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मेरे हमसफ़र …….

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जीवन के सफ़र में अब तनहा न रहा में,
तुम से मिलकर यूँ लगा के अब खुद का ही न रहा में !

वो जब मिला था पहली बार तुमसे,
हर पल हर लम्हा सहेजकर रखा है दिल में,
यूँ तो वक़्त चलता रहेगा अपनी ही रफ़्तार से,

आगाज़ अपने प्यार का सदा महकता रहेगा दिल में !

पहली मुलाक़ात में ही कुछ ऐसा जादू कर गए,
मेरी साँसों को,इन धडकनों को बेकाबू कर गए,
तुमसे मिलकर लगा के जिंदगी फिर मुस्कुरायी है,

खुशियाँ जहाँ भर की अब मेरे घर आयीं हैं !

तुम यूँ ही मुस्कुराते रहना सदा,
मेरे दिल की है बस यही दुआ,
धड़कने भी मेरी अब चहकने लगीं है,
साँसों ने तेरी दिल को कुछ ऐसा छुआ !

बैठे हैं राहों में यूँ पलकें बिछाकर,

हो इंतज़ार जैसे सदियों से तेरे आने का ,
आहट तेरे कदमों की एक बार सुन तो लूं,
तू क्या जाने कितना है जूनून दिल में तुझे पाने का !

करो वादा के साथ न छोड़ोगे कभी,
मुश्किलें तो राहों में आती ही रहेंगी,
टूट भी जाएँ ये उम्मीदें सारी,
दिल नहीं तोड़ोगे कभी !

Kartik Shrivastava
My Website :
www.kartikshri.co.cc
My Other Blogs :
A Developers Diary [On Web Technologies]


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कुछ दिल से……..


बातों बातों में ही जो निकल आई है यूँ दिल की बात,
अब तो ये बेचारा दिल मचल के रहेगा,

जिंदगी की कसती जो डूबते डूबते बची है तूफानों में,
अब तो मुसाफिर साहिल पर भी संभल के रहेगा,

लाख कोशिशें कर लो रोकने की, थामने की,
वक़्त तो रेत है , हाँथ से फिसल के रहेगा,

मुद्दतों से था इन्तेजार जिसका,वो लम्हा आने को है,
अब तो है यकीन ये बदरंग समां बदल के रहेगा,

जलती हुई बस्तियों से जो आरही है दर्द की आहें,
अब तो हरेक पत्थर दिल पिघल के रहेगा,


खामोशियों से जो उठने लगा है पर्दा हौले - हौले,
राज--दिल अब तो हरेक पता चल के रहेगा,

उम्मीदों के धागे में जो पिरोये है ख्वावों के मोती,
है यकीन अब तो हरेक अरमान दिल का निकल के रहेगा,

नफरत की है जो चिंगारियां इन्हें जरा सुलगने दो,

देखना एक दिन इस आग से खुद का ही घर जल के रहेगा ……!


Kartik Shrivastava
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में एक ख्वाव हूँ……..



लोग जो समझते हैं तो समझते रहे  नासमझ मुझे,
मेने अब भी दिल में अपने , कई सवालों को दबा रखा है ,
करूँ भी तो कैसे में खुद को  बयां ,
कभी ख्यालों में कभी सवालों में , में उलझता बहुत हूँ……. 

वो छोटी छोटी बातों पर यूँ लग जाना गले,
तब शहर की फिजाओं की कुछ बात ही अलग थी ,
अब तो हैं बस गिले शिकवे दरम्यान दिलों के,
उन छोटी-छोटी खुशियों के लिए अब में तरसता बहुत हूँ…….

यूँ जो न आ सकी दिल की बात जुवान पर,
गम  तो इसका भी रहेगा सदा मुझे ,
आँखों से ही कर दो हाल ए दिल बयां अपना ,
में दिल ही दिल में समझता बहुत हूँ………

ये जो है ख्वावों  की छोटी सी दुनिया मेरी,
आशियाने हजारों हैं सजा रखे मेने यहाँ,
 डर है के खो न जाऊं अपनी ही दुनिया में कहीं ,
ख्वावों की इन राहों में, में भटकता बहुत हूँ………

कभी कभी सोचता हूँ हर रिश्ते में कुछ कमी है,

हर मोड़ पर कुछ आहट है हर आँख में कुछ नमी है,

मिलने की न रही कोई तमन्ना बाकी,

में अपनी ही उम्मीदों के दायरे में सिमटता बहुत हूँ……..




