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वो फिर लौटा (reposted)

 

बिजली की कड़कड़ाहट और बारिश में काँपते हुए उसके कदम मंदिर की सीडियों पर लड़खडाकर पसर गये. आसमान एक दम स्याह हो गया था. तेज हवा भयंकर गर्जना के साथ पेड़ों को जैसे जड़ से उखाड़ देना चाहती थी. वह किसी तरह् से रेंगता हुआ मंदिर के अंदर घुस गया. अपने खून से सने हुए हाथों को दीवार पर किसी तरह् टिका कर उसने खड़ा होने का प्रयास किया पर सफल न हुआ. वह वहीं दीवार पर पीठ टिकाए बैठ गया. एकदम निढाल …उसके शरीर ने जैसे उसका साथ छोड़ दिया था. तूफान और बारिश का शोर उसके कानों में अंदर तक घुस रहा था और रह-रहकर कौंधती बिजली की चमक उसे जैसे अंधा बना रही थी. बारिश की बौछारें उस जीर्ण -जर्जर मंदिर के खुले द्वार पर पूरे वेग से प्रहार कर रही थी. जाने कितनी देर तक वह उसी प्रकार निश्चल और अर्धमुरछित सा पड़ा रहा… बीच बीच में बिजली की कौंध से मंदिर के बीचों-बीच स्थापित शिवलिंग उसकी अधखुली आँखों को नजर आता तो उसे अपने जीवित होने का अहसास होता. उसे लगा उसके होंठ सूखते जा रहे हैं और उसके भीतर जैसे खून जम सा गया था. पहली बार जीवन में उसने किसी जीते-जागते आदमी को चाकू से गोद कर मार डाला था. एक ऐसे व्यक्ति को जो उसे पहली बार मिला था और पहली मुलाकात का अंजाम था उस व्यक्ति की लाश जो अभी भी बारिश में मंदिर के बाहर पड़ी हुई थी. जिस वक्त उसके चाकू के अन्तिम प्रहार से वह गिरा था ठीक उसी वक्त बारिश की बौछार पड़ने लगी थी और कुछ ही क्षणों में ताज़ा गाढ़ा लहू जमीन पर पानी से मिलकर बहने लगा था.
और जब रक्त-रंजित हाथ में चाकू लिए वह पलटा तो पहली बार उसने लंगड़े उस्ताद के भयानक चेहरे पर मौत का खौफ देखा. वो चाकू हाथ में लिए जब उसकी तरफ बढ़ा तो उस्ताद के हाथों से ब्रीफ़केस गिर गया जिसके अंदर मौजूद पाँच लाख रुपयों की झलक अभी अभी देखी थी उसने.
“शंकर…मुझे माफ कर दे…” यही तो निकला था उस्ताद की लड़खड़ाती हुई जुबान से. वो हैरान था आखिर उस्ताद की जुबान पर दादा का नाम क्यों था.
लंगड़ा उस्ताद गिर पड़ा…उसकी बैसाखी दूर जा पड़ी. वो चीखने लगा …जोर जोर से. “शंकर….शंकर मुझे मत मार…मुझे माफ कर दे”
ज्यों ज्यों वह आगे बढ़ता उस्ताद पीछे-पीछे घिसटने लगता.
“उस्ताद….”- उसने चाकू को बाएँ हाथ में पकड़ा और दाहिने हाथ से उस्ताद को उठाने की कोशिश की…ठीक उसी वक्त उस्ताद की आँखें खुली रह गई…
“शंकर” उसकी जुबान पर अन्तिम शब्द जैसे अटक कर रह गया था..उसका मुँह अधखुला रह गया.
“उस्ताद…उस्ताद”…उसने झिंझोड़ कर उस्ताद के शरीर को हिलाया…पर बारिश की बौछारों से बेपरवाह बेजान शरीर धरती पर लुढ़क गया.
उस्ताद मर चुका था. अब उसके सामने दो बेजान जिस्म बिछे हुए थे. आसमान बिल्कुल काला हो गया था और बारिश भी तेज हो चली थी… और उसने एक नजर दोनों शरीरों को देखा जो औंधे मुँह जमीन पर गिरे पड़े थे जैसे तेज हवा के झोंको से दो पेड़ गिर गये हों. बिजली चमकी तो उसे उस्ताद का चेहरा दिखा …दहशत से भरा चेहरा और दो खुली हुई भयभीत आँखें. उसने चाकू फेंक दिया…और उसकी दोनों टांगे कांपने लगी…बिजली की चमक में मंदिर का द्वार उसे नजर आया और उसके कदम मंदिर की तरफ घिसटने लगे थे.

