gopigoswami’s blog

आपसे मिलकर खुशी हुई ……………आते रहना
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कुछ सौगातें

December 08, 2009 By: Category: Uncategorized

कुछ मुस्कुराहटें
इन आँसुओं ने भी बाँटी हैं
वो चैन से सोते होंगे
हमने रातें जागते हुए काटी हैं

कुछ मुरादें
इस दिल ने भी बाँटी हैं
बन कर टूटता हुआ तारा
गुजरते हैं हम अक्सर
उनकी छत के ऊपर से
और वो दौड़ कर आती हैं

कुछ सौगातें
इस नाकाम इश्क ने भी बाँटी हैं
बेशक कहती होंगी जख्म उनको
तन्हाइयों में अपने आँसुओं
से अब भी सहलाती हैं

कुछ हसरतें
इस खाक-ए-दिल ने भी बाँटी हैं
हम चूम के उन पलकों
को दे आए थे दुआएँ
अब ये उनकी बात है
किस रक़ीब को वो कब
आजमाती हैं

कुछ बरसातें
इस आसमां ने भी बाँटी हैं
उधर बरसता है
पानी झम झम
इधर आँखें हमारी
डबडबाती हैं


शांति मार्च (reposted)

December 07, 2009 By: Category: Uncategorized

 

             शांति मार्च

 

 

वो शांति मार्च था
मौन धारण किए लोग चलते
थे
हाथों में थामे जलती हुई
मोमबत्तियाँ
विरोध और गुस्से के इज़हार
के
लिए जलती हुई मोमबती को
प्रतीक
बनाकर वो सिद्ध कर चुके
थे
की वो सब संभ्रात और जागरूक
थे

सभी शामिल थे
उनमें
बच्चे, बूढ़े और
जवान
महिलाएँ और कुछ
बालाएँ
कुछ मनचले, कुछ दिलजले
भी….
कुछ बुझे बुझे, कुछ
गंभीर,
कुछ उत्साहित
और
कुछ आक्रोश से
भ्ररे
कुछ के हाथों में मोमबती
की
जगह् तख़्तियाँ
थी
आतंक से लाचार
जनता
निकम्मी
सरकार
ऐसा ही कुछ लिखा था उन
पर

एक अंधा भी शामिल
था
मोमबती हाथ में
लिए
जन-एकता का
प्रतीक
चलता था वो भी
डगमग
उस मौन जुलूस
में
वो जलती हुई मोमबती
नहीं
देख सकता
था
पर सोच रहा
था
कि दिन के उजाले में जलती
हुई
मोमबती का मतलब क्या
है

उस अंधे के कानों में कुछ
वार्तालाप
कैद हुए उस शांति मार्च
के
जो कुछ इस तरह से
थे..
कृपया मौन रहें, यह शांति मार्च
है
टीवी वाले नहीं हैं….गुप्ता जी तो कह रहे थे
कि
सब चैनल्स को फोन कर दिया
है…’
बेटे, FM की लीड कानों से निकाल
लो
वो भी आई
है….’
यार, ये मोमबती अपने अपने घरों
से
लाने का आइडिया किसका
था?’
इस शांति मार्च के चक्कर में सारा
दिन
खराब हो
जाएगा
कुछ रेफ्रेशमेंट का इंतजाम है या यूँ
ही
फोकट में मार्च कर रहे
हैं
इतना मेकअप कर के आई है..
कौन
कहेगा कि इसका आदमी मरे दो हीं महीने हुए
हैं
साड़ी नई लग रही है..आपकी ..कब
ली?’
यार ये अपनी सोसाइटी में नया माल कौन सा आया
है?’
संभाल के मोमबती गिर ना
जाए……’
मुझे तो ये फालतू का ड्रामा लगता
है….”
कब तक फ्री हो
जाएंगे….?
हाहा….हाहीहीहू..
हू..

