भी 
खुदा रखे आंसुओं का ये मरहम हमारा सलामत 
हर जख्म का हम रखते हैं अपने पास इलाज भी 

कुछ कतरे आँसू के संभाले होंगे उसने आज भी 
सुनकर खबर, आना ही पड़ेगा उसे कब्र पर हमारी  कोई इतना भी नहीं होता है किसी से नाराज भी 

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