वो जीवन में पहली बार किसी मंदिर में घुसा था…और भी ऐसे मंदिर में जो बरसों से वीरान था…कभी कोई वहाँ पूजा करना तो दूर उस तरफ आता तक नहीं था.
सिर्फ उसके दादा…शंकर दादा वही आते थे इस मंदिर में वो भी महीने में सिर्फ एक बार तेरह तारीख को. एक-दो बार वो भी दादा के साथ आया था यहाँ…पर दादा उसे मंदिर के बाहर पीपल के पेड़ के पास खड़ा रहने की हिदायत देकर अकेले ही मंदिर में जाते थे और दीया जला कर वापस लौट आते थे. उन्होने कभी इस मंदिर के बारे में जिक्र नहीं किया. पर उसने सुना था कि यह मंदिर अभिशप्त था…जो यहाँ आता था उसका अनिष्ट जरूर होता था.. इसलिए बरसों से वह मंदिर जो बस्ती से काफी दूर एक पहाड़ी के टीले पर था वीरान ही रहता था. केवल महीने में एक बार दादा वहाँ आते और मंदिर की साफ-सफाई कर दीया जला आते. वो भी सिर्फ तेरह तारीख को. उसकी कभी हिम्मत नहीं हुई कि पूछे कि दादा आखिर इस मंदिर से आप का क्या रिश्ता है.
लेकिन दादा सिर्फ प्यार से उसके सिर के बालों को सहलाते मानों कह रहे हों मुन्ना इस राज को राज ही रहने दो.
लेकिन आज वो जान गया था कि क्यों दादा इस मंदिर में हर तेरह तारीख को दीया जलाने आते थे.
उस्ताद ने बताया था कि ये टूटा-फूटा मंदिर दरअसल एक समय गाँव रंगपुर की पहचान हुआ करता था. दूर-दूर से लोग इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने आते थे. मंदिर बहुत ही प्राचीन था और कई किवदंतियों को समेटे हुए था पर मान्यता इतनी थी कि लोग दो-दो घंटे पैदल चल कर इस मंदिर में शीश झुकाने चले आते थे. रंगपुर में करीब सौ या शायद इस से भी कुछ अधिक परिवार रहते थे. शिव रात्रि को यहाँ पूजा का विशेष आयोजन होता था.उस दिन तेरह तारीख थी, शिवरात्रि का दिन. विशेष रूप से बुलाई गई गाँव की पंचायत में उस दिन जो हुआ उस से पूरे गाँव में जैसे भूचाल सा उठ खड़ा हुआ. एक अठारह बरस की अविवाहित लड़की ने भारी पंचायत में अपनी कोख में पनप रहे बच्चे के लिए मंदिर के पुजारी को ज़िम्मेदार ठहरा दिया. पूरे गाँव में आक्रोश फैल गया. इतना जघन्य अपराध!, लोगों ने आव-देखा न ताव मंदिर की ओर लाठी-डंडों के साथ कूच कर दिया. पंचों का फ़ैसला आना शेष था..पर किसे परवाह थी फ़ैसले की. गाँव के लोगों ने फ़ैसला कर लिया था. मंदिर में पूजा करते पुजारी को खींच कर मंदिर के प्रांगण में घसीटा गया. ओर उसके कुकृत्या की सजा लोगों ने उसको वहीं डंडों ओर लाठियों से पीट पीट कर दे दी. बेचारा पुजारी भगवान शंकर की कसम खाता रहा ओर खुद को निर्दोष बताता रहा. पर गाँववालों ने एक न सुनी. पुजारी का अंत हो गया. इस घटना के ठीक एक महीने के बाद ही सरपंच के बेटे को लकवा मार गया. उसके आग्रह पर उसे चारपाई में मंदिर ले जाया गया. उसने सबके सामने कबूला कि दरअसल लड़की के पेट में पल रहे बच्चे के लिए वो खुद ज़िम्मेदार है ओर उसी के कहने पर लड़की ने पुजारी के उपर आरोप लगाया था और पुजारी जी निर्दोष थे.गाँव वाले सन्न रह गये ओर एक बेगुनाह व्यकित के खून के छींटे गाँव के हर आदमी के माथे पर लग गये. इस बीच वो लड़की पेट में बच्चा लिए कहीं लापता हो गई थी. कुछ सालों के बाद एक दिन तेरह तारीख को गाँव के सात लोग एक रहस्यमयी बीमारी से काल के मुँह में समा गये. गाँववालों ने इसे निर्दोष पुजारी की आत्मा का बदला माना और फिर कई तरह् की अफवाह जैसे किसी ने मंदिर में पुजारी की आत्मा को भटकते देखा या मंदिर में जो भी पूजा करता है उसके बुरे दिन शुरू हो जाते हैं..आदि.. आदि . नतीजा गाँव से लोगों का पलायन होने लगा और धीरे धीरे एक जीता जागता गाँव, रंगपुर इतिहास बन गया. गाँव निर्जन हो गया…मंदिर सुनसान हो गया. पर जो व्यक्ति हर महीने की तेरह तारीख को वहाँ दिया जलाने आता था वो उसी लड़की की कोख से जन्मा था और स्वयं को और अपनी माँ को पुजारी की हत्या के लिए दोषी मानता था और हर महीने की तेरह तारीख को दिय जला कर शायद प्रायश्चित कर रहा था. वो शंकर दादा थे.