तभी दूर से जोर से धमाके की आवाज़
आई……
क्या
हुआ…?’
ब्लास्ट……’
बम फटालगता
है…’
आतंकवादी
गये…’
भागो
और फिर मौन जुलूस चीख़ते चिल्लाते बिखर
गया
सब खिसक लिएअंधा
भी
सबके ..सब सिवाय एक छोटे से बच्चे
के
जो हाथ में पत्थर लिए खड़ा
था…………..
मौन, चेहरे पर आक्रोश
लिए
जैसे आज फ़ैसले की घड़ी गई
हो…..


उधर दूर जहाँ से धमाके की आवाज़ आई
थी
एक ट्रक खड़ा
था..
जिसका एक टायर दम तोड़ चुका
था
लेकिन..मानना पड़ेगा कि धमाका
सचमुच
जोरदार था…….


साया मेरा

December 04, 2009 By: Category: Uncategorized

मेरे मुस्कुराने भर की देर होती है
वो दोस्त बनकर सीने से लग जाता है
बस दर्द का यही अंदाज मुझे भाता है

करीब मंजिल के पहुँच जाता हूँ अक्सर
साँस भर फ़ासले का सफर रह जाता है
बस जुनून ये मेरा तभी मात खाता है

आस मर जाती है इंतजार में उसके
वो लम्हा जब कभी भी करीब आता है
बस अजनबी सा पास से गुजर जाता है

जो पलता है ख्वाब मेरी हथेलियों में
पंख लगने का जब भी समय आता है
बस बन के राख सामने बिखर जाता है

हर शाम साथ निभाने का होता है वादा
अंधेरों में मुझको वो फिर भी छोड़ जाता है
बस साया मेरा यूँ ही रोज मुकर जाता है


दोस्त

November 30, 2009 By: Category: Uncategorized

इस शहर में मेरा एक दोस्त था
किसी ने बताया
वो अब नहीं रहा
बस तब से ही गुमसुम हूँ
अपना घर, गलियाँ,
तालाब, मंदिर और
स्कूल कुछ भी तो
नहीं खोज पाया
बिना अपने दोस्त के
अपना ही शहर
अजनबी हो गया

सोचा था वो बाहें फैलाए मेरा
स्वागत करेगा
वो दूर से दिखाई देगा
उसी तरह मुस्कुराता झूमता
और मैं उससे लिपट कर
लड़कपन के
पलों को फिर से जिऊँगा
उस से कहूँगा
बरसों बाद भी वो मेरे सपनों में जिंदा है
आज भी मैं उसके इर्द-गिर्द
घूमता हूँ, उसकी बाहों में
झूलता हूँ और उसकी
छाती पर कुछ न कुछ
लिखता रहता हूँ

मेरी तलाश का अंत
मेरे सामने है
मेरी नम आँखें देख रही हैं
एक बेजान मोबाइल का टावर
ठीक उसी जगह्
जहाँ मेरे दोस्त को होना चाहिए था
इस शहर ने मेरे दोस्त की
हत्या कर दी
एक नीम का अदना सा पेड़ ही तो
था मेरा वो दोस्त

रात के आँसू

November 26, 2009 By: Category: Uncategorized


क्या तुम्हें या हैं''''''''''''''''''''''
"स क वो नन्हं बूँें
हर ूब पर बि'र
वो सर् रातों क म म आहें
ो रो सुबह मोत बन बिछ ात थ
स्वा?त में तुम्हारे'


'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
क्या तुम्हें या है
कोहरे में लिपट
उन बर्फल हवा"ं का संेश
ो रो सुबह
ध'ुल 'िड़क से
ुसकर तुम्हारे सिरहाने
'ड़ा हो ाता था
"र िस में छुपा होता था
वो मौन
'निमंत्रण
उन्हं नन्हं बूंों का
"र फिर चल पड़ते थे
तुम्हारे नं?े पैर
हर ूब क "र


'''

