
जीवन के सफ़र में अब तनहा न रहा में,
तुम से मिलकर यूँ लगा के अब खुद का ही न रहा में !
वो जब मिला था पहली बार तुमसे,
हर पल हर लम्हा सहेजकर रखा है दिल में,
यूँ तो वक़्त चलता रहेगा अपनी ही रफ़्तार से,
आगाज़ अपने प्यार का सदा महकता रहेगा दिल में !
पहली मुलाक़ात में ही कुछ ऐसा जादू कर गए,
मेरी साँसों को,इन धडकनों को बेकाबू कर गए,
तुमसे मिलकर लगा के जिंदगी फिर मुस्कुरायी है,
खुशियाँ जहाँ भर की अब मेरे घर आयीं हैं !
तुम यूँ ही मुस्कुराते रहना सदा,
मेरे दिल की है बस यही दुआ,
धड़कने भी मेरी अब चहकने लगीं है,
साँसों ने तेरी दिल को कुछ ऐसा छुआ !
बैठे हैं राहों में यूँ पलकें बिछाकर,
हो इंतज़ार जैसे सदियों से तेरे आने का ,
आहट तेरे कदमों की एक बार सुन तो लूं,
तू क्या जाने कितना है जूनून दिल में तुझे पाने का !
करो वादा के साथ न छोड़ोगे कभी,
मुश्किलें तो राहों में आती ही रहेंगी,
टूट भी जाएँ ये उम्मीदें सारी,
दिल नहीं तोड़ोगे कभी !
Kartik Shrivastava
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By Kartik Shrivastava
– August 28, 2011
बातों बातों में ही जो निकल आई है यूँ दिल की बात,
अब तो ये बेचारा दिल मचल के रहेगा,
जिंदगी की कसती जो डूबते डूबते बची है तूफानों में,
अब तो मुसाफिर साहिल पर भी संभल के रहेगा,
लाख कोशिशें कर लो रोकने की, थामने की,
वक़्त तो रेत है , हाँथ से फिसल के रहेगा,
मुद्दतों से था इन्तेजार जिसका,वो लम्हा आने को है,
अब तो है यकीन ये बदरंग समां बदल के रहेगा,
जलती हुई बस्तियों से जो आरही है दर्द की आहें,
अब तो हरेक पत्थर दिल पिघल के रहेगा,
खामोशियों से जो उठने लगा है पर्दा हौले - हौले,
राज-ए-दिल अब तो हरेक पता चल के रहेगा,
उम्मीदों के धागे में जो पिरोये है ख्वावों के मोती,
है यकीन अब तो हरेक अरमान दिल का निकल के रहेगा,
नफरत की है जो चिंगारियां इन्हें जरा सुलगने दो,
देखना एक दिन इस आग से खुद का ही घर जल के रहेगा ……!
Kartik Shrivastava
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By Kartik Shrivastava
– August 30, 2009
लोग जो समझते हैं तो समझते रहे नासमझ मुझे,
मेने अब भी दिल में अपने , कई सवालों को दबा रखा है ,
करूँ भी तो कैसे में खुद को बयां ,
कभी ख्यालों में कभी सवालों में , में उलझता बहुत हूँ…….
वो छोटी छोटी बातों पर यूँ लग जाना गले,
तब शहर की फिजाओं की कुछ बात ही अलग थी ,
अब तो हैं बस गिले शिकवे दरम्यान दिलों के,
उन छोटी-छोटी खुशियों के लिए अब में तरसता बहुत हूँ…….
यूँ जो न आ सकी दिल की बात जुवान पर,
गम तो इसका भी रहेगा सदा मुझे ,
आँखों से ही कर दो हाल ए दिल बयां अपना ,
में दिल ही दिल में समझता बहुत हूँ………
ये जो है ख्वावों की छोटी सी दुनिया मेरी,
आशियाने हजारों हैं सजा रखे मेने यहाँ,
डर है के खो न जाऊं अपनी ही दुनिया में कहीं ,
ख्वावों की इन राहों में, में भटकता बहुत हूँ………
कभी कभी सोचता हूँ हर रिश्ते में कुछ कमी है,
हर मोड़ पर कुछ आहट है हर आँख में कुछ नमी है,
मिलने की न रही कोई तमन्ना बाकी,
में अपनी ही उम्मीदों के दायरे में सिमटता बहुत हूँ……..
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By Kartik Shrivastava
– June 21, 2009
नयी सुबह के इंतज़ार मे ,
वक़्त की बहती धुप- छांव मे,
कुछ बुझे से कुछ थके से ,
कुछ लाचारी के बोझ तले !
चहरे से झलकती है तन्हाई
दूर-दूर तक नहीं कोई परछाई
कुछ डरे से,कुछ सहमे से,
कुछ बेदर्द ग़मों के दर्द तले !
खामोश िगगाहें तकती हैं राहें,
टूटे िबखरे ख्वावों से कैसे यकीन िदलायें,
कुछ बहके से,कुछ िसमते से,
कुछ मायुशी के गर्त तले !

