Dantevada ka dukh: ek kavita
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दंतेवाडा के जवानों
तुमने संसद की दीवारों
में अपनी लाशें क्यों लटका दी
संसद तो अंधी है
तुम्हारी चीख पुकार भी
तो दंतेवाडा के जंगलों
में ही दब गई थी
ये संसद का जो शोर है
यहाँ और हैं बहुत से
मुद्दे जो गला फाड़ फाड़
चिल्ला रहे हैं
पर ओ शहीद जवानों
तुम्हारी लाशों से
बहुत भारी हैं
रुपयों से लदे हुए ये मुद्दे
और तुमसे क्या कहूँ
ये चीखती चिल्लाती संसद
दरअसल बहरी है
नहीं तो क्यों नहीं सुना
किसी ने
चूडियाँ का टूटना
बूढ़े की लाठी का चटकना
माँ की गोद में
सन्नाटे का पसरना
नन्हीं आँखों में
अचानक गूंगेपन का
उतरना
ये संसद बहरी है
नहीं सुन सकती है
पर जो सचमुच
सुनते हैं वो जानते हैं कि
बहुत भीषण आवाज के
साथ गिरती है
कोई खबर बिजली
की तरह
एक समूचे घर पर

Sunder kavita. Harkat to hui. Bahut afsos ki baat hai ki jaayaz aur zaroori harkat ke liye itni kuchh hona hota hai. Insensitivity ka ilaj aawashyak hai aur sansad to baad ki baat hai, pehle to ek ek insaan ks swayam apne prati, pados ke prati mohalle aur shahar ke prati aur desh ke prati kartavyanishth hona aavashyak hai. sarkar. samudaya dharma aadi sab bad mein.