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वो बचपन के दीन…..


वो बचपन के दीन जब याद आते हैं,ये पल ये लम्हे मासूम से हो जाते हैं,
वो हलकी सी तक्रारें ,वो मीठी सी नोंक-झोंक ,
वो रोज नए बहाने बनाना, वो कल के रूठे दोस्तो को मनाना,
वो स्कूल की घंटी ,वो खेल का मैदान,
वो झील के कीनारे आम का बागान,
वो पत्थर उचालकर कच्चे आमों को गीराना,
वो दौड़ की होड़ मे दोस्तो को गीराना -उठाना,
वो सावन के झूले ,वो कोयल की कूक,
वो बारीश की रीम्झीम मे भीगना -भीगाना ,
वो बारीश के पानी से आंगन का भर जाना,
फीर कागज की कस्तीयां बनाकर पानी मे चलाना !
जाने ये अब कहॉ खो गए ,सायद अब ये कीसी ओर के हो गए
वो बचपन के दीन जब याद आते हैं,ये पल ये लम्हे मासूम से हो जाते
हैं

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ख्वाव……..



गीरते टूटते बीखरते ख्वाव ,
उम्मीदों के दायरे मे सीमटते ख्वाव !
बोझल पलकों से आखों मे उतरते ख्वाव ,
आखों से फीर दील तक पहुँचते ख्वाव !
दील मे रचते बसते खीलते ख्वाव ,
फीर दील ही दील मे घुटते सीसकते ख्वाव !
हरेक तनहा आँखों मे बसते ख्वाव ,
आँसू बनकर कभी बरसते ख्वाव !

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मौसम ….



सुबह की मीठी धुप मे , बर्फ सी ठंड हो गयी गुलाबी
मीट्टी की सोंधी खुशबू से आंगन की फीज़ा हो गयी शराबी
मेरे घर की छत प्र मौसम ने जब अंगड़ाई ली
सर्द सुबह की हलकी आहत से कन-कन ने रंगत बदली
दूर छीतीज़ तक फेले मैदानों ने तब हरियाली की चादर ओडी !



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जहाँ प्यार मीले……………



ना ग़मों के हो साये ना दर्द का नामों नीशां ,
दील चल चलें वहाँ जहाँ प्यार मीले
दूर ख्वावों के देश मे कोई तो होगा अपना ,
इन्तेजार में पलकें बीछाये तकता होगा रस्ता अपना
दूर ग़मों को छोड़ चलें हम, दर्द सारे भूल चले हम,
छोड़ चलें उन यादों को , भूल चलें सारे गीले ,
दील चल चलें वहाँजहाँ प्यार मीले….!







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वक़्त की आपा-धापी में कदम ये रुकते नहीं
आगे बड़ने की होड़ में जाने क्यों कभी थकते नहीं

इतनी बड़ी भीड़ में एक अजीब सी घुटन है

जाने अनजाने चेहरों मे ना जाने कीसे धूंढता ये मन है

जाने क्यों दुनीया यहाँ पैसों के पीछे दौड़ती है

शहर की हरेक गली में जींदगी दम तोड़ती है !







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हमसफ़र……



दूर नज़र रही हैं मंजील के सफ़र अब तय होने को
तू ऐसे ना देख मुझे हमराही के दील अब मेरा रोने को है
बीछडे
जो अब हम तो ना जाने फीर कब मीलेंगे
मेरे हमराही मुमकींन यही है की अब ख्वावों मे मीलेंगे
मत कहो कुछ होटों से के ये नजरें सब बता रहीं है
दील मे छीपे हैं कीतने ही राज के सभी से परदे उठा रहीं हैं
आप से बीछड्नै का कीतना है गम हमको
की अब ये ऑंखें नम होती ही जा रहीं है
जाते हो तो जाओ पर इतना तो बताते जाओ
क्या अपको भी हमारी याद इतना ही सता रही है !







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पीते जाते हैं….



ठोकर खा-खा कर गीरते हैं , गीर-गीर कर फीर उठते हैं ,
उठ-उठ कर सभंलते है , फीर संभल- संभल कर चलते हैं,

 चल -चल कर आगे बड़ते हैं , आगे बड़-बड़ कर सफ़र तय करते हैं ,

सफ़र तय कर-कर मंजील पाते हैं , मंजील पा-पा कर जीते हैं,

 जी-जी कर मरते जाते हैं , मर-मर कर जीते जाते हैं ,

ग़मों को आँसुऑ मे घोलकर ….पीते जाते है,पीते जाते हैं ,पीते जाते हैं !







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वो सुबह फीर आएगी …..




वो सुबह फीर आएगीवो सुबह फीर आएगी
सुबह
जीसने हर लीये थे अपने सारे गम ,
सुबह जीसने कर दीं थी परेसानीयां सारी कम
तू क्यों घबराता है देखकर इस अन्धीयारे को,
की वोह सुबह फीर आकर दीये जला जायेगी
वो सुबह फीर आएगीवो सुबह फीर आएगी

सूरज की पहली कीरन के साथ देगी वो दस्तक,
की खुसीयों की नदीयां लेकर आएगी वो घर तक
हे अगर वीश्वास तुझे उस सुबह पर,
तो देख वो आकर तुझे जगा जायेगी
वो सुबह फीर आएगीवो सुबह फीर आएगी

अगर कर सकता हे इन्तेजार तो कर,
के उससे दूर नहीं अब तेरा नगर
तू नींद से उठकर देख सकता हे अगर ,
तो देख वो तेरे नगर खुसीयों के फूल खीला जायेगी
वो सुबह फीर आएगीवो सुबह फीर आएगी







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तुम्ही से तो है जीवन तुम्ही से तो हंसी,तुम्ही ने तो भर दी है जींदगी मे कह्क्सी
तुम जो ना होतीं तो ये जींदगी वीरान होती,
मुस्कुराहटों के पीछे छीपी खामोशी के समान होती
तुम्हे पाकर ही तो जींदगी मे हरेक चीज पाई हे,
तुम्हे देखकर ही तो मंजीलें खुद- -खुद पास आयीं हे
तुम्हारे आने की आहट से खिल जाती हैं मुर्झाईं कलीयां,
तुम्हारे गुजरजाने से रोशन हो जाती हैं सुनसान गलीयां



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