उसके अपने शंकर दादा.
बाहर बारिश का शोर थोड़ा कम लग रहा था.. उसने अंदाज़ा लगाया शायद दोपहर के तीन बज रहे थे. पर उसे अब भी चारों तरफ अंधेरा लग रहा था. वो जल्दी से जल्दी बाहर निकल कर यहाँ से भागना चाहता था..कत्ल…उसके हाथों कत्ल..जिसने आज तक कभी चींटी तक नहीं मारी..एक जीते जागते इंसान को कैसे उसने बेरहमी से मार डाला था. वार पर वार …उसका जैसे अपने हाथों पर नियन्त्रण नहीं था…किसी अदृश्य शक्ति के वशीभूत होकर उसके हाथों ने एक व्यक्ति की जान ले ली जो शायद उसके बाप की उम्र का था. और फिर उस्ताद…उसे क्या हुआ …वो दादा का नाम लेते लेते क्यों मर गया. उसने क्या देखा….उसके चेहरे पर. वो मंदिर में आखिर आया ही क्यों. उस्ताद ने तो उस से कहा था कि दादा यहाँ मंदिर में आएंगे…पर दादा नहीं मिले. वो आदमी कौन था जो उसके हाथों मारा गया. उस्ताद को उसने नोटों से भरा ब्रीफ़केस क्यों दिया. उन सवालों का जवाब उसके पास न था. तभी अचानक जैसे उसे लगा कि कोई रो रहा है….बाहर कीचड़ में किसी के चलने की आवाज़ हुई. कौन हो सकता था…यहाँ इस मंदिर के पास दूर दूर तक कोई नहीं रहता था. दादा?…पर ये तो किसी औरत के रोने की आवाज़ थी.. फिर आवाज़ अपने आप बंद हो गयी. कौन हो सकता था..उसे पता था कि मंदिर कोई ज्यादा बड़ा नहीं है…मुख्य मंदिर के अलावा ज्यादा से ज्यादा चार क्मरे होंगे..वो भी टूटे-फूटे और फिर प्रवेश द्वार भी एक ही है. क्या कोई मंदिर में पहले से था जो मंदिर के पीछे वाले किसी कमरे से निकल कर बाहर मंदिर के द्वार के ठीक सामने लाशों के बीच घूम रहा था..एक स्त्री…उसने उठ कर बाहर देखना चाहा पर…जैसे शरीर में उसके ताकत़ नहीं थी.. फिर वो भयभीत भी कितना हो गया था. वो स्त्री कौन थी..अब उसकी आवाज़ क्यों नहीं आ रही है…क्या वो अब भी वहीं है उन लाशों के बीच?

उसने बारिश के मंद होते शोर को एक तरफ़ रख कर सुनने का प्रयास किया पर अब कोई आवाज़ नहीं आ रही थी. वो अंदर से बहुत डरा हुआ था और मंदिर के बारे में सुनी गई भूत-प्रेत की कहानियों पर न चाहते हुए विश्वास करने लगा. उसने नीम अंधेरे में मंदिर के हर कोने को ध्यान से देखा. रख रखाव के अभाव में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ अवशेष मात्र रह गई थी.उसे दादा की याद आई…महीने में एक दिन ही सही लेकिन मंदिर में दीया जलता था और साफ-सफाई भी होती थी. सात साल गुजर गये दादा को देखे. उसे दादा के साथ अपनी आखिरी मुलकात याद हो आई. लंगड़े उस्ताद ने कहा दादा उस से मिलना चाहते हैं. और वो उनसे मिला भी जेल में….
