jung jaari hai-a poem on naxalites
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वो तने खड़े हैं
एक मुठ्ठी धूप की चाहत में
अंधेरे को ओढ़े हुए
खाली पेट से
उपजी हुंकार जंगलों से
शहर को हैं ललकारती
पर जिन लाशों पर
उनके दांत गड़े हैं
वो तो दीवारें भर थी
कुछ घरों की
बैलट बक्सों को
झौंक आये हैं
अपने ही झोपड़ों की चिता पर
उठा तो ली हैं बंदूकें
पर रुख किस ओर है
नहीं जानते अब तक
अखबारों के पन्ने बोलते हैं
कभी उधर
तो कभी इधर
लाशें बिछती हैं अपनों की ही
बस जंग जारी है

सुखद अहसास
यह कैसी जंग है….
जिसमे सूखे जिस्मो का साथ
देता है केवल भय.…अनिश्चय
और समाज की वंचना …..
मौत की दहलीज़ पर
खुलते हैं मुहाने…
हर रास्ते के ….आएँ चाहे जहाँ से
फिर भी हाथ मे बंदूक
सांस मे मरता हुआ साहस ले
निकले हैं जूझने को ….
शायद कहीं जिंदा है अभी भी
जीतने की आस …..
बस यही है सुखद अहसास ….
PRIY GOPI JI, AAP KI IS KAVITA KI UTKRISHTA NE MUJHE EK POST LIKHANE KI PRERNA DI HAI…COPY KAR PASTE KAR RAHA HOON …IS MERA SHURUAATI SAHYOG SAMJHEN APNI JUNG ME….
डॉ. बृजेश कुमार त्रिपाठी
very powerful writing Gopiji,very true,poor only suffers in every jung….and later named as naxalites,moists,anti social so on…keep ur gud work…:)