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By Kartik Shrivastava
– March 9, 2008
हूँ जो मे तनहा तो तनहा ही सही ,
मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !
हमराही िमले कई ,हमसफ़र एक न िमला,
हरेक ने छोड़ा साथ,िकस-िकस से करें िगला,
सुनसान सफर िक गुमनाम है मंिजल,तो गुमनाम ही सही !
…………..मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !
कुछ न भाया तो पुरानी यादें ताजा कर ली,
पाया जो ख़ुद को अकेला तो आईने से दोस्ती कर ली,
गर िबछडो से न हो िमलना तो न िमलना ही सही !
…………..मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !
यूं तो मुझमे कुछ भी ख़ास नहीं,
पर है यकीन मेने तोडा िकसी का िवश्वास नहीं,
यूं लगते रहे मुझ पर इल्जाम,तो इल्जाम ही सही।
…………..मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !
एक िदन मे जब िजन्दगी से थक जाऊंगा,
इस तनहा से सफर मे जब कहीं रुक जाऊंगा,
न िमल पायेगी मंिजल तो ना िमल पाना ही सही,
………….मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !

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By Kartik Shrivastava
– February 26, 2008

छिितज से छिितज तक बस तुम ही तुम हो,
तुम्हारी इन झील से गहरी आँखों मे ,
डूब गए मेरे जीवन के हर पल,
तुम्हारी इन खुलती बंद होती पलक़ों से,
चांदनी कभी िदख़ती है ,कभी होती है ओझल !
तुम्हारे इन सुर्ख होंटों से िनकले बोल,
उतर जाते हैं मन के रस्ते िदल तक,
और तुम्हारे इस शर्म से झुके चहरे को देखने,
मेरी नजरें हर मुश्िकलें पार कर पहुंच जाती हैं तुम तक !
वह तुम हो हाँ तुम ही तो हो,
िजसने मेरे हरेक ख्याल को चुरा िलया है,
कल तक रखा था िजन्हे प्यार से सहेजकर,
उन लम्हों को पलभर मे अपना बना िलया है !
अब तो समझो मेरी बेकरारी का आलम,
िक ये नजरें अब और इन्तेजार न कर पायेंगी,
तुम जो चली जाओगी कभी मझसे दूर,
मेरी साँसे बस उसी पल थम जायेंगी !
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By Kartik Shrivastava
– February 12, 2008
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By Kartik Shrivastava
– January 30, 2008

वक़्त-बे-वक़्त भटकते कदमों को ,मंजील का कोई नीशान नहीं मीलता,
दम तोड़ रही हैं ख्वावीसें जमीन पर,
ख्वाबों मे भी उन्हें “अपना आश्मान“ नहीं मीलता….
तो क्या हुआ जो मीट गया आखरी नीशान भी मंजील का,
राह मे मेरी उम्मीदों के दीये जलाये रखना,
मीट भी जाये गर मेरे सारे आशीयाने,
दील मे मेरे मोहब्बत का जज्बा बनाए रखना………
जीस राह पर मे चला था ,कभी जाकर उस राह पर देखना,
टूटे हुए मेरे ख्वाबों के टुकडे हर जगह पाओगे,
आंखों से जो कह गया हूँ मे जींदगी की दास्ताँ,
दील तक पहुचाने दो ,सब समझ जाओगे……….

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By Kartik Shrivastava
– January 27, 2008
आँधी मे ,तूफ़ानों मे,
जर्जर सरकारी मकानों मे,
सफ़र की लंबी थकानो मे ,
एक आसरा तलाशता “बेजान” आदमी,
उफ्फ ………ये आम आदमी.
राशन की लंबी कतारों मे,
अस्पताल की चार दीवारों मे,
महँगाई से भरे बाज़ारों मे,
खुद की पहचान तलाशता “गुमनाम ” आदमी,
उफ्फ ………ये आम आदमी.
आँखों मे कुछ टूटे सपने लीए,
रूठते रीश्तोन मे कुछ अपने लीये,
दील मे कुछ ना भूल पाने वाले सदमे लीये,
तसल्ली के कुछ पल तलाशता “नाकाम” आदमी,
उफ्फ ………ये आम आदमी.
लाख हों गम फीर भी खुशी से पीता है,
सच है जीन्दगी जी भर के जीता है,
फीर चाहे हर दीन संघर्ष मे बीता है,
दर्द को हम्दर्द बना लेता है “नादान” आदमी,
उफ्फ ………ये आम आदमी.

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By Kartik Shrivastava
– January 10, 2008
माना की गम तो जींदगी मे आते ही रहेंगे,
ग़मों को लगाकर गले,दोस्त अपना बनाते रहो,
देखना एक दीन जींदगी आकर कहेगी तुमसे,
इसी तरह लोगों को जींदगी जीना सीखाते रहो,
तुम बस मुस्कुराते रहो………….
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By Kartik Shrivastava
– December 27, 2007