क्या तुम्हें या है
उन नन्हं बूंों क वो न्तिम भेंट
वो सर्ला चुंबन
वो कुछ म , कुछ ंड सिहरन
वो ?ला ?ला हसास
ो तुम्हार नायास बं होत
आँ'ों में ुल ाता था
एक म स कल्पना बन कर



रातें फिर सर् हो चल हैं
"र आ फिर
सिसकत रातों ने
कुछ नन्हं बूँें
मेर हथेलियों में ?िरा हैं
शाय ये रात के आँसू हैं
"र मैने बिछा िया है इन्हें
ूर् ूर् तक
फिर से उस हर ूब में
बस इंतार है तो
सिर्फ तुम्हारे नं?े पैरों का

अब क्या है शेष

November 25, 2009 By: Category: Uncategorized

कहाँ से आया इतना द्वेष
सत्ता का है खेल या
ये कुर्सी की है रेस

वो सब मिलकर
पेड़ गिराने पर तुले हैं
खोखली जड़ों में उनके
मुँह से उगले विष कण मिले हैं

लिए फिरते कुल्हाड़ी हाथ में
वृक्ष मित्र का धरे हैं वेश

वो बिके पड़े हैं सब
नमक इस मिट्टी का चख के
अब बेच रहे हैं तेज़ाब
जीभ में मिश्री को रख के

भरमाते हैं रूप बदल-बदल के
कभी जोगी, कभी दरवेश

हाशिए पर जा रहे धकेले
गरीब हो रहे रेखांकित
उधर होड़ लगी नभ छूने की
अमीरों की रेखा अपरिभाषित

डॉलर की इस दुनिया में
पैसे का वर्जित है प्रवेश

नारद मुनि सा भटकता
अस्थिर है स्तंभ चौथा
ख़बरों की लाश में घुसा पड़ा
खोज रहा है अब भी मौका

खुद हो गये नग्न अखबार- कैमरे
दिखलाने को अब क्या है शेष?









उनकी यादें

November 20, 2009 By: Category: Uncategorized


उनकी यादें मेरी तन्हाइयों को इस तरह लील गई
जख्म पहले से ही थे गहरे, वो उनको और छील गई

वो दिल से रिसते लहू को हमारे क्या समझेगें
जो नापने बैठें हैं दिल के कितने अंदर तक कील गई

तेरी बेवफाईयों को सनम, हम कर तो देते बेनकाब
वो हमारी ही वफ़ा थी जो होंठों को हमारे सील गई

चाँदनी रातों में अक्सर वहाँ खिला करते थे कमल
रेत ही रेत बिखरी है अब, जाने कहाँ वो झील गई

सूनी आँखों से तुझे ए आसमां, अब क्यों देखती हूँ मैं
दिल का टुकड़ा ही तो था, लेकर उड़ जिसे वो चील गई

कोलाहल

November 20, 2009 By: Category: Uncategorized

कहाँ गया
वो कोलाहल
जो रचा बसा था
मुझ में
एक अनमनी इजाजत
क्या दी मैनें
देहरी लाँघने की
वो खो गया
अनंत विस्तार में
छोड़कर मुझे
उन आवाजों के बीच
जो मेरी ही हैं
पर सुन नहीं सकता था
उस कोलाहल में

पर ये क्या?
ये आवाज़ें
इतनी कर्कश क्यों
होती जा रही हैं
क्या कोई नया कोलाहल
रच रहा हूँ मैं?

सुन लो ए आवाजों
इस बार मैं तुम्हें
देहरी से बाहर खुद धकेलूँगा
और भरूँगा अपने
खोखले अंतर को
उन गीतों के बोलों से
जो मैं सुनना चाहता था
उन होंठों से
जो पी रहे हैं एक कोलाहल
जो मैं दे आया था उनको
जाने-अनजाने

िं? संवार ले

November 19, 2009 By: Category: Uncategorized


हुई है रात भ कहाँ ोपहर क ह तो बात है
मंिल हो सामने तो फ़ासलों क क्या बिसात है
उ होंसलों को े हवा, िं? संवार ले
मुश्किलों को ए पथिक आ तू  ललकार ले