“मुन्ना…कैसे हो’…दादा बहुत कमजोर से लग रहे थे.
और वो सिर्फ दादा के चेहरे को देखे जा रहा था.
“क्या तुम भी समझते हो..तुम्हारे बाबूजी का कत्ल मेंने किया है?”
“नहीं..”-उसने तुरंत उत्तर दिया था.
दादा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट फैल गई जैसे कोई बहुत बड़ा बोझ उनके दिल से उतर गया था.
“माँ कैसी है’?
उसने देखा दादा के चेहरे पर नाख़ूनों के निशान बहुत गहरे लगे थे.. माँ ने गुस्से में न जाने क्या क्या कहा था और शंकर दादा के चेहरे को बुरी तरह् नोच-खसोट दिया था.
“माँ अस्पताल में है…बार बार बेहोश हो जाती है”
दादा के चेहरे का रंग उड़ गया.
“मुन्ना …उसका चेहरा छ्प गया है मेरी आँखों में..अगर फाँसी से बच गया..तो गंगा मैया कि सौगंध..जेल से निकलते ही…” उन्होने वाक्य अधूरा छोड़ दिया.
“तुमने देखा उसे?”-उसने पूछा था.
“हाँ-मैं गैराज बंद कर ही रहा था, तभी वो गाड़ी से उतर कर मेरे पास आया और कहने लगा उसकी गाड़ी खराब हो गई है. मैंने कहा ठीक है.. पर जैसे ही मैं गाड़ी की तरफ़ आगे बढ़ा….पीछे से मेरे सिर पर वार हुआ …मैं वहीं गिर पड़ा…होश आया तो खुद को गाड़ी की अधखुली डिक्की में फंसा पाया..अंदर बाबूजी की लाश थी और मेरे हाथों में चाकू और खून…यही सच है…मुन्ना पर किसी को मेरी बात पर यकीन नहीं..
माँ को भी नहीं…वो भी यही समझती है..मैंने मारा है बाबूजी को…?
“कौन था वो?”
दादा चुप रहे .
“माँ का ख्याल रखना”-यही उनके आखिरी शब्द थे.
वो उसकी आखिरी मुलाकात थी शंकर दादा से.
दादा उसके जीवन में अचानक आए थे-भगवान बन कर. एक दिन स्कूल से लौटते समय वो एक सड़क हादसे में वो घायल हो गया तब दादा ही उसे अस्पताल ले गये थे और तब उसकी जान बचाने के लिए अपना खून भी दिया था.
माँ और बाबूजी उनके बहुत अहसानमंद थे वो दादा से मिलना चाहते थे पर दादा माँ और बाबूजी को मिले बिना ही चले गये. वो अस्पताल में करीब एक महीना रहा और इस बीच शंकर दादा बराबर उनसे मिलते थे पर कभी उन्होने माँ और बाबूजी का सामना नहीं किया. बाबूजी बहुत चाहते थे कि वो शंकर दादा से मिले पर शंकर दादा हंस कर टाल देते थे. वो ठीक हुआ और फिर से स्कूल जाने लगा. शंकर दादा अक्सर स्कूल में छुट्टी के बाद उस से मिला करते थे. उन्होने बताया वो किसी लंगड़े उस्ताद के गैराज में नौकरी करते हैं और बहुत अच्छे मैकेनिक हैं. क्भी कभी तो वो नई-नई गाड़ियाँ लेकर आते और वो शहर भर में उनके साथ घूमता. माँ स्कूल से लेट आने की वजह पूछती तो वो बहाने बना देता.
फिर एक दि न उसने माँ को शंकर दादा के बारे में बताया. माँ ने कहा वो उस से मिलना चाहती है. यह बात उसने दादा को बताई तो दादा ने साफ मना कर दिया. उसके बाद से दादा ने उस से मिलना छोड़ दिया. कुछ दिन बाद ही वो बीमार पड़ गया..बुखार था कि पीछा ही नहीं छोड़ता था. नींद में भी वो अक्सर दादा का नाम लेकर बड़बड़ाने लगा था. माँ के कहने पर आखिर बाबूजी ने संदेशा भेज कर शंकर को बुलाया. उस दिन दादा पहली बार उस के घर आए. दादा को देखते ही माँ की आँखों में आँसू आ गये और वो दादा से लिपट कर जोर-जोर से रोने लगी. दादा निर्विकार भाव से खड़े रहे. दादा को सामने देख कर वो बहुत खुश हुआ..पर माँ का व्यवहार उसे समझ नहीं आया. दादा ने उस के सिर पर हाथ फेरा और आँखों ही आँखों में पूछा मुन्ना कैसे हो? वो थोड़ी देर उसके पास बैठे, उससे बातें की और फिर चले गये.
