April 2010
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jung jaari hai-a poem on naxalites

वो तने खड़े हैं  एक मुठ्ठी धूप की चाहत में  अंधेरे को ओढ़े हुए  खाली पेट से  उपजी हुंकार जंगलों से  शहर को हैं ललकारती  पर जिन लाशों पर  उनके दांत गड़े हैं  वो तो दीवारें भर थी  कुछ घरों की  बैलट बक्सों को झौंक आये हैं  अपने ही झोपड़ों की चिता पर  उठा तो ली हैं बंदूकें  पर रुख किस ओर है  नहीं जानते अब तक  अखबारों के पन्ने बोलते हैं  कभी उधर  तो कभी इधर  लाशें बिछती हैं अपनों की ही  बस जंग जारी है  


Dantevada ka dukh: ek kavita

दंतेवाडा के जवानों  तुमने संसद की दीवारों  में अपनी लाशें क्यों लटका दी  संसद तो अंधी है  तुम्हारी चीख पुकार भी  तो दंतेवाडा के जंगलों  में ही दब गई थी  ये संसद का जो शोर है  यहाँ और हैं बहुत से  मुद्दे जो गला फाड़ फाड़  चिल्ला रहे हैं  पर ओ शहीद जवानों  तुम्हारी लाशों से बहुत भारी हैं  रुपयों से लदे हुए ये मुद्दे और तुमसे क्या कहूँ  ये चीखती चिल्लाती संसद  दरअसल बहरी है  नहीं तो क्यों नहीं सुना  किसी ने  चूडियाँ का टूटना  बूढ़े की लाठी का चटकना माँ की गोद में  सन्नाटे का पसरना  नन्हीं आँखों में  अचानक गूंगेपन का  उतरना  ये संसद बहरी है  नहीं सुन सकती है  पर जो सचमुच  सुनते हैं वो जानते हैं कि  बहुत भीषण आवाज के  साथ गिरती है   कोई खबर बिजली  की तरह  एक समूचे घर पर