संकल्प तेरा विित, हार का फिर मलाल क्यों
रक्त-स्वे भ बहुत तु में, मन्थर तेर चाल क्यों
स्वप्नों क रा' से भ चिं?ार तू कोई उधार ले
उ होंसलों को े हवा, िं? संवार ले


इन कंटकों के मार्? पर भ त क तू हुंकार भर
न होने  े लक्ष्य को तू "ल,  एक बार  निहार कर
पथ नहं रण है ये, हिम्मत क तू  ब तलवार ले
उ होंसलों को े हवा, िं? संवार ले


कंबल वसा का े उड़ा, संबल विश्वास का संभाल
वर्षा, आंधियां या हो तड़ित थम न पाए तेर चाल
वक्त के प्रवाह को मोड़ पने आप  से उसे आकार े
उ होंसलों को े हवा, िं? संवार ले
मुश्किलों को ए पथिक आ तू  ललकार ले

आँसू

November 18, 2009 By: Category: Uncategorized

बहते हैं तो बहने दो हर दर्द का इलाज़ हैं, ये आँसू
जो होंठों से निकल सके दिल की वो आवाज़ हैं, ये आँसू



आँखों में ना छुपा के रखो, जीने की नई आस हैं, ये आँसू

पानी के चंद कतरे नहीं, समुंदर का एहसास हैं, ये आँसू



छ्लक कर कहते हैं कि आखरी नहीं होती कोई हार, ये आँसू

जीत की इक नई लड़ाई के लिए करते हैं तैयार, ये आँसू



आँखों में जमे, जज़्बातों कि लौ से जब पिघलते हैं, ये आँसू

दुखों को संग बहा ले जाने को तब निकलते हैं, ये आँसू



चीर कर अंधेरों को, उम्मीद क़ी रोशनी जगाते हैं, ये आँसू

जिंदगी के दिए ज़ख़्मों पर मरहम सा लगाते हैं, ये आँसू



खुशी से जब आँखों में भर आते हैं, ये आँसू

हर मुस्कुराहट पर भारी नज़र आते हैं, ये आँसू



बूँद नहीं हैं ये पानी क़ी, जीने का अरमान हैं, ये आँसू

सच तो ये है कि इंसान कि पहचान हैं, ये आँसू

लोकतंत्र

November 17, 2009 By: Category: Uncategorized

ये क्या कम है कि जिंदा हैं
घर में उनके दाल हैं न आटा है
वो क्या मुँह खोलेंगें अपना
पेट में जिनके सन्नाटा है

असंख्य हैं वो कुछ कम भी हो जाएँ
तो क्या किसी का जाता है
है बेकार गुहार गरीब की यहाँ
अविचलित प्रशासन का खर्राटा है

हाड़-मांस न दिखता तुझमें
वोट से ही उसका बस नाता है
वो नजर न आएगा पाँच साल तक
दिखा अंगूठा कर गया जो टाटा है

बिना धर्म और जाति के सहारे
सीडियाँ संसद की नहीं चढ़ पाता है
पाठ पढ़ा रहा है एकता को वो
जिसने इस देश को बाँटा है

जगमग करती लाल-नीली बत्तियाँ यहाँ
दीया आम जन का बूझता जाता है
ये मरा पड़ा है लोकतंत्र यहाँ सड़क पर
कहो किसने इसका गला काटा है

जाने क्यूँ अच्छा लगता है

November 10, 2009 By: Category: Uncategorized

बह जाता हैं आँसू बनकर हर ख्वाब
इन पलकों को अश्कों से भिगोना
फिर भी जाने क्यूँ अच्छा लगता है

वो लम्हे कहेंगे किस्सा बेवफ़ाई का
उसकी यादों को शब्दों में पिरोना
फिर भी जाने क्यूँ अच्छा लगता है

ख्याल उनका अब बन गया है तीर
हर नये जख्म को दिल में सजोना
फिर भी जाने क्यूँ अच्छा लगता है

अपना लगता है वो गीला सा सपना
बेशक टूटा हुआ है वो एक खिलोना
फिर भी जाने क्यूँ अच्छा लगता है

किस मोड़ पर खड़ा है ये दिल
इंतजार नहीं किसी का पर बाट जोहना
फिर भी जाने क्यूँ अच्छा लगता है

हे भगवान !

