वो तने खड़े हैं एक मुठ्ठी धूप की चाहत में अंधेरे को ओढ़े हुए खाली पेट से उपजी हुंकार जंगलों से शहर को हैं ललकारती पर जिन लाशों पर उनके दांत गड़े हैं वो तो दीवारें भर थी कुछ घरों की बैलट बक्सों को झौंक आये हैं अपने ही झोपड़ों की चिता पर उठा तो ली हैं बंदूकें पर रुख किस ओर है नहीं जानते अब तक अखबारों के पन्ने बोलते हैं कभी उधर तो कभी इधर लाशें बिछती हैं अपनों की ही बस जंग जारी है

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