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YEH ZARUURI NAHI
Posted by Aameen Khan in Fantasy on February 11th, 2010
चाह हो तो मंज़िल मिले यह ज़रूरी नहीं
सुख की चाह मे सुख ही मिले यह भी ज़रूरी नहीं
नदी की चाह समंदर मे समा जाने की
पर है यह चाह उसका अस्तित्व भुला देने की
चाहे फिर समंदर उसे मिले यह ज़रूरी नाही
हर काली रात बलखाती नागिन की तरह
सुबह के इंतज़ार मे तड़पे यह ज़रूरी नहीं
पर है यह चाह अपना अस्तिव मिटाने की
चाहे फिर उसे दीन का उजाला ना मिले यह ज़रूरी नहीं
आँखों की चाह मदभरे सपनो की
ना हो सपने तो पलके मूंद देने की
किसीको पाने की बदले उसे सॅंजो कर रखने की
चाहे उससे मिलन का संजोग मिले यह ज़रूरी नाही
…………………………………………………………आमीन
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