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Salam Bhopal…………..



Dec. 2-3, 1984-The Bhopal Gas Tragedy……..One Of The Biggest
Disasters in the World in Which More Than 20,000 People Were Killed and More Than 170,000 Were SEVERELY
AFFECTED……..It Has Been 23 Years Since Then But the Effect of that
Disaster is Still Continuing…….Here are Few Lines Dedicated to All
Who Were Affected
by This Disaster…………


उम्र की चादर ओढे , यादों की लाठी िलये,
ग़मों की सर्द हवाओं से बचने , बेठे हे उम्मीदों के िचराग तले !

नयी सुबह के इंतज़ार मे ,
वक़्त की बहती धुप- छांव मे,
कुछ बुझे से कुछ थके से ,
कुछ लाचारी के बोझ तले !

चहरे से झलकती है तन्हाई
दूर-दूर तक नहीं कोई परछाई
कुछ डरे से,कुछ सहमे से,
कुछ बेदर्द ग़मों के दर्द तले !

खामोश िगगाहें तकती हैं राहें,
टूटे िबखरे ख्वावों से कैसे यकीन िदलायें,
कुछ बहके से,कुछ िसमते से,
कुछ मायुशी के गर्त तल !


  
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कोई िशकायत नहीं……………

हूँ जो मे तनहा तो तनहा ही सही ,
मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !

हमराही िमले कई ,हमसफ़र एक िमला,
हरेक ने छोड़ा साथ,िकस-िकस से करें िगला,
सुनसान सफर िक गुमनाम है मंिजल,तो गुमनाम ही
ही !
…………..
मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !

कुछ भाया तो पुरानी यादें ताजा कर ली,
पाया जो ख़ुद को अकेला तो आईने से दोस्ती कर ली,
गर िबछडो से हो िमलना तो िमलना ही सही !
…………..मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !

यूं तो मुझमे कुछ भी ख़ास नहीं,
पर है यकीन मेने तोडा िकसी का िवश्वास
नहीं,
यूं लगते रहे मुझ पर इल्जाम,तो इल्जाम ही
सही।
…………..मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !

एक िदन मे जब िजन्दगी से थक जाऊंगा,
इस तनहा से सफर मे जब कहीं रुक जाऊंगा,
िमल पायेगी मंिजल तो ना िमल पाना ही सही,
………….मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !


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sirf tum…………


छिितज से छिितज तक बस तुम ही तुम हो,

तुम्हारी इन झील से गहरी आँखों मे ,
डूब गए मेरे जीवन के हर पल,
तुम्हारी इन खुलती बंद होती पलक़ों से,
चांदनी कभी िदख़ती है ,कभी होती है ओझल !

तुम्हारे इन सुर्ख होंटों से िनकले बोल,
उतर जाते हैं मन के रस्ते िदल तक,
और तुम्हारे इस शर्म से झुके चहरे को देखने,
मेरी नजरें हर मुश्िकलें पार कर पहुंच जाती हैं तुम तक !

वह तुम हो हाँ तुम ही तो हो,
िजसने मेरे हरेक ख्याल को चुरा िलया है,
कल तक रखा था िजन्हे प्यार से सहेजकर,
उन लम्हों को पलभर मे अपना बना िलया है !

अब तो समझो मेरी बेकरारी का आलम,
िक ये नजरें अब और इन्तेजार कर पायेंगी,
तुम जो चली जाओगी कभी मझसे दूर,
मेरी साँसे बस उसी पल थम जायेंगी !


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मे अजनबी हो गया……..



गाँव
मे मेरे ,हर घर मे चर्चा मेरा आम था,
आप के शहर मे आकर मे अजनबी हो गया…..