उस रात उसने माँ और बाबूजी की बातें सुनी…बाबूजी ने क्रोध में आकर माँ को चेतावनी देते हुए कहा था कि शंकर के पैर घर में दोबारा नहीं पड़ने चाहिए.
तब माँ ने रोते रोते कहा था कि वो अपनी ममता का गला कैसे घोट दे. इतने बरसों के बाद शंकर घर आया था….और भी क्या-क्या कहा माँ ने वो बुखार के कारण नीम-बेहोशी की हालत में था इसलिए सुन नहीं पाया.
उस दिन उसे पता चला कि शंकर दादा सचमुच उसके दादा थे. वे दोनों एक ही कोख से जन्मे थे.
वो ठीक हुआ पर उसने माँ से कोई सवाल नहीं किया और जा पहुँचा दादा के गैराज में.
“दादा-क्या तुम सचमुच मेरे भाई हो?” उसने सवाल किया था.
दादा की आँखों में आँसू आ गये. उन्होने उसे गले लगा लिया.
“हाँ-पर तुम्हारे बाबूजी मेरे बाबूजी नहीं हैं”
दादा ने फिर उसे बताया कि वो एक बिन-ब्याही माँ की संतान होने का बोझ लिए जी रहे हैं. पाँच साल तक किसी तरह माँ ने उसे पाला पोसा पर जब उसकी माँ को लगा कि इस दुनिया में एक छत और एक आदमी के बिना जीना बहुत कठिन है तो उन्होने शादी कर ली. फिर मुन्ना का जन्म हुआ. बाबूजी ने शंकर को कभी अपना बेटा नहीं माना. वाबूजी से लड़-झगड़ कर किसी तरह माँ ने शंकर को स्कूल भेजना शुरू कर दिया. बाबूजी हमेशा उसे डाँटते फटकारते और माँ उसके लिए बाबूजी से लड़ती. बाबूजी एक कंपनी के मामूली से मुलाजिम थे और उन्हें शराब पीने की आदत थी. एक दिन खेल-खेल में शंकर ने तीन साल के मुन्ना को धक्का दे दिया और मुन्ना के सिर से खून बहने लगा. माँ ने बाबूजी के गुस्से को देखते हुए उसे उस समय घर से चले जाने को कहा. बस …उस दिन के बाद शंकर ने घर में कदम नहीं रखा. भूखे प्यासे दस बरस के शंकर को लंगड़े उस्ताद ने आसरा दिया और अपने गैराज में साफ-सफाई के काम में लगा दिया. तब से शंकर वहीं उसी गैराज में लंगड़े उस्ताद को मई-बाप समझ कर रह रहा था. माँ ने उसका पता लगाया और उस से मिलने की कोशिश की पर शंकर को तो अपनी माँ और बाप दोनों से नफरत हो गई थी. कहीं से उसको यह भी पता चल गया था कि उसकी माँ एक बसे-बसाए गाँव को उजाड़ने के लिए ज़िम्मेदार थी. एक निर्दोष पुजारी की हत्या के लिए दादा ने स्वयम् को भी ज़िम्मेदार माना और फिर हर महीने की तेरह तारीख को मंदिर में दीया जलाकर अपनी तरफ से पश्चाताप करने लगे. हालांकि यह बात दादा ने उसे नहीं बताई.