November 04, 2009 By: Category: Uncategorized

अगर होगे तुम अवतरित
इस कलयुग में हे भगवान !
तो फुटपाथ पर पसरी हुई
कुछ सिमटी कुछ बिखरी हुई
सिसकती साँसों के संग
घिसटती एक अर्धनग्न
अदना सी लाचार जिंदगी
हर तरह से बेकार जिंदगी
उठ खड़ी होगी अचानक
और पूछेगी तुमसे
कैसे हो तुम हे भगवान !

विस्मृति के दंश तुम्हारे
उसके बदन पर छपे हैं सारे
वो मर-मर के जीती है यहाँ
पत्थरों में खोजती तुम्हारे निशाँ
एक आधी-अधूरी सी जिंदगी
एक भूली-बिसरी सी जिंदगी
तुम्हें याद भी होगा कहाँ
पर कब से खड़ी है यहाँ
लिए सवालों के गुच्छे
करेगी तुम्हारा स्वागत्
पहचान तो लोगे न हे भगवान !

पाला तुमने अपनी हथेलियों में
उलझी पड़ी है अब पहेलियों में
छिटक तुम से दौड़-रही भाग रही
चाँद-तारों को भी यहाँ नाप रही
वो जिंदगी जिसे मतलब है आज से
गुज़रेगी वो भी तुम्हारे पास से
और देख तुम्हें यकायक
बस कहेगी हाय-हैलो
और तुम ठगे से रह जाओगे हे भगवान !

दीदार-ए-यार (re-posted)

November 03, 2009 By: Category: Uncategorized

कहाँ रोज रोज मिलती है वजह यूँ इस तरह पास हमारे आने की

कुछ देर और ठहरो कि आँखों ने इजाजत नहीं दी है अभी जाने की



क्या जरूरत है शर्म-ओ-हया को, लबों पर इस तरह पहरा बिठाने की

ग़र आँखों की जुबां समझो तो बात नहीं कुछ और तुम्हें बताने की



कैद कर लेंगे इन आँखों में हम उनको जिन्हें आदत थी छुप जाने की

आखिर कुछ तो सजा मिलनी ही चाहिए चुपचाप दिल में उतर आने की



तस्सवुर में खोई रहती थी ये आँखें, फुरसत कहाँ थी इन्हें छलक जाने की

क्यों फिर अब भर आई हैं, जबसे खबर मिली है चाँद निकल आने की



तन्हाइयों में तो सुना करते थे हम आवाज़ें सिर्फ वक्त के करहाने की

पंख से क्यों लग गये हैं उसको, आहट जब से हुई है उनके आने की



धड़कने खामोश हैं, साँसें थम गई हैं वजह क्या है जुबां के लड़खड़ाने की

कुछ तो कहो इरादा-ए-कत्ल है या कि आदत है तुम्हें यूँ ही मुस्कुराने की

डर

October 26, 2009 By: Category: Uncategorized

हे मृत्यु तेरा स्वागत है
उसने कहा
मौत ने सुना और लौट गई
चुपचाप
खाली हाथ

इस से पहले मौत
कभी नहीं हारी
जब भी आई
उसकी गठरी खोल
ले कर चलती बनी
एक एक कर
हर वो चीज जिस
पर उसने लिखा था
‘मेरा’

आज जब उसने
सारी गाँठे खोल दी
तो ‘डर’ भी बाहर
निकल कर खड़ा हो गया
और उसे प्रणाम कर
चला गया
मौत के पीछे-पीछे

आज पहली बार
बिना डर के वो सो रहा है
और उसे याद आ रही है
माँ की गोद