घर से नीकला था दील मे कुछ अरमान लेकर,
कुछ अपनो के,कुछ परायों के ,हलके से अहसान लेकर…..
सपने टूटे ,अपने रूठे ,जाने ये क्या हो गया,
ठोकर लगी गीरा जो मे तो,लोगों कीकहकशीहो गया……..
………………………………..
मे अजनबी हो गया……

इन दौड़ती भागती सडकों पर ,मे खुद से ही दूर था बहुत,
दर-दर भटकते इन कदमों से मे मजबूर था बहुत,
मन मे थी एक कसक,जाने यहाँ क्या खो गया,
मंदीर,मस्जीद,गुरूद्वारे जा-जा कर मेमजहबीहो गया……..
………………………………..
मे अजनबी हो गया……

आया तो पाया यहाँ हर चीज पैसों के पीछे दौड़ती है,
आपके शहर की हरेक गली मे जींदगी दम तोड़ती है,
नाम कमाने आया था ,गुमनाम हो कर कहीं खो गया,
कभी थमती इन बेबसों की भीड़ मे ,मैंबेबसीहो गया……..
………………………………..
मे अजनबी हो गया……

*(There
are some spelling mistakes in hindi posts which have been done
deliberately to make them readable and compatible with all types of web
browsers.)


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कुछ अनकही…………..


वक़्त-बे-वक़्त भटकते कदमों को ,मंजील का कोई नीशान नहीं मीलता,
दम तोड़ रही हैं ख्वावीसें जमीन पर,
ख्वाबों मे भी उन्हें  “अपना आश्मान“  नहीं मीलता….

तो क्या हुआ जो मीट गया आखरी नीशान भी मंजील का,
राह मे मेरी उम्मीदों के दीये जलाये रखना,
मीट भी जाये गर मेरे सारे आशीयाने,
दील मे मेरे मोहब्बत का जज्बा बनाए रखना………

जीस राह पर मे चला था ,कभी जाकर उस राह पर देखना,
टूटे हुए मेरे ख्वाबों के टुकडे हर जगह पाओगे,
आंखों से जो कह गया हूँ मे जींदगी की दास्ताँ,
दील तक पहुचाने दो ,सब समझ जाओगे……….

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आम आदमी……….


आँधी मे ,तूफ़ानों मे,
जर्जर सरकारी मकानों मे,
सफ़र की लंबी थकानो मे ,
एक आसरा तलाशता “बेजान” आदमी,
उफ्फ ………ये आम आदमी.

राशन की लंबी कतारों मे,
अस्पताल की चार दीवारों मे,
महँगाई से भरे बाज़ारों मे,
खुद की पहचान तलाशता “गुमनाम ” आदमी,
उफ्फ ………ये आम आदमी.

आँखों मे कुछ टूटे सपने लीए,
रूठते रीश्तोन मे कुछ अपने लीये,
दील मे कुछ ना भूल पाने वाले सदमे लीये,
तसल्ली के कुछ पल तलाशता “नाकाम” आदमी,
उफ्फ ………ये आम आदमी.

लाख हों गम फीर भी खुशी से पीता है,
सच है जीन्दगी जी भर के जीता है,
फीर चाहे हर दीन संघर्ष मे बीता है,
दर्द को हम्दर्द बना लेता है “नादान” आदमी,
उफ्फ ………ये आम आदमी.


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मुस्कुराते रहो……

ये दुनीया एक सुख -दुःख की बगीया , फूल बनकर इसे महकाते रहो,
तुम बस मुस्कुराते रहो……

हर पल हर लम्हा जींदगी का ,कीमती है दोस्तों,
समेटकर बाहों मे इन्हें, मीठी यादैँ बनाते रहो,
कभी लगे जब जींदगी मायुश सी उदास सी,
खोलकर बाहैँ अपनी,ख़ुशी के ये पल लुटाते रहो,
तुम बस मुस्कुराते रहो………….
दील से ढूंदो तो पाओगे हर साज जींदगी मे,
जोड़कर इन साजों को ,गीत ख़ुशी के बनाते रहो,
कभी जब गीरने को हो आंशु आँखों से,
बंद कर आँखें अपनी,ख़ुशी के ये गीत गाते रहो,
तुम बस मुस्कुराते रहो………….

माना की गम तो जींदगी मे आते ही रहेंगे,
ग़मों को लगाकर गले,दोस्त अपना बनाते रहो,
देखना एक दीन जींदगी आकर कहेगी तुमसे,
इसी तरह लोगों को जींदगी जीना सीखाते रहो,
तुम बस मुस्कुराते रहो………….

(There is some font problem with hindi blogs which may vary from one browser to other)

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