दादा उसके भाई हैं, यह जानकार उसे बहुत खुशी हुई और साथ ही दादा के प्रति उसके हृदय में सम्मान भी बढ़ चला था. माँ को भी पता चल गया था कि मुन्ना को शंकर के बारे में सब पता चल गया है. अब वो खाली वक्त में बेझिझक दादा के गैराज में पहुँच जाता और घंटों उनसे बतियाता. इधर बाबूजी के व्यवहार में बहुत परिवर्तन आ गया था. उन्होने कंपनी की नौकरी छोड़ दी. अब वे देर रात तक घर से बाहर रहते और कभी कभी तो दो-दो दिन तक घर भी नहीं लौटते. माँ के बार बार पूछने पर यही कहते कि अब उनके दिन फिरने वाले हैं और जल्द ही वो पैसों का अंबर लगा देंगे. माँ कुछ शंकित हुई..उन्हैं लगा जरूर वो कोई गलत काम कर रहे हैं. और फिर सचमुच उनके दिन फिर गये. बाबूजी अक्सर नोट से भरे बैग लेकर आने लगे. घर की कायाकल्प हो गई और कुछ दिनों बाद उनके घर के बाहर शानदार कार खड़ी हो गई. वो बहुत खुश था. अब न बाबूजी उस से पढ़ाई के बारे में चर्चा करते न ही दादा से मिलने से रोकते. पर माँ पति के व्यवहार से बहुत दुखी थी. दादा भी हैरान थे उनके घर और रहन सहन में आए परिवर्तन को देख कर. फिर एक दिन दादा से मिलने जब वो उनकी गैराज में पहुँचा तो दादा ने बताया कि वो जल्द ही लंगड़े उस्ताद का साथ छोड़ देंगें उन्हैं पता चल गया है कि उस्ताद का संबंध नशे के कारोबारियों से है साथ ही उन्होने अपना शक जता दिया कि बाबूजी का संबंध भी ऐसे ही लोगों से है.उस दिन उसे सचमुच बहुत ग्लानि हुई और अपनी नयी नयी अमीरी पर उसे शर्म आने लगी. उसने सीधे जा कर माँ को यह बात बताई तो माँ ने हंगामा खड़ा कर दिया और उस दिन बाबूजी से खूब लड़ी. तब बाबूजी ने भी गड़े मुर्दे उखाड़कर माँ के चरित्र पर कटाक्ष करने शुरू कर दिए. माँ बहुत रोई और घर छोड़ने की धमकी दे डाली. अब बाबूजी बहुत परेशान रहने लगे. माँ ने उनसे बात करना छोड़ दिया और वो स्वयम् भी बाबूजी के पास नहीं जाता था, विरोध स्वरूप उसने पुराने कपड़े पहनने शुरू कर दिए. बाबूजी माँ को बहुत चाहते थे तभी तो उन्होने माँ के बारे में सब कुछ जानते हुए भी उनसे शादी की थी. उन्हैं अपनी गलती का अहसास हो गया था और एक दिन उन्होने स्वीकार किया कि पैसों के लालच में ही वो इस तरह् का गैर-कानूनी काम करने लगे थे..उन्होने माँ को वचन दिया कि वो जल्द ही सही वक्त आने पर इस धंधे से निकल् जाएंगे. पर कुछ दिन बाद ही एक सुबह उनके घर पुलिस आ गई और दादा को बाबूजी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. माँ को बहुत गहरा सदमा लगा…उनको लगा कि दादा ने ही बाबूजी की हत्या की है. दादा जेल चले गये और माँ पूरी तरह से टूट चुकी थी. पति के परिवार से नाता तोड़े बरसों हो गये थे. अब माँ क्या करती . कुछ दिनों के बाद ही माँ पर पागलपन के दौरे पड़ने लगे. मुन्ना तब चौदह बरस का था. उसने स्कूल जाना छोड़ दिया. एक साल किसी तरह घर गुजर गया. पर माँ की हालत काफी बिगड़ गई..लोंगों के कहने पर उसने माँ को पागलखाने में भरती कर दिया… फिर एक दिन उसने उस्ताद के गैराज में उस्ताद से मुलाकात की ..उस्ताद का गैराज अब बहुत बड़ा हो गया था..बहुत से लोग वहाँ काम करते थे. उसने मुन्ना को रख लिया. उस्ताद अब गैराज बहुत कम आता था…अब उसका चेहरा बहुत डरावना और रौबीला हो गया था. चार-पाँच लोग हमेशा उसके साथ रहते थे. दिन गुजरे और फिर एक दिन पता चला कि दादा जेल से रिहा हो गये हैं..पर कहाँ गये किसी को कुछ पता नहीं था.. मुन्ना को बहुत दुख था कि दादा ये जानने तक नहीं आए कि वो कैसा है और माँ कैसी है. फिर एक दिन पता चला कि उस्ताद पर चाकुओं से हमला हुआ है और वो अस्पताल में है. बड़ी मुश्किल से उस्ताद की जान बची. ठीक हुआ तो बहुत डरा डरा सा रहने लगा और देर तक गैराज में ही बैठ कर शराब पीता रहता. अब वो कहीं आता जाता नहीं था और न ही उसके पास पहले जैसे आदमियों की फौज रहती. एक दिन सुबह जब वो गैराज पहुँचा तो उस्ताद ने उसे बुलाया.
“मुन्ना-तुम्हें दादा से मिलना है?”
फिर वो और उस्ताद एक पुरानी कार लेकर निकल् पड़े उस मंदिर की तरफ़. रास्ते में उस्ताद ने बताया कि वो उसके बाबूजी के बारे में एक राज जानता है और जिसे वो उसे मंदिर में ही जा कर बताएगा. मुन्ना चुपचाप गाड़ी चलाता रहा उसे तो सिर्फ और सिर्फ दादा से मिलना था. बारिश का मौसम बनता जा रहा था. उसने गाड़ी तेज कर दी क्योंकि लगभग आधा घंटा उन्हें पैदल भी चलना था कच्चे रास्ते पर. रास्ते में उस्ताद ने मंदिर के बारे में बताया.
वो मंदिर के पास पहुँचे.
“दादा कहाँ है?”
थोड़ा इंतजार करो, उस्ताद ने कहा और अपनी जेब से चाकू निकाल कर उसकी धार को परखने लगा. बहुत देर हो चली थी.
उस्ताद ने घड़ी देखी-वो किसी का इंतजार कर रहा था. आसमान काला हो चुका था. किसी भी समय बारिश हो सकती थी. और फिर एक आदमी दूर से आता दिखाई दिया.
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है.
वो आदमी करीब आ चुका था.
“बैग-इधर दो-जगदीश सेठ”
आदमी ने ब्रीफ़केस उसकी तरफ उछाल दिया. लंगड़े ने फौरन उसे खोल कर देखा. नोटों से भरा हुआ बैग. उसकी आँखों में चमक उभर आई.
“मुन्ना …यही है तेरे बाप का कातिल ये ले चाकू…छोड़ना मत साले को….हाँ यही है…”-इसने मारा तेरे बाप को…शंकर ने नहीं बहुत बड़ा ड्रग डीलर है ये..”-उस्ताद जैसे पागल हो गया था उसने मुन्ना के हाथ में चाकू थमा दिया था.
मुन्ना ऐसी परिस्थिति के लिए तय्यार नहीं था. उसने आज तक कभी चींटी तक नहीं मारी थी. वो चाकू फेंक देना चाहता था पर धीरे-धीरे उसे लगा कि वो अपनी सुध खो रहा है…उसके शरीर में परिवर्तन हो रहा था. जिसे वो सिर्फ महसूस कर सकता था. उसके पाँव स्वत्: उस आदमीं की तरफ़ बढ़े और फिर जैसे किसी ने उसका हाथ उपर उठा दिया…और फिर एक के बाद चाकू का प्रहार ……

मुन्ना एक झटके से वर्तमान में आ गया. हल्की सी रोशनी मंदिर में पड़ने लगी थी. कितना कुछ घट गया था जीवन में..वो अब एक हत्यारा था….वो घुटनों में मुँह छुपा कर रोने लगा.
“मुन्ना”-एक आवाज़ गूंजी.
दादा….उसे लगा कि दादा ने पुकारा.
“कहाँ हो..दादा..?” उसने इधर-उधर देखा. उसने आवाज़ सुनी दादा की.
“पीपल के पेड़ के नीचे..”
ये आवाज़ कहाँ से आई …कोई आस पास नहीं था..पर ये आवाज़…वो इधर-उधर देखने लगा. कोई नहीं था…
“मैंने आवाज़ सुनी दादा की”…उसने चिल्ला कर कहा….”दादा…दादा”
वो खड़ा हुआ और पागलों की तरह् भागने लगा……मंदिर के टूटे-फूटे कमरों में…
“दादा-दादा”-एक कमरे से, दूसरे कमरे में…और फिर जैसे ही तीसरे कमरे में घुसा तो एक इंसानी जिस्म से जा टकराया.
“माँ….” वो जोर से चीखा.
वो उसकी माँ थी…पागल माँ…
“मुन्ना…”-उसकी माँ के चेहरे पर अजीब से भाव उमड़ रहे थे…जैसे उसे पहचाने की कोशिश कर रही हो.
“मैं…मुन्ना …माँ…मुझे पहचानों माँ….तुम यहाँ कैसे”…उसने माँ को बुरी तरह् झिंज़ोड कर रख दिया.
“वो आएगा…आज तेरह तारीख है…न..वो आएगा”-उसकी माँ चीख़ते हुए कमरे के टूटे हिस्से से कूद कर बाहर की तरफ भागी.
मुन्ना भी माँ..माँ चिल्लाता हुआ उसके पीछे भागा. वो घूम कर उसी जगह पहुँची जहाँ दो लाशें औंधे मुँह पड़ी हुई थी….
बाहर रोशनी थी…और फिर वो ठिठक कर रह गया.
चारों तरफ़ …गीले..गीले नोट बिखरे हुए थे…ब्रीफ़केस आधा खुला था..और उसमें से उड़कर नोट फैले हुए थे…हर तरफ़ …कुछ फट कर तार तार हो गये थे…और कुछ पीपल के पेड़ के तने से जा चिपके थे. उसकी माँ हंस रही थी…
“वो आएगा…तेरह तारीख…है आज”-वो खुशी से ताली बजा रही थी.
अचानक उसकी नजर ब्रीफ़केस के अधखुले हिस्से पर पड़ी…वो झुका और उसने देखा गीले नोटों के बीच एक कागज का टुकड़ा था.
उसने उसे निकाल कर पढ़ना शुरू किया.
“जगदीश सेठ, ये चिट्टी तुम्हारे पास मेरी आखरी चेतावनी है…तुमने मुझे धोखा दिया..मुझे मारने की कोशिश की…पर अब मेरी बारी है…पाँच लाख रुपये लेकर तेरह तारीख को उसी मंदिर में पहुँच जाना जहाँ हम दोनों ने शंकर को मार कर ठिकाने लगाया था. शंकर के बाप को मारने में मैने तेरी मदद की…और तूने हमेशा कुत्ते की तरह मुझे रखा….रोटी का टुकड़ा मुझे फेंक कर खुद कमाई का सारा हिस्सा खाता रहा.. तूझे तो शंकर मार डालता…पर मैने तुझे उस से बचाया ..तेरी खातिर उस को मैने मार डाला…कल तेरह तारीख है…पाँच लाख रुपये लेकर वहीं पहुँच जाना वरना तेरी असलियत दुनिया के सामने होगी”
“नहीं…….”-उसे लगा मानों भूचाल सा आ गया हो.
उसके दादा ….अब दुनिया में नहीं हैं…..
….पर माँ वो हँसे जा रही थी…”वो आएगा..” वो मंदिर के मुख्य द्वार की तरफ़ भागी..
बोझिल कदमों से चलते हुए वो सोच रहा था की कैसे इस पागल को बताए की शंकर दादा दुनिया में नहीं है.
मंदिर में दाखिल हुआ …तो सन्न रह गया वहाँ एक दीया जल रहा था…और माँ एक दम शांत हाथ जोड़े खड़ी थी.
ये कैसे हो सकता है…उसने माँ के दोनों कंधे पर हाथ रख कर उसे घुमाया…
“माँ…” उसने देखा …माँ आँखों में आँसू लिए खड़ी थी. एकदम शांत, कोई उन्माद नहीं….
माँ ने मुन्ना को गले लगा लिया.
“मुन्ना…शंकर …तेरा भाई …देख वो यहाँ आया था…ये दीया जल रहा है…वो मेरे सपने में आता था..बार बार यही कहता था उसने बाबूजी को नहीं मारा है….उसने बाबूजी को नहीं मारा है”
“हाँ …माँ ..दादा ठीक कहते थे….वो यहाँ आए थे…उन्होने अपना बदला भी ले लिया…आ…माँ में तुझे दादा से मिलाता हूँ…मेरे साथ आ”-उसने माँ का हाथ पकड़ा और मंदिर के बाहर निकला. माँ मंत्रमुग्ध उसके साथ चलने लगी.
मुन्ना ने एक बार दोनों लाशों को देखा…और आगे बढ़ कर पीपल के पेड़ से एक टहनी तोड़ी.
“माँ…दादा यहाँ हैं…इस पेड़ के नीचे…वो कष्ट में हैं..माँ.”
फिर टहनी से उसने पीपल के पेड़ के नीचे जमीन को खोदना शुरू कर दिया. माँ चुपचाप हाथ जोड़े देख रही थी कैसे उसका मुन्ना एक आत्मा की मुक्ति के लिए धरती माँ से वापिस माँग रहा है अपने दादा को.
……………समाप्त


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